रविवार, 27 दिसंबर 2015

आओ 2016, खुशियां लाओ

साल 2015 की विदाई का वक्त नजदीक है। खट्टी मिट्ठी यादों संग यह विदा हो जाएगा। कुछ घंटे ही शेष हैं। गुजरते साल में बदलाव के नाम पर मेरे पास अपने दो अजीजों को खोने का गम है और इलाहाबाद में ही किराए के दूसरे मकान में रहने का। इसे अच्छा कहूं अथवा बुरा, समझ नहीं पा रहा हूं। आर्थिक दुश्वरियां इस साल भी कदम दर कदम रहीं। खैर, उम्मीद करता हूं कि साल 2016 बेहतर रहेगा। सामाजिक और आर्थिक, दोनों ही मोर्चें पर। पिता जी, पत्नी, दोनों पुत्र शुभम, आयुष, छोटे भाई दीपक और उनकी पत्नी रीतू तथा प्रिय श्री और छोटे देव स्वस्थ रहेंगे। उन्हें ईश कृपा से न तो कोई शारीरिक दिक्कत होगी, न आर्थिक। श्रीहरि से इतनी ही विनती है। बुआ जी नहीं रहीं, छोटी सरहज संध्या भी चली गईं। सितंबर से नवंबर तक के बीच। जुलाई में मकान छोड़ना पड़ा था। वैसे तो हानि, लाभ जीवन,मरण जस अपजस विधि (विधाता ) के हाथ होता है, फिर भी प्रार्थना तो की ही जा सकती है। आप कहेंगे, अपनों के लिए ही प्रार्थना। ऐसा भी नहीं है। मैं हर उस मानव तथा उसकी पालक प्रकृति की कुशलक्षेभ की कामना करता हूं, जिनमें दूसरों के प्रति संवेदना है। मेरे शब्दों से, कर्मों से किसी का दिल नहीं दुखेगा, ऐसी शक्ति ईश्वर मुझे दें। यह मैं अपने लिए चाहता हूं। धन -संपत्ति दें अथवा नहीं।
साल के आखिरी हफ्ते से पहले वाले सप्ताह में दो दिन सोनभद्र के राबटर्सगंज में गुजरे। बाबू संदीप सिंह के साथ। सुमन जी ने फिर नेह उड़ेला दिया, हमेशा की तरह। अब वह प्रधान हो गई हैं पनिकप कला ग्राम पंचायत की। उनकी खुशी में खुश था, इसलिए सोनभद्र गया था। पनिकप नहीं जा सका। देखिए ईश्वर नए साल में कब इसके लिए योग बनाते हैं। आखिर हर दाने पर खाने वाले का नाम जो लिखा है। जो दाना मेरा निवाला बनेगा, वह कब बुलाता है, उसे समय पर ही छोड़ देना मुनसिब समझता हूं। कल यानि शनिवार को पिता जी से बात हो रही थी। वह अपने पुराने दिनों में पहुंच गए। मैंने उन्हें टोका। मना किया बीते हुए दिन की याद दिलाने के लिए। मन मसोस कर वह मान भी गए, लेकिन मैं अब सोच रहा हूं कि क्या मेरे मना करने से ही वह मान जाएंगे। माना कि जिंदगी चलने का नाम है। चलती का नाम ही गाड़ी है, लेकिन क्या यादें बिसारी जा सकती हैं आसानी से। वह भी यदि कड़वी हो तो। शायद नहीं।
यहां संगम नगरी में एक बार फिर माघ मेला लगने जा रहा है। जनवरी के दूसरे पखवारे में धूम शुरू हो जाएगी। इस बार मन में एक संकल्पना है। संकल्प नहीं। यह संकल्पना यह है कि मानस नवाह्न यज्ञ हो जाए, स्वामी ओमानंद जी महराज के शिविर में। उसके लिए शिविर के वास्ते जमीन चाहिए तथा अन्य सुविधाएं भीं। प्रयासरत हूं। जिलाधिकारी ने आश्वस्त किया है। एडीेएम ने लिख भी दिया है आवेदन पर। यदि सब कुछ मनोकूल रहा तो श्रीराम जी की किरपा से उनके नाम की गंगा में मैं भी डुबकी लगा लूंगा। भले ही एक -दो दिन ही सही। रही बात धन की तो मित्र मंडली है ही। उसके सामने हाथ फैलाऊंगा। दरअसल जीवन के 46 वें वसंत में आ पहुंचा हूं। अब लगता है कि नये रास्ते की तलाश करनी होगी, जिंदगी का दुर्गम पथ सुगम बनाने के लिए। शब्दों के संसार में बहुत डूब-उतरा चुका हूं। जितना मिला, उसको ही मुकददर मान लूं तो अच्छा रहेगा। आने वाले दिन और क्षण मेरे, मेरे परिवार तथा शुभचिंतकों के लिए शीतल हों, मन को भाएं, इन्हीं शब्दों के साथ रविवार 27 दिसंबर 2015 की इस पोस्ट को विराम दे रहा हूं।   

रविवार, 13 दिसंबर 2015

हां, बुरबक हूं यारों ...

अपन का आकार बिगड़ रहा है पत्र को आकार देते-देते। सच...। शब्दों की दुनिया में 23 बसंत बीतने के बाद कुछ ऐसा ही महसूस होता है। दो दिन पहले मेरे एक शुभचिंतक को नई नौकरी मिली। उन्होंने आशीर्वाद चाहा था। मैंने दिया। देता भी कैसे नहीं। यही तो दे सकता हूं। यही है मेरे पास। ढेरों अपयश के बीच। यश अपन से दूर रहा है नामुराद। जिनके लिए कुछ किया भी हो (वैसे तो मैंने किसी के लिए कुछ किया नहीं है, फिर भी ईश्वर के दरबार में कहीं कुछ हिसाब किताब में निकल आया तो गुस्ताखी माफ.) उन्होंने भी नुक्ताचीनी ही निकाली है। खैर, यह उनका काम है। मुझे तो इतना पता है कि जब जिस जगह रहो, ईमानदारी से अपना काम करो। यह परवाह नहीं करो कि लोग क्या कहते हैं। लोगों का काम ही दरअसल कुछ कहना है। लेकिन तकलीफ वहीं होती है जहां लगता है कि ईश्वरीय विधान में मेहनत के लिए जगह कम है, प्रारब्ध के लिए ज्यादा। फिर यह सोचकर संतोष करता हूं कि अपन का प्रारब्ध यही है। लिखो-पढ़ो और गरियाओ किस्मत को। दो दिन पहले वाराणसी में था। अपने अभिन्न शुभचितंक रजनीश त्रिपाठी के पुत्र के विवाहोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित रात्रिभोज में। तमाम पुराने शुभचिंतकों से मुलाकात हुई। बद्री विशाल जी भी मिले। वेद प्रकाश सिंह भी। किन -किन का नाम लिखूं। किनका छोड़ू, पंडित अजय चतुर्वेदी भी मिले, राजनाथ तिवारी भी। अमर उजाला में सब साथ थे। अब कोई यहां है कोई वहां। निंदा रस का आनंद भी लिया। एक पुराने संपादक की बात उठ खड़ी हुई, राजनाथ जी का जैसे स्वाद कसैला हो गया।
सच है हिंदी पत्रकारिता ऐसे ही लोगों से भरी है। वरिष्ठ सहयोगी हरिशंकर मिश्र जी ने एक प्रसंग सुनाया। आज की तारीख में  बड़े नामचीन पत्रकार की किसी जगह की स्वीकारोक्ति। बड़े पत्रकार महाशय किसी समारोह में थे। वहां उनसे एक छात्र ने पूछा -आप सफल हैं, लेकिन क्या यह बताएंगे कि सफलता कैसे मिलती है? जवाब मिला-अपनों के कंधे पर चढ़ना सीखो। निर्मम बनो उनके प्रति। कहावत है कि छोटे लोग बड़ों का अनुगमन करते हैं, ऐसे में यदि सवाल कर्ता भावी पत्रकार अपनों के प्रति निर्मम नहीं बना तो...? संभवतः वह दूसरा सुरेश पांडेय होगा।
बहरहाल, मैं अपनी असफलता के लिए खुद को ही जिम्मेदार मानता हूं। अंर्तमुखी हूं। लेकिन लोग मुंहफट कहते हैं। अमर उजाला के कार्यकाल में एक संपादक ने मेरी पहचान शार्ट टेंपर्ड के रूप में की। सिर्फ की ही नहीं, मेरी प्रगति के लिए इसे अवरोध माना और मुझे प्रमोशन के लायक ही मानने से इंकार कर दिया। मेरे जिस समकक्ष सहयोगी को उन्होंने प्रमोशन दिया वह आज पद प्रतिष्ठा में मुझसे कहीं आगे हैं, लेकिन प्रमोशन देने वाले संपादक जी अब निजी बातचीत में उसे अपनी भूल मानते हैं। जब उनसे कुर्सी छिन गई तो प्रमोशन पाने वाले मेरे साथी ने उनके फोन तक को रिसीव करना उचित नहीं समझा था। और तो और सार्वजनिक तौर पर उनसे जो बन पड़ा, उन्होंने उलूलजुलूल कहा।  कामयाबी का यह शार्टकट मैं नहीं सीख पाया। इसीलिए शायद विफल हूं जिंदगी का गणित समझने में। बिहार के मित्रों के शब्दों में कहूं तो बुरबक हूं।
इस रविवार इतना भर।

