रविवार, 24 सितंबर 2017

ठीक है हम वैशाखनंदन ही सही...

गुजरे सप्ताह एक रात टिवटर पर था।  तारीख थी 17 सितंबर। विश्वकर्मा जयंती और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन। किसी रीट्वीट को देखा। उत्सुकता हुई उसे बांचने की। मूल ट्वीट मृणाल पांडे का था। उनका ट्वीट देख नहीं पाया। दरअसल उन्होंने मुझे ब्लाकित किया हुआ था। खैर कुछ ही देर में कुछ और टिवटरबाज मिल गए महान पत्रकार को आड़े हाथ लेते हुए।  स्क्रीन शाट को भी उन्होंने इनसर्ट कर दिया था। मृणाल जी के टीएल पर दर्ज था -- जुमला जयंती पर आनंदित, पुलकित रोमांचित वैशाखनंदन। नीचे गधे की तस्वीर थी।
बता दूं कि वैशाखनंदन गधा का पर्यायवाची होता है। तुरंत समझ में आ गया कि मृणाल जी ने  लक्षणा व्यंजना में प्रधानमंत्री को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने वालों को  किस कदर इज्जत बख्शी है। पदमश्री सम्मानित पत्रकार/ साहित्यकार से ऐसी उम्मीद शायद ही किसी को होगी। मुझे तो बिल्कुल भी नहीं थी। समझ में गया कि मैडम फ्रस्टेशन की शिकार हैं। भले ही इन दिनों वह कहीं किसी पद पर नहीं हैं लेकिन पुराना  दंभ तो है ही उनके पास। उनकी मानसकिता छिपी नहीं है। जिस शासन में वह उपकृत हुईं थी, उसका एहसान तो चुकाना ही था उन्हें।
सेक्युलर बिग्रेड की लंबरदार मृणाल जी का असली चेहरा सामने आया तो कई और बातें सामने आ गईं उनके बारे में। पटना में कभी हिंदुस्तान में कार्यरत एक सहयोगी की  मीडिया जगत से जुड़ी वेबसाइट पर की गई टिप्पणी ने मेरे ज्ञान में इजाफा किया। इस सहयोगी ने बताया कि किसी समय वह पटना में कार्यरत थे। बतौर प्रधान संपादक मृणाल जी का एक लेख छपा। उस पर किसी पाठक ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी। पाठक के पत्र कालम में वह प्रतिक्रिया छापी गई। मृणाल जी ने सीधे तो कुछ नहीं कहा, हां यूनिट के जीएम ने जरूर इशारों इशारों में बता दिया कि प्रतिक्रिया नहीं छापी जानी चाहिए था। सेक्युलर खेमे के साथ दिक्कत यही है। उनको अपनी  कहने का हक तो सबसे अहम लगता है, लेकिन प्रतिक्रिया को ग्रहण करने से हिचकते हैं वह। अभिव्यक्ति की आजादी क्या सिर्फ उनके लिए ही है। यह बड़ा सवाल है। जाहिर है इसका जवाब वह नहीं देंगे।   