इस इतवार अब थोड़ा वक्त अपने ब्लाग को। पिछले सप्ताह सांध्यबंधु की बात की थी। इस बार उसी सिलसिले को आगे बढ़ाऊंगा। सांध्यबंधु में न दिन पता चलते थे न रात। अखबार यूं तो शाम का था, लेकिन बहुत कुछ काम रात में भी होता था। यह क्रम लगभग डेढ़ से दो साल चला। अब ठीक ठीक याद भी नहीं है। यहां तमाम चीजें सीखीं। डीसी, टीसी, चार कालम, सिंगल कालम इत्यादि-इत्यादि। हैडिंग, सब हैडिंग, क्रासर, फ्लैग-लेआउट की प्रारंभिक कक्षाएं यहीं हुईं। इसी बीच कोटा मुक्त विश्वविद्यालय से पत्रकारिता के स्नातक कोर्स के लिए एप्लीकेशन भी कर दिया। ताकि थ्योरी का ज्ञान हो जाए। मन में यह था कि किसी जनसंपर्क एजेंसी से जुड़ जाऊंगा अथवा सरकारी विभाग में जनसंपर्क का काम मिल जाएगा। लेकिन यह नहीं हो सका। एकाध जगहों पर आवेदन भी किया, लेकिन पढ़ाई लिखाई का ट्रैक रिकार्ड गांधी छाप था, इसलिए दाल नहीं गली। अलबत्ता यह भ्रम जरूर पाल बैठा कि दुनिया में काम करने वालों की कद्र नहीं होती। दुर्भाग्य से यह भ्रम आज भी नहीं टूटा है। खैर, सांध्यबंधु का अहम हिस्सा बन गया था। वहां कालांतर में पैसों को लेकर दिक्कत खड़ी होने लगी। नरेश वाजपेयी जी पैसों के लिए कारोबारी कदीर सोनी पर निर्भर थे, कदीर सोनी चाहते हुए भी खुद को मीडिया मुगल के रूप में विकसित नहीं कर सके। नरेश वाजपेयी जी को भी पत्र मालिक बनने का यह सफर ज्यादा रास नहीं आया। धीरे-धीरे मेरा मन भी उचटने लगा। इसी दौरान एक बार राजेश पांडेय जी दफ्तर में आए। वह देशबंधु में थे उन दिनों। उनका जबलपुर की पत्रकारिता में बड़ा नाम और सम्मान था। चलते चलते मुझे कह दिया क्या देशबंधु में आना चाहूंगा मैंने उनका सानिध्य पाने के लिए हां कह दी। गर्मी के दिन थे वह। जहां तक मुझे याद आता है मई का महीना था। मैं देशबंधु में गया। कुछ बातें हुईं और मेरी भी एक सीट हो गई वहां। नौदराब्रिज में दफ्तर था। इससे पहले जब तक देशबंधु शहर में इविनिंगर था, मैं उसका सुधि पाठक था। शाम को कमल की पान की दुकान पर गुटखे के साथ अखबार बांच डालता। इसी अखबार में इसके संस्थापक संपादक मायाराम सुरजन का स्तंभ छपता था धूप छांव के दिन। हफ्ते में एक बार। मन लगाकर उसे पढ़ता और उनकी पत्रकारीय गाथा से प्रभावित होता। सोचता कि कितना त्याग करना पड़ता है कुछ बनने के लिए।
देशबंधु में जाने के बाद भी सांध्यबंधु परिवार से आत्मीय रिश्ता बना रहा। आज भी है, इन पंक्तियों को लिखते हुए। हो सकता है कि अब श्याम बिहारी सोनी कक्का, अतुल वाजपेयी, मुझे भूल गए हों, लेकिन मैं उन्हें नहीं भुला सका हूं। आखिर ककहरा तो उनके स्कूल में पढ़ा है ना।
आज सांध्यबंधु का यह प्रसंग खत्म करने से पहले कुछ और भी लिखना चाहता हूं इस पेज पर। आज दो तस्वीरें अटैच कर रहा हूं। माघ मेले में यह तस्वीरें खींची हैं दैनिक जागरण इलाहाबाद में हमारे सहयोगी छायाकार गिरीश श्रीवास्तव ने। एक तस्वीर में स्वामी ओइमानंद जी महराज अकेले हैं, दूसरे में मेरे और एसबीआई से वीआरएस ले चुके अंतू प्रतापगढ़ के आरएस पांडेय जी के साथ। पवित्र संगम पर लगे माघ मेले में स्वामी जी हैं, इस बार भी। पिछले साल उनके साथ था। इस बार भी हूं। इस बार स्वामी जी ज्यादा प्रफुलि्लत हैं। मेरे जैसे उनके शिष्य भी आल्हादित। दरअसल उनके शिविर के लिए सुविधाएं भी बढ़ गई हैं। इतनी ज्यादा कि अब जगह कम पड़ रही है। कल यानि सोमवार आठ फरवरी को मौनी अमावस्या है। मैं भी इस दिन सुरसरि में सपत्नीक डुबकी लगाकर इहलोक परलोक सुधारने का अभिलाषी हूं। ईश कृपा हुई तो जरूर मेले में रहूंगा। स्वामी जी का सत्संग मिलेगा।
देशबंधु में जाने के बाद भी सांध्यबंधु परिवार से आत्मीय रिश्ता बना रहा। आज भी है, इन पंक्तियों को लिखते हुए। हो सकता है कि अब श्याम बिहारी सोनी कक्का, अतुल वाजपेयी, मुझे भूल गए हों, लेकिन मैं उन्हें नहीं भुला सका हूं। आखिर ककहरा तो उनके स्कूल में पढ़ा है ना।
आज सांध्यबंधु का यह प्रसंग खत्म करने से पहले कुछ और भी लिखना चाहता हूं इस पेज पर। आज दो तस्वीरें अटैच कर रहा हूं। माघ मेले में यह तस्वीरें खींची हैं दैनिक जागरण इलाहाबाद में हमारे सहयोगी छायाकार गिरीश श्रीवास्तव ने। एक तस्वीर में स्वामी ओइमानंद जी महराज अकेले हैं, दूसरे में मेरे और एसबीआई से वीआरएस ले चुके अंतू प्रतापगढ़ के आरएस पांडेय जी के साथ। पवित्र संगम पर लगे माघ मेले में स्वामी जी हैं, इस बार भी। पिछले साल उनके साथ था। इस बार भी हूं। इस बार स्वामी जी ज्यादा प्रफुलि्लत हैं। मेरे जैसे उनके शिष्य भी आल्हादित। दरअसल उनके शिविर के लिए सुविधाएं भी बढ़ गई हैं। इतनी ज्यादा कि अब जगह कम पड़ रही है। कल यानि सोमवार आठ फरवरी को मौनी अमावस्या है। मैं भी इस दिन सुरसरि में सपत्नीक डुबकी लगाकर इहलोक परलोक सुधारने का अभिलाषी हूं। ईश कृपा हुई तो जरूर मेले में रहूंगा। स्वामी जी का सत्संग मिलेगा।


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