गुजरे सप्ताह एक रात टिवटर पर था। तारीख थी 17 सितंबर। विश्वकर्मा जयंती और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन। किसी रीट्वीट को देखा। उत्सुकता हुई उसे बांचने की। मूल ट्वीट मृणाल पांडे का था। उनका ट्वीट देख नहीं पाया। दरअसल उन्होंने मुझे ब्लाकित किया हुआ था। खैर कुछ ही देर में कुछ और टिवटरबाज मिल गए महान पत्रकार को आड़े हाथ लेते हुए। स्क्रीन शाट को भी उन्होंने इनसर्ट कर दिया था। मृणाल जी के टीएल पर दर्ज था -- जुमला जयंती पर आनंदित, पुलकित रोमांचित वैशाखनंदन। नीचे गधे की तस्वीर थी।
बता दूं कि वैशाखनंदन गधा का पर्यायवाची होता है। तुरंत समझ में आ गया कि मृणाल जी ने लक्षणा व्यंजना में प्रधानमंत्री को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने वालों को किस कदर इज्जत बख्शी है। पदमश्री सम्मानित पत्रकार/ साहित्यकार से ऐसी उम्मीद शायद ही किसी को होगी। मुझे तो बिल्कुल भी नहीं थी। समझ में गया कि मैडम फ्रस्टेशन की शिकार हैं। भले ही इन दिनों वह कहीं किसी पद पर नहीं हैं लेकिन पुराना दंभ तो है ही उनके पास। उनकी मानसकिता छिपी नहीं है। जिस शासन में वह उपकृत हुईं थी, उसका एहसान तो चुकाना ही था उन्हें।
सेक्युलर बिग्रेड की लंबरदार मृणाल जी का असली चेहरा सामने आया तो कई और बातें सामने आ गईं उनके बारे में। पटना में कभी हिंदुस्तान में कार्यरत एक सहयोगी की मीडिया जगत से जुड़ी वेबसाइट पर की गई टिप्पणी ने मेरे ज्ञान में इजाफा किया। इस सहयोगी ने बताया कि किसी समय वह पटना में कार्यरत थे। बतौर प्रधान संपादक मृणाल जी का एक लेख छपा। उस पर किसी पाठक ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी। पाठक के पत्र कालम में वह प्रतिक्रिया छापी गई। मृणाल जी ने सीधे तो कुछ नहीं कहा, हां यूनिट के जीएम ने जरूर इशारों इशारों में बता दिया कि प्रतिक्रिया नहीं छापी जानी चाहिए था। सेक्युलर खेमे के साथ दिक्कत यही है। उनको अपनी कहने का हक तो सबसे अहम लगता है, लेकिन प्रतिक्रिया को ग्रहण करने से हिचकते हैं वह। अभिव्यक्ति की आजादी क्या सिर्फ उनके लिए ही है। यह बड़ा सवाल है। जाहिर है इसका जवाब वह नहीं देंगे। भारत में इस समय अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा है... ऐसा शोर मचाने में वह सबसे आगे हैं, पर यह सच नहीं है। यदि ऐसा होता तो मृणाल पांडेय जी जैसी शख्सियत भारत के भक्तों को वैशाखनंदन नहीं बता देतीं। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लुटियंस जोन के इंटीलेक्चुअल कदम कदम पर अपमान कर रहे हैं। यह समझे बिना कि वह आने वाले पीढ़ियों को दे क्या रहे हैं। भारत में रह कर भारत को गाली देकर प्रगतिशील का तमगा पाना आसान है। इससे रोजी रोटी भी चल जाती है। और सुर्खी भी मिल जाती है। दो दिन पहले ही मां दुर्गा के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के असस्टिेंट प्रोफेसर द्वारा किया गया अपशब्दों का प्रयोग कम से कम यही दिखाता है।
इंटीलेक्चुअल जमात की झल्लाहट का सार्थक पहलू यह है कि कम से कम एक ऐसा वर्ग विकसित हो रहा है देश में जो भारत को अपनी मां से बढ़कर मानता है। भक्त की संज्ञा को वह गाली नहीं मानता अपने लिए। वरन प्रसन्न होता है। मैं अपनी ही बात करूं। मेरे किसी ट्वीट को मृणाल जी रीट्वीट करतीं तो खुुशी होती, लेकिन मुझे ब्लाकित कर उन्होंने शायद ज्यादा खुशी दी है। जिसके लिए देश का अभिमान नहीं हो, उससे किसी तरह का रिश्ता नहीं होना चाहिए। यह मेरा निजी मत है। बचपन में स्कूल में प्रार्थना करता था--वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जाऊं। इसी प्रार्थना की पंक्ति थी, जिस देश जात में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जाऊं। खुशी है कि अपने स्तर पर जो बन पड़ रहा है कर रहा हूं। लोकतंत्र व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर हूं मैं, लेकिन मुझे महात्मा गांधी का यह वाक्य भी याद आता है कि अपने घर के दरवाजे और खिड़की इस तरह नहीं खोलना चाहिए कि तूफान हर चीजों को उड़ा ले जाए। खुशी इस बात की है कि राष्ट्रधर्म मानने वाले मुखर हो रहे हैं। अच्छा बुरा समझते हुए। पत्रकार कामरेड गौरी लंकेश की हत्या के बाद प्रेस क्लब में जो कुछ हुआ। वह ठीक था। निंदा की जानी चाहिए थी। की गई। लेकिन इसमें सियासी चेहरों की मौजूदगी क्यों थी, क्या यह सही थी अथवा गलत। समाचार 4 मीडिया ने इस सवाल पर रायशुमारी कराई। इसमें भाग लेने वाले ज्यादातर पत्रकार ही थे, उनमें 80 फीसद से ज्यादा ने कहा --गलत। यही भाव आश्वस्ति देता है मेरे जैसे वैशाखनंदन को। मृणाल जी सुन रही हैं ना।।।
