रविवार, 28 मई 2017

खुशी मिली पर थोड़ी सी कम

आज खुश हूं थोड़ा। बेटे का रिजल्ट आ गया है। उसकी कल्पना जैसी थी, वैसा भले ही नहीं रहा, लेकिन मेरे लिए सुकून का सबब है रिजल्ट उसका। आखिर परिवार में अभी तक इंटरमीडिएट में किसी ने वह स्कोर नहीं किया है। आने वाली पीढि़यों में कोई इस स्कोर को पीछे छोड़ेगा, ऐसी कामना करता हूं। आयुष की जिद थी बायो ग्रुप से पढ़ना। उसने ऐसा ही किया। साइंस ग्रुप में वह टाप थ्री में है और बायो में टाप। रिजल्ट आने के बाद आज बता रहा था  कि एक साथी ने एग्जाम से पहले कहा था उससे कि स्कूल में नंबर पाते हो, बोर्ड में पाना तब बताना।
सीबीएसई बोर्ड में नंबर उदारता से मिलते हैं, ऐसा किसी ने कहा था मुझसे, लेकिन नतीजों से साफ हैं कि ऐसा है नहीं। मेधावी ही पाते हैं नंबर। अपन तो कभी पाए नहीं इतने नंबर। लेकिन कल्पना जरूर करते रहे कि ऐसा परिवार में होगा कभी। आयुष जहां पढ़ते हैं, अर्नी मेमोरियल सीनियर सेंकेड्री स्कूल इलाहाबाद में, वहां तमाम छात्र साठ फीसद से भी कम अंक लेकर आए हैं। उनके स्कूल में हाईएस्ट परसेंटाइल रहा है 91 फीसद। आयुष 85 फीसद के साथ दूसरे स्थान पर हैं। उन्हें इस बात से थोड़ी तकलीफ है। नाइंटी प्लस उनका लक्ष्य था। मैंने उन्हें दिलासा दी कि जितना भी है, उससे अब संतोष करो। एग्जाम के दिनों में नर्वस हो जाते थे। इस बार पहला पर्चा अंग्रेजी का था। देकर आए तो चेहरा लाल था। बोले टाइम मैनेजमेंट नहीं कर सका। बायोलाजी में उन्हें अच्छे स्कोर की उम्मीद थी। नब्बे मिला है, लेकिन उन्हें लगता है कि कम है। केमेस्ट्री में भी यही लगता है उन्हें कि यहां अच्छा किया जा सकता था। फिजिक्स में अपने स्कोर से खुश हैं वह। मैंने वाराणसी में बाबू जी व दीपू को फोन पर बताया तो उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आशीर्वाद दिया। श्री और देव भी खुश हैं। श्री पूछ रही थी -बड़े पापा-आयुष भइया पास हो गया। मैंने कहा हां तो फोन पर ही चहकने लगी। आयुष व श्री एक दूसरे के दुलारे हैं। देव अभी पांच साल के हैं ज्यादा नहीं समझ पाते लेकिन खुश वह भी होंगे। शुभम के लिए भी खुशी ही है। उनके भाई ने उनसे बेहतर जो किया है।
परिवार में पढ़ने लिखने वाले सभी थे, एक मैं ही अनपढ़ रहा हूं। अपने  मार्क्स किसी को बता नहीं सकता। इसलिए आज जो कुछ भी मिला है उसे बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद ही मानता हूं। आखिर कहा ही गया है बाढ़े पूत पिता के धर्मे। शुभम, आयुष, श्री और देव का जीवन इसी तरह की खुशियों से भरा रहे, यही कामना है। आज बस इतना ही।   