रविवार, 6 दिसंबर 2015

जाओ दुख, आओ सुख

बहुत दिन हो गए हैं अनपढ़ को कुछ गढ़े हुए। आज रविवार है। आफिस में एक तरह से सन्नाटा है। सुबह की मीटिंग के बाद सहयोगी अपने-अपने टास्क पर निकल गए हैं। मुझे लग रहा है कि एक बार अपने ब्लाग को अपडेट कर दूं। जुलाई में लिखी थी अपन ने अपने मन की आखिरी बात। अब दिसंबर चल रहा है। आज तो छह दिसंबर है। वर्ष 1992 में इस तारीख को अपन जबलपुर में थे। तब देशबंधु में काम करते थे। अयोध्या में बाबरी ध्वंस की सूचना फ्लैश हुई थी टेलीप्रिंटर पर। झटका लगा था मन को। कभी जो नहीं सोचा था, वह हो गया था उस दिन। नौदराब्रिज पर जहां हमारा दफ्तर था, उसके ठीक पीछे नया मोहल्ला आबाद है। मुस्लिम बहुत बस्ती है यह जबलपुर की। ओमती थाना क्षेत्र में पड़ती है। अयोध्या से आती सूचनाएं तेजी से फैल रही थीं और उसके अनुपात में ही तनाव। देखते -देखते कर्फ्यू लग था, शहर के लगभग सभी थाना क्षेत्रों में। रात में कान में इस शोर ने मस्तिष्क को झन्ना दिया कि...  तकबीर अल्लाह हो अकबर भी और साथ ही जय श्री राम। आफिस की छत पर गए तो दूर-दूर आग जलती दिख रही थी शहर में। दफ्तर की गाड़ी से घर छुड़वाने का इंतजाम किया गया था हमें। रास्ते में सड़क पर कांच की अनगिनत बोतलें  टूटी थीं, और टूटे पड़े थे ईंट तथा नजर आ रहे थे पत्थर।  गनीमत इतनी ही थी कि हमारे दफ्तर में कोई अप्रिय प्रसंग नहीं हुआ। बस अफवाहों का बाजार गर्म रहा। करीब चार पांच दिन तनाव भरे माहौल में गुजरे थे। देखते ही देखते 23 साल बीत गए हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश में शिफ्ट होने के बाद तीन मौकों पर अयोध्या जाने का मौका मिला है। एक बार दर्शन पूजन के बहाने, दो बार अंत्येष्टि में। पहले फुफेरे भाई राकेश उर्फ भल्लू की पार्थिव देह के सरयू तट के किनारे पंचतत्व में विलीन हुई, फिर इस साल प्यारी बुआ जी की देह। अयोध्या वाकई में रोती और मुंह चिढ़ाती नजर आई। हनुमान गढ़ी भी जाना हुआ था दर्शन के क्रम में। वहां के बंदर अब भी स्मृतियों में हैं। खैर, इस प्रसंग पर बस इतना ही। बुआ जी के महाप्रयाण से पहले सितंबर में एक और अप्रिय प्रसंग से दो चार होना पड़ा। 14 सितंबर को हमारी सरहज संध्या उर्फ ऊषा चल बसीं। जुलाई में जब हम गांव से आए थे तभी ऊषा की बीमारी की सूचना मिली। पवन (हमारे छोटे साले) उन्हें लेकर आए। बेली अस्पताल में भर्ती कराया। यहां डाक्टर ओपी त्रिपाठी ने उनका इलाज किया। बीमारी शायद समझ ली थी उन्होंने,  एसजीपीआई के लिए रेफर किया था, लेकिन मौत तो कानपुर में लिखी थी। अगस्त में भर्ती हुईं। रक्षाबंधन के दिन आपरेशन हुआ। ओपेन हार्ट सर्जरी थी। दोनों बाल्व बदले गए। 19 दिन वेंटिलेटर पर रहीं, लेकिन बचाई नहीं जा सकीं। पवन के साथ धन जाए, धर्म जाए वाली बात हुई। अब वह तथाकथित देवी-देवताओं में विश्वास नहीं रखते। रखें भी कैसे? आखिर कोई सहायक तो नहीं हुआ उनका। मैंने भी जो बन पड़ा किया। अंधविश्वासी हूं। लगा कि भगवान नाम की चीज कुछ चमत्कार करेंगे, एक ज्योतिषी की शरण ली। उन्होंने कहा था कि कुछ अनुष्ठान करना होगा, हो सकता है बिगड़ी बात बन जाए। उन्होंने किया भी, लेकिन कहते हैं न कि काल की गति टारै नहीं टरती। अब संध्या स्मृति हैं हमारे लिए। उनकी हंसी इस समय भी नहीं भुला पा रहा हूं। शायद अंतिम क्षण तक नहीं भुला सकूंगा। संध्या और बुआ जी की मौत का सदमा कुछ ऐसा लगा है परिवार पर कि शुभम -आयुष की मम्मी किसी भी सूरत में कम से कम इस साल तो अस्पताल में भर्ती होना ही नहीं चाहतीं। पिछले रविवार को उनके पेट में जर्बदस्त दर्द हुआ। इमरजेंसी में ले गए बेली अस्पताल के। तीन-तीन इंजेक्शन लगे, कुछ राहत हुई। अल्टा साउंड, डिजिटल एक्सरे में कुछ नहीं निकला। अब कुछ ठीक हैं। कहती है जो भी भर्ती हो रहा है, उसे भगवान भर्ती कर ले रहे हैं अपने लोक में। माटी के तन का इतना मोह होता है यह अब जान पा रहा हूं। यदि ईश्वर हैं तो उनसे यही गुजारिश करूंगा कि अब कम से कम इस साल तो वह मेरे किसी भी शुभचिंतक के लिए ऐसी नौबत नहीं लाएं कि उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़े।
इधर पिता जी का फोन कुछ दिनों से नहीं आया। वह वाराणसी में हैं इन दिनों। तीन दिसंबर को जरूर उन्होंने बधाई दी थी। कहते हैं इस दिन मैं पैदा हुआ था। यदि हुआ था तो यह विषम संख्या वाला दिन है। तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा।...बचपन में हम ऐसा कहते हुए हंसते थे। संयोग देखिए। खैर, बेबी, दीपू, रीतू ने इस दिन बधाई दी। राबर्ट्सगंज से सुमन सिंह जी ने भी बधाई दी। वह वर्ष 2003 से जन्मदिन की शुभकामनाएं देती आ रही हैं। मैंने उनसे कहा...चलिए आपको तो याद है कम से कम। बोलीं यह दिन नहीं भुला पाती हूं। इससे एक दिन पहले उनके पति संदीप सिंह का जन्मदिन पड़ता है. मैंने उन्हें बधाई दी थी। उनके फेसबुक बाल पर लिखा था। जन्मदिन की शुभकामनाएं, इस साल प्रधान पति कहलाएं। उन्होंने हंस कर कहा था नहीं ड्राइवर कहिए सर...कार चुनाव चिह्न है। तो 2015 गुजर रहा है अहिस्ता-अहिस्ता। ईश्वर की कृपा रही तो कुछ दिनों बाद मैं परिवार के साथ वर्ष 2016 में होऊंगा। ईश्वर से अब यही कामना है कि व दुख ले जाएं, सुख छोड़ जाएं। इसलिए आज यही कहकर अपनी बात खत्म करूंगा कि जाओ दुख आओ सुख। 

रविवार, 12 जुलाई 2015

हैप्पी बर्थडे बाबू जी...

शुक्रवार को गांव में थे अपन। पिता जी का 80 वां जन्मदिन था। एकाकी जीवन जी रहे पिता जी के जन्मदिन पर शुभम -आयुष की मम्मी भी थीं मेरे साथ। मैंने तो अकेले ही जाने का कार्यक्रम बनाया था, पर पता नहीं कैसे क्या सूझा उन्हें, वह भी साथ हो लीं। साढ़े 11 बजे करीब इलाहाबाद से निकले और ठीक ढाई बजे अपने घर में थे। यात्रा सुखद ही रही। डर था उमस भरी गर्मी का, लेकिन कहते हैं कि ना कि जब दिल में अच्छी सोच हो तो सब अच्छा होने लगता है। इंद्रदेव भी मेहरबान हो गए। झूमकर बरसते रहे दिन और रात में। किशोरी मिष्ठान भंडार के गुलाब जामुन ने यदि दोपहर शानदार बनाई और शाम को झीसी (रिमझिम के बीच) पकौड़ों ने। अपने घर के बरामदे में पकौड़ों व चाय का जो स्वाद मिला, वह अद्वितीय था। पिता जी के चेहरे की खुशी इसे बढ़ा रही था। कह रहे थे कि जन्मदिन बच्चों का होता है, मेरा क्यों मना रहे हो। मैंने कहा, मना कहां रहा हूं। आप हैं तो इस अवसर का सेलीब्रेट कर ले रहा हूं।
पूछा- सुबह क्या बनाया था,..
बोले- खिच़ड़ी बन ली थी।  
मैंने कहा-चलिए शाम को पूड़ी हो जाएगी। 
शाम का परवल की सब्जी बनी। रसेदार। आलू-प्याज के साथ। आनंद आ गया। कभी तेज तो कभी रिमझिम बरसात के बीच यह डिश अनमोल लगी। मटर पनीर या किसी अन्य सब्जी की बदौलत। 
हां, इस संक्षिप्त यात्रा वृतांत की एक और बात। घर में लगी सोलर लाइट रात भर उजाला किए रही। काली -कजरारी रात हारती दिखी। अपन जागते रहे देर रात तक। श्रद्धा कब निदिया रानी के आगोश में समा गईं पता नहीं चला। सुबह आठ बजे करीब झकझोरा उन्होंने मुझे। बोलीं उठोगे नहीं क्या आज? मैंने कहा आज उठने का मन नहीं है। अभी सो लेने दो। सूर्यदेव को काले कजरारे मेघ निकलने नहीं दे रहे थे। वह जूझ रहे थे, लेकिन गांव के घर में चारों तरफ से आ रही हवाएं दिल खुश किए हुए थीं। बाहर बरामदे में डले तख्त पर चौड़ा हो गया। बाबू जी की चाय हो चुकी थी। करीब दस बजे उठा। इलाहाबाद वापस लौटने की बात मन में आते ही फिर दिल दुखी होने लगा। शाम चार बजे घर को छोड़ते समय यही लगा कि ई सुख छोर के परान कहां रहिहैं। लेकिन जीवन है तो ऐसे दुख भी होंगे। सुख के साथ-साथ। पिता जी साथ आए हैं।  बच्चों के साथ हैं। खुश हैं। मैं भी हूं। काश, ऐसा ही होता। वह हमेशा हमारे साथ रहें। पर किराए के मकान में वह बहुत दिन नहीं बिताते। कहते हैं गांव में अच्छा लगता है। मुझ पर उनकी सोच हावी हो रही है उम्र के इस पड़ाव में। बेटे जहां अपने-अपने काम से जुड़े, यानी उनका करियर शुरु हुआ रोजी-रोटी का मैं निश्चिंत हो जाऊंगा। ईश्वर इसमें मेरी मदद करेंगे। यही अभिलाषा है। 

