आज खुश हूं थोड़ा। बेटे का रिजल्ट आ गया है। उसकी कल्पना जैसी थी, वैसा भले ही नहीं रहा, लेकिन मेरे लिए सुकून का सबब है रिजल्ट उसका। आखिर परिवार में अभी तक इंटरमीडिएट में किसी ने वह स्कोर नहीं किया है। आने वाली पीढि़यों में कोई इस स्कोर को पीछे छोड़ेगा, ऐसी कामना करता हूं। आयुष की जिद थी बायो ग्रुप से पढ़ना। उसने ऐसा ही किया। साइंस ग्रुप में वह टाप थ्री में है और बायो में टाप। रिजल्ट आने के बाद आज बता रहा था कि एक साथी ने एग्जाम से पहले कहा था उससे कि स्कूल में नंबर पाते हो, बोर्ड में पाना तब बताना।
सीबीएसई बोर्ड में नंबर उदारता से मिलते हैं, ऐसा किसी ने कहा था मुझसे, लेकिन नतीजों से साफ हैं कि ऐसा है नहीं। मेधावी ही पाते हैं नंबर। अपन तो कभी पाए नहीं इतने नंबर। लेकिन कल्पना जरूर करते रहे कि ऐसा परिवार में होगा कभी। आयुष जहां पढ़ते हैं, अर्नी मेमोरियल सीनियर सेंकेड्री स्कूल इलाहाबाद में, वहां तमाम छात्र साठ फीसद से भी कम अंक लेकर आए हैं। उनके स्कूल में हाईएस्ट परसेंटाइल रहा है 91 फीसद। आयुष 85 फीसद के साथ दूसरे स्थान पर हैं। उन्हें इस बात से थोड़ी तकलीफ है। नाइंटी प्लस उनका लक्ष्य था। मैंने उन्हें दिलासा दी कि जितना भी है, उससे अब संतोष करो। एग्जाम के दिनों में नर्वस हो जाते थे। इस बार पहला पर्चा अंग्रेजी का था। देकर आए तो चेहरा लाल था। बोले टाइम मैनेजमेंट नहीं कर सका। बायोलाजी में उन्हें अच्छे स्कोर की उम्मीद थी। नब्बे मिला है, लेकिन उन्हें लगता है कि कम है। केमेस्ट्री में भी यही लगता है उन्हें कि यहां अच्छा किया जा सकता था। फिजिक्स में अपने स्कोर से खुश हैं वह। मैंने वाराणसी में बाबू जी व दीपू को फोन पर बताया तो उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आशीर्वाद दिया। श्री और देव भी खुश हैं। श्री पूछ रही थी -बड़े पापा-आयुष भइया पास हो गया। मैंने कहा हां तो फोन पर ही चहकने लगी। आयुष व श्री एक दूसरे के दुलारे हैं। देव अभी पांच साल के हैं ज्यादा नहीं समझ पाते लेकिन खुश वह भी होंगे। शुभम के लिए भी खुशी ही है। उनके भाई ने उनसे बेहतर जो किया है।
परिवार में पढ़ने लिखने वाले सभी थे, एक मैं ही अनपढ़ रहा हूं। अपने मार्क्स किसी को बता नहीं सकता। इसलिए आज जो कुछ भी मिला है उसे बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद ही मानता हूं। आखिर कहा ही गया है बाढ़े पूत पिता के धर्मे। शुभम, आयुष, श्री और देव का जीवन इसी तरह की खुशियों से भरा रहे, यही कामना है। आज बस इतना ही।
सीबीएसई बोर्ड में नंबर उदारता से मिलते हैं, ऐसा किसी ने कहा था मुझसे, लेकिन नतीजों से साफ हैं कि ऐसा है नहीं। मेधावी ही पाते हैं नंबर। अपन तो कभी पाए नहीं इतने नंबर। लेकिन कल्पना जरूर करते रहे कि ऐसा परिवार में होगा कभी। आयुष जहां पढ़ते हैं, अर्नी मेमोरियल सीनियर सेंकेड्री स्कूल इलाहाबाद में, वहां तमाम छात्र साठ फीसद से भी कम अंक लेकर आए हैं। उनके स्कूल में हाईएस्ट परसेंटाइल रहा है 91 फीसद। आयुष 85 फीसद के साथ दूसरे स्थान पर हैं। उन्हें इस बात से थोड़ी तकलीफ है। नाइंटी प्लस उनका लक्ष्य था। मैंने उन्हें दिलासा दी कि जितना भी है, उससे अब संतोष करो। एग्जाम के दिनों में नर्वस हो जाते थे। इस बार पहला पर्चा अंग्रेजी का था। देकर आए तो चेहरा लाल था। बोले टाइम मैनेजमेंट नहीं कर सका। बायोलाजी में उन्हें अच्छे स्कोर की उम्मीद थी। नब्बे मिला है, लेकिन उन्हें लगता है कि कम है। केमेस्ट्री में भी यही लगता है उन्हें कि यहां अच्छा किया जा सकता था। फिजिक्स में अपने स्कोर से खुश हैं वह। मैंने वाराणसी में बाबू जी व दीपू को फोन पर बताया तो उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आशीर्वाद दिया। श्री और देव भी खुश हैं। श्री पूछ रही थी -बड़े पापा-आयुष भइया पास हो गया। मैंने कहा हां तो फोन पर ही चहकने लगी। आयुष व श्री एक दूसरे के दुलारे हैं। देव अभी पांच साल के हैं ज्यादा नहीं समझ पाते लेकिन खुश वह भी होंगे। शुभम के लिए भी खुशी ही है। उनके भाई ने उनसे बेहतर जो किया है।
परिवार में पढ़ने लिखने वाले सभी थे, एक मैं ही अनपढ़ रहा हूं। अपने मार्क्स किसी को बता नहीं सकता। इसलिए आज जो कुछ भी मिला है उसे बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद ही मानता हूं। आखिर कहा ही गया है बाढ़े पूत पिता के धर्मे। शुभम, आयुष, श्री और देव का जीवन इसी तरह की खुशियों से भरा रहे, यही कामना है। आज बस इतना ही।