बता दूं कि वैशाखनंदन गधा का पर्यायवाची होता है। तुरंत समझ में आ गया कि मृणाल जी ने लक्षणा व्यंजना में प्रधानमंत्री को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने वालों को किस कदर इज्जत बख्शी है। पदमश्री सम्मानित पत्रकार/ साहित्यकार से ऐसी उम्मीद शायद ही किसी को होगी। मुझे तो बिल्कुल भी नहीं थी। समझ में गया कि मैडम फ्रस्टेशन की शिकार हैं। भले ही इन दिनों वह कहीं किसी पद पर नहीं हैं लेकिन पुराना दंभ तो है ही उनके पास। उनकी मानसकिता छिपी नहीं है। जिस शासन में वह उपकृत हुईं थी, उसका एहसान तो चुकाना ही था उन्हें।
सेक्युलर बिग्रेड की लंबरदार मृणाल जी का असली चेहरा सामने आया तो कई और बातें सामने आ गईं उनके बारे में। पटना में कभी हिंदुस्तान में कार्यरत एक सहयोगी की मीडिया जगत से जुड़ी वेबसाइट पर की गई टिप्पणी ने मेरे ज्ञान में इजाफा किया। इस सहयोगी ने बताया कि किसी समय वह पटना में कार्यरत थे। बतौर प्रधान संपादक मृणाल जी का एक लेख छपा। उस पर किसी पाठक ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी। पाठक के पत्र कालम में वह प्रतिक्रिया छापी गई। मृणाल जी ने सीधे तो कुछ नहीं कहा, हां यूनिट के जीएम ने जरूर इशारों इशारों में बता दिया कि प्रतिक्रिया नहीं छापी जानी चाहिए था। सेक्युलर खेमे के साथ दिक्कत यही है। उनको अपनी कहने का हक तो सबसे अहम लगता है, लेकिन प्रतिक्रिया को ग्रहण करने से हिचकते हैं वह। अभिव्यक्ति की आजादी क्या सिर्फ उनके लिए ही है। यह बड़ा सवाल है। जाहिर है इसका जवाब वह नहीं देंगे। भारत में इस समय अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा है... ऐसा शोर मचाने में वह सबसे आगे हैं, पर यह सच नहीं है। यदि ऐसा होता तो मृणाल पांडेय जी जैसी शख्सियत भारत के भक्तों को वैशाखनंदन नहीं बता देतीं। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लुटियंस जोन के इंटीलेक्चुअल कदम कदम पर अपमान कर रहे हैं। यह समझे बिना कि वह आने वाले पीढ़ियों को दे क्या रहे हैं। भारत में रह कर भारत को गाली देकर प्रगतिशील का तमगा पाना आसान है। इससे रोजी रोटी भी चल जाती है। और सुर्खी भी मिल जाती है। दो दिन पहले ही मां दुर्गा के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के असस्टिेंट प्रोफेसर द्वारा किया गया अपशब्दों का प्रयोग कम से कम यही दिखाता है।
इंटीलेक्चुअल जमात की झल्लाहट का सार्थक पहलू यह है कि कम से कम एक ऐसा वर्ग विकसित हो रहा है देश में जो भारत को अपनी मां से बढ़कर मानता है। भक्त की संज्ञा को वह गाली नहीं मानता अपने लिए। वरन प्रसन्न होता है। मैं अपनी ही बात करूं। मेरे किसी ट्वीट को मृणाल जी रीट्वीट करतीं तो खुुशी होती, लेकिन मुझे ब्लाकित कर उन्होंने शायद ज्यादा खुशी दी है। जिसके लिए देश का अभिमान नहीं हो, उससे किसी तरह का रिश्ता नहीं होना चाहिए। यह मेरा निजी मत है। बचपन में स्कूल में प्रार्थना करता था--वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जाऊं। इसी प्रार्थना की पंक्ति थी, जिस देश जात में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जाऊं। खुशी है कि अपने स्तर पर जो बन पड़ रहा है कर रहा हूं। लोकतंत्र व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर हूं मैं, लेकिन मुझे महात्मा गांधी का यह वाक्य भी याद आता है कि अपने घर के दरवाजे और खिड़की इस तरह नहीं खोलना चाहिए कि तूफान हर चीजों को उड़ा ले जाए। खुशी इस बात की है कि राष्ट्रधर्म मानने वाले मुखर हो रहे हैं। अच्छा बुरा समझते हुए। पत्रकार कामरेड गौरी लंकेश की हत्या के बाद प्रेस क्लब में जो कुछ हुआ। वह ठीक था। निंदा की जानी चाहिए थी। की गई। लेकिन इसमें सियासी चेहरों की मौजूदगी क्यों थी, क्या यह सही थी अथवा गलत। समाचार 4 मीडिया ने इस सवाल पर रायशुमारी कराई। इसमें भाग लेने वाले ज्यादातर पत्रकार ही थे, उनमें 80 फीसद से ज्यादा ने कहा --गलत। यही भाव आश्वस्ति देता है मेरे जैसे वैशाखनंदन को। मृणाल जी सुन रही हैं ना।।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें