शनिवार, 30 दिसंबर 2017

आइए 2018, स्वागत है

ठीक 11 घंटे बाद हम 2018 में होंगे। आप सभी को शुभकामनाएं। साल 2017 की यह आखिरी पोस्ट लिख रहा हूं तो कश्मीर में आतंकियों के हमले की खबर आ रही है।इसमें दो सीआरपीएफ जवानों की मौत हो गई है।  पाकिस्तानी सेना के स्नाइपर दस्ते के हमले में भी एक जवान की मौत हो गई है। 2018 में ऐसा कोई दिन न हो, यह कामना करता हूं। सीमा पर तैनात हमारे जवान सलामत रहें, उनका परिवार हंसता खेलता रहे, यह ईश्वर से मेरी पहली प्रार्थना होगी। जब सीमा पर शांति होगी तभी प्रगति, खुशहाली होगी।
2016 के आखिरी दिनों में उड़ी सेना के शिविर में आतंकी हमला हुआ था। मन के एक कोने में कहीं न कहीं था कि इस बार भी ऐसा कुछ हो सकता है। यह आशंका सही साबित हुई। लगता है कि पाकिस्तान मान नहीं सकता। यह तय हो गया है। कुलभूषण जाधव के परिवार वालों से उसका व्यवहार इस बात का प्रमाण है। कह सकता हूं कि वह कुत्ते की पूंछ है, कभी नहीं सीधी हो सकती... तब हम क्या करें। बस, प्रण प्राण से देश के लिए मर मिटने का संकल्प लें, इजराइल के लोगों की तरह। देश को पहले मानें , दल विचारधारा की बात बाद में करें। हिंदू हों अथवा मुसलमान, सिख या फिर ईसाई । किसी भी तरह की कट्टरता हमारे लिए नुकसान देह है यह जान लें। दलों का क्या है, वोट लेंगे बरगलाकर फिर भुला देंगे। हम आपस में लड़ते भिड़ते रह जाएंगे और वह अपना पेट भरते रहेंगे।
वैसे गुजरते साल में बहुत कुछ मन का हुआ। बहुत कुछ बेमन का भी। मार्च में यूपी में विधानसभा के चुनाव हुए। जैसी कल्पना की थी, नतीजे उससे बेहतर रहे। यह बात दीगर है कि जीते लोगों से की गई अपेक्षा अब तक पूरी नहीं हो सकी। मुझे कुछ खास चाहिए भी नहीं था, लेकिन सरकारी योजनाओं के जिस तरह धरातल पर आने का मेरा सपना था ,वह अधूरा ही है। फिर भी स्वच्छता की ललक बढ़ी है लोगों में। कम से कम हमारे प्रधानमंत्री जी का यह आह्वान कुछ साकार रूप लेता दिख रहा है, इसकी खुशी है। उनकी सोच देश के समग्र विकास की है। स्वच्छता बिना लक्ष्मी नहीं बसतीं। हर हिंदुस्तानी को इसे हाथों हाथ लेना चाहिए। एक ही समय में ही तीन बार तलाक -तलाक तलाक कहने वालों को सजा के प्रावधान का विधेयक लोकसभा से पारित हो गया है, यह राज्यसभा से भी पारित हो जाएगा, ऐसी उम्मीद है। मेरा दलों से आग्रह है कि अखंड भारत के लिए यूनीफार्म सिविल कोड की तरफ वह जरूर सोचें। बहुधर्मी, बहुभाषी समाज में इतने विघ्नसंतोषी हैं कि छोटे छोटे असंतोष को वह हवा देते हैं। विकसित गुजरात के हालिया चुनाव नतीजों से साफ है कि जातिवाद रूपी सर्प डसने के लिए हमारे बीच मौजूद है। भारत की तरक्की से जलने वाले देश ऐसे विवादों को हवा देते हैं। जातियां सच हैं, लेकिन आरक्षण जैसे प्रावधान पर विचार करना चाहिए। यह आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को ही मिलना चाहिए। यदि कोई दलित आइएएस, आइपीएस बन जाता है तो उसके परिवार को इसका लाभ क्यों दिया जाए। कम से कम फर्स्ट एवं सेकेंड क्लास की सेवा में आने वाले एससी-एसटी व ओबीसी वर्ग के लोगों को खुद आगे आकर इसके लिए आवाज उठानी चाहिए। क्रीमी लेयर हर समाज में हैं। वही योजनाओं का लाभ उठा लेते हैं ऐसे में आम जनमानस के लिए क्या है। त्रिपुरा में सिर्फ सरकारी नौकरियां हैं। 10 हजार रुपये के मासिक पगार वाली। यूपी में प्राइमरी के एक मास्टर की शुरुआती तनख्वाह 33 हजार रुपये के आसपास। यह विसंगति ही है। इस पर केंद्र सरकार को सोचना चाहिए। एक देश के रूप में हमें बहुत कुछ बदलाव करने होंगे तभी हम 2030 तक विकसित देश की श्रेणी में आ सकते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत है, लेकिन सामाजिक व्यवस्था कमजोर।  
खैर, चलिए।कुछ और बातें। 2017 में मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत कुछ मिला। तमाम रिश्तों पर पड़े पर्दे उठे। जिन्हें अपना हितैषी करीबी मानता था, उनकी असलियत सामने आई। परिवार, भाई बंधु बांधव सबकी। कुछ खट्टा कुछ मीठा। यह अनुभव 2018 में काम आएगा, ऐसा मेरा मानना है। जीवन के 48 वसंत देखने के बाद अब कह सकता हूं कि  बिना धन जीवन अधूरा है। शुभम आयुष के जीवन में यह साल खुशहाली लेकर आएगा, यह उम्मीद है। उनकी मां का अब तक सबसे बड़ा सपना पूरा हो, इसके लिए प्रयास करूंगा, लेकिन यह पूर्ण हो पाएगा, अथवा नहीं इस सिलसिले में कोई दावा करने की स्थिति में अभी नहीं हूं। ...पानी केरा बुलबुला, अस मानुष की जात.... कब किस क्षण किस मोड़ पर जिंदगी में तूफान आ जाए कुछ निश्चित नहीं। वाराणसी में दीपू का मकान इसलिए बन जाएगा, इसका जरूर विश्वास है। कम से कम परिवार में एक खुशी तो आएगी। बाबू जी स्वस्थ्य एवं सलामत रहें, इसकी कामना भी करूंगा। जब तक वह हैं घर में एक छाया है। बहन बेबी उनकी बेटियों शुभांगी, आदिति व भांजे आनंद के लिए भी दुआ। ...

रविवार, 17 दिसंबर 2017

उजाले संग अंधेरे से दोस्ती ...

किसी शायर की एक रचना सुनी  थी कभी। समय था दीवाली के आसपास। बोल थे -आओ ऐसा दीया जलाएं किसी रोते हुए को हंसाएं। माना कि इंसान ईश्वर का अंश है, इसलिए वह ऐसा कर सकता है लेकिन उजाले संग अंधेरे का भी साथ होता है। आखिर अंधेरे को कैसे मात दी जाए... तो चलिए मेरे साथ शब्दों के सफर पर।  दो दिन पहले महामहिम रामनाथ कोविंद इलाहाबाद में थे। शहर लकदक नजर आ रहा था। न जाम का झाम न बदरंग सड़कें, फुटपाथ। मुझे साफ सुथरा शहर खूब भाया। मन ही मन सोच रहा था कि काश हमेशा ऐसा रहता ...। नगर निगम वाले सब कुछ बदल देने के लिए आमादा नजर आएं और पुलिस वाले  व्यवस्था को व्यवस्थित रखने के लिए।
जाहिर है ऐसा होगा नहीं। इसलिए  उजाले के लिए अंधेरा तो करना ही होगा। जिस दिन महामहिम थे उस दिन फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों के लिए कर्फ्यू मानिंद था। हर वीवीआइपी के आगमन पर ऐसा ही होता है। म्यो हाल चौराहे के आसपास ठेले वाले हटा दिए जाते हैं। टेंपों वालों के लिए भी कोई जगह नहीं बचती। रिक्शे वालों का भी निवाला मुश्किल भरा हो जाता है। इसलिए उनकी जिंदगी में अंधेरा पसर जाता है।
लोकतंत्र , चाहे वह भारत का हो अथवा चाइना का ...क्या ऐसा ही है...।
एक खबर मैंने पढ़ी थी किसी वेब साइट पर। अमेरिका में भी लोग सीवर लाइन के लिए डाली गई पाइप लाइनों में रहते हैं। मेरे लिए अचरज की बात थी। अमेरिका -चीन जैसे विकसित देशों में जहां शहरों और गांवों में आवासों की उपलब्धता का अनुपात क्रमशः 100 व 80 है, वहां भी क्राइसिस। भारत में झुग्गियां बसती हैं चुनाव के लिए। लोकतंत्र के लिए। दिल्ली मुंबई हो अथवा चेन्नई। वैसे दक्षिण भारत के राज्यों में स्थिति कुछ बेहतर है, लेकिन उत्तर भारत अभिशप्त है। गरीबी हटाने के नारे यहां आजादी के बाद से चल रहे हैं, पर मुई गरीबी जस की तस है। वह हटने के लिए तैयार नहीं दिखती। उसने कसम खा रखी है कि वह नहीं हटेगी। मीडिया गरीबी बेचेगा, नेता बेचेगा लेकिन वह हटेगी नहीं। हां जब कोई नेता मन की गरीबी की बात कर देगा तो उसकी हंसी जरूर उड़ेगी। वैसे हम भारतीयों के मन की गरीबी भी दिलचस्प है। मैं जिस पेश में हूं उसे लेकर अनुभव यह है कि यहां छुट्टियों को लेकर सौतिया डाह की स्थिति है। भाई लोग छुट्टियों को अपना संवैधानिक विशेषाधिकार समझते हैं। काम नहीं करना पड़े, लिखना पढ़ना नहीं पढ़े लेकिन खुद को काम के बोझ से दबा बताते हैं। नकारात्मकता इतनी भरी है कि पूछिए नहीं। आज संडे हैं, एक एप्लीकेशन पहले से पेंडिंग था, दो और आ गए हैं, कैसे मैनेज किया जाएगा, इससे किसी को मतलब नहीं। मेरे एक सहयोगी हैं ईयर एंड पर नौ दिन गायब रहेंगे। चार दिन बीमारी के नाम पर, चार दिन बिटिया को खिलाने के नाम पर। दूसरे सहयोगी यदि अपने अवकाश के दिन आ गए हैं तो उन्हें अवकाश चाहिए। जबरिया। क्या कर लेंगे। यदि ऐसे महानुभावों का किसी दूर जिले में तबादला हो जाए तब रोएंगे, मानवाधिकार की दुहाई देंगे अब बताइए कि ऐसे लोगों के लिए लोकतंत्र होना चाहिए क्या... लेकिन उजाले संग अंधेरे की दोस्ती रखनी होगी। इसलिए यह क्रम चलेगा। 

रविवार, 22 अक्टूबर 2017

बीत गई यह दिवाली भी...

