ई बैकुंठपुरी है भाय...
बैकुंठपुरी की उस बैठक में मिश्रित भाव था। जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु मंद मंद मुस्करा रहे थे। संहारकर्ता भोले भंडारी अपने में 'टुन्नÓ थे। बस जगत के रचियता ब्रह्मïा जी के मन में उमड़ घुमड़ चल रही थी। तेज-तेज चल रही थी, उन बादलों की तरह जो उड़ते हैं आसमान में तेजी से पर टिकते नहीं। समझ में नहीं आ रहा था कि पृथ्वीलोक से आई सुरेंद्र नामक जीव (आत्मा) का किया क्या जाए?
...सुरेंद्र! पत्रकार था धरती पर। आर्यावर्ते जंबू दीपे भारतखंडे नामक खंड पर। ईमानदारी का चोला उसने बचपन से ओढ़ रखा था। असल में बेईमानी का मौका मिला ही नहीं था उसे, अथवा यह कह लें कि वह डरपोक था। साहस ही नहीं जुटा सका। बचपन में शेख चिल्ली टाइप कल्पनाओं में जीता था। उसे लगता था कि जिंदगी में दूसरों का भला करने से भला ही होता है, पर यह उसकी भूल साबित हुई कालांतर में। पढ़ाया यही गया था। जिन जिन के लिए उसने जो कुछ भी किया सब उसे 'चूतियाÓ समझने लगे। हालांकि सुरेंद्र को हमेशा यही लगता था कि वही होशियार है, समझदार है। वह जो कुछ है जैसा भी है प्रकृति की कृपा से है। प्रारब्ध से बढ़ कर कुछ नहीं। जब भी अवसाद में होता, मन को संतोष देने के लिए इसी प्रकार की बातें सोचता। पर सोचने तक ही रह जाता। कर्म करता-फल की इच्छा करता। तरक्की व अच्छे वेतन रूपी फल की, लेकिन वह उसको नहीं मिलती। थोथे आदर्श गढ़ता। उसके सहकर्मी उसके मुंह पर ठकुरसुहाती करते लेकिन पीठ पीछे... बस गरियाते।
सुरेंद्र किन कर्मों की वजह से बैकुंठपुरी ट्रांसफर हुआ था, यह उसे याद नहीं आ रहा था। वह तो ब्रह्मïा जी की तरफ देख रहा था। जिन्हें उसके अगले जन्म का फैसला करना था। अट्ठासी लाख योनियां हैं, बड़े भाग (भाग्य) थे तो कलिकाल (कलियुग) में एक युग मानव रूप में बीत चुका था सुरेंद्र का।
श्रीहरि ने ब्रह्मïा की जी तंद्रा तोड़ी-पूछा? ब्रह्मï कुछ सोचा...इसका?
ब्रह्मïा जी बोले, यही तो नहीं समझ पा रहा हूं नारायण। का करूं इसका, सरवा हमेशा गरियाता था मुझे बात बात पर। कहता था -ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नहीं..। अब इसको किस दुनिया में भेजूं...। दारू पी लेता था तो सब कुछ भूल जाता था लेकिन इतना लंठ था कि गले तक गटक लेता था, इसलिए इसकी किडनी खराब हो गई। सिगरेट -तंबाकू भी इसने इतनी भकोसी कि पूछिए नहीं। मैं नहीं चाहता कि अगले जनम में भी यह भोगे और मुझे गरियाए।
श्री हरि फिर मुस्कराए । बोले तब क्या करोगे? करना तुम्ही को है इसका जो भी करना है।...
ब्रह्मïा जी समझ गए कि श्री हरि अंटी ढीली नहीं करने वाले। बुद्धि दौड़ाई और फिर बोले- प्रभु यह अकेले मेरे बस का प्राणी नहीं है। चोर है चाई हैं, पर स्त्री लोलुप भी है, जब भी सुंदर महिलाएं देखता था, लïट्टू हो जाता था। हां, उनका बिगाड़ कुछ नहीं पाता था। विगत जन्म में राजा नहीं था लेकिन राजसी ठाठ के बारे में सोचता था...! और हां, यदा कदा मेरे साथ-साथ आप लोगों को भी गरियाता था।
हम लोगों को क्यों? श्री हरि ने विस्मय के साथ पूछा...!