भारत में इस समय अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा है... ऐसा शोर मचाने में वह सबसे आगे हैं, पर यह सच नहीं है। यदि ऐसा होता तो मृणाल पांडेय जी जैसी शख्सियत भारत के भक्तों को वैशाखनंदन नहीं बता देतीं। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लुटियंस जोन के इंटीलेक्चुअल कदम कदम पर अपमान कर रहे हैं। यह समझे बिना कि वह आने वाले पीढ़ियों को दे क्या रहे हैं। भारत में रह कर भारत को गाली देकर प्रगतिशील का तमगा पाना आसान है। इससे रोजी रोटी भी चल जाती है। और सुर्खी भी मिल जाती है। दो दिन पहले ही मां दुर्गा के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के असस्टिेंट प्रोफेसर द्वारा किया गया अपशब्दों का प्रयोग कम से कम यही दिखाता है।
इंटीलेक्चुअल जमात की झल्लाहट का सार्थक पहलू यह है कि कम से कम एक ऐसा वर्ग विकसित हो रहा है देश में जो भारत को अपनी मां से बढ़कर मानता है। भक्त की संज्ञा को वह गाली नहीं मानता अपने लिए। वरन प्रसन्न होता है। मैं अपनी ही बात करूं। मेरे किसी ट्वीट को मृणाल जी रीट्वीट करतीं तो खुुशी होती, लेकिन मुझे ब्लाकित कर उन्होंने शायद ज्यादा खुशी दी है। जिसके लिए देश का अभिमान नहीं हो, उससे किसी तरह का रिश्ता नहीं होना चाहिए। यह मेरा निजी मत है। बचपन में स्कूल में प्रार्थना करता था--वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जाऊं। इसी प्रार्थना की पंक्ति थी, जिस देश जात में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जाऊं। खुशी है कि अपने स्तर पर जो बन पड़ रहा है कर रहा हूं।  लोकतंत्र व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर हूं मैं, लेकिन मुझे महात्मा गांधी का यह वाक्य भी याद आता है कि अपने घर के दरवाजे और खिड़की इस तरह नहीं खोलना चाहिए कि तूफान हर चीजों को उड़ा ले जाए। खुशी इस बात की है कि राष्ट्रधर्म मानने वाले मुखर हो रहे हैं। अच्छा बुरा समझते हुए। पत्रकार कामरेड गौरी लंकेश की हत्या के बाद प्रेस क्लब में जो कुछ हुआ। वह ठीक था। निंदा की जानी चाहिए थी। की गई। लेकिन इसमें सियासी चेहरों की मौजूदगी क्यों थी, क्या यह सही थी अथवा गलत। समाचार 4 मीडिया ने इस सवाल पर रायशुमारी कराई। इसमें भाग लेने वाले ज्यादातर पत्रकार ही थे, उनमें 80 फीसद से ज्यादा ने कहा --गलत। यही भाव आश्वस्ति देता है मेरे जैसे वैशाखनंदन को। मृणाल जी सुन रही हैं ना।।। 