दिवाली 2017 बीत गई। गांव गया था परिवार के साथ। वापस आ गया हूं शनिवार को, भाई दूज था इस दिन। धनतेरस के दूसरे दिन जाना हुआ था। वह घर जिसे अरमान से बनवाया गया था, कमोवेश रोता नजर आया। ताला बंद था। हाते (अहाते) में घास थी, मिनी जंगल नजर आ रहा था यत्र तत्र सर्वत्र। बुधवार को नरक चौदस पर तीन बजे पहुंचते ही फावड़ा उठाकर जुटना पड़ा। करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद दोनों प्रवेश द्वार के सामने से कुछ हद तक झाड़ झंखाड़ हटाने में कामयाबी मिली। पड़ोसी स्वामीनाथ गुप्त के प्रयास से एक लेबर जी मिले तीन सौ रुपये देने की शर्त पर फावड़ा चलाने के लिए। उन्होंने भी शर्त रख दी कि घर के सामने वाले हिस्से में ही फावड़ा चलाएंगे। मरता क्या न करता की तर्ज पर मान ली उनकी शर्त। थोड़ा बहुत झाड़ झंखाड़ साफ हो गया था शाम सात बजे तक। बिजली की रोशनी हुई कमरों में और बाहर तो रुआंसा घर कुछ कुछ मुस्कराता दिखा। मैं अतीत में खो गया। कच्चे से पक्के घर तक के सफरनामे में। रियल लाइफ कितनी तकलीफदेह होती है, इसका एहसास हुआ। पिता जी के रहते जो घर स्वच्छता की मिसाल हुआ करता था, वह बेगाना था।
ऐसा कभी होगा, स्वप्न में भी इसका इल्हाम नहीं था। यदि कभी हुआ होता तो शायद मैं भी किसी शहर में किसी टुकड़े का मालिक बन गया होता। जब ऐसा करने में सामर्थ्य था, तब सोचा नहीं। तब प्राथमिकता थी गांव के घर के दुरुस्त कराने की। छोटे भाई दीपू से उम्मीद थी कि वह हमारे ख्वाबों में विकास के नए रंग भरेंगे, पर कहा गया है कि अपना सोचा कभी नहीं होता।  अब उनकी प्राथमिकता दूसरी है। वाराणसी में बसने जा रहे हैं वह। मेरे बेटे भी गांव में शायद ही रहेंगे। इसलिए कह सकता हूं कि अब गांव मेरे लिए प्राथमिकता हो चला है। आखिर उस घर को नहीं छोड़ा जा सकता जिसे प्यार व मेहनत की कमाई से बनवाया है। पिता जी अभी सशरीर हैं। वह सलामत रहें।
मैंने इस दिवाली को लेकर परिकल्पना यह की थी कि कम से कम बाबू जी को लेकर दीपू अपने परिवार समेत आ जाएंगे। देव श्री के बिना दिवाली अधूरी लगती है। अभी वह छोटे हैं, उनकी चुहलबाजी, रोना हंसना। सब अच्छा लगता है। दोनों जब बड़े पापा, बड़े पापा कहते हैं तो जो खुशी मिलती है, उसका वर्णन कर पाना संभव नहीं, लेकिन अब लगता है कि यह बीते दिनों की बात हुई। उनकी जिंदगी की डोर किसी और के हाथ है। मेरा उन पर कोई वश नहीं, इसलिए जज्बाती होने का फायदा नहीं। जज्बाती होना इंसान की कमजोरी है। मैं अपनी बात करूं तो ज्यादा ही जज्बाती हूं। एतबार करना, धोखा खाना मेरी जिंदगी का दूसरा नाम है। इस दिवाली भी ऐसा हुआ। बाबू जी को लेकर दीपू नहीं आए। दीपू ने मुझसे फोन पर औपचारिकता निभानी चाही। मन नहीं हुआ। क्या कहता...। यही कि अच्छा सिला दिया है मेरे त्याग का। मेरे भी बच्चे थे, उनकी भी स्कूलिंग थी। मैं क्यों कर आता था, खर्च कर। सोनभद्र में रहा होऊं अथवा वाराणसी या फिर इलाहाबाद में। त्योहार मिलकर मनाने में ही मजा आता है। खैर अब रिश्तों की हकीकत समझ चुका हूं। अपने परिवार की खुशी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। परिवार खुश तो आप खुश। परिवार की कीमत पर रिश्तों को निभाने का कोई मतलब नहीं। देर ही समझा हूं पर अब इसी फार्मूले पर अडिग रहना चाहता हूं। ईश्वर से यही कामना है कि इसके लिए वह मुझे शक्ति दें। 

रविवार, 24 सितंबर 2017

ठीक है हम वैशाखनंदन ही सही...

गुजरे सप्ताह एक रात टिवटर पर था।  तारीख थी 17 सितंबर। विश्वकर्मा जयंती और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन। किसी रीट्वीट को देखा। उत्सुकता हुई उसे बांचने की। मूल ट्वीट मृणाल पांडे का था। उनका ट्वीट देख नहीं पाया। दरअसल उन्होंने मुझे ब्लाकित किया हुआ था। खैर कुछ ही देर में कुछ और टिवटरबाज मिल गए महान पत्रकार को आड़े हाथ लेते हुए।  स्क्रीन शाट को भी उन्होंने इनसर्ट कर दिया था। मृणाल जी के टीएल पर दर्ज था -- जुमला जयंती पर आनंदित, पुलकित रोमांचित वैशाखनंदन। नीचे गधे की तस्वीर थी।
बता दूं कि वैशाखनंदन गधा का पर्यायवाची होता है। तुरंत समझ में आ गया कि मृणाल जी ने  लक्षणा व्यंजना में प्रधानमंत्री को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने वालों को  किस कदर इज्जत बख्शी है। पदमश्री सम्मानित पत्रकार/ साहित्यकार से ऐसी उम्मीद शायद ही किसी को होगी। मुझे तो बिल्कुल भी नहीं थी। समझ में गया कि मैडम फ्रस्टेशन की शिकार हैं। भले ही इन दिनों वह कहीं किसी पद पर नहीं हैं लेकिन पुराना  दंभ तो है ही उनके पास। उनकी मानसकिता छिपी नहीं है। जिस शासन में वह उपकृत हुईं थी, उसका एहसान तो चुकाना ही था उन्हें।
सेक्युलर बिग्रेड की लंबरदार मृणाल जी का असली चेहरा सामने आया तो कई और बातें सामने आ गईं उनके बारे में। पटना में कभी हिंदुस्तान में कार्यरत एक सहयोगी की  मीडिया जगत से जुड़ी वेबसाइट पर की गई टिप्पणी ने मेरे ज्ञान में इजाफा किया। इस सहयोगी ने बताया कि किसी समय वह पटना में कार्यरत थे। बतौर प्रधान संपादक मृणाल जी का एक लेख छपा। उस पर किसी पाठक ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी। पाठक के पत्र कालम में वह प्रतिक्रिया छापी गई। मृणाल जी ने सीधे तो कुछ नहीं कहा, हां यूनिट के जीएम ने जरूर इशारों इशारों में बता दिया कि प्रतिक्रिया नहीं छापी जानी चाहिए था। सेक्युलर खेमे के साथ दिक्कत यही है। उनको अपनी  कहने का हक तो सबसे अहम लगता है, लेकिन प्रतिक्रिया को ग्रहण करने से हिचकते हैं वह। अभिव्यक्ति की आजादी क्या सिर्फ उनके लिए ही है। यह बड़ा सवाल है। जाहिर है इसका जवाब वह नहीं देंगे।   भारत में इस समय अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा है... ऐसा शोर मचाने में वह सबसे आगे हैं, पर यह सच नहीं है। यदि ऐसा होता तो मृणाल पांडेय जी जैसी शख्सियत भारत के भक्तों को वैशाखनंदन नहीं बता देतीं। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लुटियंस जोन के इंटीलेक्चुअल कदम कदम पर अपमान कर रहे हैं। यह समझे बिना कि वह आने वाले पीढ़ियों को दे क्या रहे हैं। भारत में रह कर भारत को गाली देकर प्रगतिशील का तमगा पाना आसान है। इससे रोजी रोटी भी चल जाती है। और सुर्खी भी मिल जाती है। दो दिन पहले ही मां दुर्गा के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के असस्टिेंट प्रोफेसर द्वारा किया गया अपशब्दों का प्रयोग कम से कम यही दिखाता है।
इंटीलेक्चुअल जमात की झल्लाहट का सार्थक पहलू यह है कि कम से कम एक ऐसा वर्ग विकसित हो रहा है देश में जो भारत को अपनी मां से बढ़कर मानता है। भक्त की संज्ञा को वह गाली नहीं मानता अपने लिए। वरन प्रसन्न होता है। मैं अपनी ही बात करूं। मेरे किसी ट्वीट को मृणाल जी रीट्वीट करतीं तो खुुशी होती, लेकिन मुझे ब्लाकित कर उन्होंने शायद ज्यादा खुशी दी है। जिसके लिए देश का अभिमान नहीं हो, उससे किसी तरह का रिश्ता नहीं होना चाहिए। यह मेरा निजी मत है। बचपन में स्कूल में प्रार्थना करता था--वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जाऊं। इसी प्रार्थना की पंक्ति थी, जिस देश जात में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जाऊं। खुशी है कि अपने स्तर पर जो बन पड़ रहा है कर रहा हूं।  लोकतंत्र व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर हूं मैं, लेकिन मुझे महात्मा गांधी का यह वाक्य भी याद आता है कि अपने घर के दरवाजे और खिड़की इस तरह नहीं खोलना चाहिए कि तूफान हर चीजों को उड़ा ले जाए। खुशी इस बात की है कि राष्ट्रधर्म मानने वाले मुखर हो रहे हैं। अच्छा बुरा समझते हुए। पत्रकार कामरेड गौरी लंकेश की हत्या के बाद प्रेस क्लब में जो कुछ हुआ। वह ठीक था। निंदा की जानी चाहिए थी। की गई। लेकिन इसमें सियासी चेहरों की मौजूदगी क्यों थी, क्या यह सही थी अथवा गलत। समाचार 4 मीडिया ने इस सवाल पर रायशुमारी कराई। इसमें भाग लेने वाले ज्यादातर पत्रकार ही थे, उनमें 80 फीसद से ज्यादा ने कहा --गलत। यही भाव आश्वस्ति देता है मेरे जैसे वैशाखनंदन को। मृणाल जी सुन रही हैं ना।।। 

रविवार, 17 सितंबर 2017

बाढ़े पूत पिता के धरमे...


नमस्कार। गुजरे सप्ताह में एक बड़ी खुशी मिली मुझे और मेरे परिवार को। यह थी परिवार में बढ़ी भू-संपत्ति। दरअसल अनुज दीपक ने वाराणसी में जमीन लिखा ली। ईश कृपा से अब जल्द ही उन पर लगा किराएदार का तमगा मिट जाएगा। वह अपने आशियाने में रहने लगेंगे। पिता जी की कृपा मानता हूं उन पर। दीपू की अभी उम्र है,साथ श्री और देव छोटे हैं इसलिए वह यथाशीघ्र बैंक लोन इत्यादि चुकता कर देंगे, ऐसा विश्वास है। बड़े भाई के रूप में मुझसे जो बन पड़ेगा, वह मदद तो करूंगा ही। दीपू ने कुछ पैसे मांगे थे, अभी नहीं दे सका हूं। पीएफ से कुछ पैसा निकालकर उन्हें जरूर दूंगा। आखिरकार मेरा अंशदान तो होना ही चाहिए। 
खैर इस प्रसंग का दो चार लोगों से जिक्र किया। रिश्तेदारों से। उनके मुंह से यही निकला, तुम तो बुद्धू ही रह गए। मैंने कहा क्यों, जवाब मिला-खुद कब तक किराए पर रहोगे। मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं है। इसकी वजह संभवत मेरा प्रारब्ध है। ऐसा नहीं है कि मैंने कभी अपने आशियाने के लिए प्रयास नहीं किया। जबलपुर में जब पिता जी रिटायर होने वाले थे, तब कोशिश की। भोपाल में नवभारत में काम के दौरान जिस मकान में रहते थे, उनके मालिक लखनलाल ने घर लिखा लेने के लिए कहा था। भरोसा दिलाया था कि धीरे धीरे कर पैसे चुका देना, लेकिन पिता जी गांव में आ गए थे। दीपू भी वहीं रहने लगे थे। अम्मा गुजर चुकी थीं, इसलिए घर के आसपास नौकरी करने की ठान चुका था और प्रयास सफल भी रहा। अमर उजाला वाराणसी में नौकरी भी मिल गई। गांव पास हो गया, लेकिन खुद का आशियाना दूर। काशी पत्रकार संघ की तरफ से चुप्पेपुर आवासीय कालोनी के लिए जब ड्रा होने का समय था, सोनभद्र तबादला हो गया। वाराणसी में तब पांच अथवा दस हजार रुपये का जुगाड़ नहीं हो सका कि ड्रा में शामिल हो गया होता। सोनभद्र जाने के बाद कुछ सहयोगियों ने जमीन खरीद लेने की सलाह दी, लेकिन तब गांव में घर बनवाना जरूरी समझा। कच्चा घर था। हमेशा डर बना रहता था हादसे का। गांव में घर बना, दीपू की शादी भी हो गई। समय चक्र बलवान बना रहा। मैं भी सोनभद्र से बलिया, फिर इलाहाबाद और रांची, जबलपुर वाराणसी होते हुए वापस इलाहाबाद आ गया। संस्थान बदला, लेकिन तकदीर नहीं बदली। खानाबदोशी भारी रही। जब भी दीपू और मेरी चर्चा हुई, किराए का घर जरूर रहा इसमें। मैं बाबू जी को कई बार इस बात की उलाहना देने से भी नहीं चूका कि क्यों नहीं उन्होंने जबलपुर में ही जमीन ले ली। रिटायरमेंट के बाद इतने पैसे तो मिले थे कि जबलपुर में ठीक ठाक जमीन ले ली गई होती। यदि वह जमीन होती तो आज शायद दोनों भाईयों के पास खानाबदोशी का ठप्पा नहीं लगा होता। जमाने की निगाह किराएदारों के प्रति हिकारत भरी होती है। मकान मालिक कहते हैं कि मकान बनवाना किसी बड़े यज्ञ से कम नहीं। अब मुझे लगता है कि हां वह सही हैं। महायज्ञ है। यह तभी संभव होता है जब बड़ों की पिता अथवा पितामह की किरपा हो। मुझ पर यह नहीं है। दीपू को मिली है। पितृपक्ष में पितर आए हैं इस बार। दीपू उनको भा गए। उन्हें वह कुछ देकर जा रहे हैं, मुझ पर कब मेहरबान होंगे, मैं नहीं जानता। आखिरी सांस शहर के अपने मकान में लूं, यह ख्वाहिश है, पर क्या यह पूरी होगी...देखिए।  

रविवार, 3 सितंबर 2017

अगले बरस तू जल्दी आ, खुशियां खुशियां देता जा...