आपको इसलिए क्योंकि आप जगत के पालन कर्ता हैं और आपने इसके लिए कुछ नहीं किया। माना कि मैंने इसे भाग्य नहीं दिया लेकिन फिर भी यह कभी कभी विष्णु सहस्त्रनामस्रोत पढ़ता था। आपकी सहधर्मिणी लक्ष्मी की कृपा की प्राप्ति के लिए वह कनकधारा स्रोत भी पढ़ता था, जिसे पढ़कर शंकराचार्य ने सुवर्ण वर्षा करा दी थी।
श्री हरि को सृष्टिकर्ता के रचियता की इस बात में व्यंग समझ में आया। बोले...मैं क्या करता-आपने तो इसको भाग्य दिया ही नहीं? आपकी लेखनी मैं कैसे मिटाकर इसकी मदद करता? आपका अनादर नहीं हो जाता। खैर यह बताओ भोलेनाथ को किसलिए गरियाता था?
--भोलेनाथ को इसलिए कि उन्होंने इसे तीन बार तोड़ा, लेकिन इसकी जिंदगी बख्श दी। इसे जिंदगी के 52 साल दे दिए। एक बार एक्सीडेंट करवाया तो बख्श दिया। अरे इसे मार दिए होते अथवा इतने नशे में रखे होते कि कुछ सोच ही नहीं पाता। जब सोच ही नहीं पाता तो गरियाता कैसे?
शिवजी मुस्करा कर इतना ही बोले-जिंदगी के दिन तो आपने तय किए थे ब्रह्मï? मैं क्या करता। वैसे भी मैं ठहरा आशुतोष औघड़दानी। इस पर जब कभी प्रसन्न हुआ थोड़ा बहुत दे दिया नशा पाती के लिए।
...तो क्या मैं ही दोषी हूं इस जीव की बीती जिंदगी के लिए? अचरज में आए ब्रह्मïा जी ने पूछा?
हमें तो ऐसा ही लगता है--श्री हरि और आशुतोष औघड़दानी एक साथ बोले।
चलिए मैंने मान लिया कि मैंने इसके इस जनम में भाग्य नहीं दिया था, लेकिन अगले जन्म के लिए ऐसा क्या करूं कि यह गरियाए नहीं? ब्रहमा जी बोले...।
-यह आप ही तय करें, यह आपका केआरए (की-रिजल्ट-एरिया) है। हमारा नहीं। अच्छा अब जल्दी फैसला करें। बैकुंठपुरी खाली कराएं सुरेंद्र नामक इस गलीज जीव से....। हमारा वक्त जाया ना करें।
ठीक है तो इसे फिर से पत्रकार के रूप में एक मौका दिया जाता है...अपनी भूल सुधारने के लिए।।। ब्रह्मïा जी ने कलम उठा ली, अगले जनम का लेखा जोखा लिखने के लिए....।
सुरेंद्र की तंद्रा टूटी -त्रिदेव सामने थे। जोर से चीखा -प्रभु अगले जनम मोहे पत्रकार न कीजो...। नेता बना दो...सुअर बना दो, चींटी बना दो, शेर बना दो, कोबरा सांप बना दो...गधा बना दो !!!
