रविवार, 18 दिसंबर 2016

हे अन्ना फिर उतरिए मैदान में

टिवटर पर इन दिनों  अक्सर देर रात हो जाती है।  शनिवार-रविवार रात भी ऐसा ही था। मनीष राठी और विपुल के संवाद में जाने कैसे उलझ गया। मनीष चहकने लगे। नोटबंदी पर। तमाम बातें उन्होंने लिखीं। एक कमेंट था. मोदी जी को विश्वास में वोट दिया था-लेकिन वह देश को बर्बाद करने में लगे हैं। मनमोहन सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री 15 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला था, लेकिन मोदी की नीति से पांच करोड़ लोग फिर गरीब हो गए हैं। मुझे लगा कि कुछ बोलना चाहिए। मैंने कहा-यदि मनमोहन सिंह की नीतियों से इतने लोग गरीब से अमीर हो गए तो उनकी सत्ता आखिरकार क्यों चली गई... मनीष ने तुरंत रिप्लाई किया-अन्ना जी के आंदोलन की वजह से। मेरे लिए अचरज वाली बात थी। माना कि अन्ना के आंदोलन से चीजें बदलीं थीं। व्यवस्था के प्रति गुस्सा उपजा था लेकिन और ताकतें इसका लाभ क्यों नहीं उठा सकीं। भाजपा को ही क्यों मिल गया चुनाव में इसका फायदा। वैसे भाजपा नहीं, यदि मोदी लिखूं तो ज्यादा उपयुक्त रहेगा। अब भी चीजें वैसी ही हैं। मोदी के नाम पर ही भाजपा है। भाजपा में क्या है, शायद कुछ नहीं। अब देखिए लालकृष्ण आडवाणी को। वह लोकसभा में नहीं रहना चाहते। शोर शराबे से उनका मन उचट गया है। वह अब संसद न चलने से दुखी हैं, हालांकि 2011  में जब संसद नहीं चली थी तब उन्होंने ही कहा था कि लोकतंत्र के लिए कभी कभी ऐसा जरूरी हो जाता है। 
नेता हैं गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं, आंदोलन हैं मर जाते हैं करेंगे क्या? 
हम भारतीयों की नियति ही लगता है ऐसी है। भरोसा बंधते और टूटते देर नहीं लगती। लोग आते हैं चले जाते हैं। लाइनें पहले भी लगती हैं, अब भी लगती हैं। मुझे याद है जबलपुर। तब आठवीं का छात्र था। राशन दुकान के आगे गेहूं चावल लेने भागता था। कभी मिलता था कभी नहीं। पिता जी बताते हैं इससे पहले बासठ में और बुरा हाल था। अमेरिकन गेहूं के लिए कतार लगती थी। कतार खत्म नहीं होगी हिंदुस्तान में। चाहे शासक कोई भी हों। वजह- हमारी सोच। हम तात्कालिक जरूरतों के मद्देनजर दीर्घकालिक सोच रखते ही नहीं। राजीव गांधी ने यदि 1985-86 में हमें कंप्यूटर नहीं दिया होता तो क्या यह संभव था कि अन्ना आंदोलन करते, सरकार हिला देते। मोदी डिजिटल इकोनामी की बात कर रहे हैं, तो क्या आज के भारत के लिए है। नहीं, मेरी धारणा यह है कि अगले दो दशक बाद जब लोगों को इसका फायदा होगा तब वह राजीव गांधी की तरह मोदी को भी याद करेंगे। हां आज चुनाव हों तो लाइन में उपजा असंतोष किसी भी करवट बदल सकता है। सुखद यह है कि मीडिया के एक खास वर्ग के दुष्प्रचार के बाद भी तमाम लोग मोदी के साथ हैं। हां अब कोई अन्ना फिर आएं भ्रष्टाचार के पुख्ता सुबूतों के साथ तो माहौल बदलने में देर नहीं लगेगी। मनीष ने कहा है कि राहुल जी के पास सुबूत है और वह वकील से सलाह मशविरा कर रहे हैं भूकंप लाने के लिए। मैं चाहता हूं जल्दी भूकंप आए। दरअसल विनाश ही विकास का रास्ता तय करता है। जब तक पुरानी धारणाओं, मिथक, कुरीतियों का विनाश नहीं होगा, जलजलों से तब तक समृद्ध और विकसित भारत दूर होगा दुनिया से। इसलिए हे अन्ना, फिर उतरिए मैदान में। 

रविवार, 25 सितंबर 2016

राष्ट्रवाद बनाम इंसानवाद

राष्ट्रवाद बनाम इंसानवाद
प्रसंग है उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद पर उड़ती बहसें, अफवाहें। राष्टभक्ति और इंसानियत की बातें। चुनांचे हर शब्दवीर अमोघ अस्त्र छोड़ता नजर आ रहा है, यह मानकर कि दूसरा मर जाएगा या घायल हो जाएगा। घायल नहीं होगा तो कम से कम मार जरूर जाएगा शब्दों से ही। मर भी रहे हैं हम,जिंदा होते हुए। सोच से। विचारों से।
मेरे एक फेसबुकिया मित्र ने अपने पाकिस्तानी मित्र से हुई टि्वटरबाजी पोस्ट की है, पढ़ा फिर लगा कि कामरेड को कुछ बतलाने की कोशिश करूं। जेहन में सवाल उठा कि आखिर किस वामपंथी देश में राष्ट्रवाद की सोच नहीं है? रूस में, चाइना में ? वियतनाम में। चाइना में थ्योनमान चौक हुआ, किस मानवाधिकारवादी ने झंडा बुलंद किया न्याय का। दूर नहीं जाएं। अभी-अभी चीन के ग्वांगझू में G-20 सम्मेलन हुआ था। चीन ने पाकिस्तानियों को होटल का कमरा देने से मना कर दिया था, क्यों? मित्र देश के लोगों के लिए ऐसा बर्ताब? चीन में मार्क्सवादी सोच वाले विचारकों की सरकार है, जनसंख्या नियोजन के लिए क्या किया गया वहां, यह भी जान लें। मैंने बहुत पहले नवनीत डाइजेस्ट में एक अमेरिकी लेखक का उपन्यास पढ़ा था। लब्बोलुआब यह था कि दूसरा बच्चा पेट में आने की बात पता चलते ही उसे गर्भ में मार दिया जाता था, और यदि खुदा न खास्ता वह नवजात के रूप में बाहर आ गया तो उसके सिर में इंजेक्शन लगा दिया जाता था मौत का...। पता नहीं इस तरीके से कितनी जानें ली गईं वहां। कामरेडों की सब बात तब तक मुझे अच्छी लगती थीं युवा हो रहा था मैं, लेकिन इस कहानी (उपन्यास) को पढ़ने के बाद मन कसैला हुआ। हर किसी को एक जैसा मानने की बात कामरेड करते हैं तब तिब्बत से दलाई लामा को क्यों भागना पड़ा। तिब्बत में दमन है, कौन कामरेड लिखता है? बलूचिस्तान में दमन है, वहां मारे जाने वालों के अंगों का व्यापार तक हो रहा है, कहां लिखा जा रहा है यह सब। एमनेस्टी इंटरनेशनल वाले कहां हैं?
कश्मीर में भारतीय सेना दमन कर रही है ऐसा कामरेड चीख-चीखकर कह रहे हैं। गेहूं के साथ घुन पिसता है, इसमें नई बात क्या है। चौथी दुनिया वाले संतोष भारतीय कहते हैं कि कश्मीर में कोई भी भारत के साथ खुद को नहीं जोड़ता। बकरीद नहीं मनी वहां इस बार। क्या बकरीद तब मनेगी जब वहां पाकिस्तान का आधिपत्य होगा। आज ही तो वहां ऐसा हुआ नहीं है भारतीय जी। पहले भी था तब आपने प्रधानमंत्री को खुली पाती लिखी थी क्या?  पंजाब में कुछ ऐसा ही था।  सुपर काप केपीएस गिल और रिबेरो साहब ने कहा था तब कि गेहूं के साथ घुन पिसता है। बेअंत सिंह ने जान गंवाई लेकिन सख्ती से कुचल दिया आतंकवाद को। खैर अब विषय पर। राष्ट्रवाद में इंसानियत नहीं है, ऐसा कहते हैं सेक्युलर सोच वाले कारकून। चलिए मान लिया आपकी बात लेकिन बताइए  यदि पूंजीवाद में इंसानियत नहीं होती तो मलाला युसूफजई को ब्रिटेन पनाह नहीं देता, जिंदगी नहीं बचाता उनकी और उनके परिवार की। भारतीय सेना के जांबाज साल भर पहले आई कश्मीर की भयानक बाढ़ में उन लोगों की जिंदगी नहीं बचाते जो हमेशा से पत्थर बरसाते आ रहे हैं उन पर। दरअसल तथाकथित सेक्युलर कारकूनों को कभी भी कुछ अच्छा नहीं लगता भारत में। कांग्रेस की सरकार रही तब भी अब भाजपा की सरकार है तब भी। कामरेडों ने ही तो अमेरिका से एटमी संधि के नाम पर मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, भाजपा ने तब जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका अदा की थी विधेयक पर समर्थन देकर। आज कांग्रेसी मित्र शायद उस बात को भूल गए हैं। यही वजह है कि वह लगातार अप्रांसगिक होते जा रहे हैं। दक्षिणपंथियों में सब अच्छा ही अच्छा है, यह दावा भी नहीं करता, न करने की धृष्टता करूंगा। यह तो स्वर्ग में भी आपस में लड़ सकते हैं, इसमें इनका कोई सानी नहीं। शोषण भी करते हैं शब्दों की चासनी पिलाकर  लेकिन उनका क्या जो सर्वहारा की बात करते हैं और अपने फुलटाइमर स्टाफ को पार्टटाइमर बताते हैं। है न हाराकिरी।
सच वाकई में कड़वा होता है। अब तक अनुभव यही रहा है। इसलिए इंसानियत की बात करें तो तर्कों के साथ। यदि केंद्र में कांग्रेस की सरकार होती और वह भी सिंधु समझौते को रद करती तो मैं उसका समर्थन करता। पर वह ऐसा करती तो। इंसानियत के नाम पर दुश्मन को पानी पिलाओ तो वह जिंदा रहेगा, लेकिन हम आप नहीं रहेंगे, क्योंकि हम शत्रु हैं उसके। यह इंसानियत होगी क्या? जिनके पाठ्यक्रम में हमें शत्रु ही पढ़ाया जाता है, बताया जाता है। वह क्यों हमारे साथ आएंगे। यह सवाल कामरेड शायद नहीं उठाएंगे। भारत के किसी भी स्कूल के पाठ्यक्रम में ऐसा लिखा है क्या? यदि लिखा हो तो बताएंगे।
यह प्रसंग लंबा हो गया है,ज्यादा लंतरानी पचेगी नहीं, इसलिए यहीं विराम।