शनिवार, 4 जुलाई 2015

गुजर-बसर की रामकहानी

सामाजिक आर्थिक व जातिगत जनगणना मेरे सामने है। इसमें एक तथ्य यह है कि गांवों में आज भी पांच हजार से कम में गुजारा हो रहा है। करीब 75 फीसद परिवार ऐसे ही बताए जा रहे हैं। शहरों में औसत आय कितनी है, यह आंकड़ा मुझे नहीं मिल सका है। मेरा अपना अनुमान है कि करीब 10 हजार रुपये होगी यह। इलाहाबाद में जहां मैं रह रहा हूं इन दिनों, वहां एक कमरा का न्यूनतम मकान किराया ही दो हजार रुपये है। कैसे गुजर बसर करते होंगे लोग इतनी रकम में, इसे समझ पाने में मैं नाकाम हूं। मैं अपनी बात करूं। मेरी तनख्वाह कट पिट कर करीब 28 हजार रुपये बैठती है। इसमें आठ हजार रुपये दो कमरों वाले उस अदद मकान के नाम पर निकाल देता हूं, जो कायदे से रहने लायक नहीं है। उसके बाद की गुजर बसर कैसे होती है, यह ऊपर वाले पर छोड़ देता हूं। यदि अभी भी पिता जी से समय -समय पर सहयोग नहीं मिले तो अनुमान ही लगा सकते हैं आप। बच्चों की फीस-दीगर खर्च के बाद कुछ नहीं बचता। कहने के लिए करीब दो दशक से पत्रकारिता में झक मार रहा हूं, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ है कि परिवार के साथ किसी थ्री स्टार में जाकर डिनर या लंच ले संकू। ढाबे में गए हुए भी सात साल की अवधि बीत चुकी है परिवार के साथ डिनर के नाम पर। सीबीएसई स्कूल में पढ़ते हैं छोटे चिरंजीव आयुष। जुलाई में ही बीस हजार रुपये की फीस बता रहे हैं। किताब कापी, यूनीफार्म जूते इत्यादि का खर्च अलग है। इसी महीने बड़े चिरंजीव शुभम लखनऊ जाएंगे अपने पांचवें सेमेस्टर के लिए। फीस का जुगाड़ तो लोन से हो जा रहा है उनका लेकिन और भी खर्चे होते हैं। खाने और रहने के लिए छत के नाम के। हर महीने पांच से छह हजार रुपये उन पर ही चले जा रहे हैं। कैंपस इंटरव्यू के लिए सूट की फरमाइश आ गई है उनकी तरफ से। राम जाने इसका इंतजाम कैसे हो पाएगा।
टेंट ढीली हो तो तनाव रहता है। तनाव होता है तो आप अपने दायित्वों को कायदे से नहीं निभा पाते। लेकिन सफल से सफलतम बने लोग यही नसीहत देते हैं कि हिम्मत न हारिए बिसारिए न हरि नाम। जेंहि विधि राखै राम, तैंहि विधि रहिए। सही हैं ऐसे नसीहत बाज। मैं भी यही सीख देता है दिल को बहलाने के लिए लेकिन जब कभी द्ररिदता को नुमाया करने वाली ऐसी रिपोर्ट्स से दो चार होता हूं तो तंतु झनझना जाते हैं शरीर के। इसलिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि अगला जनम कम से कम देव भूमि यानि भारत में नहीं देना। पाखंडियों, दोगलों से भरे इस देश में इंसान की कोई कीमत नहीं है। यहां प्रवचन बाज ही काफी हैं उल्लू बन कर हर साख पर बैठे हैं। गाल बजाने वाले यह लोग तरक्की करें, लेक्चर दें, सफल रहें।  

सोमवार, 22 जून 2015

वाह क्या कामयाबी है भाई

इतवार को दिन में दफ्तर नहीं आ सका। इसलिए चाहकर भी कुछ नहीं लिख पाया। अभी थोड़ा वक्त मिला है तो सोच रहा हूं कि मन की कुछ लिख दूं। आज अकेला हूं घर पर। शुभम मां के साथ ननिहाल चले गए हैं। मुझे भी कह रहे थे चलने के लिए लेकिन नौकरी है वह भी प्राइवेट। छुट्टी कहां मिलती है अपन को। होली के बाद से गांव भी नहीं जा सका हूं। अब दरख्वास्त लगाऊंगा लंबी छुट्टी की। कम से कम चार दिन की। दरअसल घुटन सी होने लगी है एक सा काम करते-करते। कभी कभी ही ऐसा दिन होता है जब अच्छा लगता है। गुजरा शनिवार ऐसा ही था। प्रतापगढ़ के रेहुआ लालगंज के दो बच्चों के इस दिन जेईई-एडवांस में कामयाबी की खबर मिली। टेलीविजन पर देखा। मन प्रफुल्लित हुआ। लगा कभी-कभी गरीबी भी बेहतरी की तरफ ले जाती है, बस माद्दा हो। दोनों ही सगे भाई हैं और उनकी कामयाबी ने दुनिया उनके अनुकूल कर दी है। ऐसा ही होता है। जब हम कामयाब होते हैं तो सब अपने हो जाते हैं। पराए भी। शायद श्रीकृष्ण ने इसीलिए गीता में अर्जुन से कहा है कि हे पार्थ -इतिहास विजेताओं के साथ होता है। पराजितों के साथ नहीं। बृजेश और राजू सरोज अब विजेता हैं। गरीबी से लड़कर कामयाबी की जंग जीतने वाले। ईश्वर मेरे बेटों में भी उनसे प्रेरणा लेने की जिजीविषा पैदा करें, यही कामना है। 

रविवार, 14 जून 2015

यशस्वी हों आनंद हमारे...

नमस्कार। रविवार है आज। रात हो चली है। कुछ देर बाद सिस्टम बंद कर दूंगा। इससे पहले कि आज लिखना पढ़ना बंद हो कुछ उल्लेखित कर देना चाहता हूं। सुबह शुभम के मोबाइल पर फोन आया। उनके फुफा जी का। गजियाबाद के लोनी से। बोले व्हाट्स एप खोलो। शुभम् ने व्हाट्स एप चालू किया तो दिल को धड़काने वाली तस्वीरें आईं। भांजे आनंद थे इस तस्वीर में हाथ में प्लास्टर लिए हुए। बेबी (बहन) ने बताया कि शनिवार को खेलते -खेलते हाथ तुड़वा बैठे हैं। कच्चा प्लास्टर हुआ है अभी। दो तीन दिन में पक्का लगेगा। आज यानी १४ जून को आनंद का जन्मदिन था। सोचा था कि शुभकामनाएं दूंगा। शुभकामनाएं दीं, अनमने मन से। क्या करता। आनंद दीघार्यु हों। भांजे के लिए कोई मामा आखिर और क्या दुआ कर सकता है।
दिन में सोचा था, कुछ लिखूंगा ब्लाग पर। इसी दौरान एक और खबर को लेकर उलझ गया मन। यह खबर थी सुषमा स्वराज को लेकर। क्रिकेट को कारोबार बनाने वाले ललित मोदी की मदद का आरोप लगा है उन पर। सुषमा जी की सफाई है कि ललित मोदी की पत्नी को कैंसर हुआ था। आपरेशन होना था। ललित मोदी की कंसेंट चाहिए थी। इसलिए वीजा वांछित था। इस वीजे के लिए उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से कहा था मानवीय आधार पर। मुझे लगता है कि इसमें गलत कुछ नहीं। आखिर फांसी देने से पहले भी तो रवायत रही है आखिरी ख्वाहिश पूछने की।  अब कांग्रेस के मित्र इस्तीफा मांग रहे हैं सुषमा स्वराज से। उनसे एक सवाल है कि वारेन एंडरसन को भागाने वाले नेता जी के लिए क्या किया था उन्होंने ? तब क्या तत्कालीन प्रधानमंत्री और संबंधित सूबे के मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दिया था। वारंट पर भोपाल आए थे वारेन एंडरसन। भोपाल गैस त्रासदी के बाद। उस त्रासदी के बाद जिसमें तीन हजार लोगों की मौत हुई थी और आज भी लोग उस त्रासदी से पीड़ित हैं किसी न किसी रूप में। एंडरसन साहब को तब जिस काली अंबेसडर कार से वायुयान तक भेजा गया था, वह किसकी थी, शायद याद नहीं होगा कांग्रेसियों को। मुझसे एक बार किसी ने कहा था-शीशे के घर रहने वाले दूसरों के घर में पत्थर नहीं फेंकते। पर ऐसा ही होता रहेगा। दरअसल सत्ता और विपक्ष में बैठते ही हमारे दलों का चिंतन बदल जाता है। 

