रविवार, 28 फ़रवरी 2016

देशबंधु से नवभारत का सफर

देशबंधु की पत्रकारिता उम्दा स्तर की थी। शाब्दिक दोष अपवाद स्वरूप ही होते थे। नई दुनिया का बहुत असर था यहां। उस दौर में नई दुनिया में हम कोई शब्द गलत ढूढ़ते थे तो गदगद होते थे। अब ऐसा नहीं है। हिंदी आए न आए। जो मन में हो लिख दें। कोफ्त होती है ऐसी पत्रकारिता पर। इस संस्थान में सीखने के लिए बहुत कुछ था। खास तौर पर वरिष्ठों का सानिध्य। प्रकाश राय, राजेश पांडेय, शिवकुमार तिवारी, श्याम कटारे, राजेश उपाध्याय, निशांत शर्मा जैसे चेहरे थे। संस्कारधानी जबलपुर की पत्रकारिता में नाम था उनका। खबरों के चयन, संपादन, प्रस्तुतीकरण में हर दिन कुछ न कुछ नया सीखता था। साथी संजय सोनी, मदन गर्ग का नामोल्लेख न करूं तो यहां बिताए गए दिनों के साथ शायद न्याय नहीं करूंगा।  सतना में महेश महदेले थे। तमाम नाम विस्मृत होने लगे हैं अब। 
मेरे साथ यहां छायाकार के रूप में काम करने वाले आनंद मनोध्या ने एक बार मेरी बहिन बेबी (किरण) की तस्वीर दीपावली के एक दिन पहले खींची थी, दीपों के साथ।  कटारे सर ने उसमें कैप्शन लगाया था। उम्दा था वह कैप्शन। यह अखबार मैं काफी समय तक रखे हुए था, लेकिन अब यह गुम गया है। पहले पेज पर चार कालम में तस्वीर लगी थी। इसी अखबार में सुगन जाट भी थे छायाकार के रूप में। ब्लैक एंड व्हाइट के जमाने में उनकी तस्वीरें ऐसी होती थीं कि अंग्रेजी अखबारों के फोटोग्राफर भी कई बार पानी पीते नजर आते थे। मुझे याद है उनकी एक तस्वीर। हुआ यह था कि मप्र के मुख्यमंत्री के रूप में अर्जुनसिंह जबलपुर आए थे। डमुना विमानतल पर उतर रहे थे। नीचे काफी भीड़ थी। एक कांग्रेसी उन्हें गुलदस्ता थमा रहा था और अर्जुनसिंह विमान के बाहर निकल रहे थे। तस्वीर में विमान, अर्जुनसिंह का चेहरा, गुलदस्ता और लोगों के सिर ही दिखाई दे रहे थे। इसी अखबार में मुझे पहले पेज पर एंकर के रूप में पहली बार छपने का मौका मिला। साथ ही संपादकीय पेज पर भी। संपादकीय पेज पर पहली बार कौन सा लेख छपा था, यह तो याद नहीं। अलबत्ता उस वक्त जितनी खुशी हुई थी, उतनी कभी नहीं हुई। खुद को बौद्धिक मानने का भ्रम और फैला लिया। यह जस का तस है। भारत में पहली बार हुई मिस युनिवर्स प्रतियोगिता पर विशेषांक भी निकाला था यहीं पर। दूसरे अखबार खासकर नवभारत, भास्कर