रविवार, 18 सितंबर 2016

अब तो आर या पार कर लें हुजूर

बस बहुत हुआ। आज जब यह पोस्ट लिख रहा हूं तो मन व्यथित है। ऊरी में सेना के शिविर पर हमला हुआ है, नार्दर्न कमांड पर। अब तक 17 जवानों के मरने की सूचना आ चुकी है। टि्वटर पर गुस्सा जताने का दौर शुरू हो चुका है, कब तक चलेगा यह क्रम? पता नहीं। हमारा राजनीतिक नेतृत्व कब जागेगा, पता नहीं? निंदा, कड़ी निंदा व भर्त्सना का दौर ही चलेगा, अथवा उससे आगे भी बढ़ेगी बात। यही मेरा सवाल है। मेरा ही नहीं, शायद सरसठ फीसद उन भारतीयों की जो पहले खुद को हिंदू,मुसलमान, सिख अथवा जैन या बौद्ध या क्रिश्चयन नहीं मानते। हिंदुस्तानी या भारतीय मानते हैं।
56 इंच का सीना वाले हमारे पीएम क्या करते हैं, इसे मैं समय पर छोड़ देता हूं, लेकिन उम्मीद बरकरार है। एक बार हो जाए। बांग्लादेश की जंग हुए बहुत समय बीत चुका है। आर-पार जरूरी है। हो सकता है उसमें मैं भी नहीं रहूं। कोई बम गिरे दुश्मन का साफ हो जाऊं। पर राहत तो होगी। कम से कम रोज रोज जेहनी मौत से अच्छी होगी यह मौत। यदि हम जीतते हैं तो हमारी पीढ़ियां सलामत होंगी। हारते हैं तो कोई नहीं बचेगा। जो फिदायीन हमें मारने आते हैं, मरने का संकल्प लेकर वह कितना नुकसान करते हैं, इसका अंदाजा शायद हमारे नीति नियंताओं को नहीं है। यदि होता तो अब तक हमारी फौज कुछ हो न हो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कुछ तो जौहर दिखा ही चुकी होती।
दुश्मन मुल्क को सबक जरूरी है। उसे यह बताया जाना चाहिए कि हम कमजोर नहीं हैं। पर यह कैसे होगा? देश बंटा है। किसी वर्ग के नेता यह बयान दे देते हैं कि यदि भारत पाकिस्तान पर हमला करता है तो मुसलमान पहले पाकिस्तान का साथ देंगे? कितनी खतरनाक सोच है। मानता हूं कि अधिकांश मुसलमान ऐसे नेता को पागल ही कहेंगे, पर यह दुस्साहस भरा बयान जिस जीभ से निकला है, उसे बख्शा क्यों जाना चाहिए। हम लड़ेंगे, भिड़ेगे पर देश हित में एक क्यों नहीं होते।
मुझे दुख है कि मैं फौज में क्यों नहीं हुआ। अब उम्र 45 पार कर चुकी है, शायद होऊं भी नहीं। लेकिन भारतीय सेना दुनिया में ताकत है, ऐसा ऐतबार है। एक बार कुछ होना चाहिए आर या पार।
मन व्यथित है, आज मैंने सोचा था कि कुछ और लिखूंगा, अपनी आपबीती पर हिंदुस्तानी मन ठहरा। थोड़े में रोने की थोड़े में हंसने की। हंसने का मौका मोदी जी दे दीजिएगा। देश आपका ऋणी रहेगा। 

रविवार, 11 सितंबर 2016

अपन के पास बाबा जी का ठुल्लू

नमस्कार। आप स्वस्थ एवं सानंद रहें।
आज इतवार है।  कुछ समय है तो लगा कि अपनी पूंजी और संपन्न कर लूं। इसलिए कुछ शब्दों के साथ फिर बैठ गया हूं नई पोस्ट के लिए।
पहले का दौर होता तो डायरी लिखता। पिता जी भी डायरी लिखते रहे हैं। वैसे क्रम से तो उन्होंने भी कभी नहीं लिखी। लेकिन है यह बड़े काम की चीज। कभी कभार पढ़ने पर हंसी आती है। गुस्सा भी आता है जब तब। आप जब दुनिया में नहीं रहते तो कभी कभार इसे पढ़ लिया जाता है। वीवीआइपी नहीं होते तो यह जला दी जाती हैं अथवा कबाड़ी के काम आती है। प्रारब्ध के बली हुए और ईश कृपा ने कभी वीवीआइपी बना दिया तो यह शब्द रायल्टी दिलाते हैं आपके परिवार वालों को। मेरे साथ ऐसा होगा कि नहीं, बता नहीं सकता। बहरहाल उम्मीद तो करना ही चाहिए। बुढ़ापे में मेरे इस ब्लाग की तमाम पोस्ट यदि ईश कृपा से पुस्तकाकार हुईं तो रायल्टी भले नहीं दिलाएं परिवार वालों को? हां, एकाध शुभचिंतकों के घर में कुछ दिनों के लिए जरूर जगह पाएगी। मेरा जीवन सार्थक कहलाएगा तब।
पत्रकारिता के इस मुकाम पर कभी कभी रिक्तता का बोध होता है। होना लाजिमी है। तमाम साथी आज संपादक हैं अथवा इससे आगे। पर अपन। जहां थे, वहीं हैं। गाड फादर नहीं बना सका ना, इसलिए। ऐसा नहीं है कि पूजा नहीं करता, लेकिन भगवान से लड़ाई में पीछे नहीं रहा। सच को सच कहने की सजा बहुत मिली है, इसलिए अब सच कहने की हिम्मत नहीं रखता। अब तो तीन ही चीज याद है नून, तेल, लकड़ी। बड़की अम्मा (मेरी दादी) गाती थीं- भूल गए राज रंग, भूल गए खिचड़ी जिंदगी रह गई नून तेल लकड़ी। पढ़ने लिखने का जब दौर था, तब लापरवाह बने रहे, खमियाजा अब भुगत रहे हैं। शब्दों से दुनियां संवारने की सोची, अपनी जिंदगी बिखर गई। क्या है अपन के पास। बाबा जी का ठुल्लू। मित्र, रिश्तेदार, सगे संबंधी सबको देख लिया। शिकायत किसी से नहीं है। जिनके पास है, उन्होंने दिया, जिनके पास नहीं है, वह क्या देते? उन्होंने नहीं दिया।
आज सुबह अमर उजाला देखा। अच्छा लगा, नए कलेवर में। वैसे मुझे निनायनबे का दौर याद आ गया तब भी कुछ ऐसा ही था यह। अच्छा यह भी लगा कि बहुत दिन बाद शब्दों के कुबेर यशवंत व्यास यारी दुश्मनी नामक नए स्तंभ के साथ थे, नई जमीन बनाते हुए। (रविवारीय बौद्धिक पेज का नया नाम दिया है उजाला ने नई जमीन मास्टहेड के साथ)। यशवंत जी के साथ काम करने की साध अधूरी रही है मेरी, लेकिन उनसा बनने की ख्वाहिश हिलोर जरूर मारती है दिल में। एक जानकारी और। जबलपुर में आदरणीय ज्ञानरंजन सर ने यशवंत जी के लिए बताया था कि उनकी ओपन हार्ट सर्जरी हुई है। नोएडा में नौकरी के सिलसिले में जब मुलाकात हुई थी तो कहीं से ऐसा लगा ही नहीं। बहुत सहज हैं यशवंत व्यास। उनकी लेखनी सलामत रहे। यही कामना है।
अच्छा अब विदा लूं, इससे पहले हिंदी दिवस की बधाई। रोइएगा नहीं कि इस भाषा में लिखते हैं। अंग्रेजी आती होती तो इसमें क्यों लिखते। देखिए मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वालों को भी हिंदी सिखाई जा रही है ताकि गोरे भी बोल सकें- सस्ता है अच्छा है। नमस्कार।