शुक्रवार, 12 जून 2015

चलो मिली कुछ राहत

थोड़ी राहत है आज। दरअसल अभी जहां रह रहा हूं, उसके करीब ही नया ठिकाना मिल गया किराए का। शाम को एडवांस भी दे दिया जाएगा। इसके बाद फौरी तौर पर सिरदर्द खत्म। बाबू जी कल पूछ रहे थे कि बेटा मकान मिला कि नहीं। मैंने बताया तलाश जारी है। उम्मीद है कि कुछ हो जाएगा। सात हजार प्लस बिजली। यानि आठ हजार रुपये में यह मकान पड़ेगा। हर दिन लगभग तीन सौ रुपये में कुछ देर के लिए छत मयस्सर होगी। करेंगे क्या?
मकान मालिक मुस्लिम हैं। पढे़-लिखे सुशिक्षित। आज सुबह मिलने गया था। बिस्कुट, नमकीन व शरबत से खैरमकद्दम किया। मैंने अपने खानाबदोशी की दास्तां सुनाई। आयुष (छोटे चिरंजीव) भी थे साथ। उनकी भावभंगिमा से लग रहा था कि उन्हें दर्द-ए-दास्तां सुनाया जाना अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन मैंने सोच रखा है कि जैसा भी हूं, साफ -साफ बता दूं। धन्ना सेठ होता तो क्यों कर किराए पर होता। करीब 20 साल के  पत्रकारीय करियर के बाद भी। बताया कि जबलपुर से सफर शुरू किया था, भोपाल, वाराणसी, सोनभद्र, बलिया, इलाहाबाद, रांची, जबलपुर होते हुए फिर वाराणसी और अब इलाहाबाद में पहुंचा हूं। दो साल कम से कम और रहना चाहता हूं यहां जब तक कि आयुष अर्नी मेमोरियल स्कूल से हायर सेकेंड्री न कर लें, अपने मनचाहे विषय से। मकान मालिक खान साहब ने 11 महीने का एग्रीमेंट कर ले रहे हैं, बाद में रिश्ता हमारे व्यवहार पर चलेगा। मैंने कहा ठीक है, उम्मीद है कि अच्छा ही रहेगा। आज तक जहां भी रहा हूं, एकाध अपवाद को छोड़ कर रिश्ता ठीक ही रहा है मकान मालिकों से। सोनभद्र में स्व. महेंद्र प्रताप सिंह के घर तो  जैसा आत्मीय संबंध बना, उसे शब्दों से नहीं बांधा जा सकता। वाराणसी में उमापति यादव जी के घर भी ऐसा ही रहा। उनकी पुत्री शिवानी तो आयुष की बुआ जैसी है। रहेगी हमेशा। उसने अस्पताल में उसकी पाटी साफ की है, कौन करता है भला ऐसा। अहसानमंद रहूंगा मैं उस परिवार का आजीवन। 
गुजरी रात टिवटर पर था। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक ट्वीट दिखा। सबको आवास के लिए उन्होंने बैठक की थी अफसर व मंत्रियों संग। मैंने रिप्लाई ट्वीट से लिखा है कि मैं भी कुछ सुझाव देना चाहता हूं डाक से यदि अनुमति हो तो। अभी तक वहां से हरी झंडी नहीं मिली है। यदि मिलती है तो यही कहूंगा कि पहले उन लोगों का रजिस्ट्रेशन करा लें जो बिना छत के हैं शहरों में। संख्या पता चल जाए तो बिल्डरों के साथ बैठक कर लें। बता दें कि इतने आवास चाहिए। फिर लोगों की आर्थिक सामर्थ्य के मुताबिक ईडब्लयूएस, एलआइजी, एमआइजी, जूनियर एमआइजी जैसे आवास बनवाए जाएं। हम जैसे लोगों का जिनका पीएफ है थोड़ा बहुत उसे सिक्योरिटी मनी के रूप में रख लिया जाए। जो किराया हम दूसरों को देते हैं वह मकान के मद में दें। जब लागत चुका दें तो उसे हमारे अथवा हमारी संतानों के नाम कर दिया जाए। ऐसे में कम से कम चार सदस्यों वाले परिवार को एक छत तो सुलभ हो ही जाएगी।  

रविवार, 7 जून 2015

चलो उठो खानाबदोश, नया ठिकाना खोजो...

दिन रविवार। 
आज दिन में नहीं आ सका था दफ्तर। मकान तलाशने का दौर जो था। निराशा लगी है इस मोर्चे पर। अब देखिए सोमवार कैसा रहता है, इस मामले में। तनाव जस का तस है। पूरा परिवार तनाव के लम्हों से गुजर रहा है। मित्रों का प्रयास भी जारी है इस दिशा में लेकिन अपन की बदकिस्मती ज्यादा जोर मारे हुए है। ऐसा नहीं है कि मकान हैं नहीं। हैं, लेकिन आठ से 10 हजार रुपये मासिक किराए वाले। इतना दे पाना अपने बूते में नहीं है। इसलिए बस ऊपर वाले को याद कर रहा हूं। आखिरी उम्मीद वही हैं। कुछ न कुछ रास्ता निकालेंगे। ऐसा विश्वास है। घर खोजने का तनाव दैनदिनी पर असर डाल रहा है। न कुछ लिखने का मन करता है, न पढ़ने का। रविवार के दिन अखबारों के विशेष आलेखों को भी इसी वजह से कायदा से नहीं पढ़ सका। 
दिन में लेटा था कुछ देर के लिए। 
याद आ गया जबलपुर में पीडब्लयूडी कालोनी में पिता जी के नाम आवंटित हुआ आवास। तीन कमरे, आंगन, बरामद, पीछा बगीचा। पता नहीं क्या-क्या। पच्चीस बसंत गुजर गए इसमें पता ही नहीं चला। अब लगता है कि पिता जी को वह मकान नहीं मिला होता तो वह भी किरायेदारों का दर्द महसूस किए होते। यदि महसूस किए होते तो कहीं न कहीं जरूर मकान बनवा लिया होता। मकान बना होता तो खानाबदोश न होते अपन। यह खानाबदोशी भारी पड़ रही है उम्र के पैंतालीसवें पड़ाव पर। पत्नी हो या बच्चे। हर कोई कहते कुछ नहीं हैं, लेकिन झल्लाते हैं अपनी बदकिस्मती पर। मीरजापुर के शुभचिंतक पंडित संतोष शास्त्री कल रात व्हाट्स एप पर थे। मैंने अपनी समस्या बताई। उन्होंने समाधान। कहा जल्दी हो जाएगा नया ठिकाना। पर अपनी खुद की छत कब होगी? यह सवाल मथता है हर पल मुझे। उत्तर तलाशता हूं, मिल नहीं पाता। अंत में इस निचोड़ को दिल में बैठा लेता हूं कि चलो खानाबदोश...। बंद करो चिंतन। बंद करो मर्सिया। 

मंगलवार, 2 जून 2015

पूर्णिमा स्नान, आशा-निराशा का खेल...