को ही प्रतिद्वंद्वी मानता था उस दौर में। पहले पेज के ले आउट, खबरों के चयन को लेकर जूझता था। होड़ होती थी। क्या मैंने किया है क्या दूसरे ने। जिस दिन लेटनाइट की कोई खबर छूट जाती थी, दुख होता था और जिस दिन बढ़त लिए होते थे, अजीबोगरीब खुशी होती थी। यह दौर वर्ष 1995 तक निर्वाध गति से चला। देशबंधु में ही काम करते-करते कोटा मुक्त विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल कर ली। पनचानबे में ही अरविंद बिंजोलकर, विनय गुप्ता इत्यादि आ गए। अरविंद ने माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में ही स्नातकोत्तर कर लेने की सलाह दी। उनके साथ एग्जाम भी दे आए और सिलेक्ट हो गए। इसी साल मां गोलोकवासी हो गईं। जब एडमिशन लेना था तो गांव में उनकी तेरहवीं थी। खैर एडमिशन हो गया। देशबंधु में जिस पद पर था, उसी हैसियत से भोपाल तबादला हो गया। भोपाल में राजेश पांडेय पहले ही पहुंच थे, लेकिन वहां मन नहीं लगा। एक साल का कोर्स खत्म कर वापस जबलपुर आया तो पिता जी रिटायर हो चुके थे। देशबंधु में फिर काम करने की सोची, लेकिन वेतन को लेकर बात नहीं जमी। दरअसल जिम्मेदारियां बढ़ चुकी थीं। एक बेटे का बाप भी हो चुका था। सरकारी क्वाटर छूट गया था। किराए के मकान में रहने का मतलब था ज्यादा बोझ। देशबंधु की कमान इस दौर में गिरिराज चाचा के हाथ में थी। मैं साढ़े तीन हजार रुपये चाहता था, वह तीन हजार से अधिक देने के लिए तैयार नहीं थे। बस, मैंने तय कर लिया कि अब भोपाल चलना चाहिए। तत्कालीन दौर में वहां सर्वाधिक बिकने वाले अखबार नवभारत में महराज जी थे असल नियोक्ता। उन्होंने लिखित परीक्षा ली और इंटरव्यू लिया। पास हो गए। वेतन लगा 38 सौ रुपये। मुझे यह काफी समझ में आए। हां नौकरी कन्फर्म नहीं थी। अस्थायी थी। स्थायी किए जाने का भरोसा मिला था। दिसंबर 96 में जबलपुर छूट गया।  
नवभारत में पहुंचने से पहले एक और प्रसंग। बहिन की शादी 96 की गर्मियों में हुईं। पिताजी के रिटायरमेंट से एक महीने पहले। इसी समय राजस्थान पत्रिका से आफर आया था। कैलाश मिश्र संपादक थे वहां। मैंने गुलाब कोठारी को आवेदन भेजा था। वैवाहिक व्यस्तताओं की वजह से जा नहीं सका। यह मौका छूटने का अफसोस है। कहते हैं कि तकदीर रोज दरवाजा नहीं खटखटातीं। जब मौका मिले तो कैश कर लेना चाहिए।  