शनिवार, 27 अगस्त 2016

कश्मीर देखे यह राष्ट्रभक्त कि घर का किराया

नमस्कार। बहुत दिनों बाद आज फिर कुछ देर मुखातिब हूं आपसे शब्दों के जरिए।
शनिवार देर रात ट्विटर पर श्री श्री रविशंकर और आतंकी बुरहान बानी के पिता की तस्वीर वायरल थी। तमाम सवालों के साथ। सवाल यह भी थे कि अब भक्त ( छदम धर्मनिरपेक्षों की नजर में कथित मोदी समर्थक और राष्ट्रभक्त) क्या कहेंगे? कतिपय पत्रकारों  को देशद्रोही बताने वाले बताएं? कुछ ने इसे दोगलेपन की संज्ञा दी।
मैंने एक टि्वटरबाज को जवाब दिया- श्री श्री और हाफिज सईद में कोई अंतर नहीं है क्या?
उसका जवाब आया--फर्जी राष्ट्रभक्त।
मैंने लिखा- जो लोग अपना नाम छुपाकर छद्म नाम से लिखते हैं उनसे मुझे नसीहत नहीं चाहिए। दोगले ही नाम छुपाते हैं ऐसा मानना है मेरा।
कश्मीर जल रहा है और क्यूं? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। टेलीविजन की एक चर्चा में पता चला कि एक बार प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने हुर्रियत के नेताओं से पूछा था कि आखिर वह चाहते क्या हैं? बगलें झांकने लगे थे कश्मीर के तथाकथित रहनुमा।  ऐसे में मुझे लगता है कि महबूबा मुफ्ती फिलहाल सही हैं। उनका  कहना है कि पनचानबे फीसद कश्मीरी शांतिप्रिय हैं? पर यहां मुझे शक है। यदि बहुसंख्यक कश्मीरी शांतिप्रिय हैं तो मुट्ठीभर चरमपंथी हावी कैसे हैं? बल प्रयोग जरूरी है ऐसे लोगों पर और मुझे खुशी है कि केंद्र सरकार ने वहां बीएसएफ की तैनाती करीब बारह साल बाद कर दी है। इंशाअल्लाह। हम दुआ करते हैं बेहतरी की अमन की।
--अब कुछ निजी पीर।
आज दफ्तर में सुबह पहुंचना था। पौने दस बजे ही आ गया। यूनिट कंटेंट मानीटरिंग भेजनी जो थी। पर आने से पहले घर में तकरार हो गई? पूछेंगे क्यों? वजह जान लें-पैसा।
दरअसल हमारे मकान मालिक साहब सुबह नुमाया हो गए। मेरे मन के एक कोने ने कहा जरूर किराया बढ़वाने की बात करने आए होंगे। मैंने श्रद्धा से कहा? आशंका जताई। वह बोली -नहीं। हो सकता है बेटी के विवाह के लिए विज्ञापन की कोई बात करने आए हों।
खैर, जल्दी जल्दी पूजा की। फिर खान साहब से मुखातिब हुआ।  वह चाय पी चुके थे। मैंने आने का मकसद पूछा।
धीमे से वह बोले--मई में आप आए थे। एक साल हो गया है। किरायेनामे की शर्त के मुताबिक टेन परसेंट बढ़ना था, कुछ कीजिए...
मैंने बीच में ही बात काटी। कहा बस एकाध साल का और मामला है यदि चल जाए तो ....
खान साहब बोले -ठीक है आप पांच सौ ही बढ़ा दीजिए। अगले महीने के किराए में। उन्होंने मुझ पर एहसान जता दिया। पिता भी थे। भाषण दे रहे थे। बस्तर में साठ रूपये से नौकरी शुरू की थी। खान साहब अब निकल गए थे। फरमान सुना कर। मकान मालिक हैं न। मैं किराएदार।
मेरा नख से सिर सुलग गया था। क्या करता। पिता जी का भाषण दिल को वेध गया। एक तरफ कुत्तों सी जिंदगी। मकान मालिक की शर्त। मानना मजबूरी है। बीवी का लेक्चर सुनने लगा। कह रही थीं और लोग सालों से हैं, किराया नहीं बढा रहे, कह दो नहीं देंगे।
गुस्सा बढ़ गया। चिल्ला पड़ा मैं। हिस्टीरिया के पेशेंट सरीखे। उन्हें क्या बताऊं कि कितना सिरदर्द है।
बस अब नहीं। ईश्वर यदि कहीं है तू तो कुछ राहत दे।
 


