देशबंधु। प्रगतिशील सोच रखने वालों का अखबार। संस्थापक संपादक मायाराम सुरजन। नवभारत में भी उन्होंने लंबा पत्रकारीय जीवन जिया था। धूप छांव के जरिए मैं इस तथ्य से भिज्ञ हुआ कि कालांतर में मतभेदों की वजह से उन्होंने अलग राह पर चलने की सोची। रायपुर से प्रकाशन आरंभ किया और देखते ही देखते मप्र का प्रमुख अखबार ( विचार और समाचार की दृष्टि से) बन गया। यहां मेरे पांच साल गुजरे। वर्ष 1991 से लेकर 1995 के दिसंबर तक। पहले दिन राजेश पांडेय के पास पहुंचा तो उन्होंने प्रकाश राय, शिवकुमार तिवारी , मुकुल दुबे से परिचय करवाने के बाद देवेंद्र सुरजन से मिलवाया। नौदराब्रिज पर दफ्तर था। नया-नया सेटअप। देवेंद्र जी ने संक्षिप्त परिचय जाना। फिर पूछा कब से आएंगे, मैंने कहा आज से ही। वह तारीख तो अब ठीक ठीक याद नहीं , लेकिन गर्मी के दिन थे। काम शुरू कर दिया। जून के पहले सप्ताह में इस संस्थान की पहली सैलेरी मिली। एकाउंटेंट ने प्यून को भेजा था मुझे बुलाने के लिए। शायद सात तारीख थी वह। पैसों (सैलेरी) की कोई बात तय नहीं हुई थी। मैंने अपने आप ही तय कर ली थी सैलेरी। सोचा था कि पांच सौ रुपये तो मिल ही जाएंगे। इतना सांध्यबंधु में मिलने लगा था करीब डेढ़ साल में ही। जब सैलेरी मिली तो चकरा गया। यह 780 रुपये थे। मैं दंग। उम्मीद से अधिक मिलने पर मेरी हालत अंधे को मिठाई मिलने जैसी हुई। भागा-भागा बर्तन की दुकान पर गया। प्रेशर कुकर लिया पांच लीटर का। अम्मा को इसकी बहुत जरूरत थी। अंगीठी पर पतीले में दाल-चावल बनने में वक्त लगता था। साइकिल के करियर पर कुकर लेकर पहुंचा तो घर वाले अचरज में। नालायक बेटे ने पहली बार थोड़ा समझ का काम जो किया था।
मैं अपना काम बताना भूल ही गया। राजेश पांडेय जी पहले पेज के इंचार्ज थे। दिन में राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय खबरों वाले पेज बनते थे। विभा मिश्र देखती थीं यह काम। प्रारंभ में मेरी ड्यूटी सेकेंड नाइट की थी। यानि रात आठ बजे से टेलीप्रिंटर पर गुड नाइट का संदेश आने तक। सेकेंड नाइट में मुकुल दुबे की सरपरस्ती मिली। वह जनरल डेस्क के इंचार्ज होते थे। राजेश उपाध्याय ( संप्रति आन लाइन एडीटर हिंदुस्तान, दिल्ली) सिटी रिपोर्टिंग टीम के इंचार्ज होते थे। उनकी ही टीम पेज भी लगवाती थी। इसमें थे संजय सोनी, मदन गर्ग। मेरी संजय सोनी व मदन गर्ग से जमने लगी। हम एक तिकड़ी कहलाते थे। रवि गौतम कंपोजिंग सेक्शन के इंचार्ज होते थे। पेस्टिंग होती थी डार्क रूम से निकली फिल्म की। राजेश पांडेय जी पहला पेज फाइनल कराने के बाद करीब 10 बजे चले जाते थे। मुकुल दुबे जी सानिध्य में मुझे आल्टर कराना पड़ता था, पहला पेज, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पेज। अंदर