ब्रह्मïा जी हंसे। बोले नहीं। तुम्हारे कर्म इतने अच्छे भी नहीं। तुम्हारी यही सजा है। जाओ अगले जनम में भी कलम घसीटू बनो। गाली खाओ। घर परिवार, दोस्त यार सबकी। और हां जितना बन पड़े, मुझे गरियाओ।
....बैकुंठपुरी की बैठक खत्म हो चुकी थी।
बैकुंठपुरी की उस बैठक में मिश्रित भाव था। जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु मंद मंद मुस्करा रहे थे। संहारकर्ता भोले भंडारी अपने में 'टुन्नÓ थे। बस जगत के रचियता ब्रह्मïा जी के मन में उमड़ घुमड़ चल रही थी। तेज-तेज चल रही थी, उन बादलों की तरह जो उड़ते हैं आसमान में तेजी से पर टिकते नहीं। समझ में नहीं आ रहा था कि पृथ्वीलोक से आई सुरेंद्र नामक जीव (आत्मा) का किया क्या जाए?
...सुरेंद्र! पत्रकार था धरती पर। आर्यावर्ते जंबू दीपे भारतखंडे नामक खंड पर। ईमानदारी का चोला उसने बचपन से ओढ़ रखा था। असल में बेईमानी का मौका मिला ही नहीं था उसे, अथवा यह कह लें कि वह डरपोक था। साहस ही नहीं जुटा सका। बचपन में शेख चिल्ली टाइप कल्पनाओं में जीता था। उसे लगता था कि जिंदगी में दूसरों का भला करने से भला ही होता है, पर यह उसकी भूल साबित हुई कालांतर में। पढ़ाया यही गया था। जिन जिन के लिए उसने जो कुछ भी किया सब उसे 'चूतियाÓ समझने लगे। हालांकि सुरेंद्र को हमेशा यही लगता था कि वही होशियार है, समझदार है। वह जो कुछ है जैसा भी है प्रकृति की कृपा से है। प्रारब्ध से बढ़ कर कुछ नहीं। जब भी अवसाद में होता, मन को संतोष देने के लिए इसी प्रकार की बातें सोचता। पर सोचने तक ही रह जाता। कर्म करता-फल की इच्छा करता। तरक्की व अच्छे वेतन रूपी फल की, लेकिन वह उसको नहीं मिलती। थोथे आदर्श गढ़ता। उसके सहकर्मी उसके मुंह पर ठकुरसुहाती करते लेकिन पीठ पीछे... बस गरियाते।
सुरेंद्र किन कर्मों की वजह से बैकुंठपुरी ट्रांसफर हुआ था, यह उसे याद नहीं आ रहा था। वह तो ब्रह्मïा जी की तरफ देख रहा था। जिन्हें उसके अगले जन्म का फैसला करना था। अट्ठासी लाख योनियां हैं, बड़े भाग (भाग्य) थे तो कलिकाल (कलियुग) में एक युग मानव रूप में बीत चुका था सुरेंद्र का।
श्रीहरि ने ब्रह्मïा की जी तंद्रा तोड़ी-पूछा? ब्रह्मï कुछ सोचा...इसका?
ब्रह्मïा जी बोले, यही तो नहीं समझ पा रहा हूं नारायण। का करूं इसका, सरवा हमेशा गरियाता था मुझे बात बात पर। कहता था -ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नहीं..। अब इसको किस दुनिया में भेजूं...। दारू पी लेता था तो सब कुछ भूल जाता था लेकिन इतना लंठ था कि गले तक गटक लेता था, इसलिए इसकी किडनी खराब हो गई। सिगरेट -तंबाकू भी इसने इतनी भकोसी कि पूछिए नहीं। मैं नहीं चाहता कि अगले जनम में भी यह भोगे और मुझे गरियाए।
श्री हरि फिर मुस्कराए । बोले तब क्या करोगे? करना तुम्ही को है इसका जो भी करना है।...
ब्रह्मïा जी समझ गए कि श्री हरि अंटी ढीली नहीं करने वाले। बुद्धि दौड़ाई और फिर बोले- प्रभु यह अकेले मेरे बस का प्राणी नहीं है। चोर है चाई हैं, पर स्त्री लोलुप भी है, जब भी सुंदर महिलाएं देखता था, लïट्टू हो जाता था। हां, उनका बिगाड़ कुछ नहीं पाता था। विगत जन्म में राजा नहीं था लेकिन राजसी ठाठ के बारे में सोचता था...! और हां, यदा कदा मेरे साथ-साथ आप लोगों को भी गरियाता था।
हम लोगों को क्यों? श्री हरि ने विस्मय के साथ पूछा...!