रविवार, 28 फ़रवरी 2016

देशबंधु से नवभारत का सफर

देशबंधु की पत्रकारिता उम्दा स्तर की थी। शाब्दिक दोष अपवाद स्वरूप ही होते थे। नई दुनिया का बहुत असर था यहां। उस दौर में नई दुनिया में हम कोई शब्द गलत ढूढ़ते थे तो गदगद होते थे। अब ऐसा नहीं है। हिंदी आए न आए। जो मन में हो लिख दें। कोफ्त होती है ऐसी पत्रकारिता पर। इस संस्थान में सीखने के लिए बहुत कुछ था। खास तौर पर वरिष्ठों का सानिध्य। प्रकाश राय, राजेश पांडेय, शिवकुमार तिवारी, श्याम कटारे, राजेश उपाध्याय, निशांत शर्मा जैसे चेहरे थे। संस्कारधानी जबलपुर की पत्रकारिता में नाम था उनका। खबरों के चयन, संपादन, प्रस्तुतीकरण में हर दिन कुछ न कुछ नया सीखता था। साथी संजय सोनी, मदन गर्ग का नामोल्लेख न करूं तो यहां बिताए गए दिनों के साथ शायद न्याय नहीं करूंगा।  सतना में महेश महदेले थे। तमाम नाम विस्मृत होने लगे हैं अब। 
मेरे साथ यहां छायाकार के रूप में काम करने वाले आनंद मनोध्या ने एक बार मेरी बहिन बेबी (किरण) की तस्वीर दीपावली के एक दिन पहले खींची थी, दीपों के साथ।  कटारे सर ने उसमें कैप्शन लगाया था। उम्दा था वह कैप्शन। यह अखबार मैं काफी समय तक रखे हुए था, लेकिन अब यह गुम गया है। पहले पेज पर चार कालम में तस्वीर लगी थी। इसी अखबार में सुगन जाट भी थे छायाकार के रूप में। ब्लैक एंड व्हाइट के जमाने में उनकी तस्वीरें ऐसी होती थीं कि अंग्रेजी अखबारों के फोटोग्राफर भी कई बार पानी पीते नजर आते थे। मुझे याद है उनकी एक तस्वीर। हुआ यह था कि मप्र के मुख्यमंत्री के रूप में अर्जुनसिंह जबलपुर आए थे। डमुना विमानतल पर उतर रहे थे। नीचे काफी भीड़ थी। एक कांग्रेसी उन्हें गुलदस्ता थमा रहा था और अर्जुनसिंह विमान के बाहर निकल रहे थे। तस्वीर में विमान, अर्जुनसिंह का चेहरा, गुलदस्ता और लोगों के सिर ही दिखाई दे रहे थे। इसी अखबार में मुझे पहले पेज पर एंकर के रूप में पहली बार छपने का मौका मिला। साथ ही संपादकीय पेज पर भी। संपादकीय पेज पर पहली बार कौन सा लेख छपा था, यह तो याद नहीं। अलबत्ता उस वक्त जितनी खुशी हुई थी, उतनी कभी नहीं हुई। खुद को बौद्धिक मानने का भ्रम और फैला लिया। यह जस का तस है। भारत में पहली बार हुई मिस युनिवर्स प्रतियोगिता पर विशेषांक भी निकाला था यहीं पर। दूसरे अखबार खासकर नवभारत, भास्कर को ही प्रतिद्वंद्वी मानता था उस दौर में। पहले पेज के ले आउट, खबरों के चयन को लेकर जूझता था। होड़ होती थी। क्या मैंने किया है क्या दूसरे ने। जिस दिन लेटनाइट की कोई खबर छूट जाती थी, दुख होता था और जिस दिन बढ़त लिए होते थे, अजीबोगरीब खुशी होती थी। यह दौर वर्ष 1995 तक निर्वाध गति से चला। देशबंधु में ही काम करते-करते कोटा मुक्त विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल कर ली। पनचानबे में ही अरविंद बिंजोलकर, विनय गुप्ता इत्यादि आ गए। अरविंद ने माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में ही स्नातकोत्तर कर लेने की सलाह दी। उनके साथ एग्जाम भी दे आए और सिलेक्ट हो गए। इसी साल मां गोलोकवासी हो गईं। जब एडमिशन लेना था तो गांव में उनकी तेरहवीं थी। खैर एडमिशन हो गया। देशबंधु में जिस पद पर था, उसी हैसियत से भोपाल तबादला हो गया। भोपाल में राजेश पांडेय पहले ही पहुंच थे, लेकिन वहां मन नहीं लगा। एक साल का कोर्स खत्म कर वापस जबलपुर आया तो पिता जी रिटायर हो चुके थे। देशबंधु में फिर काम करने की सोची, लेकिन वेतन को लेकर बात नहीं जमी। दरअसल जिम्मेदारियां बढ़ चुकी थीं। एक बेटे का बाप भी हो चुका था। सरकारी क्वाटर छूट गया था। किराए के मकान में रहने का मतलब था ज्यादा बोझ। देशबंधु की कमान इस दौर में गिरिराज चाचा के हाथ में थी। मैं साढ़े तीन हजार रुपये चाहता था, वह तीन हजार से अधिक देने के लिए तैयार नहीं थे। बस, मैंने तय कर लिया कि अब भोपाल चलना चाहिए। तत्कालीन दौर में वहां सर्वाधिक बिकने वाले अखबार नवभारत में महराज जी थे असल नियोक्ता। उन्होंने लिखित परीक्षा ली और इंटरव्यू लिया। पास हो गए। वेतन लगा 38 सौ रुपये। मुझे यह काफी समझ में आए। हां नौकरी कन्फर्म नहीं थी। अस्थायी थी। स्थायी किए जाने का भरोसा मिला था। दिसंबर 96 में जबलपुर छूट गया।  
नवभारत में पहुंचने से पहले एक और प्रसंग। बहिन की शादी 96 की गर्मियों में हुईं। पिताजी के रिटायरमेंट से एक महीने पहले। इसी समय राजस्थान पत्रिका से आफर आया था। कैलाश मिश्र संपादक थे वहां। मैंने गुलाब कोठारी को आवेदन भेजा था। वैवाहिक व्यस्तताओं की वजह से जा नहीं सका। यह मौका छूटने का अफसोस है। कहते हैं कि तकदीर रोज दरवाजा नहीं खटखटातीं। जब मौका मिले तो कैश कर लेना चाहिए।  

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

देशबंधु में सीखने के दिन -एक

देशबंधु। प्रगतिशील सोच रखने वालों का अखबार। संस्थापक संपादक मायाराम सुरजन। नवभारत में भी उन्होंने लंबा पत्रकारीय जीवन जिया था। धूप छांव के जरिए मैं इस तथ्य से भिज्ञ हुआ कि कालांतर में मतभेदों की वजह से उन्होंने अलग राह पर चलने की सोची। रायपुर से प्रकाशन आरंभ किया और देखते ही देखते मप्र का प्रमुख अखबार ( विचार और समाचार की दृष्टि से) बन गया। यहां मेरे पांच साल गुजरे। वर्ष 1991 से लेकर 1995 के दिसंबर तक। पहले दिन राजेश पांडेय के पास पहुंचा तो उन्होंने प्रकाश राय, शिवकुमार तिवारी , मुकुल दुबे से परिचय करवाने के बाद देवेंद्र सुरजन से मिलवाया। नौदराब्रिज पर दफ्तर था। नया-नया सेटअप। देवेंद्र जी ने संक्षिप्त परिचय जाना। फिर पूछा कब से आएंगे, मैंने कहा आज से ही। वह तारीख तो अब ठीक ठीक याद नहीं , लेकिन गर्मी के दिन थे। काम शुरू कर दिया। जून के पहले सप्ताह में इस संस्थान की पहली सैलेरी मिली। एकाउंटेंट ने प्यून को भेजा था मुझे बुलाने के लिए। शायद सात तारीख थी वह।  पैसों (सैलेरी) की कोई बात तय नहीं हुई थी। मैंने अपने आप ही तय कर ली थी सैलेरी। सोचा था कि पांच सौ रुपये तो मिल ही जाएंगे। इतना सांध्यबंधु में मिलने लगा था करीब डेढ़ साल में ही। जब सैलेरी मिली तो चकरा गया। यह 780 रुपये थे। मैं दंग। उम्मीद से अधिक मिलने पर मेरी हालत अंधे को मिठाई मिलने जैसी हुई। भागा-भागा बर्तन की दुकान पर गया। प्रेशर कुकर लिया पांच लीटर का। अम्मा को इसकी बहुत जरूरत थी। अंगीठी पर पतीले में दाल-चावल बनने में वक्त लगता था। साइकिल के करियर पर कुकर लेकर पहुंचा तो घर वाले अचरज में। नालायक बेटे ने पहली बार थोड़ा समझ का काम जो किया था। 
मैं अपना काम बताना भूल ही गया। राजेश पांडेय जी पहले पेज के इंचार्ज थे।  दिन में राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय खबरों वाले पेज बनते थे। विभा मिश्र देखती थीं यह काम। प्रारंभ में मेरी ड्यूटी सेकेंड नाइट की थी। यानि रात आठ बजे से टेलीप्रिंटर पर गुड नाइट का संदेश आने तक। सेकेंड नाइट में मुकुल दुबे की सरपरस्ती मिली। वह जनरल डेस्क के इंचार्ज होते थे। राजेश उपाध्याय ( संप्रति आन लाइन एडीटर हिंदुस्तान, दिल्ली) सिटी रिपोर्टिंग टीम के इंचार्ज होते थे। उनकी ही टीम पेज भी लगवाती थी। इसमें थे संजय सोनी, मदन गर्ग। मेरी संजय सोनी व मदन गर्ग से जमने लगी। हम एक तिकड़ी कहलाते थे। रवि गौतम कंपोजिंग सेक्शन के इंचार्ज होते थे। पेस्टिंग होती थी डार्क रूम से निकली फिल्म की। राजेश पांडेय जी पहला पेज फाइनल कराने के बाद करीब 10 बजे चले जाते थे। मुकुल दुबे जी सानिध्य में मुझे आल्टर कराना पड़ता था, पहला पेज, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पेज। अंदर का एकाध पेज का पूरा जिम्मा था मेरे ऊपर। काम में आनंद आने लगा। आदरणीय प्रकाश राय , शिवकुमार तिवारी स्नेह देते रहे। इसी बीच राजेश पांडेय जी का तबादला कतिपय मतभेदों की वजह से भोपाल कर दिया गया। दरअसल देवेंद्र भइया ने परिवार में विवाद की वजह से रूचि लेनी बंद कर दी। उनके अनुज दीपक सुरजन जी के हाथ में कमान आ गई देशबंधु की। राजेश पांडेय के जाने के बाद मुकुल दुबे इंचार्ज हो गए जनरल डेस्क के। विधि स्नातक होने की वजह से वह हाईकोर्ट प्रतिनिधि भी थे। रिपोर्टिंग भी करते थे। उनके मन में कहीं न कहीं सिटी रिपोर्टिंग व डेस्क  टीम का इंचार्ज बनने की ख्वाहिश थी, ऐसा हो नहीं सका। वह फ्रस्टेशन में आने लगे। उनका विवाह भी काफी दिनों बाद हुआ। संभवतः 40 की  उम्र के बाद। बतौर जनरल डेस्क इंचार्ज उनके कामकाज से प्रबंधन खुश नहीं था। लगभग दो साल बाद श्याम कटारे भी हिस्सा हो गए देशबंधु के। वह नवीन दुनिया में बतौर संपादक काम करते थे। यहां भी उन्हें संपादक बतौर ही लाया गया था। प्रकाश राय स्कूल में टीचर भी थे, इसलिए प्रबंधन ने फुल फ्लैश संपादक की तलाश में उन्हें बुलाया था। कटारे जी के आने के बाद स्थितियां बदलीं। कुछ दिन पहले पेज पर मुझे उनका सानिध्य मिला फिर मैं ही जनरल डेस्क का इंचार्ज हो गया और मुकुल दुबे सेकेंड नाइट इंचार्ज। अब तक मेरी तनख्वाह दोगुनी हो गई थी करीब 18 सौ रुपये। 92-93 में यह सम्मानजनक मानी जाती थी। 
देशबंधु का एक और प्रसंग लिख कर आज अपनी बात को विराम दूंगा। वह प्रसंग तत्कालीन मालिकान के उदार हृदय का परिचय भी माना जा सकता है। हुआ यह था कि नौदराब्रिज पर मोहर्रम के मद्देनजर खूब रोशनी की गई थी। मैंने इसे खुशी का त्योहार समझ लिया और पहले पेज पर एजेंसी से आई खबर में शीर्षक लगा दिया --हर्षोल्लास से मनाया गया मोहर्रम। खबर छप गई। अगले दिन देवेंद्र सुरजन जी ने केबिन में बुलाया। पूछा तुमने हैडिंग लगाई थी, मैंने कह दिया हां। बोले भाई यह त्योहार गम का होता है...और कुछ नहीं। अलबत्ता राजेश पांडेय जी ने अपने अंदाज में ऐसी सीख दी कि आज तक नहीं भुला सका हूं। जब भी मोहर्रम आता है खुद पर हंसता हूं, अपने बचपने के लिए। इसी अखबार में कामकाज के दौरान एक दिन किसी खबर के लिए जगह नहीं मिल पा रही थी। मैं परेशान था। पेज लगाने वाले पेस्टर (नाम विस्मृत हो रहा है उनका) बोले, पांडेय जी, यह विज्ञापन हटा दें, मैंने कहा हां। 10 गुणे 2 का विज्ञापन था। हटा दिया। सुबह हंगामा मच गया। मुझे शाम को राजेश पांडेय ने इतनी ही नसीहत दी कि विज्ञापन कभी मत हटवाना। न उसकी भाषा ठीक कराना। कई बार लोग ऐसी भाषा लिखते ही हैं विज्ञापन में कि लोगों का ध्यान उस पर जाए।    

