देखो ये कैसी हवा है...
सभी को नमन। ब्लाग के इस पेज पर गुजरे सप्ताह एक अनपढ़ भारतीय के रूप में मेरे मन में जो उमड़ा घुमड़ा है, आज वही सब। रामनाथ कोविंद जी हमारे महामहिम बन गए हैं अनौपचारिक रूप से। आने वाली 25 जुलाई को दिन में 12-25 बजे वह देश के 14 वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेंगे। फिर आने वाले पांच सालों में उनके हस्ताक्षर रूपी प्रसाद से कितनों की जिंदगी बदलेगी, मैं नहीं जानता। देश के लिए उनका चयन कितना सकारात्मक फलदायी होगा, यह भी नहीं जानता। पर इतना तो कह सकता हूं कि हमारा लोकतंत्र वास्तव में बहुत हद तक परिपक्व बन चला है। तमाम नरेश अग्रवालों के बावजूद। निवर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने किसी समय उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाए जाने पर इतना भर कहा था कि -इट्स माइ लक। किस्मत वास्तव में सबसे अहम होती है। यही गाडफादर दिलाती है, गाड की कृपा भी इसकी दम पर आती है। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास कह ही गए हैं कि ....जा पर कृपा राम की होई ता पर कृपा करैं सब कोई। राम गोविंद पर राम की कृपा है वास्तव में। यह चुनाव में साफ दिखा। एनडीए के वोटों से ज्यादा कहीं उन्हें वोट मिला है। उनकी प्रतिद्वंद्वी रहीं मीरा कुमार पर राम की कृपा कब और किस रूप में होती है, यह बात देखने वाली होगी, मेरे लिए, देश के लिए। मीरा जी कांग्रेस से रही हैं और आज कांग्रेस की जो दशा है, उसमें उसका भविष्य बांचने की क्षमता कम से कम मुझमें तो नहीं है। इतिहासकार व स्तंभकार रामचंद्र गुहा जैसा विद्वान नहीं हूं मैं। उन्होंने जरूर बांचा है इस पार्टी का भविष्य, तभी वह कह रहे हैं कि कांग्रेस अपनी कमान नीतीश कुमार जैसे किसी नेता को सौंप दे। क्या कांग्रेस इस पर राजी होगी? यह बड़ा सवाल है। वैसे राम चाहेंगे तो ऐसा हो जाएगा। अभी तो राम ऐसा चाहते नहीं दिखते। हां, राष्ट्रवाद बनाम छदम धर्मनिपरेक्षता की लड़ाई आने वाले दिनों में और तल्ख होगी, इतना जरूर लगता है मुझे। यदि आप मुझसे पूछेंगे कि मैं कहा होऊंगा तो बता दूं कि मैं खुद को राष्ट्रवाद के पलड़े में रखना चाहूंगा। ऐसा इसलिए कि निरपेक्ष भाव में बैठना मेरी आदत नहीं। मेरे देश में जिस तरह की परिस्थितियां हैं फिलहाल, उसमें मुझे लगता है कि ऐसा जरूरी है। चीन से लेकर पाकिस्तान तक सनातन धर्मियों की बहुलता वाले भारत को जर्जर करने में लगे हैं। डोकलाम में चीन जो कुछ करना चाहता है उसका प्रतिकार अब तक तो मेरे नजरिए से बेहतर रहा है। पहली बार भारत प्रतिरोध करता दिख रहा है, दुनिया की दूसरी बड़ी ताकत का। कुछ लोग चीन को आज अमेरिका से भी बड़ी ताकत मानते हैं, पर मेरा मानना है कि यह पूरी तरह सच नहीं। चीन भी घिरा है, जापान, हांगकांग, ताइवान उसके लिए सिरदर्द बन रहे हैं। शायद यह भी एक वजह है भारत के मौजूदा रुख के पीछे।
