सोमवार, 22 जून 2015

वाह क्या कामयाबी है भाई

इतवार को दिन में दफ्तर नहीं आ सका। इसलिए चाहकर भी कुछ नहीं लिख पाया। अभी थोड़ा वक्त मिला है तो सोच रहा हूं कि मन की कुछ लिख दूं। आज अकेला हूं घर पर। शुभम मां के साथ ननिहाल चले गए हैं। मुझे भी कह रहे थे चलने के लिए लेकिन नौकरी है वह भी प्राइवेट। छुट्टी कहां मिलती है अपन को। होली के बाद से गांव भी नहीं जा सका हूं। अब दरख्वास्त लगाऊंगा लंबी छुट्टी की। कम से कम चार दिन की। दरअसल घुटन सी होने लगी है एक सा काम करते-करते। कभी कभी ही ऐसा दिन होता है जब अच्छा लगता है। गुजरा शनिवार ऐसा ही था। प्रतापगढ़ के रेहुआ लालगंज के दो बच्चों के इस दिन जेईई-एडवांस में कामयाबी की खबर मिली। टेलीविजन पर देखा। मन प्रफुल्लित हुआ। लगा कभी-कभी गरीबी भी बेहतरी की तरफ ले जाती है, बस माद्दा हो। दोनों ही सगे भाई हैं और उनकी कामयाबी ने दुनिया उनके अनुकूल कर दी है। ऐसा ही होता है। जब हम कामयाब होते हैं तो सब अपने हो जाते हैं। पराए भी। शायद श्रीकृष्ण ने इसीलिए गीता में अर्जुन से कहा है कि हे पार्थ -इतिहास विजेताओं के साथ होता है। पराजितों के साथ नहीं। बृजेश और राजू सरोज अब विजेता हैं। गरीबी से लड़कर कामयाबी की जंग जीतने वाले। ईश्वर मेरे बेटों में भी उनसे प्रेरणा लेने की जिजीविषा पैदा करें, यही कामना है। 

रविवार, 14 जून 2015

यशस्वी हों आनंद हमारे...

नमस्कार। रविवार है आज। रात हो चली है। कुछ देर बाद सिस्टम बंद कर दूंगा। इससे पहले कि आज लिखना पढ़ना बंद हो कुछ उल्लेखित कर देना चाहता हूं। सुबह शुभम के मोबाइल पर फोन आया। उनके फुफा जी का। गजियाबाद के लोनी से। बोले व्हाट्स एप खोलो। शुभम् ने व्हाट्स एप चालू किया तो दिल को धड़काने वाली तस्वीरें आईं। भांजे आनंद थे इस तस्वीर में हाथ में प्लास्टर लिए हुए। बेबी (बहन) ने बताया कि शनिवार को खेलते -खेलते हाथ तुड़वा बैठे हैं। कच्चा प्लास्टर हुआ है अभी। दो तीन दिन में पक्का लगेगा। आज यानी १४ जून को आनंद का जन्मदिन था। सोचा था कि शुभकामनाएं दूंगा। शुभकामनाएं दीं, अनमने मन से। क्या करता। आनंद दीघार्यु हों। भांजे के लिए कोई मामा आखिर और क्या दुआ कर सकता है।
दिन में सोचा था, कुछ लिखूंगा ब्लाग पर। इसी दौरान एक और खबर को लेकर उलझ गया मन। यह खबर थी सुषमा स्वराज को लेकर। क्रिकेट को कारोबार बनाने वाले ललित मोदी की मदद का आरोप लगा है उन पर। सुषमा जी की सफाई है कि ललित मोदी की पत्नी को कैंसर हुआ था। आपरेशन होना था। ललित मोदी की कंसेंट चाहिए थी। इसलिए वीजा वांछित था। इस वीजे के लिए उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से कहा था मानवीय आधार पर। मुझे लगता है कि इसमें गलत कुछ नहीं। आखिर फांसी देने से पहले भी तो रवायत रही है आखिरी ख्वाहिश पूछने की।  अब कांग्रेस के मित्र इस्तीफा मांग रहे हैं सुषमा स्वराज से। उनसे एक सवाल है कि वारेन एंडरसन को भागाने वाले नेता जी के लिए क्या किया था उन्होंने ? तब क्या तत्कालीन प्रधानमंत्री और संबंधित सूबे के मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दिया था। वारंट पर भोपाल आए थे वारेन एंडरसन। भोपाल गैस त्रासदी के बाद। उस त्रासदी के बाद जिसमें तीन हजार लोगों की मौत हुई थी और आज भी लोग उस त्रासदी से पीड़ित हैं किसी न किसी रूप में। एंडरसन साहब को तब जिस काली अंबेसडर कार से वायुयान तक भेजा गया था, वह किसकी थी, शायद याद नहीं होगा कांग्रेसियों को। मुझसे एक बार किसी ने कहा था-शीशे के घर रहने वाले दूसरों के घर में पत्थर नहीं फेंकते। पर ऐसा ही होता रहेगा। दरअसल सत्ता और विपक्ष में बैठते ही हमारे दलों का चिंतन बदल जाता है। 

