रविवार, 10 जनवरी 2016

ठलुआ के हाथ पाती

नमस्कार। पिछले रविवार को वादा किया था कि आने वाले इतवार से पत्रकारीय जीवन के सफरनामे को लिखना शुरू करूंगा। आज अनमयस्क हूं। लिखने का मन नहीं है, फिर भी वादा था तो दो कदम जरूर चलना चाहूंगा, इस दिशा में। डायरी मेंटेन नहीं करता मैं। पिता जी करते हैं, लेकिन उनकी भी डायरी अनियमित रही है। उनसे तमाम चीजें लीं, पर डायरी लिखने की प्रेरणा नहीं ली। मुझे पता नहीं क्यों डायरी से कोफ्त रही है शुरू से। डायरियां मिलती रही हैं, लेकिन ऐसी ही पढ़ी रहती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि लगता था कि यह बकवास है। अभी भी सोच यही है। आप लिखें दूसरे पढ़ें और हंसे...। क्या यह बचकाना नहीं है? फैसला आप करें।
खैर, जबलपुर में गर्मी के दिन थे। नब्बे के दशक के आखिरी साल में। तब जीएस कामर्स कालेज का छात्र था बीकाम तृतीय वर्ष की परीक्षा हो चुकी थी। पढ़ाई लिखाई में ज्यादा मन नहीं लगता था उन दिनों। इसकी एक वजह शायद मैट्रिक का रिजल्ट था। उसमें कृपांक से पास हुआ था। दिलीप यादव इस कालेज के छात्रसंघ अध्यक्ष थे, उन्होंने पता नहीं कैसे प्रवेश दिला दिया था, कक्षा में एकाध बार ही बैठा होऊंगा। फर्स्ट इयर में था तभी कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव लड़ गया, शिकस्त मिली। सियासत की पहली ही पाठशाला में फेल हो गया। मेरे पड़ोसी रामगोपाल नामदेव जी के पुत्र पवन मुझसे सीनियर थे, वह चुनाव जीत गए थे। उनकी देखादेखी मुझे भी चस्का लगा था। खैर। राजनीति ज्यादा रास नहीं आई। अपन के पास न पैसे थे, न लोग। इसलिए राम-राम कह दिया। नौकरी खोजने लगा। छोटी मोटी कैसी भी। इसी दौरान समाजसेवा भी चलती रही, अंड बंड।  मोहल्ले में कार्यक्रम होते थे, गणेशोत्सव, दुर्गापूजा, नया साल, पंद्रह अगस्त। पता नहीं क्या -क्या? लड़ाई झगड़े भी होते थे। शादी हो गई थी, लेकिन यह बात छिपाना ही उचित लगता था। शायद इसलिए कि सीटियाबाजी नहीं कर पाऊंगा, इस बात के जाहिर होने पर। वैसे ब्यौहारबाग कालोनी में लोगों को यह बात मालूम थी। अम्मा सरल हृदय थीं, छिपा नहीं पाती थीं। हां तो गर्मी के दिन थे। एक दिन शाम को घर के बाहर बैठा था। पप्पू सोनकर भी साथ थे। वह बेरोजगार थे उन दिनों। गोधूलि बेला में ठाकुर साहब की साइकिल घर के बाहर रुकी। ठाकुर साहब पोस्टमैन थे। उनके हाथ में एक लिफाफा था। उस पर मेरा नाम लिखा था। ग्वालियर से किसी रामकुमार श्रीवास्तव ने भेजा था। खोला तो उसमें साप्ताहिक पत्र निकला। पत्रकार बनने के लिए मुझसे कहा गया था। सौ रुपये मांगे गए थे। सौ रुपये की रकम तब बड़ी होती थी। पिता जी से मांग नहीं सकता था। उनकी तनख्वाह ही तब शायद छह सौ से सात रुपये के बीच रहती थी। याद आए शंकरशाह नगर में रहने वाले श्वसुर जी। उनके घर पहुंच गया। विदाई में सौ रुपये मिल  गए। मैंने मनीआर्डर कर दिया। कुछ ही दिनों में ग्वालियर से आइडेंडी कार्ड आ गया। मैंने ससुराल से मिली हीरो मैजिस्टक मोपेड की हेडलाइट के ऊपर लिखवा लिया रिपोर्टर। उड़ने लगा। घर के पीछे माडल हाईस्कूल था। वहां लोकअदालत लगी थी। रंगनाथ मिश्र उसमें आए थे। उसमें पहुंच गया बाहैसियत रिपोर्टर। पत्रकारों की जमात में जा बैठा, सीनियरों ने हिकारत की नजर से देखा, पर मैं बेशर्म सा बैठा रहा। घर आया। तीन पन्ने में जो कुछ समझ सका लिखा और भेज दिया। पता नहीं वह छपा अथवा नहीं।
ग्वालियर से अखबार भेजने वाले श्रीवास्तव जी से मुलाकात कभी नहीं हुई। (शेष अगले इतवार को--यदि सलामत रहा तो...)

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