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

सांध्यबधु से देशबंधु

इस इतवार अब थोड़ा वक्त अपने ब्लाग को।  पिछले सप्ताह सांध्यबंधु की बात की थी। इस बार उसी सिलसिले को आगे बढ़ाऊंगा। सांध्यबंधु में न दिन पता चलते थे न रात। अखबार यूं तो शाम का था, लेकिन बहुत कुछ काम रात में भी होता था। यह क्रम लगभग डेढ़ से दो साल चला। अब ठीक ठीक याद भी नहीं है। यहां तमाम चीजें सीखीं। डीसी, टीसी, चार कालम, सिंगल कालम इत्यादि-इत्यादि। हैडिंग, सब हैडिंग, क्रासर, फ्लैग-लेआउट की प्रारंभिक कक्षाएं यहीं हुईं। इसी बीच कोटा मुक्त विश्वविद्यालय से पत्रकारिता के स्नातक कोर्स के लिए एप्लीकेशन भी कर दिया। ताकि थ्योरी का ज्ञान हो जाए। मन में यह था कि किसी जनसंपर्क एजेंसी से जुड़ जाऊंगा अथवा सरकारी विभाग में जनसंपर्क का काम मिल जाएगा। लेकिन यह नहीं हो सका। एकाध जगहों पर आवेदन भी किया, लेकिन पढ़ाई लिखाई का ट्रैक रिकार्ड गांधी छाप था, इसलिए  दाल नहीं गली। अलबत्ता यह भ्रम जरूर पाल बैठा कि दुनिया में काम करने वालों की कद्र नहीं होती। दुर्भाग्य से यह भ्रम आज भी नहीं टूटा है। खैर, सांध्यबंधु का अहम हिस्सा बन गया था। वहां कालांतर में पैसों को लेकर दिक्कत खड़ी होने लगी। नरेश वाजपेयी जी पैसों के लिए कारोबारी कदीर सोनी पर निर्भर थे, कदीर सोनी चाहते हुए भी खुद को मीडिया मुगल के रूप में विकसित नहीं कर सके। नरेश वाजपेयी जी को भी पत्र मालिक बनने का यह सफर ज्यादा रास नहीं आया। धीरे-धीरे मेरा मन भी उचटने लगा। इसी दौरान एक बार राजेश पांडेय जी दफ्तर में आए। वह देशबंधु में थे उन दिनों। उनका जबलपुर की पत्रकारिता में बड़ा नाम और सम्मान था। चलते चलते मुझे कह दिया क्या देशबंधु में आना चाहूंगा मैंने उनका सानिध्य पाने के लिए हां कह दी। गर्मी के दिन थे वह। जहां तक मुझे याद आता है मई का महीना था।  मैं देशबंधु में गया। कुछ बातें हुईं और मेरी भी एक सीट हो गई वहां। नौदराब्रिज में दफ्तर था। इससे पहले जब तक देशबंधु शहर में इविनिंगर था, मैं उसका सुधि पाठक था। शाम को कमल की पान की दुकान पर गुटखे के साथ अखबार बांच डालता। इसी अखबार में इसके संस्थापक संपादक मायाराम सुरजन का स्तंभ छपता था धूप छांव के दिन। हफ्ते में एक बार। मन लगाकर उसे पढ़ता और उनकी पत्रकारीय गाथा से प्रभावित होता। सोचता कि कितना त्याग करना पड़ता है कुछ बनने के लिए।
देशबंधु में जाने के बाद भी सांध्यबंधु परिवार से आत्मीय रिश्ता बना रहा। आज भी है, इन पंक्तियों को लिखते हुए। हो सकता है कि अब श्याम बिहारी सोनी कक्का, अतुल वाजपेयी, मुझे भूल गए हों, लेकिन मैं उन्हें नहीं भुला सका हूं। आखिर ककहरा तो उनके स्कूल में पढ़ा है ना।
आज सांध्यबंधु का यह प्रसंग खत्म करने से पहले कुछ और भी लिखना चाहता हूं इस पेज पर। आज दो तस्वीरें अटैच कर रहा हूं। माघ मेले में यह तस्वीरें खींची हैं दैनिक जागरण इलाहाबाद में हमारे सहयोगी छायाकार गिरीश श्रीवास्तव ने। एक तस्वीर में स्वामी ओइमानंद जी महराज अकेले हैं, दूसरे में मेरे और एसबीआई से वीआरएस ले चुके अंतू प्रतापगढ़ के आरएस पांडेय जी के साथ। पवित्र संगम पर लगे माघ मेले में स्वामी जी हैं, इस बार भी। पिछले साल उनके साथ था। इस बार भी हूं। इस बार स्वामी जी ज्यादा प्रफुलि्लत हैं। मेरे जैसे उनके शिष्य भी आल्हादित। दरअसल उनके शिविर के लिए सुविधाएं भी बढ़ गई हैं। इतनी ज्यादा कि अब जगह कम पड़ रही है। कल यानि सोमवार आठ फरवरी को मौनी अमावस्या है। मैं भी इस दिन सुरसरि में सपत्नीक डुबकी लगाकर इहलोक परलोक सुधारने का अभिलाषी हूं। ईश कृपा हुई तो जरूर मेले में रहूंगा। स्वामी जी का सत्संग मिलेगा।