नमस्कार।
सप्ताहांत पर फिर हाजिर हूं। इस बार देशकाल पर बात करने का कुछ ज्यादा मन नहीं है। फिर भी थोड़ा सा। रामरहीम सजा पा गए हैं अपने किए की। आज सुबह सुबह मोदी जी ने मंत्रिमंडल का तीसरा विस्तार भी कर लिया है और चीन चले गए हैं ब्रिक्स सम्मेलन में शिरकत करने। डोकलाम का गतिरोध खत्म हो गया है। भारत ने सेना हटा ली है वहां से और चीन ने सड़क निर्माण का इरादा छोड़ दिया है। पिछले सप्ताह मैंने लिखा था कि संक्षिप्त युद्ध हो सकता है, मेरा आकलन गलत रहा। खैर जो हुआ अच्छा हुआ। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ठीक ही कहा था कि युद्ध होता है तब भी शांति के लिए बात ही करनी पडे़गी। भारत ने सधी प्रतिक्रिया दी थी इस मसले पर। लड़ने भिड़ने वाली बात नहीं की। चीन को भी समझ में आ गया कि भारत अब 1962 वाला नहीं है। कश्मीर में आतंकवादियों पर प्रहार तथा पत्थरबाजी जारी है। अब  मुझे लगता है कि यह दौर भी धीमे धीमे खत्म हो जाएगा। अरुण जेटली का एक वाक्य मेरे लिए जीवन की कुंजी बन गया है कि समस्याएं कभी कभी अपना समाधान खुद ढूढ़ लेती है। यही शायद व्यक्तिगत, सार्वजनिक जीवन का फलसफा है।
भारत के पूर्वी हिस्से इन दिनों बाढ़ से बेहाल हैं, यूपी जापानी इंसेफ्लाइटिस से। पश्चिम में बाढ़ के साथ-साथ उत्सव है। इस उत्सव को गणेशोत्सव के नाम से हम जानते हैं। इस बार मैं देख रहा हूं कि इलाहाबाद और उसके आसपास भी गणेशोत्सव की धूम है। मूर्तियां स्थापित कर भक्तजन पूजा कर रहे हैं। मेरी भी ख्वाहिश रहती है कि मैं गणेशोत्सव के दौरान घर में मूर्ति स्थापित कर विधिवत पूजन अर्चन करूं। बचपन में जबलपुर में ब्योहारबाग के पीडब्ल्यूडी कालोनी में सार्वजनिक तौर पर होने वाली पूजा में बढ़ चढ़ कर शिरकत करता था, इसलिए भी शायद गणेशोत्सव की अमिट छाप है मुझ पर। शुभम् जब पेट में थे। तब मैंने मन ही मन कामना की थी कि पहली संतान पुत्र के रूप में हो। एक हजार रुपये चंदा दूंगा। शुभम हुए तो वादा निभाया। मनौती पूरी की। कालोनी की मूर्ति  विसर्जन के बाद खामोशी पसर जाती थी। इससे पहले 10 दिन तक आरती से लेकर ग्वारीघाट में मां नर्मदा के आंचल में बप्पा के विर्सजन तक धूम रहती थी। इसके बाद करीब दो दिन तो कुछ अच्छा ही नहीं लगता था। फिर धीरे धीरे जिदंगी रफ्तनी पकड़ती थी। यूपी में जब से हूं तब से ऐसी अनुभूति नहीं हुई। इलाहाबाद में एक बार प्रतिमा स्थापित की। बनारस में भी एक बार। किराए के घर में बंदिशें होती हैं, मनमाफिक पूजा अर्चना नहीं हो पाती, इसलिए इस बार इरादा त्याग दिया। अभी जिस मकान में हूं, वहां मन भी नहीं करता। न मेरा, न श्रृद्धा का। आज दफ्तर में था। सहयोगी आशुतोष तिवारी ने मुंबई के प्रभादेवी में स्थापित सिद्धि विनायक मंदिर से जुड़ा प्रसंग छेड़ दिया। कहा कि सच्चे मन से यहां की गई कोई आराधना निष्फल नहीं जाती। उन्होंने मुंबई में संपत्ति से जुड़े एक विवाद की जानकारी दी। कहा कि बात कोर्ट कचहरी तक जाने वाली थी, लेकिन जैसे ही वह अपने चाचा जी के साथ दर्शन पूजन कर निकले, मामला सेटल हो गया। सिद्धि विनायक की कृपा ही है यह। मुझे इससे नाइत्तेफाकी की कोई वजह नहीं दिखती। मैंने भी मन ही मन अपनी मनौती कर ली है। अब देखना यह है कि सिद्धि विनायक कब इसे पूरी करते हैं और कब मेरा मुंबई में जाकर उनके दर्शन की अभिलाषा पूरी होती है। खैर गजानन की कृपा मेरे परिवार पर रही है। पिता जी आज थोड़ा बहुत भी चल फिर ले रहे हैं तो उनकी ही कृपा है। दीपू को बैंकाक जाने का मौका मिला है। यह भी मेरे लिए खुशी का पल है। घर परिवार पर गणेश जी की कृपा बनी रहे।
संभवतः कल गणेशोत्सव का औपचारिक समापन हो जाएगा। लाल बाग के राजा समेत तमाम स्थानों पर भक्तों पर स्नेहाशीष बिखेरने के बाद बप्पा चले जाएंगे। अगले साल आएंगे, लेकिन जीवन के जरूरी तत्व जल में विसर्जित होने से पहले कितनी खुशियां देकर जाएंगे, इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। मैं तो कतई नहीं। बस शब्दों से उनसे मांग ही सकता हूं। मैं भी कुछ मांग रहा हूूं। दर्द फिल्म के इस गीत को गुनगुनाते हुए ...गणपित बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ। बस इसमें इतना और जोड़ दे रहा हूं कि मेरे परिवार, शुभेच्छुओं के लिए खुशियां देता जा.... ।
मुंबई के सिद्धि विनायक। 

रविवार, 27 अगस्त 2017

अकेला चना कैसे फोड़ेगा भाड़

देशकाल पर कागज कारे करने की बीमारी रही है मुझे। लगभग ढाई दशक से। पत्रकारिता की बीमारी लगने के बाद काफी समय तक ऐसा लगता रहा कि  अपने देश व दुनिया के बदलाव के लिए पहल करूंगा। एक ऐसा भारत बनाने में मेरे शब्द काम आएंगे, जहां न गरीबी हो, न अन्याय। समाज का हर तबका फले फूलेगा। मेरे जैसे तमाम लोग सोचते हैं, लेकिन कहावत है ना कि अकेला चना भाड़ तो नहीं फोड़ सकता। यही बात मुझ पर भी लागू होती है। अपने अब तक के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि  हर किसी की अलग-अलग सोच रहती है और क्षमता भी।  देशकाल को लेकर विचारधाराएं है। मेरे विचार देश को एकजुट व मजबूत देखने के पक्ष में रहते हैं। दिक्कत तब होती है जब हम थोपते हैं अपनी बात। दूसरों को खारिज करने की धारणा हम हिंदुस्तानियों में सबसे अहम रही है।  बहरहाल यह लंबा विमर्श है। आज तो पिछले सप्ताह की कुछ घटनाओं -फैसलों का उल्लेख भर करूंगा ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत पडे़ तो काम आए। चीन से डोकलाम को लेकर चल रही तनातनी तीसरे महीने में पहुंच गई है। चीन रोज -रोज धमकी दे रहा है युद्ध की, लेकिन अब तक दोनों सेनाएं भिड़ी नहीं हैं। मुझे लगता है कि मौजूदा सरकार की दृढ़ता ने इस समय विश्व के दूसरे दरोगा को सोचने समझने के लिए मौका दिया है कि भारत किसी भी देश के लिए आसान भोजन नहीं है, तमाम विसंगतियों के बाद भी।
गुजरे सप्ताह की शुरुआत में तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला आ गया। इसमें पांच सदस्यीय खंडपीठ ने बहुमत से एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इसके बावजूद तीन तलाक देने की बातें आ रही हैं। क्या सबके लिए कानून नहीं है क्या इस देश में? यह मेरा सवाल है। कामन सिविल कोड देश की मांग है। इसे आप संकीर्ण सोच मान सकते हैं लेकिन गहराई से सोचेंगे तो पाएंगे कि इसके बिना बात नहीं बनेगी। गुजरे सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय खंडपीठ ने निजता को मौलिक अधिकार मान लिया है। यह काफी अहम फैसला है। मेरा अपना मत है कि हर किसी को स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन कितनी? देश -परिवार व समाज के प्रति कर्तव्य क्या हों, इसका ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए। आधार पर फैसला आना है। इसे निजता के अधिकार में शामिल करने से भ्रष्टाचार को लेकर हमारी लड़ाई कमजोर पड़ सकती है। उत्तराखंड व असम का एक प्रसंग यहां उल्लेखित करूंगा। वहां मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों के आंकड़े को आधार से जोड़ने की कवायद हुई तो करीब तीन चौथाई छात्र खारिज हो गए। यह मिले ही नहीं। यूपी में भी ऐसे ही आंकड़े हैं वजीफे को लेकर। यानि आधार से सरकारी कल्याण कारी योजनाएं लिंक किए जाने के सुफल आए हैं भ्रष्टाचार के खुलासे के रूप में। क्या इस तथ्य को खारिज कर देना चाहिए? किसी भी देश की तरक्की में सबसे बड़ा रोड़ा है भ्रष्टाचार। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संरक्षण के नाम पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा तो नहीं दिया जा सकता। चोर को चोर के रूप में पकड़ने के लिए यदि आधार का इस्तेमाल हो रहा है तो गलत क्या है?
सप्ताह के अंतिम दो दिनों में राम रहीम बाबा को दुष्कर्म के आरोप में सजा सुनाए जाने पर पंजाब और हरियाणा में हुई हिंसा ने मन व्यथित कर दिया। बाबा को चाहिए था कि कानून को अपना काम करने देते। सम्मान जताते।  बाबा यदि आसानी से कोर्ट में पेश हो गए होते तो शायद वह छूट भी जाते। अब ऐसा हो सकेगा, इसमें संदेह है। दरअसल हमारी न्यायापालिका से अदावत रखने वालों का भला नहीं हुआ है आज तक। इंदिरा गांधी से लेकर सहारा प्रमुख सुब्रत राय तक इसके उदाहरण हैं। विकसित समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं है, लेकिन चाहे दक्षिण पंथी हों अथवा वामपंथी, इस आग्रह के लिए गंभीर नहीं दिखते। यदि कश्मीर में हिंसा गलत है तो केरल में सही क्यों? कश्मीर से ही याद आ गया। पुलवामा में शनिवार को हुआ आतंकी हमला हमसे और सजगता की अपेक्षा करता है। आतंकवादी रक्तबीज की तरह हैं और देश की जनता को इनके विनाश के लिए मां काली की तरफ मुंह फैलाना होगा।
ध्यान रखिए कि राजनीति का अंतिम लक्ष्य समाज के सर्वहारा की खुशहाली है, भ्रष्टाचार के जरिए अपनी झोली भरना नहीं। दुर्भाग्य से इस देश ने 70 साल की आजादी में यही ज्यादा देखा है। हर दल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की बात जरूर की, लेकिन मौका मिला तो वह दूसरों से आगे निकलने की होड़ में नजर आए। केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार पर ऐसा कोई बड़ा दाग नहीं लगा है अब तक। यह कहीं कहीं आश्वस्त करता है, लेकिन जमीन पर चीजें नहीं बदलीं हैं ज्यादा। करीब 20 करोड़ गरीबों के लिए जनधन खाते खुले हैं, लेकिन इसमें करीब एक चौथाई खाली हैं, नोटबंदी के बाद भी। जीएसटी लागू होने के बाद इलाहाबाद में दूध व खाद्य वस्तुओं के दाम वही हैं जो पहले थे। सबको छत देने का वादा हवा हवाई ही रहा है। बदलाव की बातें भर नहीं होनी चाहिए। दिखना भी चाहिए। खबरिया चैनलों के पास इसके लिए वक्त नहीं है। यह काम पांचवां स्तंभ यानि सोशल मीडिया ही करा सकेगा। 

रविवार, 6 अगस्त 2017

कलाई आपकी, प्यार हमारा...