रविवार, 17 सितंबर 2017

बाढ़े पूत पिता के धरमे...


नमस्कार। गुजरे सप्ताह में एक बड़ी खुशी मिली मुझे और मेरे परिवार को। यह थी परिवार में बढ़ी भू-संपत्ति। दरअसल अनुज दीपक ने वाराणसी में जमीन लिखा ली। ईश कृपा से अब जल्द ही उन पर लगा किराएदार का तमगा मिट जाएगा। वह अपने आशियाने में रहने लगेंगे। पिता जी की कृपा मानता हूं उन पर। दीपू की अभी उम्र है,साथ श्री और देव छोटे हैं इसलिए वह यथाशीघ्र बैंक लोन इत्यादि चुकता कर देंगे, ऐसा विश्वास है। बड़े भाई के रूप में मुझसे जो बन पड़ेगा, वह मदद तो करूंगा ही। दीपू ने कुछ पैसे मांगे थे, अभी नहीं दे सका हूं। पीएफ से कुछ पैसा निकालकर उन्हें जरूर दूंगा। आखिरकार मेरा अंशदान तो होना ही चाहिए। 
खैर इस प्रसंग का दो चार लोगों से जिक्र किया। रिश्तेदारों से। उनके मुंह से यही निकला, तुम तो बुद्धू ही रह गए। मैंने कहा क्यों, जवाब मिला-खुद कब तक किराए पर रहोगे। मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं है। इसकी वजह संभवत मेरा प्रारब्ध है। ऐसा नहीं है कि मैंने कभी अपने आशियाने के लिए प्रयास नहीं किया। जबलपुर में जब पिता जी रिटायर होने वाले थे, तब कोशिश की। भोपाल में नवभारत में काम के दौरान जिस मकान में रहते थे, उनके मालिक लखनलाल ने घर लिखा लेने के लिए कहा था। भरोसा दिलाया था कि धीरे धीरे कर पैसे चुका देना, लेकिन पिता जी गांव में आ गए थे। दीपू भी वहीं रहने लगे थे। अम्मा गुजर चुकी थीं, इसलिए घर के आसपास नौकरी करने की ठान चुका था और प्रयास सफल भी रहा। अमर उजाला वाराणसी में नौकरी भी मिल गई। गांव पास हो गया, लेकिन खुद का आशियाना दूर। काशी पत्रकार संघ की तरफ से चुप्पेपुर आवासीय कालोनी के लिए जब ड्रा होने का समय था, सोनभद्र तबादला हो गया। वाराणसी में तब पांच अथवा दस हजार रुपये का जुगाड़ नहीं हो सका कि ड्रा में शामिल हो गया होता। सोनभद्र जाने के बाद कुछ सहयोगियों ने जमीन खरीद लेने की सलाह दी, लेकिन तब गांव में घर बनवाना जरूरी समझा। कच्चा घर था। हमेशा डर बना रहता था हादसे का। गांव में घर बना, दीपू की शादी भी हो गई। समय चक्र बलवान बना रहा। मैं भी सोनभद्र से बलिया, फिर इलाहाबाद और रांची, जबलपुर वाराणसी होते हुए वापस इलाहाबाद आ गया। संस्थान बदला, लेकिन तकदीर नहीं बदली। खानाबदोशी भारी रही। जब भी दीपू और मेरी चर्चा हुई, किराए का घर जरूर रहा इसमें। मैं बाबू जी को कई बार इस बात की उलाहना देने से भी नहीं चूका कि क्यों नहीं उन्होंने जबलपुर में ही जमीन ले ली। रिटायरमेंट के बाद इतने पैसे तो मिले थे कि जबलपुर में ठीक ठाक जमीन ले ली गई होती। यदि वह जमीन होती तो आज शायद दोनों भाईयों के पास खानाबदोशी का ठप्पा नहीं लगा होता। जमाने की निगाह किराएदारों के प्रति हिकारत भरी होती है। मकान मालिक कहते हैं कि मकान बनवाना किसी बड़े यज्ञ से कम नहीं। अब मुझे लगता है कि हां वह सही हैं। महायज्ञ है। यह तभी संभव होता है जब बड़ों की पिता अथवा पितामह की किरपा हो। मुझ पर यह नहीं है। दीपू को मिली है। पितृपक्ष में पितर आए हैं इस बार। दीपू उनको भा गए। उन्हें वह कुछ देकर जा रहे हैं, मुझ पर कब मेहरबान होंगे, मैं नहीं जानता। आखिरी सांस शहर के अपने मकान में लूं, यह ख्वाहिश है, पर क्या यह पूरी होगी...देखिए।  

रविवार, 3 सितंबर 2017

अगले बरस तू जल्दी आ, खुशियां खुशियां देता जा...

नमस्कार।
सप्ताहांत पर फिर हाजिर हूं। इस बार देशकाल पर बात करने का कुछ ज्यादा मन नहीं है। फिर भी थोड़ा सा। रामरहीम सजा पा गए हैं अपने किए की। आज सुबह सुबह मोदी जी ने मंत्रिमंडल का तीसरा विस्तार भी कर लिया है और चीन चले गए हैं ब्रिक्स सम्मेलन में शिरकत करने। डोकलाम का गतिरोध खत्म हो गया है। भारत ने सेना हटा ली है वहां से और चीन ने सड़क निर्माण का इरादा छोड़ दिया है। पिछले सप्ताह मैंने लिखा था कि संक्षिप्त युद्ध हो सकता है, मेरा आकलन गलत रहा। खैर जो हुआ अच्छा हुआ। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ठीक ही कहा था कि युद्ध होता है तब भी शांति के लिए बात ही करनी पडे़गी। भारत ने सधी प्रतिक्रिया दी थी इस मसले पर। लड़ने भिड़ने वाली बात नहीं की। चीन को भी समझ में आ गया कि भारत अब 1962 वाला नहीं है। कश्मीर में आतंकवादियों पर प्रहार तथा पत्थरबाजी जारी है। अब  मुझे लगता है कि यह दौर भी धीमे धीमे खत्म हो जाएगा। अरुण जेटली का एक वाक्य मेरे लिए जीवन की कुंजी बन गया है कि समस्याएं कभी कभी अपना समाधान खुद ढूढ़ लेती है। यही शायद व्यक्तिगत, सार्वजनिक जीवन का फलसफा है।
भारत के पूर्वी हिस्से इन दिनों बाढ़ से बेहाल हैं, यूपी जापानी इंसेफ्लाइटिस से। पश्चिम में बाढ़ के साथ-साथ उत्सव है। इस उत्सव को गणेशोत्सव के नाम से हम जानते हैं। इस बार मैं देख रहा हूं कि इलाहाबाद और उसके आसपास भी गणेशोत्सव की धूम है। मूर्तियां स्थापित कर भक्तजन पूजा कर रहे हैं। मेरी भी ख्वाहिश रहती है कि मैं गणेशोत्सव के दौरान घर में मूर्ति स्थापित कर विधिवत पूजन अर्चन करूं। बचपन में जबलपुर में ब्योहारबाग के पीडब्ल्यूडी कालोनी में सार्वजनिक तौर पर होने वाली पूजा में बढ़ चढ़ कर शिरकत करता था, इसलिए भी शायद गणेशोत्सव की अमिट छाप है मुझ पर। शुभम् जब पेट में थे। तब मैंने मन ही मन कामना की थी कि पहली संतान पुत्र के रूप में हो। एक हजार रुपये चंदा दूंगा। शुभम हुए तो वादा निभाया। मनौती पूरी की। कालोनी की मूर्ति  विसर्जन के बाद खामोशी पसर जाती थी। इससे पहले 10 दिन तक आरती से लेकर ग्वारीघाट में मां नर्मदा के आंचल में बप्पा के विर्सजन तक धूम रहती थी। इसके बाद करीब दो दिन तो कुछ अच्छा ही नहीं लगता था। फिर धीरे धीरे जिदंगी रफ्तनी पकड़ती थी। यूपी में जब से हूं तब से ऐसी अनुभूति नहीं हुई। इलाहाबाद में एक बार प्रतिमा स्थापित की। बनारस में भी एक बार। किराए के घर में बंदिशें होती हैं, मनमाफिक पूजा अर्चना नहीं हो पाती, इसलिए इस बार इरादा त्याग दिया। अभी जिस मकान में हूं, वहां मन भी नहीं करता। न मेरा, न श्रृद्धा का। आज दफ्तर में था। सहयोगी आशुतोष तिवारी ने मुंबई के प्रभादेवी में स्थापित सिद्धि विनायक मंदिर से जुड़ा प्रसंग छेड़ दिया। कहा कि सच्चे मन से यहां की गई कोई आराधना निष्फल नहीं जाती। उन्होंने मुंबई में संपत्ति से जुड़े एक विवाद की जानकारी दी। कहा कि बात कोर्ट कचहरी तक जाने वाली थी, लेकिन जैसे ही वह अपने चाचा जी के साथ दर्शन पूजन कर निकले, मामला सेटल हो गया। सिद्धि विनायक की कृपा ही है यह। मुझे इससे नाइत्तेफाकी की कोई वजह नहीं दिखती। मैंने भी मन ही मन अपनी मनौती कर ली है। अब देखना यह है कि सिद्धि विनायक कब इसे पूरी करते हैं और कब मेरा मुंबई में जाकर उनके दर्शन की अभिलाषा पूरी होती है। खैर गजानन की कृपा मेरे परिवार पर रही है। पिता जी आज थोड़ा बहुत भी चल फिर ले रहे हैं तो उनकी ही कृपा है। दीपू को बैंकाक जाने का मौका मिला है। यह भी मेरे लिए खुशी का पल है। घर परिवार पर गणेश जी की कृपा बनी रहे।
संभवतः कल गणेशोत्सव का औपचारिक समापन हो जाएगा। लाल बाग के राजा समेत तमाम स्थानों पर भक्तों पर स्नेहाशीष बिखेरने के बाद बप्पा चले जाएंगे। अगले साल आएंगे, लेकिन जीवन के जरूरी तत्व जल में विसर्जित होने से पहले कितनी खुशियां देकर जाएंगे, इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। मैं तो कतई नहीं। बस शब्दों से उनसे मांग ही सकता हूं। मैं भी कुछ मांग रहा हूूं। दर्द फिल्म के इस गीत को गुनगुनाते हुए ...गणपित बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ। बस इसमें इतना और जोड़ दे रहा हूं कि मेरे परिवार, शुभेच्छुओं के लिए खुशियां देता जा.... ।
मुंबई के सिद्धि विनायक। 

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...