शुक्रवार, 12 जून 2015

चलो मिली कुछ राहत

थोड़ी राहत है आज। दरअसल अभी जहां रह रहा हूं, उसके करीब ही नया ठिकाना मिल गया किराए का। शाम को एडवांस भी दे दिया जाएगा। इसके बाद फौरी तौर पर सिरदर्द खत्म। बाबू जी कल पूछ रहे थे कि बेटा मकान मिला कि नहीं। मैंने बताया तलाश जारी है। उम्मीद है कि कुछ हो जाएगा। सात हजार प्लस बिजली। यानि आठ हजार रुपये में यह मकान पड़ेगा। हर दिन लगभग तीन सौ रुपये में कुछ देर के लिए छत मयस्सर होगी। करेंगे क्या?
मकान मालिक मुस्लिम हैं। पढे़-लिखे सुशिक्षित। आज सुबह मिलने गया था। बिस्कुट, नमकीन व शरबत से खैरमकद्दम किया। मैंने अपने खानाबदोशी की दास्तां सुनाई। आयुष (छोटे चिरंजीव) भी थे साथ। उनकी भावभंगिमा से लग रहा था कि उन्हें दर्द-ए-दास्तां सुनाया जाना अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन मैंने सोच रखा है कि जैसा भी हूं, साफ -साफ बता दूं। धन्ना सेठ होता तो क्यों कर किराए पर होता। करीब 20 साल के  पत्रकारीय करियर के बाद भी। बताया कि जबलपुर से सफर शुरू किया था, भोपाल, वाराणसी, सोनभद्र, बलिया, इलाहाबाद, रांची, जबलपुर होते हुए फिर वाराणसी और अब इलाहाबाद में पहुंचा हूं। दो साल कम से कम और रहना चाहता हूं यहां जब तक कि आयुष अर्नी मेमोरियल स्कूल से हायर सेकेंड्री न कर लें, अपने मनचाहे विषय से। मकान मालिक खान साहब ने 11 महीने का एग्रीमेंट कर ले रहे हैं, बाद में रिश्ता हमारे व्यवहार पर चलेगा। मैंने कहा ठीक है, उम्मीद है कि अच्छा ही रहेगा। आज तक जहां भी रहा हूं, एकाध अपवाद को छोड़ कर रिश्ता ठीक ही रहा है मकान मालिकों से। सोनभद्र में स्व. महेंद्र प्रताप सिंह के घर तो  जैसा आत्मीय संबंध बना, उसे शब्दों से नहीं बांधा जा सकता। वाराणसी में उमापति यादव जी के घर भी ऐसा ही रहा। उनकी पुत्री शिवानी तो आयुष की बुआ जैसी है। रहेगी हमेशा। उसने अस्पताल में उसकी पाटी साफ की है, कौन करता है भला ऐसा। अहसानमंद रहूंगा मैं उस परिवार का आजीवन। 
गुजरी रात टिवटर पर था। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक ट्वीट दिखा। सबको आवास के लिए उन्होंने बैठक की थी अफसर व मंत्रियों संग। मैंने रिप्लाई ट्वीट से लिखा है कि मैं भी कुछ सुझाव देना चाहता हूं डाक से यदि अनुमति हो तो। अभी तक वहां से हरी झंडी नहीं मिली है। यदि मिलती है तो यही कहूंगा कि पहले उन लोगों का रजिस्ट्रेशन करा लें जो बिना छत के हैं शहरों में। संख्या पता चल जाए तो बिल्डरों के साथ बैठक कर लें। बता दें कि इतने आवास चाहिए। फिर लोगों की आर्थिक सामर्थ्य के मुताबिक ईडब्लयूएस, एलआइजी, एमआइजी, जूनियर एमआइजी जैसे आवास बनवाए जाएं। हम जैसे लोगों का जिनका पीएफ है थोड़ा बहुत उसे सिक्योरिटी मनी के रूप में रख लिया जाए। जो किराया हम दूसरों को देते हैं वह मकान के मद में दें। जब लागत चुका दें तो उसे हमारे अथवा हमारी संतानों के नाम कर दिया जाए। ऐसे में कम से कम चार सदस्यों वाले परिवार को एक छत तो सुलभ हो ही जाएगी।  