फौज में जाना मेरा सपना था। फौजी मेरे आदर्श हैं । जबलपुर में मैट्रिककुलेशन के बाद इंडियन नेवी की आर्टिफिशयल अप्रेंट्रिस की परीक्षा दी थी। इसमें सफल नहीं हो सका। देखते ही देखते वह उम्र गुजर गई, जब फौज में जा सकता था। मन भटक गया कहीं और। लिखने पढ़ने की दुनिया में आना था, इसलिए फौज की जिंदगी ख्वाब ही रह गई। लगभग उन्हीं दिनों में टेलीविजन पर शाहरुख खान का सीरियल आने लगा फौजी। इसलिए भी फौज को लेकर उत्सुकता बढ़ गई। ऐसे शहर में बचपन बीता है, जो भारतीय सशस्त्र सेनाओं के लिए खास है। एरिया कमांड है जबलपुर। थल सेना के लगभग लगभग सभी सिपाहियों, अफसरों का वास्ता जीवन में एकाध बार यहां से जरूर पड़ता है, ऐसा पता चला था। खैर, देखते ही देखते ढाई दशक से ज्यादा का समय गुजर गया। फौज में जाने का ख्वाब अब इस जिंदगी में पूरा नहीं हो सकेगा। अगले जन्म में ईश्वर ने साथ दिया तो जरूर जाऊंगा फौज में।
आज फौज की बात क्यों? यह सवाल आप कर सकते हैं। चलिए उत्तर भी दे देता हूं। असल में कल कुछ देर फौजियों के बीच रहने का मौका मिला। दैनिक जागरण दशक भर से ज्यादा समय से भारत रक्षा पर्व मानता आ रहा है। इस पर्व के तहत विभिन्न संस्करण (प्रकाशन केंद्र) में कार्यरत सहयोगी अपने -अपने शहर की बहन बेटियों के हाथ की बनी राखियां जुटाते हैं। इन राखियों को ट्रक के जरिए सीमा पर तैनात जवानों को भेजा जाता है। सरहद प्रहरियों पर प्यार जताने का पर्व होता है एक तरह से यह। हम सिविलयन तो हर तीज त्योहार का आनंद ले लेते हैं अपनों के बीच, लेकिन यह ऐसा दिन होता है जब एक फौजी भाई को उसकी बहन की कमी खलती है। आखिर वह भी परिवार छोड़कर मोर्चे पर हैं। कभी पत्थर खाते, कभी गोलियां झेलते। इस अभियान से जहनी जुड़ाव पहली बार महसूस हुआ, शनिवार को इलाहाबाद स्थित पूर्व यूपी -एमपी एरिया सब कमांड मुख्यालय पहुंचकर। अनुशासित फौज और उसके सिपाही वाकई में अदभुत नजर आए। यह दुनिया कुछ अलग ही दिखी। हम (आदरणीय संपादकीय प्रभारी जगदीश जोशी, उपमहाप्रबंधक मनीष चतुर्वेदी, सहयोगी अवधेश पांडेय, रमेश यादव, दिव्यानंद पांडेय, शानू सिंह) मुख्यालय की हरियाली, सुरक्षा देख ओतप्रोत थे। कुछ ही देर में हमारे बीच में थे मेजर जनरल एसके सिंह। संपादकीय प्रभारी जगदीश जोशी ने कार्यक्रम का संक्षिप्त परिचय दिया। हमने राखियां भेंट की। फिर बारी थी मेजर जनरल एसके सिंह की। हिंदी पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। कहा कि सिविलयन की तरफ से ऐसे उपक्रम हमें (फौज को) यह बताते हैं कि हम उनके लिए खास हैं।)  उन्होंने चंद पंक्तियां पढ़ फौजी की जिंदगी और देश में उसके योगदान को रेखांकित कर दिया। उनकी पंक्तियां थीं....
कभी ठंड में ठिठुर कर देखो, कभी गर्मी में तप कर देखो
देश की हिफाजत कैसे होती है कभी सरहद पर आकर देखो...
उपरोक्त पंक्तियां दिल में उतर गईं। गहरे से। राखियां सौंपे जाने के बाद हमारे साथ ही परिसर में पहुंची एमपीवीएम गंगा गुरुकुलम स्कूल की छात्राओं ने तिलक किया फौजी भाईयों का और राखियां बांधने लगीं। तमाम फौजी भाईयों ने हाथ पर राखियां बंधवाई और पर्स निकाल कर नेग दिया। मुझे याद आ गई अपनी बहन की। मैं भी ऐसे ही करता हूं। एकबारगी आंख छलछला आईं। यह दृश्य भुलाए नहीं भूलेगा। रक्षाबंधन तो और भी आएंगे। हमारा समाज, हमारी नई पीढ़ी कितनी संवेदनशील है फौजी भाईयों को लेकर, यह शब्दों में बता पाना संभव नहीं। कल रक्षा बंधन है। इस बार कुछ ही घंटों का वक्त रहेगा राखियां बांधने के लिए। सीमा पर मौजूद सारे जवानों के हाथ में देश के नेह का बंधन होगा, ऐसा विश्वास करता हूं। बहनें निश्चित तौर पर नहीं चूकेंगी। आखिर इन्हीं भाईयों के हाथ ही है उनकी लाज। तो कह सकते हैं कि कलाई आपकी, प्यारा हमारा... रक्षा बंधन का पर्व है प्यारा।
    

रविवार, 23 जुलाई 2017

जा पर कृपा राम की होई, ता पर कृपा करें सब कोई

देखो ये कैसी हवा है...
सभी को नमन। ब्लाग के इस पेज पर गुजरे सप्ताह एक अनपढ़ भारतीय के रूप में मेरे मन में जो उमड़ा घुमड़ा है, आज वही सब। रामनाथ कोविंद जी हमारे महामहिम बन गए हैं अनौपचारिक रूप से। आने वाली  25 जुलाई को दिन में 12-25 बजे वह देश के 14 वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेंगे। फिर आने वाले पांच सालों में उनके हस्ताक्षर रूपी प्रसाद से कितनों की जिंदगी बदलेगी, मैं नहीं जानता। देश के लिए उनका चयन कितना सकारात्मक फलदायी होगा, यह भी नहीं जानता। पर इतना तो कह सकता हूं कि हमारा लोकतंत्र वास्तव में बहुत हद तक परिपक्व बन चला है। तमाम नरेश अग्रवालों के बावजूद। निवर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने किसी समय उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाए जाने पर इतना भर कहा था कि -इट्स माइ लक। किस्मत वास्तव में सबसे अहम होती है। यही गाडफादर दिलाती है, गाड की कृपा भी इसकी दम पर आती है। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास कह ही गए हैं कि ....जा पर कृपा राम की होई ता पर कृपा करैं सब कोई। राम गोविंद पर राम की कृपा है वास्तव में। यह चुनाव में साफ दिखा। एनडीए के वोटों से ज्यादा कहीं उन्हें वोट मिला है। उनकी प्रतिद्वंद्वी रहीं मीरा कुमार पर राम की कृपा कब और किस रूप में होती है, यह बात देखने वाली होगी, मेरे लिए, देश के लिए। मीरा जी कांग्रेस से रही हैं और आज कांग्रेस की जो दशा है, उसमें उसका भविष्य बांचने की क्षमता कम से कम मुझमें तो नहीं है। इतिहासकार व स्तंभकार रामचंद्र गुहा जैसा विद्वान नहीं हूं मैं। उन्होंने जरूर बांचा है इस पार्टी का भविष्य, तभी वह कह रहे हैं कि कांग्रेस अपनी कमान नीतीश कुमार जैसे किसी नेता को सौंप दे। क्या कांग्रेस इस पर राजी होगी? यह बड़ा सवाल है। वैसे राम चाहेंगे तो ऐसा हो जाएगा। अभी तो राम ऐसा चाहते नहीं दिखते। हां, राष्ट्रवाद बनाम छदम धर्मनिपरेक्षता की लड़ाई आने वाले दिनों में और तल्ख होगी, इतना जरूर लगता है मुझे। यदि आप मुझसे पूछेंगे कि मैं कहा होऊंगा तो बता दूं कि मैं खुद को राष्ट्रवाद के पलड़े में रखना चाहूंगा। ऐसा इसलिए कि निरपेक्ष भाव में बैठना मेरी आदत नहीं। मेरे देश में जिस तरह की परिस्थितियां हैं फिलहाल, उसमें मुझे लगता है कि ऐसा जरूरी है। चीन से लेकर पाकिस्तान तक सनातन धर्मियों की बहुलता वाले भारत को जर्जर करने में लगे हैं। डोकलाम में चीन जो कुछ करना चाहता है उसका प्रतिकार अब तक तो मेरे नजरिए से बेहतर रहा है। पहली बार भारत प्रतिरोध करता दिख रहा है, दुनिया की दूसरी बड़ी ताकत का। कुछ लोग चीन को आज अमेरिका से भी बड़ी ताकत मानते हैं, पर मेरा मानना है कि यह पूरी तरह सच नहीं। चीन भी घिरा है, जापान, हांगकांग, ताइवान उसके लिए सिरदर्द बन रहे हैं। शायद यह भी एक वजह है भारत के मौजूदा रुख के पीछे।
थोड़ी देर के लिए एक और कल्पना। मान लीजिए चीन और भारत का युद्ध होता है तब क्या होगा? यदि भारत थोड़ा बहुत भी भारी पड़ा उस पर, तब भी हाथ में लड्डू और हारा तो भी। राष्ट्रवाद की ऐसी हवा बहेगी, जो यदि तूफान में बदली तो चीन बहुत कुछ गवां बैठेगा। चीन के लिए आज भारत वह बाजार है, जहां से उसकी अर्थव्यवस्था को प्राणवायु मिलती है। वह बाजार उससे चला जाएगा। चीन निर्मित उत्पादों के बहिष्कार होने ही लगा है जगह-जगह। कल टिवटर के जरिए जानकारी मिली कि ओडीशा में व्यवसायियों ने चीन निर्मित उत्पादों की बिक्री से तौबा कर ली है। इस तरह मैं कह सकता हूं कि भारत की जनता ही चीन को हरा सकती है, सेना को हाथ आजमाने की नौबत नहीं आएगी। आखिरकार अहिंसा के रास्ते से ही तो हमने उस ब्रितानिया साम्राज्य का सूरज अस्त कर दिया जिसके बारे में कहा जाता था कि यह कभी नहीं डूबता। सेक्युलर राजनीति की जलन इसीलिए है। कामरेडों के लिए कहा जाता है कि वह भारत में तब छाता तानते हैं जब बीजिंग में बारिश होती है। अब वहां बारिश हो रही है, वह छाता तान लें। यदि वह बचते हैं तो भारत नहीं बचेगा, और यह अच्छा ही होगा। मेरे जैसे राष्ट्रवादी कम से कम देश के लिए ईश्वर को तो प्यारे हो जाएंगे। ईश्वर की कृपा से राष्ट्रपति भवन नहीं मिला तो क्या हुआ, स्वर्ग तो मिल जाएगा। राम की कृपा इसी रूप में।
अंत में --मायावती जी का इस्तीफा हो गया है। आज वह अपनी नई भूमिका का ऐलान करेंगी। कुछ देर में लखनऊ में उनकी बैठक है पार्टी पदाधिकारियों के साथ। देखिए क्या आउटकम आता है। उन्हें सलाह इतनी है कि वह सियासत करें लेकिन देश की कीमत पर नहीं। राम की कृपा के लिए यह भाव जरूरी है। इन पंक्तियों का समापन करते हुए यह भी बता दूं कि बाबी देखने जा रहा हूं इलाहाबाद स्थित सिविल लाइंस के पैलेस थियेटर में।  मौका है आठवां जागरण फिल्म फेस्टिवल। गुनगुनाते हुए .. सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो... क्या. हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाभी खो जाए...।
  

