रविवार, 12 जुलाई 2015

हैप्पी बर्थडे बाबू जी...

शुक्रवार को गांव में थे अपन। पिता जी का 80 वां जन्मदिन था। एकाकी जीवन जी रहे पिता जी के जन्मदिन पर शुभम -आयुष की मम्मी भी थीं मेरे साथ। मैंने तो अकेले ही जाने का कार्यक्रम बनाया था, पर पता नहीं कैसे क्या सूझा उन्हें, वह भी साथ हो लीं। साढ़े 11 बजे करीब इलाहाबाद से निकले और ठीक ढाई बजे अपने घर में थे। यात्रा सुखद ही रही। डर था उमस भरी गर्मी का, लेकिन कहते हैं कि ना कि जब दिल में अच्छी सोच हो तो सब अच्छा होने लगता है। इंद्रदेव भी मेहरबान हो गए। झूमकर बरसते रहे दिन और रात में। किशोरी मिष्ठान भंडार के गुलाब जामुन ने यदि दोपहर शानदार बनाई और शाम को झीसी (रिमझिम के बीच) पकौड़ों ने। अपने घर के बरामदे में पकौड़ों व चाय का जो स्वाद मिला, वह अद्वितीय था। पिता जी के चेहरे की खुशी इसे बढ़ा रही था। कह रहे थे कि जन्मदिन बच्चों का होता है, मेरा क्यों मना रहे हो। मैंने कहा, मना कहां रहा हूं। आप हैं तो इस अवसर का सेलीब्रेट कर ले रहा हूं।
पूछा- सुबह क्या बनाया था,..
बोले- खिच़ड़ी बन ली थी।  
मैंने कहा-चलिए शाम को पूड़ी हो जाएगी। 
शाम का परवल की सब्जी बनी। रसेदार। आलू-प्याज के साथ। आनंद आ गया। कभी तेज तो कभी रिमझिम बरसात के बीच यह डिश अनमोल लगी। मटर पनीर या किसी अन्य सब्जी की बदौलत। 
हां, इस संक्षिप्त यात्रा वृतांत की एक और बात। घर में लगी सोलर लाइट रात भर उजाला किए रही। काली -कजरारी रात हारती दिखी। अपन जागते रहे देर रात तक। श्रद्धा कब निदिया रानी के आगोश में समा गईं पता नहीं चला। सुबह आठ बजे करीब झकझोरा उन्होंने मुझे। बोलीं उठोगे नहीं क्या आज? मैंने कहा आज उठने का मन नहीं है। अभी सो लेने दो। सूर्यदेव को काले कजरारे मेघ निकलने नहीं दे रहे थे। वह जूझ रहे थे, लेकिन गांव के घर में चारों तरफ से आ रही हवाएं दिल खुश किए हुए थीं। बाहर बरामदे में डले तख्त पर चौड़ा हो गया। बाबू जी की चाय हो चुकी थी। करीब दस बजे उठा। इलाहाबाद वापस लौटने की बात मन में आते ही फिर दिल दुखी होने लगा। शाम चार बजे घर को छोड़ते समय यही लगा कि ई सुख छोर के परान कहां रहिहैं। लेकिन जीवन है तो ऐसे दुख भी होंगे। सुख के साथ-साथ। पिता जी साथ आए हैं।  बच्चों के साथ हैं। खुश हैं। मैं भी हूं। काश, ऐसा ही होता। वह हमेशा हमारे साथ रहें। पर किराए के मकान में वह बहुत दिन नहीं बिताते। कहते हैं गांव में अच्छा लगता है। मुझ पर उनकी सोच हावी हो रही है उम्र के इस पड़ाव में। बेटे जहां अपने-अपने काम से जुड़े, यानी उनका करियर शुरु हुआ रोजी-रोटी का मैं निश्चिंत हो जाऊंगा। ईश्वर इसमें मेरी मदद करेंगे। यही अभिलाषा है। 

शनिवार, 4 जुलाई 2015

गुजर-बसर की रामकहानी

सामाजिक आर्थिक व जातिगत जनगणना मेरे सामने है। इसमें एक तथ्य यह है कि गांवों में आज भी पांच हजार से कम में गुजारा हो रहा है। करीब 75 फीसद परिवार ऐसे ही बताए जा रहे हैं। शहरों में औसत आय कितनी है, यह आंकड़ा मुझे नहीं मिल सका है। मेरा अपना अनुमान है कि करीब 10 हजार रुपये होगी यह। इलाहाबाद में जहां मैं रह रहा हूं इन दिनों, वहां एक कमरा का न्यूनतम मकान किराया ही दो हजार रुपये है। कैसे गुजर बसर करते होंगे लोग इतनी रकम में, इसे समझ पाने में मैं नाकाम हूं। मैं अपनी बात करूं। मेरी तनख्वाह कट पिट कर करीब 28 हजार रुपये बैठती है। इसमें आठ हजार रुपये दो कमरों वाले उस अदद मकान के नाम पर निकाल देता हूं, जो कायदे से रहने लायक नहीं है। उसके बाद की गुजर बसर कैसे होती है, यह ऊपर वाले पर छोड़ देता हूं। यदि अभी भी पिता जी से समय -समय पर सहयोग नहीं मिले तो अनुमान ही लगा सकते हैं आप। बच्चों की फीस-दीगर खर्च के बाद कुछ नहीं बचता। कहने के लिए करीब दो दशक से पत्रकारिता में झक मार रहा हूं, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ है कि परिवार के साथ किसी थ्री स्टार में जाकर डिनर या लंच ले संकू। ढाबे में गए हुए भी सात साल की अवधि बीत चुकी है परिवार के साथ डिनर के नाम पर। सीबीएसई स्कूल में पढ़ते हैं छोटे चिरंजीव आयुष। जुलाई में ही बीस हजार रुपये की फीस बता रहे हैं। किताब कापी, यूनीफार्म जूते इत्यादि का खर्च अलग है। इसी महीने बड़े चिरंजीव शुभम लखनऊ जाएंगे अपने पांचवें सेमेस्टर के लिए। फीस का जुगाड़ तो लोन से हो जा रहा है उनका लेकिन और भी खर्चे होते हैं। खाने और रहने के लिए छत के नाम के। हर महीने पांच से छह हजार रुपये उन पर ही चले जा रहे हैं। कैंपस इंटरव्यू के लिए सूट की फरमाइश आ गई है उनकी तरफ से। राम जाने इसका इंतजाम कैसे हो पाएगा।
टेंट ढीली हो तो तनाव रहता है। तनाव होता है तो आप अपने दायित्वों को कायदे से नहीं निभा पाते। लेकिन सफल से सफलतम बने लोग यही नसीहत देते हैं कि हिम्मत न हारिए बिसारिए न हरि नाम। जेंहि विधि राखै राम, तैंहि विधि रहिए। सही हैं ऐसे नसीहत बाज। मैं भी यही सीख देता है दिल को बहलाने के लिए लेकिन जब कभी द्ररिदता को नुमाया करने वाली ऐसी रिपोर्ट्स से दो चार होता हूं तो तंतु झनझना जाते हैं शरीर के। इसलिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि अगला जनम कम से कम देव भूमि यानि भारत में नहीं देना। पाखंडियों, दोगलों से भरे इस देश में इंसान की कोई कीमत नहीं है। यहां प्रवचन बाज ही काफी हैं उल्लू बन कर हर साख पर बैठे हैं। गाल बजाने वाले यह लोग तरक्की करें, लेक्चर दें, सफल रहें।  

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...