रविवार, 31 जनवरी 2016

सांध्यबंधु में जिंदगी -एक

नमस्कार। आज इतवार है। सोचा था मन की बात लिखूंगा, लेकिन समय ज्यादा हो चला है। दफ्तर की बाबूगिरी ने ऊर्जा छीन ली है, कुछ लिखने की। लेकिन पिछले रविवार को भी नहीं लिख सका था ठलुआगिरी के आगे की दास्तान । इसलिए आज जरूर कुछ न कुछ तो ब्लाग काला करूंगा ही । जब तक उंगलियां थक नहीं जातीं।
...17 जनवरी की पोस्ट में बात अरविंद चौबे तक पहुंची थी। उन्होंने मिलौनीगंज स्थित अपने प्रेस से  जवान शैतान  निकाला था। मैं उनके संपर्क में आ गया था। पता नहीं एक दिन उन्हें क्या सूझा उन्होंने मेरा नाम प्रिंट लाइन में बतौर संपादक डाल दिया। शायद 18 अथवा 19 साल की उम्र रही होगी। संपादक बन गया। क ख ग घ ड़ कुछ भी पता नहीं था पत्रकारिता के बारे में। बस मोपेड की हेडलाइट के ऊपर रिपोर्टर लिखवाए घूमता था। जनभारती प्रहरी से होता हुआ सांध्यबंधु में पहुंच गया। नरेश वाजपेयी -कदीर सोनी इस अखबार के सर्वेसर्वा थे। दोनों ही कांग्रेस से जुड़े थे। लगा बड़े लोगों की सोहबत मिल गई। नरेश वाजपेयी जाने माने चेहरे थे शहर के। जमींदार परिवार के। उनके बेटे अतुल दोस्त बन गए थे मेरे। सांध्यबंधु में टेलीप्रिंटर लगा था। इस पर बैठते थे  शैलेंद्र दुबे। वह यहां पार्टटाइमर के रूप में काम करते थे।  चूंकि वह नवभारत के पहले पेज पर बैठते थे और नवभारत तब जबलपुर का लीडर था, इसलिए उनमें कुछ गर्व का अतिरिक्त बोध था। यदि विज्ञिप्त नवभारत में नहीं छपी तो कहीं नहीं छपी, ऐसी धारणा थी मेरी। भास्कर भी इसी दौर में जम रहा था। इसमें सतीश वाजपेयी जी काम करते थे । टेलीप्रिंटर में उन्हें भी मास्टर माना जाता था। वह भी सांध्यबंधु में आने लगे। तब संस्कारधानी में देशबंधु, नवीनदुनिया जैसे स्थापित अखबार तो थे ही। सब जगह टेलीप्रिटंर की खटर-पटर होती थी। एक बार मन में टेलीप्रिटंर को लेकर उत्सुकता जगी। देखने लगा। शैलेंद्र दुबे जी ने व्यंग के लहजे में कह दिया, इतना आसान नहीं है बच्चा। बात लग गई। शैलेंद्र के साथ भरत ओकास भी होते थे। एक दिन संयोग से दोनों नहीं आए। मैंने ही खबरें निकालीं, संपादित की और पहला पन्ना बनवा दिया। आत्मविश्वास हिलोर मारने लगा। वह तारीख तो अब ठीक से याद नहीं लेकिन स्मृति में इतना जरूर है कि जिस दिन दिल्ली को विधानसभा बनाए जाने का प्रस्ताव संसद में पास हुआ, मैंने चार पन्नों के इस अखबार के पहले पेज पर लीड बनाई थी यह खबर। तीन कालम दो लाइन में हैडिंग देते हुए। तीन दिन बाद घर के पीछे राजकीय पुस्तकालय की लाइब्रेरी में बैठ कर नवभारत टाइम्स देख रहा था। भौचक रह गया। मैंने जो शीर्षक दिया था, हु-ब-हू वही शीर्षक नवभारत टाइम्स की लीड का था। मन बाग-बाग हो उठा। मेरे तमाम मित्रों को आज विश्वास नहीं होगा। वह फाइल देख सकते हैं। पहली बार कांफिडेंस  हजार गुना बढ़ गया। इसके बाद तो रात में अकेले ही सांध्यबंधु के भीतर के पेज बनवा देता था। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों को लेते हुए। कन्हैयालाल राज यहां संपादकीय प्रभारी थे। दलित समुदाय से आते थे वह। पुराने पत्रकार थे गांधीवादी। उनके चरण स्पर्श से भी गुरेज नहीं किया था मैंने। खूब सीखा। कभी कभी वह झिड़कते थे मुझे, लेकिन रात में जब टुन्न होते थे तो आशीषते थे। सांध्यबंधु के बाद उनसे रिश्ता नहीं रहा। पर वह स्मृति में बने हैं। सांध्यबंधु में पहली तनख्वाह (सैलरी) शायद 280 रुपये मिली थी। इसके बाद यह एक साल के ही भीतर छह सौ रुपये हो गई। श्याम बिहारी सोनी कक्का, नरेश वाजपेयी भरपूर दुलार देते। रात में यहां दूसरा ही दौर हो जाता। तख्त पर नरेश भैया और उनकी मित्रमंडली जम जाती। दौर चलते। खाना आता तो मुझे भी पूछा जाता। घर में खाना बनता था, इसलिए अक्सर न कर देता था मैं। फिर भी कई बार नरेश वाजपेयी खाना खिलवा ही देते। उनका हक था मुझ पर। भगवान उनके परिवार को सलामत रखें। यहीं शरद मोदी मिले। मस्तमौला। यहीं हैंडकंपोजिंग होती थी। खटर पटर के बीच मैटर देना होता था। प्रूफ भी पढ़ता। दो पेज तैयार करवाकर जाता। घर पहुंचते-पहुंचते बाजे दफा रात में 11 भी बज जाते, या इससे अधिक। करीब डे़ढ़ साल पंख लगकर गुजर गए। अयोध्या में जब कारसेवकों पर गोली चली तब यहीं था। सांप्रदायिक तनाव क्या होता है, पत्रकारीय धर्म क्या होता है ऐसे मौकों पर, यहीं जाना। सच कहूं तो सांध्यबंधु में की गई अप्रेंटिसगिरी आगे बहुत काम आई। यही मोहब्बत के भी एक पाठ से दो चार हुआ। लेकिन यह सफर संक्षिप्त ही रहा। बात आई गई हो गई। इस पर अब क्या लिखना। 

रविवार, 24 जनवरी 2016

गंगा की गोद में सुखद पल

गंगा माई की गोद में थी इस बार रविवार की सुबह। माघ मेला क्षेत्र में लोअर संगम मार्ग पर लगे स्वामी ओइमानंद जी के शिविर में शनिवार देर रात तक जगता रहा, करीब तीन बजे नींद लगी। चार बजे खुल गई, इस अनाउंस को सुनकर कि स्नान घाट पर भीड़ न लगाएं। रात 11 बजे अचानक तय हुआ था माघ मेले क्षेत्र में जाने का प्लान। सहयोगी अवधेश पांडेय थे साथ में। दरअसल झूंसी में ही रहते हैं वह। उनके साथ पहुंच गया बाइक पर, चंद मिनटों के भीतर। ठंड थी, लेकिन अंदर ही अंदर अध्यात्मिक ऊर्जा से भरा था। सूर्योदय से पहले ही कोहरे के बीच पौष पूर्णिमा का स्नान किया। तमाम कामनाएं कीं मां गंगा से।  शायद पहली बार पौष पूर्णिमा पर मां गंगा की गोद में था। इसलिए सुखद अनुभूति हुई। अकेले ही घुसा सुरसरि के शीतल जल में। सुबह जागरण कनेक्शन में भी आना था, इसलिए स्नान के बाद ज्यादा बैठकी नहीं हुई। अवधेश जी के साथ निकल पड़ा। संस्थान के कार्यक्रम के बाद थकान ऐसी लगी कि दिन में नहीं आया दफ्तर। घर में ही रजाई में दुबका रह गया। शुभम लखनऊ चले गए, अमन भी आए राबर्टसगंज से। जाते-जाते दोनों को रजाई से ही विदा किया। इस तरह अबकी रविवार अपनी राम कहानी नहीं लिख सका। अब अगले रविवार को, अगर सब कुछ सलामत रहा तो...।   