रविवार, 9 जुलाई 2017

बरसो इंद्रदेव, जमकर बरसो

पिछले हफ्ते चाह कर भी कुछ नहीं लिख सका। जब लिखने बैठा, सहयोगी गोपाल आ गए। मन भटक गया। बावला होता है न यह। अनायास लिखने का मन नहीं होता। सयास लिखा जाए, पर वह हो क्या। यह बड़ा सवाल होता है। खैर, आज सुबह हिंदुस्तान में आजकल कालम के लिए उकेरे गए शशिशेखर जी के शब्द पढ़े। अमर उजाला में सुधीश पचौरी को पढ़ा। शशि जी ने बारिश की याद दिलाई। इसके बहाने अपना बचपना याद किया। वह (शशि जी) जिस पद पर हैं, वहां से अपनी यादों को ताजा कर सकते हैं लाखों लाख पाठकों के सामने। मेरे पास ऐसा कोई मंच नहीं है। मुझे लगा मेरा यही मंच सही। निश्चित तौर पर बारिश मेरे जीवन में भी सुखद एहसास ही कराती रही है आमतौर पर। एकाध प्रसंग जरूर याद हैं जब मैंने इंद्रदेव से यह कामना की कि अब वह बरसना बंद करें। जबलपुर में वर्ष 1994 में हुई मानसूनी बारिश अब भी याद है। उसी साल शुभम हुए थे। घर में एक सुबह पानी ही पानी था।  बाबू जी पूजा कर रहे थे, अचानक से नाले का पानी घुस आया, चीजें बहने लगीं। सिलेंडर से लेकर अन्य हल्की वस्तुएं। बाहर सड़क पर भी वही हाल था। मैं देर रात सोया था, सुबह उठ नहीं पाया। उठा तो बिस्तर के नीचे बारिश का पानी ही पानी था। शुभम जिस दिन हुए, उस दिन भी झमाझम बारिश हुई थी। तारीख थी 17 जुलाई। ब्यौहारबाग की उस पीडब्लयूडी कालोनी में जो अब तक मानस पटल से नहीं हटी है। एक बार की बारिश और याद है। गांव में था मैं।  बाबा दिवंगत हुए थे उस साल। वर्ष था 1984-85। तेरहवीं होनी थी बाबा की। खूब पानी बरसा। बाबू जी के साथ मैं दिलीपपुर बाजार गया था सामान की खरीदारी करने। आते समय इतना पानी गिरा कि भीग गया। तब घर कच्चा था गांव का। खपरैल हर साल खराब होता था। बाबू जी जीपीएफ से फंड निकालते, छाजन ठीक होता। नए खप्पर मंगवाए जाते। टूटते। बनते। यह सिलसिला 2004-05 तक उस वक्त तक चलता रहा, जब तक कि घर पक्का नहीं हो गया। अब गांव में बारिश में जा ही नहीं पाता। वहां सुविधाएं हैं, लेकिन घर वीरान है। हम दो भाई हैं, दोनों घर से दूर। मैं इलाहाबाद में, छोटा बनारस में। बाबू जी की सेहत साथ नहीं देती। वह भी बनारस में हैं। गांव का घर निश्चित तौर पर हमें कोसता होगा। बारिश के दिनों में। पक्का होने के बाद भी। जब साफ सफाई नहीं हो तो और कहेगा भी क्या?
पक्का घर बनने के बाद बारिश की बूंदों के बीच भजिया पकौड़ी खाने का अपना सुख है। एकाध बार ऐसा आनंद उठाया हूं। छत पर अंडर वियर पहन कर झिड़की के बीच भीगने का भी सुख लिया हूं। लेकिन बात काफी पुरानी हो गई है अब।  दो साल पहले ठीक 10 जुलाई को श्रद्धा के साथ गांव गया था। बाबू जी के लिए किशोरी के यहां से समोसे और रसगुल्ले लेकर। उनका जन्मदिन पड़ता है 10 जुलाई को। इसलिए। उस दिन भी बारिश हुई थी। बाबू जी हमें अपने बीच पाकर आल्हादित थे। मैं भी भीगना चाहता था, लेकिन अपनी इच्छा को अंजाम नहीं दे सका। इस बार इलाहाबाद में हूं। किराए के मकान में। यहां यदि एक से दो घंटे पानी बरसता है तो गली से निकलना आसान नहीं होता। नाली ओवर फ्लो हो जाती है।  फिर भी चाहता हूं कि खूब पानी बरसे। आखिर इंद्रदेव की इसी कृपा से तो हम सभी का गला तल होता है। शशिशेखर जी को पढ़ा तो मन में कल्पना करने लगा, काश मैं भी किसी ऐसी जगह होता जहां पार्क होता, बालकनी से बारिश को निहारता और प्रफुल्लित होता। बचपन में खूब भीगा हूं। अब भी भीगता। छत पर चढ़कर। भले ही डाट फटकार पड़ती रही। यदि दैव कृपा से शहर में घर बनाने का मौका मिला तो जरूर भीगूंगा।
जुलाई के महीेने में परिवार में तीन लोगों के जन्मदिन पड़ते हैं। सबसे पहले 10 तारीख को बाबू जी। फिर 17 को शुभम और 30 जुलाई को देव का। ईश्वर की कृपा ही है। जुलाई मेरे परिवार के लिए खास है। सभी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देकर अपनी बात खत्म करूंगा।

रविवार, 25 जून 2017

धूप छांव के यह भी दिन

हर इतवार चाहता हूं ब्लाग के इस पेज पर मन की उमड़ घुमड़ को साझा करना। कर नहीं पाता हूं। वजह -अलाली। आज भी ज्यादा नहीं लिख पाऊंगा। पहले इतना बता दूं कि आज बाबू जी से फोन पर बात हुई। लगभग दस दिन बाद। उन्होंने बताया है कि वह थोड़ा बहुत चलने लगे हैं। एक दिन गिर गए थे। उनको देखने की इच्छा है, लेकिन समय नहीं निकाल पा रहा हूं। वाराणसी जाने का मतलब है कि एक दिन पूरा। आखिर श्री और देव भी हैं वहां। कुछ देर उनसे भी खेलना होगा। दीपू ने कुछ दिन पहले बाबू जी का वीडियो भेजा था। इसमें वह छड़ी के सहारे कुछ चहल कदमी करते दिख रहे थे। वाकई में सुखद अनुभूति हुई। यह दीपू और उनके परिवार की सेवा है कि बाबू जी कम से कम बिस्तर से उठ बैठ रहे हैं। हो सकता है कि दीपू अस्पताल इत्यादि के चक्कर लगाने की वजह से मानसिक तौर पर पीड़ित हुए हों, उनका परिवार भी असहज हो, लेकिन उनकी साधना बेकार नहीं जाएगी। उन्हें इसका सुफल जरूर मिलेगा। किसी बड़ी सौगात के रूप में। 
बाबू जी से मैं कई बातों को लेकर अतीत में नाराज रहा हूं। मेरी कई सलाहें उन्हें दाएं कान से सुनीं, बायें से निकाल दीं। तकलीफ होती थी तब। अब भी होती है। खासकर शहर में कहीं मकान न होने को लेकर। लेकिन अब सोचता हूं कि यह अपना प्रारब्ध है। इसमें उनका कोई दोष नहीं। जब वह जबलपुर में सरकारी सेवा से रिटायर हुए थे तभी मैंने चाहा था वह वहीं घर खरीद लें। इतना पैसा तो मिला ही था कि कोई एमआइजी लिया जा सकता था, पर उन्होंने नहीं लिया। यदि ले लिया होता तो मेरी स्थिति यायावर जैसी नहीं रहती। मेरी ही नहीं, दीपू की भी। हम दोनों भाई किराए के मकान में हैं। हमारी कमाई का एक बड़ा हिस्सा किराये के रूप में चला जा रहा है। मैं अपनी बात करूं तो गांव में पुराने घर को नई शक्ल देने में मशरूफ होने के बाद मैंने शहर में मकान की दिशा में उतनी गंभीरता से नहीं सोचा, जितना अब सोच रहा हूं। अब इतना पैसा नहीं है कि पचास से साठ लाख का कोई मकान खरीद सकूं। शहर में जिनके मकान हैं, उन्हें मैं सौभाग्यशाली मानता हूं। वैसे मेरे एक मित्र हैं कहते हैं मकान भी जी का जंजाल है। किरायेदार ठीक हैं, जब तक जंचा रहे, नहीं तो चलते बने। वह मकान मालिक हैं, इसलिए ऐसा कह सकते हैं। मैं किरायेदार ठहरा लगभग दो दशक से, इसलिए दर्द जानता हूं।  यदि कभी किस्मत ने पलटी मारी तो हो सकता है कि मैं भी मकान मालिक बन जाऊं, पर अभी तो ऐसा नहीं है। सरकार की योजनाओं के सब्जबाग में विचरण कर रहा हूं। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी स्कीमें मेरे लिए मृगतष्णा ही हैं। ईपीएफओ की योजना आई, पत्नी ने अखबार में पढ़ा, बोली पहल करो। मैंने कहा आसान नहीं है यह। आजादी के बाद से ही ऐसी योजनाएं चल रही हैं। किस्मत के बली लोग ही इससे लाभान्वित हो रहे हैं। कमजोर तकदीर वाले नहीं। 
हो सकता है कि बार बार किस्मत से नाराजगी वाली मेरी बात से आपको झुंझलाहट हो, लेकिन सच ऐसा ही है। किस्मत का धनी जरूर होना चाहिए इंसान को। यदि वह बली है तो इंसान हर जगह बली। यदि ब्रह्मा ने किस्मत में धक्के ही लिखे हैं तो कोई नहीं बदल सकता। योग्यता, विचार, अनुभव सब कुछ शून्य। तकदीर बली कैसे हो, इसका उपाय खोज रहा हूं, लेकिन सैंतालीस साल की उम्र में ऐसा कोई गुरु नहीं मिला है जो इसे बता सके। अम्मा जिंदा थीं तो कहती थीं, बब्बू (मेरा घर का नाम) संतोषी है। संतोष कर लेता है। शायद यही उत्तम मार्ग भी है जीने का। धूप छांव के दिन कब तक चलते हैं, ईश्वर जाने। पर उसका स्मरण इसी बहाने हो रहा है, वही अच्छा। 

रविवार, 28 मई 2017

खुशी मिली पर थोड़ी सी कम

आज खुश हूं थोड़ा। बेटे का रिजल्ट आ गया है। उसकी कल्पना जैसी थी, वैसा भले ही नहीं रहा, लेकिन मेरे लिए सुकून का सबब है रिजल्ट उसका। आखिर परिवार में अभी तक इंटरमीडिएट में किसी ने वह स्कोर नहीं किया है। आने वाली पीढि़यों में कोई इस स्कोर को पीछे छोड़ेगा, ऐसी कामना करता हूं। आयुष की जिद थी बायो ग्रुप से पढ़ना। उसने ऐसा ही किया। साइंस ग्रुप में वह टाप थ्री में है और बायो में टाप। रिजल्ट आने के बाद आज बता रहा था  कि एक साथी ने एग्जाम से पहले कहा था उससे कि स्कूल में नंबर पाते हो, बोर्ड में पाना तब बताना।
सीबीएसई बोर्ड में नंबर उदारता से मिलते हैं, ऐसा किसी ने कहा था मुझसे, लेकिन नतीजों से साफ हैं कि ऐसा है नहीं। मेधावी ही पाते हैं नंबर। अपन तो कभी पाए नहीं इतने नंबर। लेकिन कल्पना जरूर करते रहे कि ऐसा परिवार में होगा कभी। आयुष जहां पढ़ते हैं, अर्नी मेमोरियल सीनियर सेंकेड्री स्कूल इलाहाबाद में, वहां तमाम छात्र साठ फीसद से भी कम अंक लेकर आए हैं। उनके स्कूल में हाईएस्ट परसेंटाइल रहा है 91 फीसद। आयुष 85 फीसद के साथ दूसरे स्थान पर हैं। उन्हें इस बात से थोड़ी तकलीफ है। नाइंटी प्लस उनका लक्ष्य था। मैंने उन्हें दिलासा दी कि जितना भी है, उससे अब संतोष करो। एग्जाम के दिनों में नर्वस हो जाते थे। इस बार पहला पर्चा अंग्रेजी का था। देकर आए तो चेहरा लाल था। बोले टाइम मैनेजमेंट नहीं कर सका। बायोलाजी में उन्हें अच्छे स्कोर की उम्मीद थी। नब्बे मिला है, लेकिन उन्हें लगता है कि कम है। केमेस्ट्री में भी यही लगता है उन्हें कि यहां अच्छा किया जा सकता था। फिजिक्स में अपने स्कोर से खुश हैं वह। मैंने वाराणसी में बाबू जी व दीपू को फोन पर बताया तो उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आशीर्वाद दिया। श्री और देव भी खुश हैं। श्री पूछ रही थी -बड़े पापा-आयुष भइया पास हो गया। मैंने कहा हां तो फोन पर ही चहकने लगी। आयुष व श्री एक दूसरे के दुलारे हैं। देव अभी पांच साल के हैं ज्यादा नहीं समझ पाते लेकिन खुश वह भी होंगे। शुभम के लिए भी खुशी ही है। उनके भाई ने उनसे बेहतर जो किया है।
परिवार में पढ़ने लिखने वाले सभी थे, एक मैं ही अनपढ़ रहा हूं। अपने  मार्क्स किसी को बता नहीं सकता। इसलिए आज जो कुछ भी मिला है उसे बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद ही मानता हूं। आखिर कहा ही गया है बाढ़े पूत पिता के धर्मे। शुभम, आयुष, श्री और देव का जीवन इसी तरह की खुशियों से भरा रहे, यही कामना है। आज बस इतना ही।   

