दिवाली 2017 बीत गई। गांव गया था परिवार के साथ। वापस आ गया हूं शनिवार को, भाई दूज था इस दिन। धनतेरस के दूसरे दिन जाना हुआ था। वह घर जिसे अरमान से बनवाया गया था, कमोवेश रोता नजर आया। ताला बंद था। हाते (अहाते) में घास थी, मिनी जंगल नजर आ रहा था यत्र तत्र सर्वत्र। बुधवार को नरक चौदस पर तीन बजे पहुंचते ही फावड़ा उठाकर जुटना पड़ा। करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद दोनों प्रवेश द्वार के सामने से कुछ हद तक झाड़ झंखाड़ हटाने में कामयाबी मिली। पड़ोसी स्वामीनाथ गुप्त के प्रयास से एक लेबर जी मिले तीन सौ रुपये देने की शर्त पर फावड़ा चलाने के लिए। उन्होंने भी शर्त रख दी कि घर के सामने वाले हिस्से में ही फावड़ा चलाएंगे। मरता क्या न करता की तर्ज पर मान ली उनकी शर्त। थोड़ा बहुत झाड़ झंखाड़ साफ हो गया था शाम सात बजे तक। बिजली की रोशनी हुई कमरों में और बाहर तो रुआंसा घर कुछ कुछ मुस्कराता दिखा। मैं अतीत में खो गया। कच्चे से पक्के घर तक के सफरनामे में। रियल लाइफ कितनी तकलीफदेह होती है, इसका एहसास हुआ। पिता जी के रहते जो घर स्वच्छता की मिसाल हुआ करता था, वह बेगाना था।
ऐसा कभी होगा, स्वप्न में भी इसका इल्हाम नहीं था। यदि कभी हुआ होता तो शायद मैं भी किसी शहर में किसी टुकड़े का मालिक बन गया होता। जब ऐसा करने में सामर्थ्य था, तब सोचा नहीं। तब प्राथमिकता थी गांव के घर के दुरुस्त कराने की। छोटे भाई दीपू से उम्मीद थी कि वह हमारे ख्वाबों में विकास के नए रंग भरेंगे, पर कहा गया है कि अपना सोचा कभी नहीं होता। अब उनकी प्राथमिकता दूसरी है। वाराणसी में बसने जा रहे हैं वह। मेरे बेटे भी गांव में शायद ही रहेंगे। इसलिए कह सकता हूं कि अब गांव मेरे लिए प्राथमिकता हो चला है। आखिर उस घर को नहीं छोड़ा जा सकता जिसे प्यार व मेहनत की कमाई से बनवाया है। पिता जी अभी सशरीर हैं। वह सलामत रहें।
मैंने इस दिवाली को लेकर परिकल्पना यह की थी कि कम से कम बाबू जी को लेकर दीपू अपने परिवार समेत आ जाएंगे। देव श्री के बिना दिवाली अधूरी लगती है। अभी वह छोटे हैं, उनकी चुहलबाजी, रोना हंसना। सब अच्छा लगता है। दोनों जब बड़े पापा, बड़े पापा कहते हैं तो जो खुशी मिलती है, उसका वर्णन कर पाना संभव नहीं, लेकिन अब लगता है कि यह बीते दिनों की बात हुई। उनकी जिंदगी की डोर किसी और के हाथ है। मेरा उन पर कोई वश नहीं, इसलिए जज्बाती होने का फायदा नहीं। जज्बाती होना इंसान की कमजोरी है। मैं अपनी बात करूं तो ज्यादा ही जज्बाती हूं। एतबार करना, धोखा खाना मेरी जिंदगी का दूसरा नाम है। इस दिवाली भी ऐसा हुआ। बाबू जी को लेकर दीपू नहीं आए। दीपू ने मुझसे फोन पर औपचारिकता निभानी चाही। मन नहीं हुआ। क्या कहता...। यही कि अच्छा सिला दिया है मेरे त्याग का। मेरे भी बच्चे थे, उनकी भी स्कूलिंग थी। मैं क्यों कर आता था, खर्च कर। सोनभद्र में रहा होऊं अथवा वाराणसी या फिर इलाहाबाद में। त्योहार मिलकर मनाने में ही मजा आता है। खैर अब रिश्तों की हकीकत समझ चुका हूं। अपने परिवार की खुशी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। परिवार खुश तो आप खुश। परिवार की कीमत पर रिश्तों को निभाने का कोई मतलब नहीं। देर ही समझा हूं पर अब इसी फार्मूले पर अडिग रहना चाहता हूं। ईश्वर से यही कामना है कि इसके लिए वह मुझे शक्ति दें।
ऐसा कभी होगा, स्वप्न में भी इसका इल्हाम नहीं था। यदि कभी हुआ होता तो शायद मैं भी किसी शहर में किसी टुकड़े का मालिक बन गया होता। जब ऐसा करने में सामर्थ्य था, तब सोचा नहीं। तब प्राथमिकता थी गांव के घर के दुरुस्त कराने की। छोटे भाई दीपू से उम्मीद थी कि वह हमारे ख्वाबों में विकास के नए रंग भरेंगे, पर कहा गया है कि अपना सोचा कभी नहीं होता। अब उनकी प्राथमिकता दूसरी है। वाराणसी में बसने जा रहे हैं वह। मेरे बेटे भी गांव में शायद ही रहेंगे। इसलिए कह सकता हूं कि अब गांव मेरे लिए प्राथमिकता हो चला है। आखिर उस घर को नहीं छोड़ा जा सकता जिसे प्यार व मेहनत की कमाई से बनवाया है। पिता जी अभी सशरीर हैं। वह सलामत रहें।
मैंने इस दिवाली को लेकर परिकल्पना यह की थी कि कम से कम बाबू जी को लेकर दीपू अपने परिवार समेत आ जाएंगे। देव श्री के बिना दिवाली अधूरी लगती है। अभी वह छोटे हैं, उनकी चुहलबाजी, रोना हंसना। सब अच्छा लगता है। दोनों जब बड़े पापा, बड़े पापा कहते हैं तो जो खुशी मिलती है, उसका वर्णन कर पाना संभव नहीं, लेकिन अब लगता है कि यह बीते दिनों की बात हुई। उनकी जिंदगी की डोर किसी और के हाथ है। मेरा उन पर कोई वश नहीं, इसलिए जज्बाती होने का फायदा नहीं। जज्बाती होना इंसान की कमजोरी है। मैं अपनी बात करूं तो ज्यादा ही जज्बाती हूं। एतबार करना, धोखा खाना मेरी जिंदगी का दूसरा नाम है। इस दिवाली भी ऐसा हुआ। बाबू जी को लेकर दीपू नहीं आए। दीपू ने मुझसे फोन पर औपचारिकता निभानी चाही। मन नहीं हुआ। क्या कहता...। यही कि अच्छा सिला दिया है मेरे त्याग का। मेरे भी बच्चे थे, उनकी भी स्कूलिंग थी। मैं क्यों कर आता था, खर्च कर। सोनभद्र में रहा होऊं अथवा वाराणसी या फिर इलाहाबाद में। त्योहार मिलकर मनाने में ही मजा आता है। खैर अब रिश्तों की हकीकत समझ चुका हूं। अपने परिवार की खुशी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। परिवार खुश तो आप खुश। परिवार की कीमत पर रिश्तों को निभाने का कोई मतलब नहीं। देर ही समझा हूं पर अब इसी फार्मूले पर अडिग रहना चाहता हूं। ईश्वर से यही कामना है कि इसके लिए वह मुझे शक्ति दें।