थोड़ी देर के लिए एक और कल्पना। मान लीजिए चीन और भारत का युद्ध होता है तब क्या होगा? यदि भारत थोड़ा बहुत भी भारी पड़ा उस पर, तब भी हाथ में लड्डू और हारा तो भी। राष्ट्रवाद की ऐसी हवा बहेगी, जो यदि तूफान में बदली तो चीन बहुत कुछ गवां बैठेगा। चीन के लिए आज भारत वह बाजार है, जहां से उसकी अर्थव्यवस्था को प्राणवायु मिलती है। वह बाजार उससे चला जाएगा। चीन निर्मित उत्पादों के बहिष्कार होने ही लगा है जगह-जगह। कल टिवटर के जरिए जानकारी मिली कि ओडीशा में व्यवसायियों ने चीन निर्मित उत्पादों की बिक्री से तौबा कर ली है। इस तरह मैं कह सकता हूं कि भारत की जनता ही चीन को हरा सकती है, सेना को हाथ आजमाने की नौबत नहीं आएगी। आखिरकार अहिंसा के रास्ते से ही तो हमने उस ब्रितानिया साम्राज्य का सूरज अस्त कर दिया जिसके बारे में कहा जाता था कि यह कभी नहीं डूबता। सेक्युलर राजनीति की जलन इसीलिए है। कामरेडों के लिए कहा जाता है कि वह भारत में तब छाता तानते हैं जब बीजिंग में बारिश होती है। अब वहां बारिश हो रही है, वह छाता तान लें। यदि वह बचते हैं तो भारत नहीं बचेगा, और यह अच्छा ही होगा। मेरे जैसे राष्ट्रवादी कम से कम देश के लिए ईश्वर को तो प्यारे हो जाएंगे। ईश्वर की कृपा से राष्ट्रपति भवन नहीं मिला तो क्या हुआ, स्वर्ग तो मिल जाएगा। राम की कृपा इसी रूप में।
अंत में --मायावती जी का इस्तीफा हो गया है। आज वह अपनी नई भूमिका का ऐलान करेंगी। कुछ देर में लखनऊ में उनकी बैठक है पार्टी पदाधिकारियों के साथ। देखिए क्या आउटकम आता है। उन्हें सलाह इतनी है कि वह सियासत करें लेकिन देश की कीमत पर नहीं। राम की कृपा के लिए यह भाव जरूरी है। इन पंक्तियों का समापन करते हुए यह भी बता दूं कि बाबी देखने जा रहा हूं इलाहाबाद स्थित सिविल लाइंस के पैलेस थियेटर में। मौका है आठवां जागरण फिल्म फेस्टिवल। गुनगुनाते हुए .. सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो... क्या. हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाभी खो जाए...।
सभी को नमन। ब्लाग के इस पेज पर गुजरे सप्ताह एक अनपढ़ भारतीय के रूप में मेरे मन में जो उमड़ा घुमड़ा है, आज वही सब। रामनाथ कोविंद जी हमारे महामहिम बन गए हैं अनौपचारिक रूप से। आने वाली 25 जुलाई को दिन में 12-25 बजे वह देश के 14 वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेंगे। फिर आने वाले पांच सालों में उनके हस्ताक्षर रूपी प्रसाद से कितनों की जिंदगी बदलेगी, मैं नहीं जानता। देश के लिए उनका चयन कितना सकारात्मक फलदायी होगा, यह भी नहीं जानता। पर इतना तो कह सकता हूं कि हमारा लोकतंत्र वास्तव में बहुत हद तक परिपक्व बन चला है। तमाम नरेश अग्रवालों के बावजूद। निवर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने किसी समय उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाए जाने पर इतना भर कहा था कि -इट्स माइ लक। किस्मत वास्तव में सबसे अहम होती है। यही गाडफादर दिलाती है, गाड की कृपा भी इसकी दम पर आती है। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास कह ही गए हैं कि ....जा पर कृपा राम की होई ता पर कृपा करैं सब कोई। राम गोविंद पर राम की कृपा है वास्तव में। यह चुनाव में साफ दिखा। एनडीए के वोटों से ज्यादा कहीं उन्हें वोट मिला है। उनकी प्रतिद्वंद्वी रहीं मीरा कुमार पर राम की कृपा कब और किस रूप में होती है, यह बात देखने वाली होगी, मेरे लिए, देश के लिए। मीरा जी कांग्रेस से रही हैं और आज कांग्रेस की जो दशा है, उसमें उसका भविष्य बांचने की क्षमता कम से कम मुझमें तो नहीं है। इतिहासकार व स्तंभकार रामचंद्र गुहा जैसा विद्वान नहीं हूं