नमस्कार। आज दिन मंगलवार। सुबह रसूलाबाद घाट पर दूसरी तरफ जाकर सपत्नीक गंगा स्नान किया। ज्येष्ठ पूर्णिमा थी। श्रद्धा का आग्रह था। टाला नहीं जा सकता था। मन गदगद हो गया। शीतल जल में। वैसे घाट से नाव पर चढ़ते समय नाले का गंगा में प्रवाह मन कसैला करने वाला था, लेकिन इस पर कोई वश नहीं था। नाविक ने कहा- मां हैं बेटे इसी तरह पाप कर रहे हैं...। नमामि गंगे। बस यही कहते हुए मन ही मन में रह गया। साढ़े नौ बज गए नहा कर मुख्य सड़क तक पहुंचने में। आटो पकड़ी और उतर गए स्टेनली रोड पर बेली अस्पताल के ठीक सामने। शर्मा जी के मकान को भी देखना था। सोमवार रात ही तय कर आया था कि सुबह आऊंगा घर देखने। सेकेंड फ्लोर पर है उनका घर का वह हिस्सा जिसे वह किराए पर देना चाहते हैं। सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता रह चुके हैं शर्मा जी। अब वकालत करते हैं हाईकोर्ट में। मकान हमें (मुझे और श्रद्धा को) पसंद है, लेकिन किराया पांव में बेड़ी है। आठ हजार रुपये की डिमांड है, इसकी। अभी दुबे जी के मकान में साढ़े पांच हजार रुपये में ही काम चल जा रहा था। लेकिन मकान बदलना ही है तो मन दृढ़ कर रहा हूं। अगली तकलीफों के लिए। यदि शुभम के साथी और हमारे पुत्रवत रजनीश तैयार होते हैं तो शायद मामला बन जाएगा। नहीं तो...।
बहरहाल, आज सुबह कुछ खबरें देखीं। एक मेरे ही अखबार यानी जागरण में थी। इसमें जानकारी यह है कि कम कमाई वालों के लिए ज्यादा आशियाने बनेंगे। उप्र की अखिलेश सरकार ने विकास प्राधिकरणों-आवास विकास परिषद को तिरासी हजार आवास-भूखंड तैयार करने का निर्देश दिया है, इसमें इलाहाबाद में कितने बनेंगे, पता नहीं। पिछले दिनों ही इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के मकानों खास कर एलआइजी-जूनियर एमआइजी के बारे में पता करवाया था। पिछले पांच साल में कोई भी बड़ी योजना नहीं आई। ऐसे में 83 हजार मकान शायद ख्वाब ही रहें, इस वित्तीय वर्ष में। जाने कब से सुनता आ रहा हूं, सबको छत मयस्सर कराने की सरकारी कवायदों के बारे में। कुछ समय पहले चीन के बारे में यह रोचक तथ्य सामने आया था कि वहां शहरी आबादी के लिए सौ फीसद छत का प्रबंध है और ग्रामीण आबादी के लिए अस्सी फीसद। भारत में साठ साल में भी ऐसा नहीं हो सका है। एक तरफ बड़े बड़े बंगले हैं भ्रष्टाचार की कमाई से बने हुए। दूसरी तरफ हम जैसे लोग हैं जो पांच सौ फुट की अदद छत के लिए तरस रहे हैं। दावा है कि हमारी अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से बढ़ रही है। तीस हजार रुपये की तनख्वाह में दो बच्चों की पढ़ाई, किराना, दूध तथा अन्य मद में खर्च के बाद बचेगा ही क्या ? यदि मेरे जैसे लोग आठ हजार रुपये मकान के किराए में दे देंगे? लेकिन सरकारों को यह बात कभी समझ में नहीं आएगी।
सरकार यदि सबको छत देना चाहती है तो मेरे पास एक सुझाव है। आवास विकास विभाग अथवा प्राधिकरणों में बेघरों का पंजीयन करा लिया जाए। संख्या पता चल जाएगी। फिर उन्हें मकान दिलाए जाएं। किराए से ही सही। मेरे जैसे लोग जो प्राइवेट सेक्टर में कार्यरत हैं उनकी पीएफ जमा सिक्योरिटी के रूप में ली जा सकती है। और फिर एक किश्त बांध दी जाए किराये के रूप में। जब लागत निकल जाय तो मकान का स्वामित्व दे दिया जाए। क्या इस पर विचार हो सकता है। यदि हां. तो उपयुक्त होगा। खैर फिलहाल चिंता यह है कि अगली छत कैसी मयस्सर होगी। उम्मीद ऊपर वाले पर टिकी है। कहता भी रहा हूं कि जिसने चोंच दी है, वही चुग्गा भी देगा। आशा और निराशा का यह खेल भी गजब है...पर किया क्या जाए। जिंदगी इसी का नाम है।

रविवार, 31 मई 2015

उपदेश, अपमान और सम्मान

कल पत्रकारिता दिवस था। मुझे न्योता मिला था सम्मान करवाने के लिए। झूंसी जाना था। भारतीय संस्कृति एवं साहित्य संस्थान के तत्वावधान में यह आयोजन हुआ। डा. विजयानंद का विशेष आग्रह था कि मैं उपस्थित होऊं। लेकिन साथी अवधेश पांडेय की मां की निधन की खबर मिली मैं अन्य सहयोगियों के साथ अस्पताल पहुंच गया। वहां से दफ्तर। फिर चार बज गए। खबरें भेजने और गढ़ने के फेर में। विजयानंद ने जी सूचना दी है कि मेरा प्रमाणपत्र व शाल रख लिया गया है। कोई सम्मान करना चाहे और अाप अभिमान में तने रहें, मैं उनमें नहीं हूं। ठीक है कि अपमान का आदी हूं। कदम दर कदम अपमान ही जीवन में ज्यादा रहा है। लेकिन यही मेरा प्रारब्ध है। सम्मान ही देना होता तो ईश्वर टाटा-बिड़ला -अंबानी के घर पैदा करते। प्रतापगढ़ के दिलीपुर के पूरे रूपधर पांडेय के पुरवा के कच्चे घर में तो कतई नहीं। माना कि तमाम ऐसे गुदड़ी के लाल हैं जो मुझसे भी गई गुजरी परिस्थितियों में धरा पर अवतरित हुए और उन्होंने आसमान अपने नाम कर लिया है, लेकिन भई मैं यह नहीं कर सका, इसे स्वीकार करता हूं बिना किसी लाग लपेट के।
खैर, मई महीने का यह आखिरी दिन है। कल से कई चीजें महंगी हो जाएंगी। सर्विस टैक्स बढ़ रहा है। तो महंगाई का मीठा डंक मेरे साथ-साथ आपको भी मुबारक। नहीं बढ़ेगी तो सिर्फ तनख्वाह। और हम चिल्लाते रहेंगे कि अच्छे दिन आ गए हैं। अच्छे दिन आ गए हैं। आज रविवार है। हर इतवार  को मैं बड़े स्तंभकारों  (पत्रकारों) के विचार पढ़ता हूं। इस संडे हिंदुस्तान में शशिशेखर जी ने मुफलिसी के मारों की दास्तां लिख मारी है। मदर टेरेसा के इन शब्दों के साथ कि हम कई बार सोचते हैं कि सिर्फ भूखा, नंगा और बेघर होना गरीबी है, लेकिन नहीं। इस दुनिया में सबसे बड़ी गरीबी अवांछित, अप्रिय व उपेक्षित होना है। ठंड और गर्मी से मरने वालों के आंकड़े के साथ शशि शेखर जी ने बखूबी मर्म को समझाने की कोशिश की है। मेरे अपने अखबार जागरण में हमारे प्रधान संपादक संजय गुप्त ने एक साल की मोदी सरकार की आलोचना में कांग्रेस की अपरिपक्वता देखी है। कभी कभी मुझे भी ऐसा लगता है कि क्यों नहीं कांग्रेस को मौजूदा दुर्व्यवस्था के लिए जिम्मेदार मानना चाहिए। खैर, इसी रविवार को अमर उजाला में पूर्व केंद्रीय मंत्री और फिलहाल स्तंभकार बन चले पी. चिदंबरम ने एक छदम नागरिक के रूप में प्रधानमंत्री के नाम खुली पाती लिखी है। अच्छे दिनों को खारिज करते हुए। उनका कहना है कि चुनौतियां तो हर सरकार को मिलती हैं विरासत में। नई सरकार का कर्तव्य भी वह बताते हैं। अब उनसे यह सवाल कौन करे कि दस साल आपकी सरकार थी तो आपने कौन सा तीर मार दिया था। अटल जी की सरकार यदि कबाड़ा कर गई थी तो उसे आप दस साल में क्यों ठीक नहीं कर सके। और यदि नहीं कर सके तो एक साल की सरकार से सवालों का हक किसने दिया है आपको। लोकतंत्र है इसलिए आप कहिए-लिखिए पढ़िए पर सवालों के लिए भी तैयार रहिए। मोदी सरकार काम नहीं करती तो जनता ने जैसे उन्हें सत्ता दी है, वैसे ही छीन भी लेगी लेकिन जो काम वह करना चाहती है उसे वह करने तो दीजिए। भूमि अधिग्रहण बिल, जीएसटी पर रोड़ा क्यों? आपकी सरकार थी तो भाजपा ने साथ दिया था भूमि विधेयक पारित कराने में। अब यदि उन्हें (मोदी सरकार को) लग रहा है कि इसमें कुछ कमियां थीं तो क्या उन्हें इसे दुरुस्त करने का हक नहीं होना चाहिए। चिदंबरम जी को काम कम और बातें ज्यादा होती दिख रही हैं, मैं उनसे कुछ हद तक सहमत हूं। मेरे जैसे खानाबदोशों के लिए सरकार छत की दिशा में कुछ सार्थक करती नहीं दिख रही है। मैं इलाहाबाद में अदद किराए के मकां की तलाश में हूं। हां, तीन सौ तीस रुपये में दो लाख रुपये के बीमा वाला फार्म भर दिया है। यानी घर वालों के लिए दो लाख रुपये पक्के कर जा रहा हूं, मोदी सरकार की किरपा से। पत्नी का फार्म भरवाना बाकी है, अब जिस भी दिन छुट्टी मिलेगी, वह भी करवा दूंगा। लोअर मिडिल क्लास के लिए दो लाख रुपये काफी होते हैं चिदंबरम जी। साठ साल पहले आपकी कांग्रेस ने ऐसी ही कोई पहल क्यों नहीं की थी, यह सवाल अब आपसे है...राहुल जी से है...। प्लीज इसका जवाब दिलवा दीजिएगा। बड़ी मेहरबानी होगी।

