रविवार, 17 जनवरी 2016

ठलुआगिरी के दिन और अस्सी रुपये का चेक

नमस्कार इतवार। आज सत्रह जनवरी है। ढाई बज रहे हैं, लिखने का मूड नहीं है। लेकिन अभी 20 मिनट बचे हैं तो क्रम न टूटे, इसलिए कुछ जरूर लिखूंगा। ब्लाग पर सारी बातें रख सकता हूं, लेकिन टाइम मैनेजमेंट में कहीं न कहीं आलस की वजह से चूक जाता हूं। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह क्रम भी व्यवस्थित हो जाएगा।
पिछले रविवार को मैंने लिखा था कि कैसे गर्मी के दिनों में ग्वालियर से आई एक पाती ने जिंदगी की दशा मोड़ी। इससे पहले भी कुछ बातें हुईं थीं। क्रिश्चयन स्कूल में हिंदी की कक्षा मैं नेगी सर की तारीफ मिली थी। इसके बाद से खुद को विद्वान मानने का भ्रम पाल लिया था। यह भ्रम आज भी है शायद। जब बीकाम फर्स्ट इयर में था तब एक बार पप्पू (सुरेश सोनकर) के साथ माधवराव सिंधिया जी से मिलने का मौका मिला। वह राजीव गांधी की सरकार में रेल राज्य मंत्री थे स्वतंत्र प्रभार। उनके रेलमंत्री बनने के बाद तमाम काम हुए थे, जबलपुर भी अछूता नहीं था। स्टेशन की सुंदरता बढ़ी थी। उन दिनों पप्पू भाई भी बेरोजगार थे और मैं भी कैसे न कैसे एक अदद नौकरी से जुड़ना चाहता था। यह नौकरी रेलवे की हो जाए, यही बात सिर चढ़ कर घूम रही थी। दरअसल जबलपुर से प्रतापगढ़ आने -जाने के दौरान रेलवे वालों के जलवे देखता था। सोचता था यदि गार्ड टीसी अथवा ड्राइवर बन जाऊं तो कितना मजा आ जाए जिंदगी में। तो इसी सोच से प्रभावित होकर पप्पू भाई के साथ मुजफ्फरनगर भर्ती बोर्ड द्वारा निकाली गई गार्ड -सहायक स्टेशन मास्टर की परीक्षा दी थी। इलाहाबाद में परीक्षा केंद्र बना था। नतीजा नहीं आ रहा था, इसी बीच एक खबर छपी की परीक्षा में धांधली हुई है। श्रीमंत जी (माधव राव सिंधिया) जबलपुर आए थे विवेक तन्खा के घर। दोपहर में तमाम कांग्रेसजन एकत्रित थे वहां। मैं भी कुर्ता पैजामा पहने घुस गया उस भीड़ में पप्पू भाई के साथ। एक एप्लीकेशन लिख रखी थी, धांधली की और इसकी वजह से योग्य लोगों का चयन नहीं होने की आशंका भी जताई थी। लंच था तनखा जी के यहां, मैंने भी लगे हाथ सिंधिया जी के हाथों में वह पाती थमा दी। हंसकर उन्होंने इतना ही कहा...अरे यह क्या है, मैंने कहा सर देख लेंगे तो कृपा होगी। उन्होंने एप्लीकेशन अपने सचिव को पकड़ा दी। कुछ दिनों बाद करीब तीन महीने बाद परीक्षा रद होने की खबर छपी। मैंने अपने आपको इसका श्रेय दिया और अपने शब्दों को महान मानने लगा। पता नहीं यह परीक्षा मेरे ज्ञापन की वजह से रद हुई अथवा किसी और वजह से लेकिन शब्दों को मैंने महान और महानतम मानना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद मैंने घर में बैठे बैठे तीन चार पन्ने में एक निबंध लिख मारा। शीर्षक दिया -भारतीय रेल एकता की संगम। इस लेख को रेल मंत्री जी को संबोधित करते हुए रेल भवन भेज दिया। दरअसल एक खबर थी कि सिंधिया जी के प्रयासों से रेल मंत्रालय एसी फर्स्ट व वातानुकूलित डिब्बों में रेल पत्रिका रखेगा, जो हिंदी व अंग्रेजी में होगी। पत्रिका में मेरा लेख छपा अथवा नहीं, मैं नहीं जानता, अलबत्ता रेल भवन से एक लिफाफा जरूर मिला जिसमें चेक था अस्सी रुपये का। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। फूला नहीं समाया। चार पेज के लिए अस्सी रुपये, तब बड़ी बात थी यह। जबलपुर जंक्शन पहुंच गया और उसके कोषागार में अस्सी रुपये नगद की मांग कर दी। वहां तैनात बाबू हंसे। बोले, जाकर बैंक में एकाउंट खोलो, उसमें जमा कराओ। वहां से भुगतान होगा। तब स्टेडियम के सामने एसबीआई मेन ब्रांच में एकाउंट खोला। चेक जमा हुआ। चालीस रुपये घर से लिए थे। एकाउंट में धीमे-धीमे डेढ़ सौ रुपये जमा हो गए।
ग्वालियर के साप्ताहिक (संभवतः मासिक) से जुड़ने के बाद पांव जमीन पर नहीं पड़ते थे मेरे। लेकिन पैसा नहीं होता था। नब्बे का दशक ढलान पर था। इसी दौरान ज्ञान भारती प्रहरी निकलना शुरू हुआ जबलपुर से। वहां एक दिन विज्ञिप्त देने गया। खुद को पत्रकार बताया। छात्रनेतागिरी का चस्का था, विज्ञिप्त छात्रनेता की हैसियत से दी थी, नाम छप भी गया। अगले दिन फिर पहुंचा और काम करने की ख्वाहिश जताई। अखिलेश तिवारी, राजेश पांडेय, अज्जू दुबे इत्यादि से परिचय हुआ। एकाध विज्ञिप्त बनाई। मुझे याद आता है राजेश पांडेय (जूनियर) ने कहा लगता है इसे भी कीड़ा काट खाया है...। कुछ समय बाद रामकुमार विश्वकर्मा से परिचय हुआ और फिर अरविंद चौबे से। जवान शैतान नामक अखबार निकालते थे अरविंद चौबे। तब तक बीसवी सदी की शुरूआत हो चुकी थी। जवान शैतान में अरविंद चौबे ने संपादक के रूप में मेरा नाम प्रिंट करवा दिया था। मसें भी कायदे से नहीं भीगीं थी और मेरा नाम संपादक के रूप में दर्ज हो गया। संपादकीय, अग्रलेख क्या होते हैं, इसकी गंभीरता से तब उतना परिचय नहीं हुआ था। सीनियर के रूप में दद्दा जो बताते वही हां होता था। कुछ इश्यू निकले, कुछ नहीं। दद्दा को मोपेड पर लेकर घूमता। वह विज्ञापन लाते थे। इसी सब में पता नहीं कैसे सांध्यबंधु के संपर्क में आ गया। इस अखबार में कैसे बीता समय, यहां के अनुभव...इसे अगले रविवार को लिखूंगा, बशर्ते सब कुछ ठीक रहा तो...। आज बस इतना ही । 

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