रविवार, 21 मई 2017

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

सप्ताह गुजर गया। बाबू जी की हालत में थोड़ा सुधार दिखा है, लेकिन अब भी उनका चलना फिरना बंद है। छोटे भाई दीपू ने बताया है कि पैर तो हिल रहा है, लेकिन वह साहस नहीं जुटा पा रहे हैं।  मुझे लगता है कि  उनकी कमजोरी मानसिक  ज्यादा है। जब पैर में मूवमेंट है तो उन्हें चलना चाहिए, लेकिन पता नहीं क्यों, वह जोखिम नहीं ले रहे हैं। संभवतः वह हम सबकी परीक्षा ले रहे हैं। उनके पिता जी ने भी ऐसी ही परीक्षा ली थी।
हमारे खान दान का यह पुश्तैनी चलन है क्या? इसका उत्तर समय पर छोड़ देता हूं। हां अपने और अपनी आने वाली संततियों के लिए ईश्वर से यह कामना जरूर करता हूं कि वह हमें इस हालत में कभी नहीं लाए।
बीमारी। बड़ी खराब चीज है यह। जो बीमार हो वह तो होता ही है, दूसरे भी परेशान हो जाते हैं। खासकर मेरे जैसे इमोशनल व्यक्ति के लिए तकलीफ बढ़ जाती है। दफ्तर में हूं अथवा घर में। अज्ञात भय सताता है। पता नहीं क्या होगा? इस बार हम सब गर्मियों में गांव में कुछ निर्माण कराने की तैयारी में थे, लेकिन विधि का विधान पता नहीं था। आखिर किसे पता होता है विधि का विधान।
चिकित्सक कह रहे हैं कि आपरेशन अंतिम विकल्प है। यह जोखिम भरा है। बाबू जी को जाने क्यों यह बात समझ नहीं आ रही है। यदि आपरेशन के बाद भी बात नहीं बनी तब? यह सवाल कठिन है। इसका जवाब मैं नहीं दे सकता। अब तो यही मान कर चल रहा हूं कि जो भी होगा, उसे सिर माथे लेना पड़ेगा। और कोई कर भी क्या सकता है। वैसे पिता जी यदि चलने फिरने लगते हैं, कम से कम इस लायक हो जाते हैं कि लैट्रिन बाथरूम खुद से जा सकें तो उन्हें अपने पास ही रखूंगा। भले ही दिन भर गरियाएं। जब तक जियें गरिया लें। यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। और तो कुछ दे नहीं सके हैं वह। श्राप -गाली जो कुछ उनके पास है, वही दे दें। जिंदगी किराए के घर में कट गई। प्राइवेट नौकरी में इतना पैसा नहीं जुटा पाया कि अपने लिए दो कमरे का फ्लैट ही कहीं बना लेता। जब मौका था तब चेता नहीं जब चेता तो पैसा नहीं। बेटे शुभम आयुष किसी लाइन से लग जाएं तो चिंता दूर हो जाए। बस यही चाहता हूं अब। मैं तो इतना ही जानता हूं कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। इसलिए अपने मन को सबल बन रहा हूं।

रविवार, 14 मई 2017

दुआओं की है जरूरत, देंगे ना

आपका यह सप्ताह शुभ हो। यही कामना है। मेरे लिए दुआ करें। यह चाहत है। दरअसल गुजरे सप्ताह के घटनाक्रम से चिंतित हूं। बीते सोमवार यानि आठ मई की  सुबह 10 बजे थे। छोटे भाई दीपू का फोन आया--बाबू जी बीमार हो गए हैं भइया। आप पास में हैं देख लें। संयोग वश मैंने अवकाश ले रखा था, इसदिन। गांव के पड़ोसी लखपति की शादी में जाने की तैयारी कर रहा था। शाम को गांव जाने का प्रोग्राम था। तुरंत भागा। करीब दो बजे घर पहुंचा तो पिता जी बरामदे में तख्त पर लेटे थे। बाहर थी तपती धूप, उमस । बिना कुछ खाए पिए थे बाबू जी। पूछा तो बताया कि सुबह से बायां पैर काम नहीं कर रहा है। जैसे तैसे नहाया हूं। खाना नहीं बना सका। इलाहाबाद से निकलते वक्त सब्जी पराठा रख लिया था। उन्हें खाने के लिए दिया। बमुश्किल दो पराठा ही वह खा सके। बाकी सब गाय को देना पड़ा। इतना होने तक एंबुलेंस आ चुकी थी।प्रतापगढ़ कार्यालय के सहयोगी रमेश त्रिपाठी ने मदद की थी। तीन बजे हम घर से निकले। आधे घंटे के भीतर प्रतापगढ़ जिला अस्पताल में थे। वहां बताया गया कि पैरालिसिस का आंशिक अटैक हुआ है। मुझसे पूछा गया कि क्या रेफर कर दें, मैंने पिता जी की इच्छा जाननी चाही। पूछा क्या यहीं (प्रतापगढ़) में भर्ती करवा दूं। वर्ष 2004-05 का उनका अनुभव अच्छा नहीं था। सो तुरंत बोले, यहां नहीं। तय हुआ कि इलाहाबाद में इलाज करवाऊं।
खैर एंबुलेंस से लेकर शाम साढ़े पांच बजे तक मोती लाल नेहरू मेडिकल कालेज के स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल पहुंच गया। लाल बत्ती में। लालबत्ती यानि इमरजेंसी। यहां से मेडिसिन की आइसीयू में। प्रशिक्षु डाक्टरों ने अपना ज्ञान उड़ेलना शुरू किया। आनन फानन करीब पांच सौ की जांच। खून इत्यादि की। दवा कुछ नहीं। हाथ में इंजेक्शन के लिए व्यवस्था की गई। करीब आठ बजे वार्ड 10 में भेजे गए। जनरल वार्ड का बिस्तर मिला 18 नंबर। यहां उमस से बैठना मुहाल था। तीन बिस्तर आगे खाली थे, लेकिन सिस्टर (नर्स) ने फरमान सुनाया, यह बिस्तर रिजर्व हैं बजाज मैडम के लिए। संभवतः वह कोई डाक्टर हैं। उनके पेंशेट्स के लिए बिस्तरों का आरक्षण। पिता जी कभी कभी जाली मूड में होते हैं। व्यंगात्मक लहजे में बोले-जनरल में भी रिजर्वेशन? धन्य हो मोदी जी।
प्राइवेट वार्ड में भी बेहाल
इलाहाबाद कार्यालय में सहयोगी शरद द्विवेदी ने स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल के चिकित्सक डा. करूणाकर द्विवेदी से बात कर ली थी। मैंने शरद से आग्रह किया था कि कम से कम एकाध प्राइवेट रूम दिलवा दें। जो भी रेट तय होगा, भुगतान कर दूंगा। पिता जी के नाम से न्यू प्राइवेट वार्ड का कक्ष क्रमांक 1/2 आवंटित था। यह खुलवाया गया तो वहां का एयरकंडीशन खामोश मिला। अटेंडेंट ने दूसरा कक्ष दिया 1/11। इसमें पंखा था, दीवारों में सीलन था। फ्लश, वाश बेसिन टूटे हुए थे। मरता क्या नहीं करता की तर्ज पर इसमें शरण ली। मेडिसिन वाले डाक्टर आए। कुछ जांच लिखी, चले गए। अगले दिन डा. मनोज माथुर के निर्देशन में इलाज शुरू हुआ। सहृदय डाक्टर हैं वह। उन्होंने न्यूरो, आर्थो स्पेशलिस्ट से राय लेने की एडवाइज दी। न्यूरो स्पेशलिस्ट ने आर्थो वाले को दिखाने की सलाह दी। आर्थो स्पेशलिस्ट डा. वर्मा ने देखा और बता दिया कि पुरानी चोट है। कूल्हे की। आपरेशन के बिना बात नहीं बनेगी।
प्लेन से जाइए और क्या
गुरुवार शाम चार बजे के बाद पिता जी को देखने आए थे डा. वर्मा। अपने सहयोगी के साथ। तमाम सिफारिशें लगवाई थीं इसके लिए। मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. एसपी सिंह, जूनियर रेजीेडेंट डाक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डा. संतोष सिंह से लेकर हमारे सहयोगी शरद द्विवेदी तक का। डा. वर्मा ने डिजिटल एक्सरे की बात की। पिता जी ने कहा सर कैसे जा पाऊंगा, डा. वर्मा ने उपहास उड़ने वाले लहजे में कहा-प्लेन से जाइए। मैं बेबस था। कोई और मौका स्थान होता तो पता नहीं मैं क्या कर जाता? बहरहाल, खून का घूंट पीकर रह गया। जिस डाक्टर का ऐसा बिहेव हो, वह कैसे इलाज करता होगा, यह सोचकर हैरान हूं। स्वरूपरानी की बदहाली सुनी बहुत थी, लेकिन देखी पहली बार। छोटे भाई को बताया तो वह बोला, भइया मैं आ रहा हूं। बाबू जी का इलाज अब बनारस में होगा। जो होगा देखा जाएगा। शुक्रवार शाम वह आ गया। शनिवार को पिता जी को बनारस ले जाया गया। अभी बनारस में हैं छोटे भाई के घर। वहां बीएचयू के ट्रामा सेंटर में भर्ती के लिए कोई बिस्तर नहीं मिला। मेरी कोशिश बेकार ही रही है अब तक। वैसे अमर उजाला में कामकाज के दिनों में बलिया में मेरे सहयोगी रहे मुकेश श्रीवास्तव इन दिनों वाराणसी में हैं। दैनिक जागरण में ही। उन्होंने अपने स्तर से कोशिश की है। संभव है सोमवार को ट्रामा सेंटर में पिता एडमिट हो जाएं। इसके बाद तय होगा कि पिता जी  आपरेशन कब होगा? डा. संजय मारवाह (वाराणसी) ने भी आपरेशन की ही सलाह दी है। उम्मीद थी कि उनके इंजेक्शन से काम सध जाएगा, आपरेशन की नौबत नहीं आएगी, लेकिन निराशा ही हाथ लगी है।
बाबा विश्वनाथ पर एतबार
पिता जी वाराणसी से स्वस्थ होकर लौटेंगे, इसका विश्वास है मन में। भले ही कुछ आशंकाए भी हों। विश्वास इसलिए है क्योंकि बाबा विश्वनाथ विराजते हैं वहां। बाबा को कुछ अच्छा करना चाहिए। आखिर अपने शरणागत पर वह कृपा करते रहे हैं। इसके साथ ही मुझे आपकी दुआएं भी चाहिए। आप सब भी तो उनके अंश हैं। 

रविवार, 26 मार्च 2017

खुदगर्ज होने का सर्टिफिकेट...