आपको इसलिए क्योंकि आप जगत के पालन कर्ता हैं और आपने इसके लिए कुछ नहीं किया। माना कि मैंने इसे भाग्य नहीं दिया लेकिन फिर भी यह कभी कभी विष्णु सहस्त्रनामस्रोत पढ़ता था। आपकी सहधर्मिणी लक्ष्मी की कृपा की प्राप्ति के लिए वह कनकधारा स्रोत भी पढ़ता था, जिसे पढ़कर शंकराचार्य ने सुवर्ण वर्षा करा दी थी।
श्री हरि को सृष्टिकर्ता के रचियता की इस बात में व्यंग समझ में आया। बोले...मैं क्या करता-आपने तो इसको भाग्य दिया ही नहीं? आपकी लेखनी मैं कैसे मिटाकर इसकी मदद करता? आपका अनादर नहीं हो जाता। खैर यह बताओ भोलेनाथ को किसलिए गरियाता था?
--भोलेनाथ को इसलिए कि उन्होंने इसे तीन बार तोड़ा, लेकिन इसकी जिंदगी बख्श दी। इसे जिंदगी के 52 साल दे दिए। एक बार एक्सीडेंट करवाया तो बख्श दिया। अरे इसे मार दिए होते अथवा इतने नशे में रखे होते कि कुछ सोच ही नहीं पाता। जब सोच ही नहीं पाता तो गरियाता कैसे?
शिवजी मुस्करा कर इतना ही बोले-जिंदगी के दिन तो आपने तय किए थे ब्रह्मï? मैं क्या करता। वैसे भी मैं ठहरा आशुतोष औघड़दानी। इस पर जब कभी प्रसन्न हुआ थोड़ा बहुत दे दिया नशा पाती के लिए।
...तो क्या मैं ही दोषी हूं इस जीव की बीती जिंदगी के लिए? अचरज में आए ब्रह्मïा जी ने पूछा?
हमें तो ऐसा ही लगता है--श्री हरि और आशुतोष औघड़दानी एक साथ बोले।
चलिए मैंने मान लिया कि मैंने इसके इस जनम में भाग्य नहीं दिया था, लेकिन अगले जन्म के लिए ऐसा क्या करूं कि यह गरियाए नहीं? ब्रहमा जी बोले...।
-यह आप ही तय करें, यह आपका केआरए (की-रिजल्ट-एरिया) है। हमारा नहीं। अच्छा अब जल्दी फैसला करें। बैकुंठपुरी खाली कराएं सुरेंद्र नामक इस गलीज जीव से....। हमारा वक्त जाया ना करें।
ठीक है तो इसे फिर से पत्रकार के रूप में एक मौका दिया जाता है...अपनी भूल सुधारने के लिए।।। ब्रह्मïा जी ने कलम उठा ली, अगले जनम का लेखा जोखा लिखने के लिए....।
सुरेंद्र की तंद्रा टूटी -त्रिदेव सामने थे। जोर से चीखा -प्रभु अगले जनम मोहे पत्रकार न कीजो...। नेता बना दो...सुअर बना दो, चींटी बना दो, शेर बना दो, कोबरा सांप बना दो...गधा बना दो !!!
ब्रह्मïा जी हंसे। बोले नहीं। तुम्हारे कर्म इतने अच्छे भी नहीं। तुम्हारी यही सजा है। जाओ अगले जनम में भी कलम घसीटू बनो। गाली खाओ। घर परिवार, दोस्त यार सबकी। और हां जितना बन पड़े, मुझे गरियाओ।
....बैकुंठपुरी की बैठक खत्म हो चुकी थी।