शनिवार, 4 मार्च 2017

आजाद है कलम गरियाने के लिए

कलम स्वतंत्र है गरियाने के लिए
 ...मन खुला है गरियाने के लिए
...अा रही होली दे लो गाली की गोली

यह क्यों लिख रहा हूं आज? पहले यही साफ कर दूं। आज मैंने अपने प्रिय लेखक को पढ़ा। उनकी एक पंक्ति देखी--आप भी पढ़िए --ट्रंप को इतिहास शातिर सियासी बहेलिये के तौर पर याद करेगा।
सच में ट्रंप क्या हैं? क्या वास्तव में वैसे ही, जैसा मेरे प्रिय लेखक ने लिखा है और मैंने अर्ज किया है? यदि उन्होंने अमेरिकियों में यह भावना उभारी कि अमेरिकी श्रेष्ठ हैं, तो कौन सा ऐसा नेता है जो यह नहीं करता। हाफिज सईद भी यही कर रहा है पाकिस्तान में। खुलेआम लालकिले पर फिर से कब्जे की बात करता है वह।  क्या हम ऐसे नेताओं को शातिर बता दें। पत्रकारिता में शातिर नहीं हैं क्या? कितनी खबरें, किन हालात में छपने से पहले ही मर जाती हैं। अथवा मार दी जाती हैं। अरे यह भी होता है कि खबरों की वजह से लोग भी मर जाते हैं। इसी सप्ताह यानि मार्च के पहले हफ्ते में एक आनलाइन मैगजीन की पत्रकार ने एक फौजी का इंटरव्यू लिया, हिडन कैमरे से। अपनी पहचान छिपाते हुए। फौजी ने बताया कि पीस एरिया में तैनाती पाने वालों को क्या-क्या नहीं करना पड़ता है। जब से फौज बनी हैं हमारी, ऐसा होता आया है? लेकिन इस फौजी पर क्या बीती? इंटरव्यू आनलाइन होते ही उसने फांसी लगाकर जान दे दी।
पत्रकारिता की शुरुआत में हमें सिखाया गया था कि मित्र देशों और पड़ोसी राष्ट्रों तथा किसी भी राष्ट्र के प्रमुख का अपमान हमें किसी रूप में नहीं करना चाहिए। लेकिन कालांतर में जैसे जैसे में प्रौढ़ होता गया, मेरी धारणा टूटती गई। इराक के पूर्व राष्ट्राध्यक्ष सद्दाम हुसैन को फांसी के बाद जोरदार प्रदर्शन हुए थे भारत में भी। मुझे याद है कि एक अखबार में पहले पेज पर छह कालम की तस्वीर छपी थी अमेरिकी राष्ट्रपति की फोटो पर चप्पल मारते हुए। मैं अवाक रह गया था....अपने वरिष्ठों की समझ पर।
यह साफ कर दूं कि पत्रकारिता निष्पक्ष नहीं हो सकती। यहां सच बोलना, लिखना आसान नहीं। मालिक की सुननी होगी। संपादक की सुननी होगी। क्योंकि यह व्यवसाय है इसलिए वहां वही टिकता है जो बिकता है, सो पत्रकार ढाल ले लेते हैं विचारधारा व जनभावनाओं की। अमेरिका में तीन भारतीयों पर हमले हुए हैं। क्यों? इसकी गहराई में जाए बिना हम ट्रंप को शातिर बहेलिया बता दे रहे हैं। मुझे लगता है कि श्वेत अमेरिकियों में अश्वेत अमेरिकियों को आतंकवादी अथवा आतंकवाद का समर्थक मान लिया गया है। दक्षिण एशियाई मूल के लोग एक से ही दिखते हैं भले ही उनके धर्म, जाति, बोली अलग हो। क्या हिंदुस्तानी, क्या पाकिस्तानी, क्या बांग्लादेशी, क्या श्रीलंकाई, सभी रंग अमूमन गेहुंआ ही है और गफलत में चरमपंथी श्वेत अमेरिकी अपनी गोली चला दे रहे हैं उन पर। आखिर टि्वन टावर पर हुए हमले में तीन हजार से ज्यादा लोगों को खोने का मलाल तो उन्हें रहेगा ही। इस तथ्य के बावजूद हमारे नीति नियंताओं की यह ड्यूटी बनती है कि वह अमेरिकी हुक्मरानों के सामने भारतीयों की रक्षा की मांग पुरजोर तरीके से करें। आखिर हमारे हिंदुस्तानी भाई क्यों असुरक्षित रहें वहां? मुझे लगता है कि देर सबेर उन्माद कम होगा।
अपनी इस पोस्ट के समापन से पहले हल्का सा जिक्र कर दूं यूपी के साथ-साथ पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव का। यूपी सबसे अहम है। यदि यहां सपा-कांग्रेस गठबंधन कामयाब रहता है तो राजनीति की दिशा बदल जाएगी। दक्षिणपंथियों के लिए यह झटका होगा और वामपंथियों के लिए सुकून का सबब। बसपा की विजय पर धर्मनिरपेक्ष ताकतें जश्न मनाएगी, लेकिन यदि भाजपा जीतती है तो निश्चित तौर पर दक्षिणपंथी राजनीति को नया आयाम मिलेगा और कुछ कुछ अमेरिका जैसी गति की तरफ बढ़ता हुआ नजर आएगा हमारा भारत। राष्ट्रवाद का रंग चोखा होगा और तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का फीका। हो सकता है तब अमेरिकी सेक्युलर अखबार के थिंक टैंक नरेंद्र मोदी के लिए यह लिखें-  -मोदी को इतिहास शातिर सियासी बहेलिये के तौर पर याद करेगा।
कुल मिलाकर वही कि कलम और मुंह आजाद है जो चाहें लिखें, कहें। गधे हिंदुस्तान में ही नहीं पूरी दुनिया में हैं सियासत से लेकर पत्रकारिता तक? समझ गए हैं ना...

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