शुक्रवार, 29 मई 2015

हे खुशी, प्लीज नजर मत लगने देना

थोड़ी सी खुशी कल शाम खाते में आई मुद्दत बाद। शाम चार बजे का वक्त था। साथी कमल वर्मा का फोन आया हल्दवानी से। उन्होंने बताया कि हैप्पी टाप कर गए हैं 10 वीं, (हैप्पी उनके सुपुत्र हैं) फिर पूछा आयुष का क्या हुआ? मैं आफिस से पहुंचकर लेटा ही था, एक झपकी लेने के लिए। आयुष जग रहे थे। रिजल्ट के इंतजार में। उनकी नींद गुम थी। फोन  सुनकर वह जग गए और आफिस से मुझे मिले टैब को लेकर सर्च करने लगे अपना रिजल्ट। शुभम भी इसमें उनके साथ थे। कुछ देर के लिए सिग्नल गुम था और दोनों भाईयों की बैचेनी बढ़ती रही। खैर, चंद पलों में रिजल्ट खुल गया तो झूम उठे दोनों भाई। लिपट गए एक दूजे से। मैंने पूछा क्या हुआ, बोले पापा...10 सीजीपीए है... मैंने कहा चलो। बधाई। मौसी भी थी इस दौरान आयुष को उनके पैर छूने का निर्देश दे मैं श्रीहरि की इस असीम अनुकंपा के लिए उनका कोटि-कोटि नमन करने लगा। आखिर परिवार में आयुष ने नए मुकाम को जो छुआ है। आज यानी शुक्रवार को उनके स्कूल के टापर्स की लिस्ट जारी हुई है, उसमें भी उनका नाम टाप पर है। टॉपर का पिता होना इतनी खुशी का सबब बनता है, यह पहली बार महसूस हुआ। श्रद्धा भी खुश हैं, मौसी की नातिन प्रीती से कह रही हैं कि तुम लकी हो, अक्सर आया करो। क्या पता तुम्हारे होने से हमें एक अदद छत भी मिल जाए। एक ऐसी ख्वाहिश जो पिछले 20 साल से अधूरी है और हम खानाबदोश कहलाते हैं। दफ्तर में शरद द्विवेदी, संजय कुशवाहा की खुशी से लग रहा है कि एक कलमकार के लिए शायद यही सब सबसे बड़ा धन है। अपने बेटे के लिए तो और क्या कहूं, आपकी दुआओं के लिए जरूर शुक्रिया अदा करना चाहूंगा। फेसबुक पर कल रात छोटी सी पोस्ट डाली थी। अब तक करीब तीन दर्जन से ज्यादा लाइक कमेंट के साथ आ चुकी है। छोटे भाई दीपू का फोन आया था आज सुबह वाराणसी से। कह रहे थे कि भईया जो उसको पढऩा हो, पढऩे देना। मैं मन ही मन सोच रहा हूं कि ईश्वर तो हूं नहीं, जो उसने सोच रखा होगा, वही होगा। बस मैं थोड़ा सा कह सकता हूं। वैसे मेरी ख्वाहिश यह है कि बेटा इंजीनियरिंग पढ़े यानी पीसीएम ग्र्रुप से आगे बढ़े आगे उसकी इच्छा। मेरे पिता जी ने भी तो मुझे लेकर ढेरों सपने संजोये थे, वह आज धूल धूसरित ही हैं। असफल हूं जिंदगी की राह में। भटक रहा हूं। देखें कब यह भटकाव खत्म होगा। 

शनिवार, 23 मई 2015

पांडे...मकान खाली कर दो...कल तक

पांडे... 
कल मकान खाली कर दो ...
रात सोने की तैयारी कर ही रहा था कि यह फरमान सुना दिया नीरज दुबे ने। उनके मकां में हम किराएदार हैं। पिछले चार साल से भी ज्यादा समय से। नीरज के पिता जी शक्तिधर दुबे ने अपने मकान के ऊपरी हिस्से के दो कमरे किराए पर दिए थे। शक्तिधर जी हाईकोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं और चिरंजीव नीरज भी। उनके घर में कल कुछ विवाद हुआ था। हो हल्ला मचा था। अक्सर ऐसे ही मचता है। मैं सुनता हूं, लेकिन कान नहीं देता। कल शुक्रवार को भी मैंने कान नहीं दिया। खैर...। रात में ही दो चार शुभचिंतकों को फोन लगाया। मकान ढूंढने की बात कही। अब तक नतीजा सिफर है। हमारे चिरंजीव शुभम सुबह नेट पर सर्च कर रहे थे किराए का मकान। मुझे हंसी आ गई। कहीं नेट से मकान मिलता है भला। यही सोच रहा हूं। दफ्तर में ज्ञानेंद्र से मदद मांगी। बोले, देखता हूं भाई साहब। 
मैंने एक हफ्ते का समय मांगा है, नीरज से। मकान की तलाश के लिए। दिक्कत यह है कि जब अपन को जिस चीज की जरूरत होती है, नहीं मिलती। मिलती है तो पापड़ बेलने पड़ते हैं। इस बार शायद यही होगा। पता नहीं कब वह घड़ी आएगी जब मकान मिलेगा किराए का। अपनी खुद की छत इस जिंदगी में हर पल दूर होती जा रही है। ऐसे में उन लोगों की किस्मत से ईष्या होनी वाजिब ही है जो अपनी छत के नीचे जिंदगी बसर कर रहे हैं। 
बिना लागलपेट के कह सकता हूं कि खानाबदोशी जिंदगी में लिख दी गई है। पता नहीं कब तक के लिए। मोदी सरकार कह रही है कि अच्छे दिन आ गए हैं। आ गए होंगे बेशक आप लोगों के लिए लेकिन मेरे जैसों के लिए नहीं। 
एक बार पिता जी गुस्से में थे। श्राप दिया था --दो कौड़ी के हो तुम। हां बाबू जी आपने सही कहा था दो कौड़ी का हूं मैं। नहीं होता तो क्या कल जैसा नीरज ने कहा, वैसा वह कह पाते। उनके पिता जी ने मकान बनवा लिया है। वह कामयाब हैं। मैं नहीं। शुभम और आयुष को लेकर इतना ही ख्वाब है कि मेरा कि यदि वह शहर में रहें तो कम से कम अपनी छत के नीचे। नहीं तो गांव चलें। गांव में एक कमरा मैंने बनवाया है। सोचता हूं वहीं चलकर रहूं। बहुत हो चुकी लुकुटी कमरिया लटकाए हुए जिंदगी। किराए की जिंदगी भी कोई जिंदगी होती है क्या। इलाहाबाद में तो आठ साल की अवधि में ऐसा ही एहसास हुआ है।  

शुक्रवार, 8 मई 2015

बिन पानी सब सून...

आज जबर्दस्त गर्मी है। आफिस आने का मन नहीं हो रहा था, मगर नौकरी है तो ना के लिए कोई गुंजाइश नहीं। इसलिए दफ्तर में आया हूं। ब्लाग को काला कर रहा हूं। शब्दों के जरिेए। पिछले दो दिनों से गर्मी संग पानी की किल्लत परेशान कर रही है। सप्लाई नहीं आने से हाल बेहाल है। कल रात टैंकर आ गया था, इससे जैसे-तैसे काम चल गया, लेकिन बस चला भर। न ढंग से नहाना हुआ, न अन्य जरूरी कर्म। शहरों में पानी की दिक्कत बड़ी समस्या होती है। यदि किराए का मकान हो तो और ज्यादा। जबलपुर में पिता जी के नाम सरकारी आवास अलाट था। ब्योहारबाग में। पीडब्लयूडी कालोनी के मकान नंबर 595 में ऐसी दिक्कत कम से कम जीवन के 22 वें बसंत तक अपवाद स्वरूप ही देखी थी। वहां से भोपाल गए तब भी ऐसी दिक्कत अपवाद स्वरूप ही रही। वाराणसी, सोनभद्र में भी नहीं थी। पैतृक गांव प्रतापगढ़ में कुंआ था। बाद में हैंडपंप लग गया। वहां गर्मी के दिनों में दिक्कत आती है, मगर ऐसी नहीं। फिलहाल गंगा -यमुना के शहर में भी पानी की किल्लत मेरे लिए अचरज भरी है। कुव्यवस्था का नतीजा है यह। हमारी सरकारें आजादी के इतने सालों बाद भी यदि सभी के लिए पानी-बिजली का इंतजाम नहीं कर सकी हैं तो उन्हें लानत ही दी जा सकती है। इसके अलावा और कुछ नहीं। चंद लोगों के लिए यहां पानी बेकार बहता है और करोड़ों लोगों सुबह -शाम अपने दैनदिनी की जरूरत पूरी करने के लिए भी पानी नहीं पाते। रात में बिस्तर पर लेटा था तो पानी की दुव्यर्वस्था पर खुद को कोस रहा था। एक हिंदुस्तानी के रूप में जन्म लेने के लिए। 

गुरुवार, 7 मई 2015

देखते हैं कब राम की होगी माया

रात में दफ्तर से घर पहुंचने के बाद कई बातें मन में उमड़ती -घुमड़ती हैं। ब्लाग पर क्या लिखूं, क्या नहीं, इसी उधेड़बुन में कभी दो तो कभी तीन बज जाता है। खबर की दुनिया में हूं, लेकिन लगता है कि खबरची चंद मौकों पर ही खबर बनते हैं। बनते रहेंगे। पेश के शुरुआती दिनों में ऐसा नहीं लगता था। राह कठिन होगी, यह तो जानता था, लेकिन इतनी दुरुह, यह नहीं। नब्बे के दशक में अनायास इस पेशे में आना हुआ। एक्सीडेंटल कह सकते हैं इसे। जबलपुर में मेरे शुभेच्छु अचरज करते थे, मेरे फैसले पर। कुछ ही ऐसे थे, जिन्होंने पीठ थपथपाई होगी। खैर। देश बंधु में मायाराम सुरजन जी का साप्ताहिक स्तंभ पढ़ता था, धूप छांव के दिन। इसमें आदरणीय मायाराम जी मन की बात लिखा करते थे। उनकी आपबीती जीवन पथ पर संघर्ष की प्रेरणा देती थी। कल्पना के संसार में उड़ता था। सोचता था अपन का भी एक प्रिटिंग प्रेस होगा। साथ में काम करने वाले तमाम लोग होंगे। हम मिलकर नया संसार रचेंगे। ऐसा संसार, जिसमें दुख-दर्द के लिए जगह नहीं हो। यह सपना वक्त के साथ हवा में उड़ता गया। अब जिस मुकाम पर हूं। वहां सिर्फ दो ही बातें सोचता हूं। शुभम-आयुष जिंदगी में कुछ मुकाम पा जाएं और एक अदद ऐसी छत हो इलाहाबाद में जिसे खुद की कह सकूं। 
कहते हैं इंसान अपनी भूलों से सीखता है। मैंने भी कुछ सबक सीखे हैं। इसमें सबसे पहला यह कि जब मौका मिले तो दुनियावी जरूरतों को पहले पूरा कर लिया जाए। मसलन, घर-वाहन इत्यादि। फिर आर्थिक रूप से समृद्धि। इसके लिए जीवन के ४० साल अहम होते हैं। यदि इसमें आप यह नहीं कर सके तो राह आसान नहीं रह जाती। ऐसा नहीं है कि मैं इस दिशा में उदासीन रहा हूं, लेकिन तकदीर से ज्यादा तो पा नहीं सकता। सो नहीं पा सका। अपनी छत आज भी मयस्सर नहीं है। किराए के मकां में जिंदगी अधेड़ावस्था की तरफ बढ़ चली है। ईश्वर से यही कामना है कि बुढ़ापा अपनी खुद की छत के नीचे कट जाए। पिछले एक दशक से यही सपना लिए हुए जी रहा हूं। खबरचियों के लिए सरकार की छत की कोई स्कीम हो तो शायद यह हो भी जाए। पर जगह है कहां। यदि कहीं है भी तो इतनी महंगी कि अपन सोच तक नहीं सकते। दो दिन पहले हिंदुस्तान में एक खबर पढ़ी थी। इसमें लिखा था कि आवास विकास के एलआइजी की मासिक किश्त ही अड़तीस हजार रुपये है। अपनी इतनी सेलरी अभी तक नहीं है। हां, मेरे तमाम शुभेच्छुओं की इससे कहीं ज्यादा है। वह आबाद भी हैं अपनी-अपनी जगह। मुझे उनकी तरक्की से खुशी होती है और अपनी हालत पर तरस आता है, पर करिएगा क्या यही तो राम की माया है।  जब उनकी माया होगी तब अपना भी मकां होगा। पुण्य सलिला गंगा -यमुना के बीच कहीं। नर्मदा मैया का शहर तो जाने कब से बेगाना हो गया अपन के लिए। 