खुदगर्ज होने का एक सर्टिफिकेट मुझे हाल ही में मिला है। वह भी एक सहयोगी से जो जहां रहे सिर्फ विवाद में रहे। असल में उन्होंने तय कर लिया है कि वह इसी तरह रहेंगे। मुझे मानस में तुलसीदास बाबा की यह चौपाई ही याद आ रही है कि अपने कर्म जाएं अपकारी...। खैर संवाद आपके लिए प्रस्तुत है। विषय वस्तु हैं जागरण में हमारे सहयोगी रहे संजय मिश्र। अब संजय मिश्र इस दुनिया में नहीं हैं। बीती 11 मार्च को जब हम चुनाव नतीजों के दिन  दफ्तर में ब्रेकिंग इत्यादि भेजने में जुटे थे, तब यह मनहूस खबर आई। संजय की त्रयोदशी के दिन हमारे ही एक साथी ने सोशल मीडिया पर मुझे और मेरे साथ -साथ पूरी टीम को नंगा करने की जो चेष्टा की वह मेरे लिए मृत्युतुल्य कष्ट से कम नहीं रही। मौत पर राजनीति सुनी थी, लेकिन पहली बार होती भी देखी किसी संस्थान में। आप भी पढि़ए 

[5:22 PM, 3/23/2017] Ln Triphathi: संजय हमे अफ़सोस है...
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आज संजय मिश्र को हम सबको छोड़ कर गए 13 दिन हो गए। मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कभी नकारा नही जा सकता। जन्मना मृत्यु निश्चितमं। जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए एक न एक दिन तो तुम्हे जाना ही था। हम सब भी हमेशा यहां नही रहेंगे। काल ने हमारी विदाई की तिथि भी निर्धारित कर रखी है।
इन सबके बावजूद संजय के जाने का अत्यधिक अफ़सोस है। पैसे और इलाज के अभाव में जिस तरह वह गया वह अत्यधिक कष्टकारी और सोचनीय रहा।

संजय होने के मायने...
-कुंभ में मौनी अमावस्या की भोर में जब भारी भीड़ के दबाव में अधिकारियों ने भी अपने वाहन किनारे लगा दिए थे, जागरण टीम का कारों का काफिला अंदर ले जाना संजय के ही बस की बात थी। तत्कालीन संपादकीय प्रभारी आ. अवधेश गुप्ता जी भी उस क्षण के साक्षी थे। सोहबतिया बाग से ही वाहन रोक दिए गए थे पर जागरण के वाहन भोर में तीन बजे भारी भीड़ के बीच खुद एसएसपी एस्कोर्ट कर अंदर ले गए।
-विभिन्न गणमान्य अतिथियों के आगमन के दौरान उनके स्नान, मेले में प्रतिबंध के बीच वाहनों के काफिले के साथ घूमने आदि की व्यवस्था संजय के ही हवाले थी। ऐसे कई अवसर आए जब आ. अवधेश गुप्ता जी व्यवस्था को लेकर तनाव में आए पर मेरे साथ बाइक पर बैठकर जब मेला क्षेत्र पहुंचे तो सब ओके देख कर तनाव मुक्त हो गए। यह सब संजय के ही बस की बात थी। स्टीमर से लेकर एस्कार्ट तक उसी के हवाले था।
कुंभ में तमाम लोगो ने तमाम कार्य किए पर लाजिस्टिक (संसाधन व सुविधाएं)उपलब्ध कराने की अघोषित जवाबदारी इलाहाबाद सिटी टीम को दी गई थी। कुंभ टीम जहां रुक जाती, उसके आगे की व्यवस्था सीधे हमारे सिर पर होती। सिर्फ तीन सहयोगियों के साथ नगर संस्करण निकालने और कुंभ में आने वाले महत्वपूर्ण लोगों की व्यवस्था का दायित्व निभाने का काम संजय के बिना कत्तई नहीं हो पाता। तत्कालीन सिटी टीम को कभी कुंभ के आयोजन में निभाई गई बेहतरीन भूमिका की कोई क्रेडिट नहीं दी गई। मुझे इसी बात का हमेशा अफसोस रहा कि ताराचंद के साथ मिलकर संजय ने जो काम किया, उसे उसका श्रेय कभी नहीं मिल सका।  

बतौर टीम लीडर मैं यह कह सकता हूं कि संजय के अंदर खबरों की समझ थी, लिखने का सलीका था, व्यवहार में विनम्रता थी और रिपोर्टर का तेवर था। क्राइम से साहित्य तक कुछ भी दे दिया जाता, वह बेहतर परिणाम ही देता। इसीलिए वह मेरा सबसे पसंदीदा रिपोर्टर था।
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टीम इलाहाबाद विचार करे--
-हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी हैं। वह खुद एक्सीडेंट में घायल होकर घर पर पड़े थे। अनुपस्थित रहने के कारण उनका भी वेतन रुक गया था। उस समय आ. आशुतोष शुक्ला जी की अगुवाई में हम सब जब उन्हें दीपावली पर आर्थिक सहायता व अन्य उपहार देने पहुंचे थे, वह भावविह्वल हो गए थे। उनके आंसू आज भी हम सबको द्रवित करते हैं और किसी अन्य की सहायता करने को प्रेरित करते हैं। उनके साथ मुसीबत के समय अच्छा किया गया पर जब ऐसी परिस्थिति किसी और के साथ आई तो वह सीन से नदारद हो गए।  आर्थिक सहायता आदि तो दूर की बात है, आज तक वह संजय के घर पहुंच कर सहानुभूति के दो शब्द भी नहीं बोल पाए।
- एक अन्य वरिष्ठ सहयोगी हैं। उनकी मां का देहांत हुआ, फिर छोटे भाई का देहांत हुआ। बाहर तैनात थे। जब भी मिलते थे मुझे यही कहते थे कि तीन गृहस्थी का खर्च जागरण के वेतन से निकालना मुश्किल हो गया है। मुझे तो अपने बच्चों की पढ़ाई बंद करा देनी पड़ेगी। आपको फला फला बहुत मानते हैं। मेरी सिफारिश करके इलाहाबाद बुला लीजिए। कुछ खर्च कम हो जाएगा। घर भी देख लेंगे। हम जब जगह जगह उनकी सिफारिश कर रहे थे तो आ. अवधेश गुप्ता जी बहुत बार टोके। उनका कहना था कि वह आ जाएगा तो पहले तुम्हारे पीछे ही पड़ेगा। एक दिन भी नहीं पट पाएगी। हुआ भी कुछ ऐसा ही। यहां मेरा मसला नहीं है। सोचने की बात यह है कि अपनी आर्थिक स्थिति के लिए इतना परेशान रहा बंदा संजय की आर्थिक स्थिति के बारे में सोचने को भी तैयार नहीं हुआ। बीमार होने के बावजूद छुट्टी देने में परेशानी, वेतन कट जाने देना आदि आम बात रही। जब संजय कार्यालय आने में लाचार हो गया तो उसका पूरा वेतन बंद हो जाने देना भी देखता रहा। जरा भी नहीं सोचा कि एक बीमार व्यक्ति बिना पैसे के काम कैसे चला रहा होगा।

यह सिर्फ नमूने हैं। टीम इलाहाबाद के सदस्यों को मदद लेना पसंद रहा है। सभी ने खुल कर मदद ली थी पर देने की स्थिति में कोई नहीं है। टीम के पुराने सदस्यों को किन किन गंभीर परिस्थितियों में कैसी कैसी मदद की गई है, चिंतन करेंगे तो सभी को खुद याद आ जाएगा।
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-आज की टीम इलाहाबाद आ. अवधेश गुप्ता जी के पसंदीदा सितारों से भरी हुई है। यह टीम, इसके इंचार्ज और हर सहयोगी को आज एक बार अपने बारे में सोचने की सख्त जरूरत है।

-संजय पिछले लंबे समय से बीमार चल रहा था। उसकी आर्थिक स्थिति के बारे में हम सभी जानते थे। अनुपस्थित रहने के चलते उसे कई महीनों से वेतन भी नहीं पा रहा था। इसके बावजूद किसी ने उसकी कोई मदद नहीं की।
अरे, ईएसआइ से ही उसकी सहायता करा दी जाती तब भी कुछ राहत रहती। नियमानुसार ईएसआइ से उसे छह माह तक ६० प्रतिशत वेतन, उसका और उसकी मां का किसी नर्सिंग होम में पूरा ईलाज हो सकता था। इलाहाबाद की टीम इतना भी नहीं कर पाई। साल भर से डॉक्टर उसको आराम करने और इलाज करने की सलाह दे रहे थे पर वेतन कटने के डर से वह बीमारी में कार्यालय पहुंच जाता था। अंत में जब चलने से लाचार हआ तो बिना वेतन घर पर बैठा रहा। सरकारी सहायता भी नहीं दिलाई जा सकी।
-आज इंचार्ज से लेकर रिपोर्टर तक की पूरी टीम में एक भी बंदा ऐसा नहीं है जो किसी नर्सिंग होम से इलाज की व्यवस्था कर सके। आज भी इलाहाबाद कार्यालय का स्टाफ उन्ही रवि उपाध्याय के पहचान पर सृजन और वात्सल्य नर्सिंग होम की सुविधाएं लिए पड़ा है, जिसे नकारा बता कर आ. अवधेश जी नौकरी से बाहर करने की हर संभव कोशिश करते रहे। अंत में जिला बदर करके माने। उनके पसंदीदा सितारे एक सहयोगी की इलाज तक नहीं करा पाए।
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-मेरा अफसोस यह है कि संजय ने मेरी मदद ली नहीं। उसे और उसकी मां को अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस तक भेज दी पर वह भर्ती होने को तैयार नहीं हुआ। उसका कहना था कि अस्पताल में हमें देखेगा कौन। कोई भी जरूरत पड़ने पर एक भी व्यक्ति उपलब्ध नहीं है। उसे टीम इलाहाबाद पर इतना भी भरोसा नहीं था कि वहां से कोई देखभाल के लिए उपलब्ध हो जाएगा।
-मैं सच में अमर उजाला के योगेन्द्र, संजय, ऋषि आदि का आभारी हूं। संजय मिश्र की अधिकांश समय सहायता उजाला के इन्ही सहयोगियों ने की। बेली से डॉक्टर बुलाना, दवा दिलाना, हृदय रोग विशेषज्ञ, फीजिशियन व अन्य विशेषज्ञों को दिखाने की व्यवस्था कराना, ईसीजी से लेकर एमआरआइ तक की जांच में रियायत कराना, अस्पताल व चिकित्सक तक ले जाने आदि तक के अधिकांश काम में इन लोगों ने सहायता की। संजय इनके बारे में बताया करता था। जागरण टीम में किसने कितनी मदद की, हर कोई खुद सोच सकता है।

संजय, तुम होते तो मैं आज शायद यही गीत गाता...

जिस पथ पर चला उस पथ पर मुझे
आँचल तो बिछाने दे
साथी न समझ कोई बात नही
मुझे साथ तो आने दे।

तुमने मेरी बात मान ली होती तो बेहतर रहा होता। मौत तो कोई नहीं टाल सकता पर तिलतिल कर किसी को मरते देखना और कुछ न कर पाने का अफसोस मेरे मन में न रहा होता। मुझे तनाव न देने की बात करते करते तुम मुझे जीवन भर का अफसोस दे गए।
(यह किस फिल्म का गाना है, मै भी नहीं जानता। टीम इलाहाबाद में कोई बता पाएगा क्या? संजय होता तो तुरंत बता देता। कला व साहित्य में उसकी रुचि थी और कई बेहतर खबरें उसकी क्रेडिट में थीं।)

यह मैसेज आ. अवधेश गुप्ता जी को भी सादर प्रेषित है। शायद इमानदार, मेहनती व कार्यकुशल जैसे शब्दों का कुछ मतलब समझ सकें और जहां भी रहें वहां ऐसे लोगों की कुछ कदर कर सकें। सालोसाल जिन्हें नकारा घोषित करते रहे, निकाल देने की धमकी देते रहे उन्हें ही अंत में ईनाम देकर गए। जिसने उनकी शान बढ़ाई, मान बढ़ाया, जो मौके पर खड़े रहे उसे इस कदर बेजार किया कि वह अपने इलाज के लिए पैसों का जुगा़ड़ करते करते ही मर गया।

आशा है, मेरे सहयोगी मेरी बात का बुरा मानने की जगह आत्मचिंतन करेंगे और खुद को इतना समर्थ बनाने की कोशिश अवश्य करेंगे कि किसी को मदद की जरूरत पड़ जाए तो डट कर वहां खडे तो रह सकें।

अंत में,
ना मुस्कुराने को जी चाहता है,
ना आंसू बहाने को जी चाहता है,
लिखूं तो क्या लिखूं तेरी याद में,
बस तेरे पास लौट आने को जी चाहता है।