रविवार, 7 जून 2015

चलो उठो खानाबदोश, नया ठिकाना खोजो...

दिन रविवार। 
आज दिन में नहीं आ सका था दफ्तर। मकान तलाशने का दौर जो था। निराशा लगी है इस मोर्चे पर। अब देखिए सोमवार कैसा रहता है, इस मामले में। तनाव जस का तस है। पूरा परिवार तनाव के लम्हों से गुजर रहा है। मित्रों का प्रयास भी जारी है इस दिशा में लेकिन अपन की बदकिस्मती ज्यादा जोर मारे हुए है। ऐसा नहीं है कि मकान हैं नहीं। हैं, लेकिन आठ से 10 हजार रुपये मासिक किराए वाले। इतना दे पाना अपने बूते में नहीं है। इसलिए बस ऊपर वाले को याद कर रहा हूं। आखिरी उम्मीद वही हैं। कुछ न कुछ रास्ता निकालेंगे। ऐसा विश्वास है। घर खोजने का तनाव दैनदिनी पर असर डाल रहा है। न कुछ लिखने का मन करता है, न पढ़ने का। रविवार के दिन अखबारों के विशेष आलेखों को भी इसी वजह से कायदा से नहीं पढ़ सका। 
दिन में लेटा था कुछ देर के लिए। 
याद आ गया जबलपुर में पीडब्लयूडी कालोनी में पिता जी के नाम आवंटित हुआ आवास। तीन कमरे, आंगन, बरामद, पीछा बगीचा। पता नहीं क्या-क्या। पच्चीस बसंत गुजर गए इसमें पता ही नहीं चला। अब लगता है कि पिता जी को वह मकान नहीं मिला होता तो वह भी किरायेदारों का दर्द महसूस किए होते। यदि महसूस किए होते तो कहीं न कहीं जरूर मकान बनवा लिया होता। मकान बना होता तो खानाबदोश न होते अपन। यह खानाबदोशी भारी पड़ रही है उम्र के पैंतालीसवें पड़ाव पर। पत्नी हो या बच्चे। हर कोई कहते कुछ नहीं हैं, लेकिन झल्लाते हैं अपनी बदकिस्मती पर। मीरजापुर के शुभचिंतक पंडित संतोष शास्त्री कल रात व्हाट्स एप पर थे। मैंने अपनी समस्या बताई। उन्होंने समाधान। कहा जल्दी हो जाएगा नया ठिकाना। पर अपनी खुद की छत कब होगी? यह सवाल मथता है हर पल मुझे। उत्तर तलाशता हूं, मिल नहीं पाता। अंत में इस निचोड़ को दिल में बैठा लेता हूं कि चलो खानाबदोश...। बंद करो चिंतन। बंद करो मर्सिया। 

मंगलवार, 2 जून 2015

पूर्णिमा स्नान, आशा-निराशा का खेल...