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

देशबंधु में सीखने के दिन -एक

देशबंधु। प्रगतिशील सोच रखने वालों का अखबार। संस्थापक संपादक मायाराम सुरजन। नवभारत में भी उन्होंने लंबा पत्रकारीय जीवन जिया था। धूप छांव के जरिए मैं इस तथ्य से भिज्ञ हुआ कि कालांतर में मतभेदों की वजह से उन्होंने अलग राह पर चलने की सोची। रायपुर से प्रकाशन आरंभ किया और देखते ही देखते मप्र का प्रमुख अखबार ( विचार और समाचार की दृष्टि से) बन गया। यहां मेरे पांच साल गुजरे। वर्ष 1991 से लेकर 1995 के दिसंबर तक। पहले दिन राजेश पांडेय के पास पहुंचा तो उन्होंने प्रकाश राय, शिवकुमार तिवारी , मुकुल दुबे से परिचय करवाने के बाद देवेंद्र सुरजन से मिलवाया। नौदराब्रिज पर दफ्तर था। नया-नया सेटअप। देवेंद्र जी ने संक्षिप्त परिचय जाना। फिर पूछा कब से आएंगे, मैंने कहा आज से ही। वह तारीख तो अब ठीक ठीक याद नहीं , लेकिन गर्मी के दिन थे। काम शुरू कर दिया। जून के पहले सप्ताह में इस संस्थान की पहली सैलेरी मिली। एकाउंटेंट ने प्यून को भेजा था मुझे बुलाने के लिए। शायद सात तारीख थी वह।  पैसों (सैलेरी) की कोई बात तय नहीं हुई थी। मैंने अपने आप ही तय कर ली थी सैलेरी। सोचा था कि पांच सौ रुपये तो मिल ही जाएंगे। इतना सांध्यबंधु में मिलने लगा था करीब डेढ़ साल में ही। जब सैलेरी मिली तो चकरा गया। यह 780 रुपये थे। मैं दंग। उम्मीद से अधिक मिलने पर मेरी हालत अंधे को मिठाई मिलने जैसी हुई। भागा-भागा बर्तन की दुकान पर गया। प्रेशर कुकर लिया पांच लीटर का। अम्मा को इसकी बहुत जरूरत थी। अंगीठी पर पतीले में दाल-चावल बनने में वक्त लगता था। साइकिल के करियर पर कुकर लेकर पहुंचा तो घर वाले अचरज में। नालायक बेटे ने पहली बार थोड़ा समझ का काम जो किया था। 
मैं अपना काम बताना भूल ही गया। राजेश पांडेय जी पहले पेज के इंचार्ज थे।  दिन में राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय खबरों वाले पेज बनते थे। विभा मिश्र देखती थीं यह काम। प्रारंभ में मेरी ड्यूटी सेकेंड नाइट की थी। यानि रात आठ बजे से टेलीप्रिंटर पर गुड नाइट का संदेश आने तक। सेकेंड नाइट में मुकुल दुबे की सरपरस्ती मिली। वह जनरल डेस्क के इंचार्ज होते थे। राजेश उपाध्याय ( संप्रति आन लाइन एडीटर हिंदुस्तान, दिल्ली) सिटी रिपोर्टिंग टीम के इंचार्ज होते थे। उनकी ही टीम पेज भी लगवाती थी। इसमें थे संजय सोनी, मदन गर्ग। मेरी संजय सोनी व मदन गर्ग से जमने लगी। हम एक तिकड़ी कहलाते थे। रवि गौतम कंपोजिंग सेक्शन के इंचार्ज होते थे। पेस्टिंग होती थी डार्क रूम से निकली फिल्म की। राजेश पांडेय जी पहला पेज फाइनल कराने के बाद करीब 10 बजे चले जाते थे। मुकुल दुबे जी सानिध्य में मुझे आल्टर कराना पड़ता था, पहला