रविवार, 21 मई 2017

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

सप्ताह गुजर गया। बाबू जी की हालत में थोड़ा सुधार दिखा है, लेकिन अब भी उनका चलना फिरना बंद है। छोटे भाई दीपू ने बताया है कि पैर तो हिल रहा है, लेकिन वह साहस नहीं जुटा पा रहे हैं।  मुझे लगता है कि  उनकी कमजोरी मानसिक  ज्यादा है। जब पैर में मूवमेंट है तो उन्हें चलना चाहिए, लेकिन पता नहीं क्यों, वह जोखिम नहीं ले रहे हैं। संभवतः वह हम सबकी परीक्षा ले रहे हैं। उनके पिता जी ने भी ऐसी ही परीक्षा ली थी।
हमारे खान दान का यह पुश्तैनी चलन है क्या? इसका उत्तर समय पर छोड़ देता हूं। हां अपने और अपनी आने वाली संततियों के लिए ईश्वर से यह कामना जरूर करता हूं कि वह हमें इस हालत में कभी नहीं लाए।
बीमारी। बड़ी खराब चीज है यह। जो बीमार हो वह तो होता ही है, दूसरे भी परेशान हो जाते हैं। खासकर मेरे जैसे इमोशनल व्यक्ति के लिए तकलीफ बढ़ जाती है। दफ्तर में हूं अथवा घर में। अज्ञात भय सताता है। पता नहीं क्या होगा? इस बार हम सब गर्मियों में गांव में कुछ निर्माण कराने की तैयारी में थे, लेकिन विधि का विधान पता नहीं था। आखिर किसे पता होता है विधि का विधान।
चिकित्सक कह रहे हैं कि आपरेशन अंतिम विकल्प है। यह जोखिम भरा है। बाबू जी को जाने क्यों यह बात समझ नहीं आ रही है। यदि आपरेशन के बाद भी बात नहीं बनी तब? यह सवाल कठिन है। इसका जवाब मैं नहीं दे सकता। अब तो यही मान कर चल रहा हूं कि जो भी होगा, उसे सिर माथे लेना पड़ेगा। और कोई कर भी क्या सकता है। वैसे पिता जी यदि चलने फिरने लगते हैं, कम से कम इस लायक हो जाते हैं कि लैट्रिन बाथरूम खुद से जा सकें तो उन्हें अपने पास ही रखूंगा। भले ही दिन भर गरियाएं। जब तक जियें गरिया लें। यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। और तो कुछ दे नहीं सके हैं वह। श्राप -गाली जो कुछ उनके पास है, वही दे दें। जिंदगी किराए के घर में कट गई। प्राइवेट नौकरी में इतना पैसा नहीं जुटा पाया कि अपने लिए दो कमरे का फ्लैट ही कहीं बना लेता। जब मौका था तब चेता नहीं जब चेता तो पैसा नहीं। बेटे शुभम आयुष किसी लाइन से लग जाएं तो चिंता दूर हो जाए। बस यही चाहता हूं अब। मैं तो इतना ही जानता हूं कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। इसलिए अपने मन को सबल बन रहा हूं।