का एकाध पेज का पूरा जिम्मा था मेरे ऊपर। काम में आनंद आने लगा। आदरणीय प्रकाश राय , शिवकुमार तिवारी स्नेह देते रहे। इसी बीच राजेश पांडेय जी का तबादला कतिपय मतभेदों की वजह से भोपाल कर दिया गया। दरअसल देवेंद्र भइया ने परिवार में विवाद की वजह से रूचि लेनी बंद कर दी। उनके अनुज दीपक सुरजन जी के हाथ में कमान आ गई देशबंधु की। राजेश पांडेय के जाने के बाद मुकुल दुबे इंचार्ज हो गए जनरल डेस्क के। विधि स्नातक होने की वजह से वह हाईकोर्ट प्रतिनिधि भी थे। रिपोर्टिंग भी करते थे। उनके मन में कहीं न कहीं सिटी रिपोर्टिंग व डेस्क टीम का इंचार्ज बनने की ख्वाहिश थी, ऐसा हो नहीं सका। वह फ्रस्टेशन में आने लगे। उनका विवाह भी काफी दिनों बाद हुआ। संभवतः 40 की उम्र के बाद। बतौर जनरल डेस्क इंचार्ज उनके कामकाज से प्रबंधन खुश नहीं था। लगभग दो साल बाद श्याम कटारे भी हिस्सा हो गए देशबंधु के। वह नवीन दुनिया में बतौर संपादक काम करते थे। यहां भी उन्हें संपादक बतौर ही लाया गया था। प्रकाश राय स्कूल में टीचर भी थे, इसलिए प्रबंधन ने फुल फ्लैश संपादक की तलाश में उन्हें बुलाया था। कटारे जी के आने के बाद स्थितियां बदलीं। कुछ दिन पहले पेज पर मुझे उनका सानिध्य मिला फिर मैं ही जनरल डेस्क का इंचार्ज हो गया और मुकुल दुबे सेकेंड नाइट इंचार्ज। अब तक मेरी तनख्वाह दोगुनी हो गई थी करीब 18 सौ रुपये। 92-93 में यह सम्मानजनक मानी जाती थी।
देशबंधु का एक और प्रसंग लिख कर आज अपनी बात को विराम दूंगा। वह प्रसंग तत्कालीन मालिकान के उदार हृदय का परिचय भी माना जा सकता है। हुआ यह था कि नौदराब्रिज पर मोहर्रम के मद्देनजर खूब रोशनी की गई थी। मैंने इसे खुशी का त्योहार समझ लिया और पहले पेज पर एजेंसी से आई खबर में शीर्षक लगा दिया --हर्षोल्लास से मनाया गया मोहर्रम। खबर छप गई। अगले दिन देवेंद्र सुरजन जी ने केबिन में बुलाया। पूछा तुमने हैडिंग लगाई थी, मैंने कह दिया हां। बोले भाई यह त्योहार गम का होता है...और कुछ नहीं। अलबत्ता राजेश पांडेय जी ने अपने अंदाज में ऐसी सीख दी कि आज तक नहीं भुला सका हूं। जब भी मोहर्रम आता है खुद पर हंसता हूं, अपने बचपने के लिए। इसी अखबार में कामकाज के दौरान एक दिन किसी खबर के लिए जगह नहीं मिल पा रही थी। मैं परेशान था। पेज लगाने वाले पेस्टर (नाम विस्मृत हो रहा है उनका) बोले, पांडेय जी, यह विज्ञापन हटा दें, मैंने कहा हां। 10 गुणे 2 का विज्ञापन था। हटा दिया। सुबह हंगामा मच गया। मुझे शाम को राजेश पांडेय ने इतनी ही नसीहत दी कि विज्ञापन कभी मत हटवाना। न उसकी भाषा ठीक कराना। कई बार लोग ऐसी भाषा लिखते ही हैं विज्ञापन में कि लोगों का ध्यान उस पर जाए।
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