पेज, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पेज। अंदर का एकाध पेज का पूरा जिम्मा था मेरे ऊपर। काम में आनंद आने लगा। आदरणीय प्रकाश राय , शिवकुमार तिवारी स्नेह देते रहे। इसी बीच राजेश पांडेय जी का तबादला कतिपय मतभेदों की वजह से भोपाल कर दिया गया। दरअसल देवेंद्र भइया ने परिवार में विवाद की वजह से रूचि लेनी बंद कर दी। उनके अनुज दीपक सुरजन जी के हाथ में कमान आ गई देशबंधु की। राजेश पांडेय के जाने के बाद मुकुल दुबे इंचार्ज हो गए जनरल डेस्क के। विधि स्नातक होने की वजह से वह हाईकोर्ट प्रतिनिधि भी थे। रिपोर्टिंग भी करते थे। उनके मन में कहीं न कहीं सिटी रिपोर्टिंग व डेस्क  टीम का इंचार्ज बनने की ख्वाहिश थी, ऐसा हो नहीं सका। वह फ्रस्टेशन में आने लगे। उनका विवाह भी काफी दिनों बाद हुआ। संभवतः 40 की  उम्र के बाद। बतौर जनरल डेस्क इंचार्ज उनके कामकाज से प्रबंधन खुश नहीं था। लगभग दो साल बाद श्याम कटारे भी हिस्सा हो गए देशबंधु के। वह नवीन दुनिया में बतौर संपादक काम करते थे। यहां भी उन्हें संपादक बतौर ही लाया गया था। प्रकाश राय स्कूल में टीचर भी थे, इसलिए प्रबंधन ने फुल फ्लैश संपादक की तलाश में उन्हें बुलाया था। कटारे जी के आने के बाद स्थितियां बदलीं। कुछ दिन पहले पेज पर मुझे उनका सानिध्य मिला फिर मैं ही जनरल डेस्क का इंचार्ज हो गया और मुकुल दुबे सेकेंड नाइट इंचार्ज। अब तक मेरी तनख्वाह दोगुनी हो गई थी करीब 18 सौ रुपये। 92-93 में यह सम्मानजनक मानी जाती थी। 
देशबंधु का एक और प्रसंग लिख कर आज अपनी बात को विराम दूंगा। वह प्रसंग तत्कालीन मालिकान के उदार हृदय का परिचय भी माना जा सकता है। हुआ यह था कि नौदराब्रिज पर मोहर्रम के मद्देनजर खूब रोशनी की गई थी। मैंने इसे खुशी का त्योहार समझ लिया और पहले पेज पर एजेंसी से आई खबर में शीर्षक लगा दिया --हर्षोल्लास से मनाया गया मोहर्रम। खबर छप गई। अगले दिन देवेंद्र सुरजन जी ने केबिन में बुलाया। पूछा तुमने हैडिंग लगाई थी, मैंने कह दिया हां। बोले भाई यह त्योहार गम का होता है...और कुछ नहीं। अलबत्ता राजेश पांडेय जी ने अपने अंदाज में ऐसी सीख दी कि आज तक नहीं भुला सका हूं। जब भी मोहर्रम आता है खुद पर हंसता हूं, अपने बचपने के लिए। इसी अखबार में कामकाज के दौरान एक दिन किसी खबर के लिए जगह नहीं मिल पा रही थी। मैं परेशान था। पेज लगाने वाले पेस्टर (नाम विस्मृत हो रहा है उनका) बोले, पांडेय जी, यह विज्ञापन हटा दें, मैंने कहा हां। 10 गुणे 2 का विज्ञापन था। हटा दिया। सुबह हंगामा मच गया। मुझे शाम को राजेश पांडेय ने इतनी ही नसीहत दी कि विज्ञापन कभी मत हटवाना। न उसकी भाषा ठीक कराना। कई बार लोग ऐसी भाषा लिखते ही हैं विज्ञापन में कि लोगों का ध्यान उस पर जाए।    