मंगलवार, 5 मई 2015

उजाला ही रहे जिंदगी में तो अच्छा

बशीर बद्र साहब का शेर है
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।
सच है उनकी यह बात। एक एक शब्द। दरअसल जिंदगी में हर दिन सुबह और शाम की संधि आती है। अच्छे -बुरे अनुभवों के रूप में। कुछ अच्छा होता है कुछ खराब। मुझे लगता है कि हमें कुछ मांगने की जगह सिर्फ यही मांगना चाहिए वक्त से। 

रविवार, 3 मई 2015

आवागमन का संसार

अभी कुछ देर पहले ही लौटा हूं। दारागंज घाट से। सहयोगी आशुतोष तिवारी की मां नहीं रहीं। शनिवार रात वह श्रीहरि के धाम में पहुंच गई थीं। आशुतोष जी ने रविवार को मुखाग्नि दी। पंचभूतों से रचित देह कुछ ही देर में मिट्टी हो गई। विधाता की लीला ही है यह। आवागमन के संसार में सारे नाते-मोह श्मशान घाट पर खत्म दिखते हैं। हर बार ऐसा ही होता है। घाट से लौटता हूं तो सोचता हूं, किसी न किसी जन्म में कोई रिश्ता जरूर रहा होगा, उस आत्मा से, जिसके लिए यह क्षण जा रहा है। दुनियावी औपचारिकताएं होती हैं, हम सभी निभाते हैं। घाट पर अंतिम कर्म में शरीक होने का कर्म तो निश्चल भाव से होता है। आखिर हर किसी को एक दिन यही गति जो मिलनी है। खैर। यही माया है। ऐसा ही आगे भी होगा। होता रहेगा। इसमें कुछ भी नया नहीं। नया इतना ही होता है कि जिदंगी क्षणभंगुर लगती है। कुछ ही देर के लिए सही। कुछ समय-घंटे क्षण भर पहले हाड़-मांस का जो शरीर मां-पिता, भाई, बहन, पुत्र, पुत्री के रूप में रहता है वह मिट्टी कहलाता है। इस मिट्टी का मोल हमें पहचानना चाहिए। जीवन सत्कर्मों में रहे, यही चेष्टा होनी चाहिए। किसी का भी दिल दुखाना जिंदगी नहीं है। 

रविवार, 26 अप्रैल 2015

मन मत करना रे अभिमान ...


मानस में तुलसी दास बाबा ने परमशक्तिशाली परमात्मा के लिए लिखा है...

बिन पद चलइ सुनइ बिनु काना, कर बिनु करम करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी, बिनु बानी वकता बड़ जोगी।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा, ग्र्रहई घान बिना बास असेषा।
असि सब भांति अलौकिक करनी
महिमा जासु जाइ नहि बरनी।
निर्गुण, निराकार प्रभु की यह स्तुति वाकई अद्भुत है। आज रविवार को जब दूसरी बार भूकंप का झटका महसूस किया है, तब ऐसा ही महसूस कर रहा हूं। प्रभु की लीला कोई नहीं जान सकता। विज्ञान भी नहीं। जो खुद को सर्वशक्तिमान मानता है। छह अरब की आबादी में कुछ हजार, कुछ सौ, कुछ इकाई की संख्या में मौतें हर दिन होती है, लेकिन न जाने क्यों हम प्रभु की लीला समझ नहीं पाते। शायद वजह है हमारा अहंकार। धर्मविमुख मार्ग पर चलने की वजह से उपजी हमारी अज्ञानता। दसानन को भी कुछ ऐसा ही हो गया था। वह खुद अपने अहंकार में इतना मदांध हो गया था कि दूसरे लोग उसे चीटीं समझ में आते हैं। सुंदर कांड में तुलसी बब्बा शायद इसीलिए रावण के दरबार का चित्रण कुछ इन शब्दों में करते हैं -कर जोड़े सुर, दिसिप विनीता। हमारे एक सहयोगी कल कुछ उग्र्र थे। उन्होंने मुझे भला -बुरा कहा। मैंने उसे तवज्जो नहीं दी। मैं इसे उनका अहंकार ही मानता हूं। रात में सोचता रहा, क्षमा वीरों का गुण है और अहंकार अज्ञानियों का। इसलिए शांत करूं मन को। मानव हूं, इसलिए धीरे-धीरे शांत कर पाया अपने मन को। शायद यही जिदंगी का उचित तरीका है। यदि आप ईश्वर को मानते हैं तो सब उन पर छोड़ दें, वह जो करेंगे अच्छा ही करेंगे। बस यही मान लीजिए। दोस्तों अपने अनुभव से कहता हूं कि जिंदगी संवर जाएगी। दरअसल लोभ, मोह का कोई अंत नहीं है। यह अनंत है। इससे जितना बचोगे, जिंदगी उतनी ही आसान हो जाएगी। 

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

दहशत की दोपहर


आज सुबह 11.40 बजे यूपी डेस्क के लिए प्रस्तावित खबरें भेजने की तैयारी कर रहा था। कम्युनिकेशन खोला ही था कि सहयोगी आशुतोष तिवारी ने जोर से आवाज लगाई, सर बाहर निकलें, भूंकप आ गया है...मैंने आवाज सुनी, लगा कि आशुतोष मजाक कर रहे हैं, फिर महसूस किया कि वह कुर्सी भी हिल रही है, जिस पर मैं बैठा हूं। कंप्यूटर भी हिलता नजर आया, करीब 10 सेकेंड चला यह क्रम। फिर सब थम गया। बाहर निकला, देखा कैंपस में सारे सहयोगी खड़े थे। घर फोन लगाया, बेटे को, पत्नी को। उनके मोबाइल की घंटी बजती रही,रिस्पांस नहीं मिला। मन में भय समा गया। ऊपर वाले का स्मरण किया। शुक्र है कुछ पलों बाद बेटे से बात हो गई। उसने कहा-पापा हम छत पर आ गए हैं, बिल्डिंग कांपने लगी थी। मैंने उसे कहा वह व्हाट्स एप पर यह मैसेज आगे बढ़ा दे। ऑफ्टर शॉक लगने की आशंका है, इसलिए खुद भी बैचेन हूं। नेपाल की तस्वीर आ रही है टेलीविजन स्क्रीन पर। वहां तबाही ही होगी, देर शाम तक तस्वीर साफ हो जाएगी। 7.9 तीव्रता वाले भूंकप की बात खबरिया चैनल बता रहे हैं। नेपाल का कांतिपुर टेलीविजन बर्बादी दिखाने लगा है। सिलीगुड़ी में भी बर्बादी दिख रही है। नेपाल में लांगचुक, काठमांडू व पोखरा में जो कुछ हुआ, उसकी कल्पना भी कर रहा हूं। राहत इतनी ही है कि नेपाल में शनिवार को बंदी रहती  है, इसलिए जान-माल का नुकसान कुछ कम हुआ होगा। पशुपतिनाथ मंदिर की सलामती मेरे लिए सुकूनदेह है। ईश्वर करें कि नुकसान कम से कम हों। भूंकप क्यों आता है, इसे तो वैज्ञानिक ही बताएंगे, मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि कहीं न कहीं यह हमारे कुकर्मों का भी सबब है। 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