नमस्कार। आज दिन मंगलवार। सुबह रसूलाबाद घाट पर दूसरी तरफ जाकर सपत्नीक गंगा स्नान किया। ज्येष्ठ पूर्णिमा थी। श्रद्धा का आग्रह था। टाला नहीं जा सकता था। मन गदगद हो गया। शीतल जल में। वैसे घाट से नाव पर चढ़ते समय नाले का गंगा में प्रवाह मन कसैला करने वाला था, लेकिन इस पर कोई वश नहीं था। नाविक ने कहा- मां हैं बेटे इसी तरह पाप कर रहे हैं...। नमामि गंगे। बस यही कहते हुए मन ही मन में रह गया। साढ़े नौ बज गए नहा कर मुख्य सड़क तक पहुंचने में। आटो पकड़ी और उतर गए स्टेनली रोड पर बेली अस्पताल के ठीक सामने। शर्मा जी के मकान को भी देखना था। सोमवार रात ही तय कर आया था कि सुबह आऊंगा घर देखने। सेकेंड फ्लोर पर है उनका घर का वह हिस्सा जिसे वह किराए पर देना चाहते हैं। सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता रह चुके हैं शर्मा जी। अब वकालत करते हैं हाईकोर्ट में। मकान हमें (मुझे और श्रद्धा को) पसंद है, लेकिन किराया पांव में बेड़ी है। आठ हजार रुपये की डिमांड है, इसकी। अभी दुबे जी के मकान में साढ़े पांच हजार रुपये में ही काम चल जा रहा था। लेकिन मकान बदलना ही है तो मन दृढ़ कर रहा हूं। अगली तकलीफों के लिए। यदि शुभम के साथी और हमारे पुत्रवत रजनीश तैयार होते हैं तो शायद मामला बन जाएगा। नहीं तो...।
बहरहाल, आज सुबह कुछ खबरें देखीं। एक मेरे ही अखबार यानी जागरण में थी। इसमें जानकारी यह है कि कम कमाई वालों के लिए ज्यादा आशियाने बनेंगे। उप्र की अखिलेश सरकार ने विकास प्राधिकरणों-आवास विकास परिषद को तिरासी हजार आवास-भूखंड तैयार करने का निर्देश दिया है, इसमें इलाहाबाद में कितने बनेंगे, पता नहीं। पिछले दिनों ही इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के मकानों खास कर एलआइजी-जूनियर एमआइजी के बारे में पता करवाया था। पिछले पांच साल में कोई भी बड़ी योजना नहीं आई। ऐसे में 83 हजार मकान शायद ख्वाब ही रहें, इस वित्तीय वर्ष में। जाने कब से सुनता आ रहा हूं, सबको छत मयस्सर कराने की सरकारी कवायदों के बारे में। कुछ समय पहले चीन के बारे में यह रोचक तथ्य सामने आया था कि वहां शहरी आबादी के लिए सौ फीसद छत का प्रबंध है और ग्रामीण आबादी के लिए अस्सी फीसद। भारत में साठ साल में भी ऐसा नहीं हो सका है। एक तरफ बड़े बड़े बंगले हैं भ्रष्टाचार की कमाई से बने हुए। दूसरी तरफ हम जैसे लोग हैं जो पांच सौ फुट की अदद छत के लिए तरस रहे हैं। दावा है कि हमारी अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से बढ़ रही है। तीस हजार रुपये की तनख्वाह में दो बच्चों की पढ़ाई, किराना, दूध तथा अन्य मद में खर्च के बाद बचेगा ही क्या ? यदि मेरे जैसे लोग आठ हजार रुपये मकान के किराए में दे देंगे? लेकिन सरकारों को यह बात कभी समझ में नहीं आएगी।
सरकार यदि सबको छत देना चाहती है तो मेरे पास एक सुझाव है। आवास विकास विभाग अथवा प्राधिकरणों में बेघरों का पंजीयन करा लिया जाए। संख्या पता चल जाएगी। फिर उन्हें मकान दिलाए जाएं। किराए से ही सही। मेरे जैसे लोग जो प्राइवेट सेक्टर में कार्यरत हैं उनकी पीएफ जमा सिक्योरिटी के रूप में ली जा सकती है। और फिर एक किश्त बांध दी जाए किराये के रूप में। जब लागत निकल जाय तो मकान का स्वामित्व दे दिया जाए। क्या इस पर विचार हो सकता है। यदि हां. तो उपयुक्त होगा। खैर फिलहाल चिंता यह है कि अगली छत कैसी मयस्सर होगी। उम्मीद ऊपर वाले पर टिकी है। कहता भी रहा हूं कि जिसने चोंच दी है, वही चुग्गा भी देगा। आशा और निराशा का यह खेल भी गजब है...पर किया क्या जाए। जिंदगी इसी का नाम है।

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...