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

सांध्यबधु से देशबंधु

इस इतवार अब थोड़ा वक्त अपने ब्लाग को।  पिछले सप्ताह सांध्यबंधु की बात की थी। इस बार उसी सिलसिले को आगे बढ़ाऊंगा। सांध्यबंधु में न दिन पता चलते थे न रात। अखबार यूं तो शाम का था, लेकिन बहुत कुछ काम रात में भी होता था। यह क्रम लगभग डेढ़ से दो साल चला। अब ठीक ठीक याद भी नहीं है। यहां तमाम चीजें सीखीं। डीसी, टीसी, चार कालम, सिंगल कालम इत्यादि-इत्यादि। हैडिंग, सब हैडिंग, क्रासर, फ्लैग-लेआउट की प्रारंभिक कक्षाएं यहीं हुईं। इसी बीच कोटा मुक्त विश्वविद्यालय से पत्रकारिता के स्नातक कोर्स के लिए एप्लीकेशन भी कर दिया। ताकि थ्योरी का ज्ञान हो जाए। मन में यह था कि किसी जनसंपर्क एजेंसी से जुड़ जाऊंगा अथवा सरकारी विभाग में जनसंपर्क का काम मिल जाएगा। लेकिन यह नहीं हो सका। एकाध जगहों पर आवेदन भी किया, लेकिन पढ़ाई लिखाई का ट्रैक रिकार्ड गांधी छाप था, इसलिए  दाल नहीं गली। अलबत्ता यह भ्रम जरूर पाल बैठा कि दुनिया में काम करने वालों की कद्र नहीं होती। दुर्भाग्य से यह भ्रम आज भी नहीं टूटा है। खैर, सांध्यबंधु का अहम हिस्सा बन गया था। वहां कालांतर में पैसों को लेकर दिक्कत खड़ी होने लगी। नरेश वाजपेयी जी पैसों के लिए कारोबारी कदीर सोनी पर निर्भर थे, कदीर सोनी चाहते हुए भी खुद को मीडिया मुगल के रूप में विकसित नहीं कर सके। नरेश वाजपेयी जी को भी पत्र मालिक बनने का यह सफर ज्यादा रास नहीं आया। धीरे-धीरे मेरा मन भी उचटने लगा। इसी दौरान एक बार राजेश पांडेय जी दफ्तर में आए। वह देशबंधु में थे उन दिनों। उनका जबलपुर की पत्रकारिता में बड़ा नाम और सम्मान था। चलते चलते मुझे कह दिया क्या देशबंधु में आना चाहूंगा मैंने उनका सानिध्य पाने के लिए हां कह दी। गर्मी के दिन थे वह। जहां तक मुझे याद आता है मई का महीना था।  मैं देशबंधु में गया। कुछ बातें हुईं और मेरी भी एक सीट हो गई वहां। नौदराब्रिज में दफ्तर था। इससे पहले जब तक देशबंधु शहर में इविनिंगर था, मैं उसका सुधि पाठक था। शाम को कमल की पान की दुकान पर गुटखे के साथ अखबार बांच डालता। इसी अखबार में इसके संस्थापक संपादक मायाराम सुरजन का स्तंभ छपता था धूप छांव के दिन। हफ्ते में एक बार। मन लगाकर उसे पढ़ता और उनकी पत्रकारीय गाथा से प्रभावित होता। सोचता कि कितना त्याग करना पड़ता है कुछ बनने के लिए।
देशबंधु में जाने के बाद भी सांध्यबंधु परिवार से आत्मीय रिश्ता बना रहा। आज भी है, इन पंक्तियों को लिखते हुए। हो सकता है कि अब श्याम बिहारी सोनी कक्का, अतुल वाजपेयी, मुझे भूल गए हों, लेकिन मैं उन्हें नहीं भुला सका हूं। आखिर ककहरा तो उनके स्कूल में पढ़ा है ना।
आज सांध्यबंधु का यह प्रसंग खत्म करने से पहले कुछ और भी लिखना चाहता हूं इस पेज पर। आज दो तस्वीरें अटैच कर रहा हूं। माघ मेले में यह तस्वीरें खींची हैं दैनिक जागरण इलाहाबाद में हमारे सहयोगी छायाकार गिरीश श्रीवास्तव ने। एक तस्वीर में स्वामी ओइमानंद जी महराज अकेले हैं, दूसरे में मेरे और एसबीआई से वीआरएस ले चुके अंतू प्रतापगढ़ के आरएस पांडेय जी के साथ। पवित्र संगम पर लगे माघ मेले में स्वामी जी हैं, इस बार भी। पिछले साल उनके साथ था। इस बार भी हूं। इस बार स्वामी जी ज्यादा प्रफुलि्लत हैं। मेरे जैसे उनके शिष्य भी आल्हादित। दरअसल उनके शिविर के लिए सुविधाएं भी बढ़ गई हैं। इतनी ज्यादा कि अब जगह कम पड़ रही है। कल यानि सोमवार आठ फरवरी को मौनी अमावस्या है। मैं भी इस दिन सुरसरि में सपत्नीक डुबकी लगाकर इहलोक परलोक सुधारने का अभिलाषी हूं। ईश कृपा हुई तो जरूर मेले में रहूंगा। स्वामी जी का सत्संग मिलेगा।

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...