चीटियों का इशारा, भरेगा भंडार सारा



यूपी के कौशांबी जिले में सिराथू तहसील का एक गांव है उदिहिन खुर्द। क्षेत्र को करीब से जानने वाले ओम प्रकाश सिंह  ने बारिश और इस बारे में चीटियों से होने वाले एक टोटके का रोचक ब्योरा भेजा है। सो इसे ब्लॉग में सहेज रहा हूं, ताकि सनद रहे। उदिहिन खुर्द निवासी वयोवृद्ध संतशरण  सिंह उर्फ मुखिया बाबा क्षेत्र में आधुनिक घाघ कहलाते हैं। यानी मौसम के जानकार। वह 'सगुनौती विधि' अपनाते हैं। दावा यह है कि उनकी अब तक मौसम को लेकर सारी भविष्यवाणियां लगभग सौ फीसद सच रही हैं और इस बार उनका कहना है कि रबी में मौसम ने चाहे जैसे मारा हो, खरीफ में इतनी बारिश जरूर होगी कि किसानों के कोठर अन्न से लबालब होंगे। संतशरण,चीटियों से मिले फलित के आधार पर कहते हैं कि आषाढ़ में तो पानी कम रहेगा लेकिन सावन और भादों में झड़ी लगेगी। खेत लबालब रहेंगे। अगले रबी सीजन में वह गेहूं की बुआई के लिए भी पर्याप्त बारिश की भविष्यवाणी कर रहे हैं। उनकी मानें तो कार्तिक पानी से भरा रहेगा।
भारतीय मौसम विभाग ने इस बार 35 फीसद बारिश कम होने की संभावना जताई है। बुधवार को दिल्ली में केंद्रीय विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान मंत्री हर्षवर्धन ने तकनीक आधारित ज्ञान जिसे हम विज्ञान भी कह सकते हैं, के आधार पर आने वाले दिनों में बादलों की जानकारी दी थी। मैं अंधविश्वासी नहीं हूं, इसलिए चीटियों के टोटके को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहता, लेकिन हैरत तो मुझे भी है, ऐसी किसी जानकारी पर। खैर 22 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर 'सगुनौती विधि आजमाई गई। इसमें 11 जिंसों  को लेकर भविष्य फल निकाला गया। जिन जिंसों के लिए फलित निकाला गया, उनमें चना, सांवा, ज्वार, जौ, धान, बाजरा, उर्द, कपास, गेहूं, काकुन व मकर शामिल है।
यह है सगुनौती विधि
अक्षय तृतीया पर रात में करीब 11 बजे 11 ङ्क्षजस कपड़े में एक-एक तोला बांधकर मटके पर बांध दिए जाते हैं।  उस पर रोटी व मोटे अनाज से बने कई प्रकार के व्यंजन होते हैं। करीब ही पानी भरा मटका आषाढ़, सावन, भादों, कुंवार और काॢतक नाम से पांच मिट्टी के ढेले के ऊपर रखा जाता है। पौ फटने से पहले ही मटके हटाकर यह देखा जाता है कि क्या हुआ? रोटी में चीटियां लिपटीं मिलीं तो अनुमान लगाया जाता है कि गेहूं की पैदावार भरपूर होगी। दूसरे मटके के नीचे रखे गए माह नाम वाले ढेले जितना भीगे होते हैं उसके आधार पर कहा जाता है कि फलां महीने में पानी गिरेगा अथवा नहीं। मटकी के साथ एक-एक तोला के 11 ङ्क्षजस अलग-अलग बांधे जाते हैं। इन्हें चांदी के सिक्के से तौला जाता है। इसके बाद जब वापस मटकी हटाई जाती है तो जिस तराजू से ङ्क्षजस की तौल होती है, उसी तराजू से दूसरे दिन उनकी दोबारा तौल होती है। इसकी बाकायदा लिखा-पढ़ी होती है। दूसरे दिन दाना तौल में कम या ज्यादा अथवा बराबर उतरता है तो उससे आने वाली फसल की उपज का अनुमान लगाया जाता है। पिछली अक्षय तृतीया पर किए गए टोटके में रोटी गायब हो गई थी। तभी उन्होंने कह दिया था गेहूं की पैदावार बहुत कम होगी। ठीक वैसा ही हुआ और किसान बेमौत मर रहे हैं। यदि राजस्थान के दौसा के गजेंद्र सिंह को 'सगुनौती की जानकारी हो गई होती तो हो सकता है वह आज जिंदा होते और देश की सबसे बड़ी पंचायत में शोर-शराबे की जगह आम लोगों के लिए कुछ अच्छी बात भी होती। 

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

सब कुछ सीखा हमने पर सीखी न होशियारी...

अप्रैल का महीना कुछ खास होता है। मेरे जैसे उन कर्मचारियों के लिए, जो निजी क्षेत्र के एम्पलाई होते हैं। दरअसल इसी महीने ज्यादातर संस्थानों में इंक्रीमेंट-प्रमोशन का दौर चलता है। आपकी साल भर की परफारमेंस बास के मूड पर होती है, यदि फैसले के वक्त किसी भी कारण से आपके बास का मूड खराब हो आपसे, तो बैठ जाता है भट्ठा। बाबा जी का टुल्लू मिलने वाली बात ही रह जाती है कर्मचारियों के लिए। साल भर संस्थान अथवा बास को कोसें, या अपनी किस्मत पर रोएं , इसका कोई मतलब नहीं रह जाता। ऐसे लोग विरले ही रहते हैं जो इस कवायद से अप्रभावित होते होंगे। मैं भी इनमें नहीं हूं। मुझे पीड़ा होती है मई में, जब अपना इंक्रीमेंट देखता हूं। मेरे काम के मूल्यांकन कैसा हुआ, मुझमें क्या कमी रह गई? ऐसे सवालों से जूझता हूं, पर कहते हैं न कि समय सबसे बड़ा मरहम होता है, धीरे-धीरे भूल जाता हूं। जुट रहता हूं उत्साह से। अपनी सामर्थ्य भर। दूसरों को सलाह देता हूं कि कम से कम जनवरी से लेकर मार्च तक किसी भी सूरत में पंगा न लें बास से, लेकिन खुद भी यही भूल कर बैठता हूं। करूं क्या, अनाड़ी जो ठहरा।
आदरणीय ज्ञानरंजन सर ने मुझे एक सलाह दी थी। जबलपुर में मई 2010 में। अवसाद के दिन थे वे। पीपुल्स समाचार की नौकरी छोड़ दी थी, तथाकथित अहं को ठोस लगने पर। किसी और ठौर की तलाश में मदद के लिए गया था, उनके पास। उन्होंने मदद भी की। सिफारिशी पत्र लिखा था मेरे लिए। यह बात दीगर रही कि उस पत्र की गति मेरी किस्मत से तेज नहीं निकली। जिन विभूति से  उन्होंने मेरे लिए कोई गुंजाइश निकालने की गुजारिश की, उन्होंने भी सिर्फ आश्वासन दिया। संभवतः समय का फेर था। खैर, ज्ञानरंजन सर की सलाह बता दूं। उन्होंने कहा था, -सुरेश तुम्हें थोड़ा डिप्लोमेटिक होना चाहिए। सर स्वीकार करता हूं कि कोशिश की, लेकिन बन नहीं सका हूं। इस जीवन में शायद यह संभव भी नहीं हो पाएगा।  क्षमा करेंगे। तकदीर से ज्यादा और वक्त से पहले कुछ नहीं मिल सकता, अब इस पर और यकीन बढ़ गयाहै। इस बार मई के बाद शायद कुछ और भी बढ़ जाएगा। यदि गलत साबित होता हूं, तो इसी ब्लाग पर फिर से कुछ शब्दों से अपनी भावना व्यक्त करूंगा। 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

दोनों देवियां हैं रूठीं...



आज अक्षय तृतीया है। सुबह टेलीविजन पर बताया जा रहा है कि मुद्दत बाद यह संयोग बना है। हर साल ऐसा ही संयोग बताया जाता है। ज्ञानी पंडित यही बताते हैं, इस बार भी कुछ ऐसा ही था। खैर बात सुबह की कर रहा हूं। खबरिया चैनल न्यूज 24 खुला था टेलीविजन स्क्रीन पर। मेरे उस ठिकाने पर जो किराए का मकान कहलाता है। पंडित जी बतलाते जा रहे थे कि फलां -फलां राशि वाले क्या- क्या चीजें खरीदें तो धन-संपदा बढ़ेगी। मुझे हंसी आ गई। दरअसल मेरी राशि वालों के लिए चांदी खरीदने की सलाह थी, (पता नहीं किस पंचांगकार ने मेरी राशि मेष तय कर दी है)। श्रीमती जी खुश हो गईं, बोली मैं कब से पायल के लिए कह रही थी, अब आज खरीद दो। मुझे अपना बैंक बैलेंस याद आ गया। कोई 2100 रुपये ही इसमें हैं, मैंने कहा, दो चार सौ की बात हो तो सोचूं भी। खैर स्क्रीन पर एक और सलाह आई पंडित सुरेश पांडेय की। बोले तुला राशि वालों के लिए नया वस्त्र खरीदना शुभ रहेगा। बेटा शुभम खुशी से उछल पड़ा। उसकी राशि तुला ही है, पंडित जी लोगों ने ऐसा ही विचारा है। मैंने शुभम से कहा जाओ खरीद लो...। जबाव मिला, तीन हजार रुपये दे दो। इससे कम में कुर्ते नहीं आ रहे हैं। मैं फिर बैकफुट पर था। क्या कहता? दोबारा याद आ गया बैंक बैलेंस। सोचने लगा न लक्ष्मी देवी की किरपा है न सरस्वती देवी की। जब दोनों देवियां रूठीं हैं तो लाख अक्षय तृतीया आए, मेरे लिए बेमतलब। हां, कल रात में अपना ब्लॉग ढूंढ लिया था, संस्थान से मिले टैब की बदौलत। इस पर जरूर दर्ज कर दूं अपनी सुबह की दास्तां। ताकि कभी रहूं, न रहूं, यह तो सनद रहे। दरअसल अपन का क्षय तो होना ही है एक दिन। अपन अक्षय नहीं हैं ना...। 

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...