मैं। उन्होंने जरूर बांचा है इस पार्टी का भविष्य, तभी वह कह रहे हैं कि कांग्रेस अपनी कमान नीतीश कुमार जैसे किसी नेता को सौंप दे। क्या कांग्रेस इस पर राजी होगी? यह बड़ा सवाल है। वैसे राम चाहेंगे तो ऐसा हो जाएगा। अभी तो राम ऐसा चाहते नहीं दिखते। हां, राष्ट्रवाद बनाम छदम धर्मनिपरेक्षता की लड़ाई आने वाले दिनों में और तल्ख होगी, इतना जरूर लगता है मुझे। यदि आप मुझसे पूछेंगे कि मैं कहा होऊंगा तो बता दूं कि मैं खुद को राष्ट्रवाद के पलड़े में रखना चाहूंगा। ऐसा इसलिए कि निरपेक्ष भाव में बैठना मेरी आदत नहीं। मेरे देश में जिस तरह की परिस्थितियां हैं फिलहाल, उसमें मुझे लगता है कि ऐसा जरूरी है। चीन से लेकर पाकिस्तान तक सनातन धर्मियों की बहुलता वाले भारत को जर्जर करने में लगे हैं। डोकलाम में चीन जो कुछ करना चाहता है उसका प्रतिकार अब तक तो मेरे नजरिए से बेहतर रहा है। पहली बार भारत प्रतिरोध करता दिख रहा है, दुनिया की दूसरी बड़ी ताकत का। कुछ लोग चीन को आज अमेरिका से भी बड़ी ताकत मानते हैं, पर मेरा मानना है कि यह पूरी तरह सच नहीं। चीन भी घिरा है, जापान, हांगकांग, ताइवान उसके लिए सिरदर्द बन रहे हैं। शायद यह भी एक वजह है भारत के मौजूदा रुख के पीछे।
थोड़ी देर के लिए एक और कल्पना। मान लीजिए चीन और भारत का युद्ध होता है तब क्या होगा? यदि भारत थोड़ा बहुत भी भारी पड़ा उस पर, तब भी हाथ में लड्डू और हारा तो भी। राष्ट्रवाद की ऐसी हवा बहेगी, जो यदि तूफान में बदली तो चीन बहुत कुछ गवां बैठेगा। चीन के लिए आज भारत वह बाजार है, जहां से उसकी अर्थव्यवस्था को प्राणवायु मिलती है। वह बाजार उससे चला जाएगा। चीन निर्मित उत्पादों के बहिष्कार होने ही लगा है जगह-जगह। कल टिवटर के जरिए जानकारी मिली कि ओडीशा में व्यवसायियों ने चीन निर्मित उत्पादों की बिक्री से तौबा कर ली है। इस तरह मैं कह सकता हूं कि भारत की जनता ही चीन को हरा सकती है, सेना को हाथ आजमाने की नौबत नहीं आएगी। आखिरकार अहिंसा के रास्ते से ही तो हमने उस ब्रितानिया साम्राज्य का सूरज अस्त कर दिया जिसके बारे में कहा जाता था कि यह कभी नहीं डूबता। सेक्युलर राजनीति की जलन इसीलिए है। कामरेडों के लिए कहा जाता है कि वह भारत में तब छाता तानते हैं जब बीजिंग में बारिश होती है। अब वहां बारिश हो रही है, वह छाता तान लें। यदि वह बचते हैं तो भारत नहीं बचेगा, और यह अच्छा ही होगा। मेरे जैसे राष्ट्रवादी कम से कम देश के लिए ईश्वर को तो प्यारे हो जाएंगे। ईश्वर की कृपा से राष्ट्रपति भवन नहीं मिला तो क्या हुआ, स्वर्ग तो मिल जाएगा। राम की कृपा इसी रूप में।
अंत में --मायावती जी का इस्तीफा हो गया है। आज वह अपनी नई भूमिका का ऐलान करेंगी। कुछ देर में लखनऊ में उनकी बैठक है पार्टी पदाधिकारियों के साथ। देखिए क्या आउटकम आता है। उन्हें सलाह इतनी है कि वह सियासत करें लेकिन देश की कीमत पर नहीं। राम की कृपा के लिए यह भाव जरूरी है। इन पंक्तियों का समापन करते हुए यह भी बता दूं कि बाबी देखने जा रहा हूं इलाहाबाद स्थित सिविल लाइंस के पैलेस थियेटर में। मौका है आठवां जागरण फिल्म फेस्टिवल। गुनगुनाते हुए .. सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो... क्या. हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाभी खो जाए...।