रविवार, 14 मई 2017

दुआओं की है जरूरत, देंगे ना

आपका यह सप्ताह शुभ हो। यही कामना है। मेरे लिए दुआ करें। यह चाहत है। दरअसल गुजरे सप्ताह के घटनाक्रम से चिंतित हूं। बीते सोमवार यानि आठ मई की  सुबह 10 बजे थे। छोटे भाई दीपू का फोन आया--बाबू जी बीमार हो गए हैं भइया। आप पास में हैं देख लें। संयोग वश मैंने अवकाश ले रखा था, इसदिन। गांव के पड़ोसी लखपति की शादी में जाने की तैयारी कर रहा था। शाम को गांव जाने का प्रोग्राम था। तुरंत भागा। करीब दो बजे घर पहुंचा तो पिता जी बरामदे में तख्त पर लेटे थे। बाहर थी तपती धूप, उमस । बिना कुछ खाए पिए थे बाबू जी। पूछा तो बताया कि सुबह से बायां पैर काम नहीं कर रहा है। जैसे तैसे नहाया हूं। खाना नहीं बना सका। इलाहाबाद से निकलते वक्त सब्जी पराठा रख लिया था। उन्हें खाने के लिए दिया। बमुश्किल दो पराठा ही वह खा सके। बाकी सब गाय को देना पड़ा। इतना होने तक एंबुलेंस आ चुकी थी।प्रतापगढ़ कार्यालय के सहयोगी रमेश त्रिपाठी ने मदद की थी। तीन बजे हम घर से निकले। आधे घंटे के भीतर प्रतापगढ़ जिला अस्पताल में थे। वहां बताया गया कि पैरालिसिस का आंशिक अटैक हुआ है। मुझसे पूछा गया कि क्या रेफर कर दें, मैंने पिता जी की इच्छा जाननी चाही। पूछा क्या यहीं (प्रतापगढ़) में भर्ती करवा दूं। वर्ष 2004-05 का उनका अनुभव अच्छा नहीं था। सो तुरंत बोले, यहां नहीं। तय हुआ कि इलाहाबाद में इलाज करवाऊं।
खैर एंबुलेंस से लेकर शाम साढ़े पांच बजे तक मोती लाल नेहरू मेडिकल कालेज के स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल पहुंच गया। लाल बत्ती में। लालबत्ती यानि इमरजेंसी। यहां से मेडिसिन की आइसीयू में। प्रशिक्षु डाक्टरों ने अपना ज्ञान उड़ेलना शुरू किया। आनन फानन करीब पांच सौ की जांच। खून इत्यादि की। दवा कुछ नहीं। हाथ में इंजेक्शन के लिए व्यवस्था की गई। करीब आठ बजे वार्ड 10 में भेजे गए। जनरल वार्ड का बिस्तर मिला 18 नंबर। यहां उमस से बैठना मुहाल था। तीन बिस्तर आगे खाली थे, लेकिन सिस्टर (नर्स) ने फरमान सुनाया, यह बिस्तर रिजर्व हैं बजाज मैडम के लिए। संभवतः वह कोई डाक्टर हैं। उनके पेंशेट्स के लिए बिस्तरों का आरक्षण। पिता जी कभी कभी जाली मूड में होते हैं। व्यंगात्मक लहजे में बोले-जनरल में भी रिजर्वेशन? धन्य हो मोदी जी।
प्राइवेट वार्ड में भी बेहाल
इलाहाबाद कार्यालय में सहयोगी शरद द्विवेदी ने स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल के चिकित्सक डा. करूणाकर द्विवेदी से बात कर ली थी। मैंने शरद से आग्रह किया था कि कम से कम एकाध प्राइवेट रूम दिलवा दें। जो भी रेट तय होगा, भुगतान कर दूंगा। पिता जी के नाम से न्यू प्राइवेट वार्ड का कक्ष क्रमांक 1/2 आवंटित था। यह खुलवाया गया तो वहां का एयरकंडीशन खामोश मिला। अटेंडेंट ने दूसरा कक्ष दिया 1/11। इसमें पंखा था, दीवारों में सीलन था। फ्लश, वाश बेसिन टूटे हुए थे। मरता क्या नहीं करता की तर्ज पर इसमें शरण ली। मेडिसिन वाले डाक्टर आए। कुछ जांच लिखी, चले गए। अगले दिन डा. मनोज माथुर के निर्देशन में इलाज शुरू हुआ। सहृदय डाक्टर हैं वह। उन्होंने न्यूरो, आर्थो स्पेशलिस्ट से राय लेने की एडवाइज दी। न्यूरो स्पेशलिस्ट ने आर्थो वाले को दिखाने की सलाह दी। आर्थो स्पेशलिस्ट डा. वर्मा ने देखा और बता दिया कि पुरानी चोट है। कूल्हे की। आपरेशन के बिना बात नहीं बनेगी।
प्लेन से जाइए और क्या
गुरुवार शाम चार बजे के बाद पिता जी को देखने आए थे डा. वर्मा। अपने सहयोगी के साथ। तमाम सिफारिशें लगवाई थीं इसके लिए। मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. एसपी सिंह, जूनियर रेजीेडेंट डाक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डा. संतोष सिंह से लेकर हमारे सहयोगी शरद द्विवेदी तक का। डा. वर्मा ने डिजिटल एक्सरे की बात की। पिता जी ने कहा सर कैसे जा पाऊंगा, डा. वर्मा ने उपहास उड़ने वाले लहजे में कहा-प्लेन से जाइए। मैं बेबस था। कोई और मौका स्थान होता तो पता नहीं मैं क्या कर जाता? बहरहाल, खून का घूंट पीकर रह गया। जिस डाक्टर का ऐसा बिहेव हो, वह कैसे इलाज करता होगा, यह सोचकर हैरान हूं। स्वरूपरानी की बदहाली सुनी बहुत थी, लेकिन देखी पहली बार। छोटे भाई को बताया तो वह बोला, भइया मैं आ रहा हूं। बाबू जी का इलाज अब बनारस में होगा। जो होगा देखा जाएगा। शुक्रवार शाम वह आ गया। शनिवार को पिता जी को बनारस ले जाया गया। अभी बनारस में हैं छोटे भाई के घर। वहां बीएचयू के ट्रामा सेंटर में भर्ती के लिए कोई बिस्तर नहीं मिला। मेरी कोशिश बेकार ही रही है अब तक। वैसे अमर उजाला में कामकाज के दिनों में बलिया में मेरे सहयोगी रहे मुकेश श्रीवास्तव इन दिनों वाराणसी में हैं। दैनिक जागरण में ही। उन्होंने अपने स्तर से कोशिश की है। संभव है सोमवार को ट्रामा सेंटर में पिता एडमिट हो जाएं। इसके बाद तय होगा कि पिता जी  आपरेशन कब होगा? डा. संजय मारवाह (वाराणसी) ने भी आपरेशन की ही सलाह दी है। उम्मीद थी कि उनके इंजेक्शन से काम सध जाएगा, आपरेशन की नौबत नहीं आएगी, लेकिन निराशा ही हाथ लगी है।
बाबा विश्वनाथ पर एतबार
पिता जी वाराणसी से स्वस्थ होकर लौटेंगे, इसका विश्वास है मन में। भले ही कुछ आशंकाए भी हों। विश्वास इसलिए है क्योंकि बाबा विश्वनाथ विराजते हैं वहां। बाबा को कुछ अच्छा करना चाहिए। आखिर अपने शरणागत पर वह कृपा करते रहे हैं। इसके साथ ही मुझे आपकी दुआएं भी चाहिए। आप सब भी तो उनके अंश हैं। 

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...