रविवार, 17 जनवरी 2016

ठलुआगिरी के दिन और अस्सी रुपये का चेक

नमस्कार इतवार। आज सत्रह जनवरी है। ढाई बज रहे हैं, लिखने का मूड नहीं है। लेकिन अभी 20 मिनट बचे हैं तो क्रम न टूटे, इसलिए कुछ जरूर लिखूंगा। ब्लाग पर सारी बातें रख सकता हूं, लेकिन टाइम मैनेजमेंट में कहीं न कहीं आलस की वजह से चूक जाता हूं। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह क्रम भी व्यवस्थित हो जाएगा।
पिछले रविवार को मैंने लिखा था कि कैसे गर्मी के दिनों में ग्वालियर से आई एक पाती ने जिंदगी की दशा मोड़ी। इससे पहले भी कुछ बातें हुईं थीं। क्रिश्चयन स्कूल में हिंदी की कक्षा मैं नेगी सर की तारीफ मिली थी। इसके बाद से खुद को विद्वान मानने का भ्रम पाल लिया था। यह भ्रम आज भी है शायद। जब बीकाम फर्स्ट इयर में था तब एक बार पप्पू (सुरेश सोनकर) के साथ माधवराव सिंधिया जी से मिलने का मौका मिला। वह राजीव गांधी की सरकार में रेल राज्य मंत्री थे स्वतंत्र प्रभार। उनके रेलमंत्री बनने के बाद तमाम काम हुए थे, जबलपुर भी अछूता नहीं था। स्टेशन की सुंदरता बढ़ी थी। उन दिनों पप्पू भाई भी बेरोजगार थे और मैं भी कैसे न कैसे एक अदद नौकरी से जुड़ना चाहता था। यह नौकरी रेलवे की हो जाए, यही बात सिर चढ़ कर घूम रही थी। दरअसल जबलपुर से प्रतापगढ़ आने -जाने के दौरान रेलवे वालों के जलवे देखता था। सोचता था यदि गार्ड टीसी अथवा ड्राइवर बन जाऊं तो कितना मजा आ जाए जिंदगी में। तो इसी सोच से प्रभावित होकर पप्पू भाई के साथ मुजफ्फरनगर भर्ती बोर्ड द्वारा निकाली गई गार्ड -सहायक स्टेशन मास्टर की परीक्षा दी थी। इलाहाबाद में परीक्षा केंद्र बना था। नतीजा नहीं आ रहा था, इसी बीच एक खबर छपी की परीक्षा में धांधली हुई है। श्रीमंत जी (माधव राव सिंधिया) जबलपुर आए थे विवेक तन्खा के घर। दोपहर में तमाम कांग्रेसजन एकत्रित थे वहां। मैं भी कुर्ता पैजामा पहने घुस गया उस भीड़ में पप्पू भाई के साथ। एक एप्लीकेशन लिख रखी थी, धांधली की और इसकी वजह से योग्य लोगों का चयन नहीं होने की आशंका भी जताई थी। लंच था तनखा जी के यहां, मैंने भी लगे हाथ सिंधिया जी के हाथों में वह पाती थमा दी। हंसकर उन्होंने इतना ही कहा...अरे यह क्या है, मैंने कहा सर देख लेंगे तो कृपा होगी। उन्होंने एप्लीकेशन अपने सचिव को पकड़ा दी। कुछ दिनों बाद करीब तीन महीने बाद परीक्षा रद होने की खबर छपी। मैंने अपने आपको इसका श्रेय दिया और अपने शब्दों को महान मानने लगा। पता नहीं यह परीक्षा मेरे ज्ञापन की वजह से रद हुई अथवा किसी और वजह से लेकिन शब्दों को मैंने महान और महानतम मानना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद मैंने घर में बैठे बैठे तीन चार पन्ने में एक निबंध लिख मारा। शीर्षक दिया -भारतीय रेल एकता की संगम। इस लेख को रेल मंत्री जी को संबोधित करते हुए रेल भवन भेज दिया। दरअसल एक खबर थी कि सिंधिया जी के प्रयासों से रेल मंत्रालय एसी फर्स्ट व वातानुकूलित डिब्बों में रेल पत्रिका रखेगा, जो हिंदी व अंग्रेजी में होगी। पत्रिका में मेरा लेख छपा अथवा नहीं, मैं नहीं जानता, अलबत्ता रेल भवन से एक लिफाफा जरूर मिला जिसमें चेक था अस्सी रुपये का। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। फूला नहीं समाया। चार पेज के लिए अस्सी रुपये, तब बड़ी बात थी यह। जबलपुर जंक्शन पहुंच गया और उसके कोषागार में अस्सी रुपये नगद की मांग कर दी। वहां तैनात बाबू हंसे। बोले, जाकर बैंक में एकाउंट खोलो, उसमें जमा कराओ। वहां से भुगतान होगा। तब स्टेडियम के सामने एसबीआई मेन ब्रांच में एकाउंट खोला। चेक जमा हुआ। चालीस रुपये घर से लिए थे। एकाउंट में धीमे-धीमे डेढ़ सौ रुपये जमा हो गए।
ग्वालियर के साप्ताहिक (संभवतः मासिक) से जुड़ने के बाद पांव जमीन पर नहीं पड़ते थे मेरे। लेकिन पैसा नहीं होता था। नब्बे का दशक ढलान पर था। इसी दौरान ज्ञान भारती प्रहरी निकलना शुरू हुआ जबलपुर से। वहां एक दिन विज्ञिप्त देने गया। खुद को पत्रकार बताया। छात्रनेतागिरी का चस्का था, विज्ञिप्त छात्रनेता की हैसियत से दी थी, नाम छप भी गया। अगले दिन फिर पहुंचा और काम करने की ख्वाहिश जताई। अखिलेश तिवारी, राजेश पांडेय, अज्जू दुबे इत्यादि से परिचय हुआ। एकाध विज्ञिप्त बनाई। मुझे याद आता है राजेश पांडेय (जूनियर) ने कहा लगता है इसे भी कीड़ा काट खाया है...। कुछ समय बाद रामकुमार विश्वकर्मा से परिचय हुआ और फिर अरविंद चौबे से। जवान शैतान नामक अखबार निकालते थे अरविंद चौबे। तब तक बीसवी सदी की शुरूआत हो चुकी थी। जवान शैतान में अरविंद चौबे ने संपादक के रूप में मेरा नाम प्रिंट करवा दिया था। मसें भी कायदे से नहीं भीगीं थी और मेरा नाम संपादक के रूप में दर्ज हो गया। संपादकीय, अग्रलेख क्या होते हैं, इसकी गंभीरता से तब उतना परिचय नहीं हुआ था। सीनियर के रूप में दद्दा जो बताते वही हां होता था। कुछ इश्यू निकले, कुछ नहीं। दद्दा को मोपेड पर लेकर घूमता। वह विज्ञापन लाते थे। इसी सब में पता नहीं कैसे सांध्यबंधु के संपर्क में आ गया। इस अखबार में कैसे बीता समय, यहां के अनुभव...इसे अगले रविवार को लिखूंगा, बशर्ते सब कुछ ठीक रहा तो...। आज बस इतना ही । 