सादर
एलएन                      
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[5:54 PM, 3/23/2017] +91 94152 26071: खेद है कि कोई साथी किस तरह किसी साथी की मौत को भी इस्तेमाल करता है.
संजय मिश्र के निधन की खबर आने पर पूरी टीम द्रवित थी.आज त्रयोदशाह है, उसमें इन पंक्तियों का लेखक भी था. और हां आफिस के सहयोगियों ने चंदा किया था परिवार को देने के लिए उस समय भी उसने पर्स में रखी तीन सौ रुपये में ढाई सौ रुपये की मदद की थी. जिस दिन निधन हुआ, जीएम साहब दफ्तर की तरफ से गए थे मौके पर. संपादकीय विभाग से भी कुछ सहयोगी गए थे, यहां तक कि शोक संबंधी खबर भी इस प्रतिनिधि इस प्रतिनिधि ने यूपी डेस्क भेजी थी.
इससे पहले संजय मिश्र जब शराब के अत्याधिक नशे के वशीभूत पूर्व एसएसपी के साथ गाली गुप्तार के कारण नौकरी से हटाए जाने की स्थिति में आ गए, यहां तक कि करीब डेढ़ महीने बैठाए गए थे, इस अदने से शख्स ने बार बार यही कोशिश की कि उन्हें काम पर ले लिया जाए. उन्हें लिया गया. आउटपुट टीम में.
संजय बीमार थे डेढ़ दो महीने से लेकिन उनकी चर्चा होती थी, निधन से दो दिन पहले आफिस के सहयोगी लक्ष्मी तिवारी उनके घर गए थे और आकर बताया था कि वह ठीक हो रहे हैं संभवत: 15 को ज्वाइन कर लेंगे.
बातें बहुत हैं पर उनको लिखने का यहां मतलब नहीं है. जहां तक मेरी बात है मेरे एक्सीडेंट के समय आशुतोष जी ने जो किया, वह शायद ही कोई करता.
और हां आज ही पूरी टीम अजहर अंसारी के भी घर होकर आई है संपादकीय प्रभारी की अगुवाई में, उनकी मां का निधन हुआ है कुछ दिनों पहले.
अवधेश जी ने मुझसे तो नहीं दूसरे सहयोगियों से यह जरूर कहा था कि उनकी तरफ से भी आर्थिक मदद दी जाएगी. संजय के परिवार को मदद के लिए.
मौजूदा संपादकीय प्रभारी ने साथियों से कहा है कि वह संजय के मृत्योपरांत सीएम के विवेकाधीन कोष से मदद दिलाने के लिए पत्रावली तैयार कराएं.
संजय की माता जी को दस्तावेजी औपचारिकता पूरी होने पर पेंशन रूपी मदद दिलाई जाएगी.                      
[5:55 PM, 3/23/2017] +91 94152 26071: पेंशन की प्रक्रिया के लिए कार्यालय के सहयोगी लगे हैं.                      
[9:57 AM, 3/26/2017] Ln Triphathi: क्या जबरिया बात करते है सुरेशजी। हमे मौत का इस्तेमाल करने पर कौन सा सिंघासन दिलवा रहे आप? अशुतोषजी की भलमनसाहत आपको अगर कही भी छू गयी थी तो आप ने खुद कभी उसके घर का रुख क्यों नहींकिया। जाकर देख आते किस हाल में है वह लोग। पैसे न देते सिटी टीम पर दबाव डाल कर ईएसआई से ही इलाज में मदद करा देते। आपने जो किया वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि किस तरह की सम्वेदन हीनता हावी रही है।
 एसएसपी को गालियां देने की जिस घटना का उल्लेख कर रहे है वह एक रिपोर्टर के मनोबल को तोड़ने वाली बात थी। क्या संजय एसएसपी से वसूली करने गया था? अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए एसएसपी से भिड़ा था? एसएसपी आईजी डीआईजी इन सबको तो भरी महफ़िल में मैंने भी बहुत गालिया दी थी। आशुतोष ने भी बहुत दी थी। श्यामेन्द्र कुशवाहा कांड में। पूछ लीजियेगा। हा तब मुखिया और लोग थे।
अरे जागरण पर जब पथराव हुआ था तब भी मैंने बहुत गालिया दी थी। आप भी गवाह थे। एसपी एसएसपी इन सबको बहुत गालिया दी थी। आईजी आलोक शर्मा को कार्यालय तलब कर खूब खरी खोटी सुनाइ थी। तब तो मुझे नही बिठा दिया गया।
यह सब जो भी किया गया था वह एक  रिपोर्टर के मनोबल को तोड़ने वाला काम था। मैंने अपने किसी व्यक्तिगत काम से गालिया नही दी थी और न ही संजय ने दी रही होगी। अच्छे रिपोर्टर को संरक्षण न देने से आज यह हालत है कि हमारी कोई पकड़ ही नही रह गयी है।
और हा, उसकी माँ को पेंशन से ज्यादा इलाज की जरूरत है। पर यह बात आपको तब पता चलेगी जब दिल में अपने अलावा दूसरे का भी दर्द महसूस होगा और उसके घर तक पहुँच पाएंगे। अकेली बुढ़िया कैसे रह रही होगी यह तो जाने पर ही प्तव चलेगा सर।
हमने तो आपको झकझोरने जगाने की कोशिश की थी। एक मित्र के नाते सही राह दिखाने की कोशिश की थी पर आपने इसे अन्यथा लिया। चलिये जो ठीक लगे करिये।                      
[10:13 AM, 3/26/2017] +91 94152 26071: एलएन बाबू कृपया मुझसे किसी तरह का व्यक्तिगत संवाद भविष्य में नहीं करेंगे.
संजय मिश्र की असमय मौत पर सियासत आपको मुबारक.आप जहां जहां संभव हो मुझे असंवेदनहीन बताकर मैसेज वायरल करते रहें. संजय मिश्र की  आत्मा गवाह है कि आपने उसका कितना भला किया, मेरे पास भी बैठते थे संजय मिश्र, पता नहीं क्या क्या कहा है आपके लिए, खैर अब वह नहीं हैं तो उनका प्रसंग समाप्त. संजय मिश्र के बहाने से ही सही ....बहुत कुछ सामने आ गया..                      
[10:27 AM, 3/26/2017] Ln Triphathi: मौत पर सियासत करनी होती तो आपके नाम के साथ मैसेज चलाते। बेनाम नही। जैसा आपको ठीक लगे। यह बात सही कही कि संजय के बहाने बहुत कुछ बाहर आ गया। अगर आपको अपना स्टैंड सही लग रहा हो तो बोलिये इसे ऐसे ही अशुतोषजी को अग्रसारित कर दूँ। वह भी देख और समझ ले।                      
[10:30 AM, 3/26/2017] +91 94152 26071: अब तो आशुतोष सर को यह मैसेज और हमारे बीच हुआ पूरा संवाद अग्रसारित कर ही दें बड़ी कृपा होगी आपकी.                      
[10:41 AM, 3/26/2017] Ln Triphathi: ओके सर😊

पुनश्चः
9415226071  दैनिक जागरण की तरफ से मुझे मोबाइल फोन के लिए दिए गए सीयूजी सिम का नंबर है। फिलहाल मैं इसका इस्तेमाल कर रहा हूं। अब पूरा प्रसंग आपके सामने हैं यदि आप भी मुझे गुनहगार मान रहे हों तो मैं कुछ नहीं कर सकता। आखिर तमगा देने का अधिकार तो आपको ही है। हां इतना जरूर कह सकता हूं कि आशुतोष सर जरूर इस प्रसंग को पढ़कर थोड़े नाखुश होंगे। 

शनिवार, 4 मार्च 2017

आजाद है कलम गरियाने के लिए

कलम स्वतंत्र है गरियाने के लिए
 ...मन खुला है गरियाने के लिए
...अा रही होली दे लो गाली की गोली

यह क्यों लिख रहा हूं आज? पहले यही साफ कर दूं। आज मैंने अपने प्रिय लेखक को पढ़ा। उनकी एक पंक्ति देखी--आप भी पढ़िए --ट्रंप को इतिहास शातिर सियासी बहेलिये के तौर पर याद करेगा।
सच में ट्रंप क्या हैं? क्या वास्तव में वैसे ही, जैसा मेरे प्रिय लेखक ने लिखा है और मैंने अर्ज किया है? यदि उन्होंने अमेरिकियों में यह भावना उभारी कि अमेरिकी श्रेष्ठ हैं, तो कौन सा ऐसा नेता है जो यह नहीं करता। हाफिज सईद भी यही कर रहा है पाकिस्तान में। खुलेआम लालकिले पर फिर से कब्जे की बात करता है वह।  क्या हम ऐसे नेताओं को शातिर बता दें। पत्रकारिता में शातिर नहीं हैं क्या? कितनी खबरें, किन हालात में छपने से पहले ही मर जाती हैं। अथवा मार दी जाती हैं। अरे यह भी होता है कि खबरों की वजह से लोग भी मर जाते हैं। इसी सप्ताह यानि मार्च के पहले हफ्ते में एक आनलाइन मैगजीन की पत्रकार ने एक फौजी का इंटरव्यू लिया, हिडन कैमरे से। अपनी पहचान छिपाते हुए। फौजी ने बताया कि पीस एरिया में तैनाती पाने वालों को क्या-क्या नहीं करना पड़ता है। जब से फौज बनी हैं हमारी, ऐसा होता आया है? लेकिन इस फौजी पर क्या बीती? इंटरव्यू आनलाइन होते ही उसने फांसी लगाकर जान दे दी।
पत्रकारिता की शुरुआत में हमें सिखाया गया था कि मित्र देशों और पड़ोसी राष्ट्रों तथा किसी भी राष्ट्र के प्रमुख का अपमान हमें किसी रूप में नहीं करना चाहिए। लेकिन कालांतर में जैसे जैसे में प्रौढ़ होता गया, मेरी धारणा टूटती गई। इराक के पूर्व राष्ट्राध्यक्ष सद्दाम हुसैन को फांसी के बाद जोरदार प्रदर्शन हुए थे भारत में भी। मुझे याद है कि एक अखबार में पहले पेज पर छह कालम की तस्वीर छपी थी अमेरिकी राष्ट्रपति की फोटो पर चप्पल मारते हुए। मैं अवाक रह गया था....अपने वरिष्ठों की समझ पर।
यह साफ कर दूं कि पत्रकारिता निष्पक्ष नहीं हो सकती। यहां सच बोलना, लिखना आसान नहीं। मालिक की सुननी होगी। संपादक की सुननी होगी। क्योंकि यह व्यवसाय है इसलिए वहां वही टिकता है जो बिकता है, सो पत्रकार ढाल ले लेते हैं विचारधारा व जनभावनाओं की। अमेरिका में तीन भारतीयों पर हमले हुए हैं। क्यों? इसकी गहराई में जाए बिना हम ट्रंप को शातिर बहेलिया बता दे रहे हैं। मुझे लगता है कि श्वेत अमेरिकियों में अश्वेत अमेरिकियों को आतंकवादी अथवा आतंकवाद का समर्थक मान लिया गया है। दक्षिण एशियाई मूल के लोग एक से ही दिखते हैं भले ही उनके धर्म, जाति, बोली अलग हो। क्या हिंदुस्तानी, क्या पाकिस्तानी, क्या बांग्लादेशी, क्या श्रीलंकाई, सभी रंग अमूमन गेहुंआ ही है और गफलत में चरमपंथी श्वेत अमेरिकी अपनी गोली चला दे रहे हैं उन पर। आखिर टि्वन टावर पर हुए हमले में तीन हजार से ज्यादा लोगों को खोने का मलाल तो उन्हें रहेगा ही। इस तथ्य के बावजूद हमारे नीति नियंताओं की यह ड्यूटी बनती है कि वह अमेरिकी हुक्मरानों के सामने भारतीयों की रक्षा की मांग पुरजोर तरीके से करें। आखिर हमारे हिंदुस्तानी भाई क्यों असुरक्षित रहें वहां? मुझे लगता है कि देर सबेर उन्माद कम होगा।
अपनी इस पोस्ट के समापन से पहले हल्का सा जिक्र कर दूं यूपी के साथ-साथ पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव का। यूपी सबसे अहम है। यदि यहां सपा-कांग्रेस गठबंधन कामयाब रहता है तो राजनीति की दिशा बदल जाएगी। दक्षिणपंथियों के लिए यह झटका होगा और वामपंथियों के लिए सुकून का सबब। बसपा की विजय पर धर्मनिरपेक्ष ताकतें जश्न मनाएगी, लेकिन यदि भाजपा जीतती है तो निश्चित तौर पर दक्षिणपंथी राजनीति को नया आयाम मिलेगा और कुछ कुछ अमेरिका जैसी गति की तरफ बढ़ता हुआ नजर आएगा हमारा भारत। राष्ट्रवाद का रंग चोखा होगा और तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का फीका। हो सकता है तब अमेरिकी सेक्युलर अखबार के थिंक टैंक नरेंद्र मोदी के लिए यह लिखें-  -मोदी को इतिहास शातिर सियासी बहेलिये के तौर पर याद करेगा।
कुल मिलाकर वही कि कलम और मुंह आजाद है जो चाहें लिखें, कहें। गधे हिंदुस्तान में ही नहीं पूरी दुनिया में हैं सियासत से लेकर पत्रकारिता तक? समझ गए हैं ना...

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...