शनिवार, 27 अगस्त 2016

कश्मीर देखे यह राष्ट्रभक्त कि घर का किराया

नमस्कार। बहुत दिनों बाद आज फिर कुछ देर मुखातिब हूं आपसे शब्दों के जरिए।
शनिवार देर रात ट्विटर पर श्री श्री रविशंकर और आतंकी बुरहान बानी के पिता की तस्वीर वायरल थी। तमाम सवालों के साथ। सवाल यह भी थे कि अब भक्त ( छदम धर्मनिरपेक्षों की नजर में कथित मोदी समर्थक और राष्ट्रभक्त) क्या कहेंगे? कतिपय पत्रकारों  को देशद्रोही बताने वाले बताएं? कुछ ने इसे दोगलेपन की संज्ञा दी।
मैंने एक टि्वटरबाज को जवाब दिया- श्री श्री और हाफिज सईद में कोई अंतर नहीं है क्या?
उसका जवाब आया--फर्जी राष्ट्रभक्त।
मैंने लिखा- जो लोग अपना नाम छुपाकर छद्म नाम से लिखते हैं उनसे मुझे नसीहत नहीं चाहिए। दोगले ही नाम छुपाते हैं ऐसा मानना है मेरा।
कश्मीर जल रहा है और क्यूं? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। टेलीविजन की एक चर्चा में पता चला कि एक बार प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने हुर्रियत के नेताओं से पूछा था कि आखिर वह चाहते क्या हैं? बगलें झांकने लगे थे कश्मीर के तथाकथित रहनुमा।  ऐसे में मुझे लगता है कि महबूबा मुफ्ती फिलहाल सही हैं। उनका  कहना है कि पनचानबे फीसद कश्मीरी शांतिप्रिय हैं? पर यहां मुझे शक है। यदि बहुसंख्यक कश्मीरी शांतिप्रिय हैं तो मुट्ठीभर चरमपंथी हावी कैसे हैं? बल प्रयोग जरूरी है ऐसे लोगों पर और मुझे खुशी है कि केंद्र सरकार ने वहां बीएसएफ की तैनाती करीब बारह साल बाद कर दी है। इंशाअल्लाह। हम दुआ करते हैं बेहतरी की अमन की।
--अब कुछ निजी पीर।
आज दफ्तर में सुबह पहुंचना था। पौने दस बजे ही आ गया। यूनिट कंटेंट मानीटरिंग भेजनी जो थी। पर आने से पहले घर में तकरार हो गई? पूछेंगे क्यों? वजह जान लें-पैसा।
दरअसल हमारे मकान मालिक साहब सुबह नुमाया हो गए। मेरे मन के एक कोने ने कहा जरूर किराया बढ़वाने की बात करने आए होंगे। मैंने श्रद्धा से कहा? आशंका जताई। वह बोली -नहीं। हो सकता है बेटी के विवाह के लिए विज्ञापन की कोई बात करने आए हों।
खैर, जल्दी जल्दी पूजा की। फिर खान साहब से मुखातिब हुआ।  वह चाय पी चुके थे। मैंने आने का मकसद पूछा।
धीमे से वह बोले--मई में आप आए थे। एक साल हो गया है। किरायेनामे की शर्त के मुताबिक टेन परसेंट बढ़ना था, कुछ कीजिए...
मैंने बीच में ही बात काटी। कहा बस एकाध साल का और मामला है यदि चल जाए तो ....
खान साहब बोले -ठीक है आप पांच सौ ही बढ़ा दीजिए। अगले महीने के किराए में। उन्होंने मुझ पर एहसान जता दिया। पिता भी थे। भाषण दे रहे थे। बस्तर में साठ रूपये से नौकरी शुरू की थी। खान साहब अब निकल गए थे। फरमान सुना कर। मकान मालिक हैं न। मैं किराएदार।
मेरा नख से सिर सुलग गया था। क्या करता। पिता जी का भाषण दिल को वेध गया। एक तरफ कुत्तों सी जिंदगी। मकान मालिक की शर्त। मानना मजबूरी है। बीवी का लेक्चर सुनने लगा। कह रही थीं और लोग सालों से हैं, किराया नहीं बढा रहे, कह दो नहीं देंगे।
गुस्सा बढ़ गया। चिल्ला पड़ा मैं। हिस्टीरिया के पेशेंट सरीखे। उन्हें क्या बताऊं कि कितना सिरदर्द है।
बस अब नहीं। ईश्वर यदि कहीं है तू तो कुछ राहत दे।
 


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