रविवार, 10 जनवरी 2016

ठलुआ के हाथ पाती

नमस्कार। पिछले रविवार को वादा किया था कि आने वाले इतवार से पत्रकारीय जीवन के सफरनामे को लिखना शुरू करूंगा। आज अनमयस्क हूं। लिखने का मन नहीं है, फिर भी वादा था तो दो कदम जरूर चलना चाहूंगा, इस दिशा में। डायरी मेंटेन नहीं करता मैं। पिता जी करते हैं, लेकिन उनकी भी डायरी अनियमित रही है। उनसे तमाम चीजें लीं, पर डायरी लिखने की प्रेरणा नहीं ली। मुझे पता नहीं क्यों डायरी से कोफ्त रही है शुरू से। डायरियां मिलती रही हैं, लेकिन ऐसी ही पढ़ी रहती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि लगता था कि यह बकवास है। अभी भी सोच यही है। आप लिखें दूसरे पढ़ें और हंसे...। क्या यह बचकाना नहीं है? फैसला आप करें।
खैर, जबलपुर में गर्मी के दिन थे। नब्बे के दशक के आखिरी साल में। तब जीएस कामर्स कालेज का छात्र था बीकाम तृतीय वर्ष की परीक्षा हो चुकी थी। पढ़ाई लिखाई में ज्यादा मन नहीं लगता था उन दिनों। इसकी एक वजह शायद मैट्रिक का रिजल्ट था। उसमें कृपांक से पास हुआ था। दिलीप यादव इस कालेज के छात्रसंघ अध्यक्ष थे, उन्होंने पता नहीं कैसे प्रवेश दिला दिया था, कक्षा में एकाध बार ही बैठा होऊंगा। फर्स्ट इयर में था तभी कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव लड़ गया, शिकस्त मिली। सियासत की पहली ही पाठशाला में फेल हो गया। मेरे पड़ोसी रामगोपाल नामदेव जी के पुत्र पवन मुझसे सीनियर थे, वह चुनाव जीत गए थे। उनकी देखादेखी मुझे भी चस्का लगा था। खैर। राजनीति ज्यादा रास नहीं आई। अपन के पास न पैसे थे, न लोग। इसलिए राम-राम कह दिया। नौकरी खोजने लगा। छोटी मोटी कैसी भी। इसी दौरान समाजसेवा भी चलती रही, अंड बंड।  मोहल्ले में कार्यक्रम होते थे, गणेशोत्सव, दुर्गापूजा, नया साल, पंद्रह अगस्त। पता नहीं क्या -क्या? लड़ाई झगड़े भी होते थे। शादी हो गई थी, लेकिन यह बात छिपाना ही उचित लगता था। शायद इसलिए कि सीटियाबाजी नहीं कर पाऊंगा, इस बात के जाहिर होने पर। वैसे ब्यौहारबाग कालोनी में लोगों को यह बात मालूम थी। अम्मा सरल हृदय थीं, छिपा नहीं पाती थीं। हां तो गर्मी के दिन थे। एक दिन शाम को घर के बाहर बैठा था। पप्पू सोनकर भी साथ थे। वह बेरोजगार थे उन दिनों। गोधूलि बेला में ठाकुर साहब की साइकिल घर के बाहर रुकी। ठाकुर साहब पोस्टमैन थे। उनके हाथ में एक लिफाफा था। उस पर मेरा नाम लिखा था। ग्वालियर से किसी रामकुमार श्रीवास्तव ने भेजा था। खोला तो उसमें साप्ताहिक पत्र निकला। पत्रकार बनने के लिए मुझसे कहा गया था। सौ रुपये मांगे गए थे। सौ रुपये की रकम तब बड़ी होती थी। पिता जी से मांग नहीं सकता था। उनकी तनख्वाह ही तब शायद छह सौ से सात रुपये के बीच रहती थी। याद आए शंकरशाह नगर में रहने वाले श्वसुर जी। उनके घर पहुंच गया। विदाई में सौ रुपये मिल  गए। मैंने मनीआर्डर कर दिया। कुछ ही दिनों में ग्वालियर से आइडेंडी कार्ड आ गया। मैंने ससुराल से मिली हीरो मैजिस्टक मोपेड की हेडलाइट के ऊपर लिखवा लिया रिपोर्टर। उड़ने लगा। घर के पीछे माडल हाईस्कूल था। वहां लोकअदालत लगी थी। रंगनाथ मिश्र उसमें आए थे। उसमें पहुंच गया बाहैसियत रिपोर्टर। पत्रकारों की जमात में जा बैठा, सीनियरों ने हिकारत की नजर से देखा, पर मैं बेशर्म सा बैठा रहा। घर आया। तीन पन्ने में जो कुछ समझ सका लिखा और भेज दिया। पता नहीं वह छपा अथवा नहीं।
ग्वालियर से अखबार भेजने वाले श्रीवास्तव जी से मुलाकात कभी नहीं हुई। (शेष अगले इतवार को--यदि सलामत रहा तो...)

रविवार, 3 जनवरी 2016

अब दिन यादों को संजोने के

वर्ष 2016  शुभ हो। हम सभी के लिए।खास तौर पर आर्थिक, सामाजिक व सेहत के मोर्चे पर । आज रविवार है और जब अपने ब्लाग पर यह पंक्तियां लिख रहा हूं तब पठानकोठ एयरबेस में हुए आतंकी हमले की खबर टेलीविजन पर चल रही है। हमारे शहीदों की संख्या 11 हो गई है अब तक। छप्पन इंच का सीना वालों की सरकार इसका क्या जवाब देती है, मुझे भी इसका इंतजार रहेगा देश के अन्य लोगों की तरह। खैर। कुछ ही देर पहले संजीव सर (अमर उजाला वाराणसी में संपादक थे हमारे) से बात हुई थी मोबाइल पर। उन्होंने आशीर्वाद दिया, नए साल की मंगलकामनाओं के साथ। मैंने उस मंगल कामना को सिर पर धर लिया। बड़े-छोटे मित्रों, शुभचिंतकों की शुभकामनाएं ही हैं कि कुछ मानसिक तनाव के बाद भी यहां ब्लाग काला कर रहा हूं। पिता जी गुजरते साल में एक बार फिर चिंता का सबब बन गए हैं हम सबके लिए। उसके बाद भी। गांव में तीस दिसंबर को बाबू जी गिर गए थे पानी भरते समय हैंडपंप के पास। बाएं हाथ की कलाई में फ्रैक्चर हो गया और कमर में क्रेक। मैं उन्हें नहीं ला सका इलाहाबाद। दीपू के पास हैं वह वाराणसी में। हड्डी की चोटों के लिए विख्यात चिकित्सक संजय मारवाह कर रहे हैं उनका इलाज। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह जल्द ही फिर सामान्य हों जाएं। उनको खोने की कल्पना मात्र से सिहर जाता हूं। घर में किससे कहूं यह सब? शुभम-आयुष शायद ही मेरी पीड़ा को समझ सकते हैं। मैं उनका नालायक बेटा हूं ना। मना किया था बाबू जी को वाराणसी से जाने के लिए। छोटे भाई ने यह कह कर मुझे सांत्वना दी कि क्या वाराणसी में हादसे नहीं होते। लेकिन मन तो मन है घोड़ों की तरह दौड़ता है। 
संजीव सर से बातचीत के दौरान मैंने कहा कि सर, अब पता नहीं क्यों मन कमजोर पड़ जाता है, विपत्ति में। सितंबर में सरहज गुजरीं नवंबर में बुआ जी। दस साल पहले यदि कहीं अपना घर बनवा लिया होता तो पिता जी को साथ ही रखता। आप थे लोन भी पास हो गया होता अासानी से। वह (संजीव सर) बोले, हां- तब अतुल जी थे, वाकई में अतुलनीय। उन्होंने मेरी किसी भी बात को अनुसुना किया हो, याद नहीं आता। काम करने वालों की कद्र वह जानते थे। मैंने कहा, सर-संयोग देखिए आज अतुल जी की पुण्यतिथि है पांचवी। हम उनका जिक्र कर रहे हैं। मेरा अतुल जी से सीधा बावस्ता कभी नहीं रहा। एक बार मिर्जापुर के उनके प्रवास से जुड़ा प्रसंग ही सुना हूं, अभिभूत करने वाला। उन्होंने वाराणसी दफ्तर में किसी को नहीं बताया था। चुपचाप आए, आम दर्शनार्थियों की भांति दर्शन कर चले गए। आज ऐसे कितने मालिकान हैं? इस सवाल का जवाब मेरे लिए कठिन है। अमर उजाला अब भी है, पर अतुल जी नहीं हैं। संजीव सर ने बताया कि एक बार तुम्हारा (मेरा) जिक्र मैंने अतुल जी से बोर्ड की बैठक के दौरान किया था। अच्छे सहकर्मी के रूप में। कुछ बेहतर करने की तैयारी थी, लेकिन मुई किस्मत आड़े आ गई। 
अमर उजाला में अच्छे दिन ज्यादा थे। जागरण में भी बहुत प्यार मिला है। अमर उजाला के साथी रजनीश त्रिपाठी ने यह नियुक्ति दिलाने में मदद की। संपादकीय प्रभारी राघवेंद्र चड्ढा जी से भी स्नेह ही मिला। आशुतोष सर (आशुतोष शुक्ला) सर का तो कृपा पात्र मैं खुद को मानता ही हूं। उन्होंने एक्सीडेंट के बाद जिस तरह से मुझे नई जिंदगी दिलाने में मदद दी, वह कभी नहीं भुलाऊंगा। पत्रकारिता में आज शीर्षस्थ नाम है शशिशेखर जी का। उन्होंने भी मुझे अवसाद के एक दौर से निकाला था। कुछ गलतियां नासमझी मैंने की और उसका खमियाजा आज भुगत रहा हूं। बहरहाल, यह सब बातें आज क्यों? इसे नहीं करना चाहिए। इसलिए विराम देता हूं इसको। विस्तार से इसका जिक्र फिर कभी करूंगा। इस साल मेरा संकल्प पत्रकारिता की अब तक की अपनी यात्रा को क्रमबृद्ध करना रहेगा। तो अगले इतवार से इस क्रम की शुरूआत करूंगा। ऐसा इसलिए क्योंकि अनुभव कहीं न कहीं किसी भी रूप में दूसरों के काम भी आ सकें। यदि लक्ष्मी की किरपा हुई तो मन की यह सरस्वती किसी पुस्तक के रूप में सजेंगी। अमरत्व की प्राप्ति के लिए यह तन और मन कितना साथ देता है, यही बात देखने लायक होगी। दरअसल वक्त रेत के घरौदें की तरह है यह कितनी तेजी से खत्म होता है पता ही नहीं चलता। इसलिए जितना भी समय मिले, उसका सार्थक उपयोग कर लेना चाहिए। अब उम्र के उस दौर में पहुंच भी गया हूं, जहां चीजें करीने से सजाई जानी चाहिए। 

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...