रविवार, 14 फ़रवरी 2021

जिंदगी यूं ही चलती रहे

बहुत दिन बाद आज कागद कारे कर रहा हूं। वर्ष 2021 की सबसे पहली पोस्ट है यह। इसे लिखते हुए बाबू जी को भूल जाऊं, यह हो नहीं सकता। बाबू जी हमारे बीच अब सशरीर नहीं हैं। उनकी यादें हैं, बातेंं हैं । पहली अक्टूबर 2020 को वह अनंत लोक में चले गए। हमें छोड़ कर। फिर भी बीते शुक्रवार को संगम में डुबकी लगाई तो एक उनके नाम से भी थी। जितनी भी गंगा में नहाया हूं, बाबू जी, अम्मा, बाबा, बड़की अम्मा (आजी) नाना, नानी और बुआ के नाम से भी डुबकी लगाई है। और भी जितने रिश्ते हैं खून के, उनके नाम से भी डुबकियां लगाई हैं सुरेश पांडे नामधारी शरीर ने। करूं क्या संस्कारों में यह मिला है। जब तक इन विभूतियों के आशीष से ऐसा सौभाग्य मिलता रहेगा, उनके नाम की डुबकी लगती रहेगी। यह बड़ा आत्मिक संतोष देती है। बाबू जी कहा करते थे कि संतोष से बड़ा धन कुछ नहीं है। सो उनकी सीख जीवन में उतार ली है, जो मिला उसके लिए भी ईश्वर को धन्यवाद देता हूं, जो नहीं मिला उसके लिए भी। जिंदगी यूं ही चलती रहेगी। ऐसा विश्वास है। ईश कृपा ही जीवन की गाड़ी सुगमता से चलाएगी। इसमें सुख भी होगा और दुख भी। 

बाबू जी जब तक सशरीर थे, गंगा स्नान के बाद उनसे फोन पर पैलगी कर लेता था। दूसरी तरफ से आशीष मिलता था। कहते थे भाग्य वाले हो-गंगा में डुबकी लगा लेते हो, माघ महीने में। वह भी गंगा में डुबकी लगाकर आल्हादित होते थे। पांच साल पहले उन्होंने डुबकी लगाई थी माघ मेले में। तीन रात गुजारी थी स्वामी जी के शिविर में। चलने मेंं तकलीफ थी। इसके बावजूद उत्साह से भरे थे। बहुत खुश थे। घर आए तो बोले -मन प्रसन्न हो गया। फिर आने का वादा किया था, लेकिन ईश्वर ने उनके पैरों की शक्ति छीन ली थी। बनारस में दीपू के निवास पर रहने लगे तो उतना ही चल फिर पाते थे, जितना दैनंदिनी के लिए जरूरी था। इधर जब मैं गंगा में नहाता और उन्हें पता चलता कि मैंने डुबकी लगा ली है तो खुश हो जाते थे। वाराणसी में जिस दिन उन्होंने आखिरी सांस ली, मैं उस मौके पर नहीं था। प्रयागराज से निकला जरूर, लेकिन उनकी पार्थिव देह से ही मुलाकात हुई। संतोष इसी बात का है कि जैसा भोपाल से वाराणसी आने के बाद मैंने कहा था, कुछ वैसा ही हुआ। पिशाच मोचन स्थित उमापति यादव के मकान में रहते समय एक बार मैंने कहा था कि बाबू जी आपकी आखिरी विदाई  महाश्मशान मणिर्काणिका घाट से ही होगी। संयोग देखिए कि वहीं उनकी पार्थिव देह पंचभूत में विलीन हुई। अंतिम समय में मैंने दीपू, शुभम व आयुष के साथ कंधा दिया। गंंगा में स्नान करा उनकी पार्थिव देह चिता पर रखी। फिर अस्थियां विसर्जित कीं। उसके बाद वाराणसी मेंं ही त्रयोदशाह कर्म हुआ और पैतृक गांव स्थित निवास में बरसी। उनकी कृपा ही थी कि सब कुछ निर्विघ्नता से पूर्ण हुआ। न सर्दी सताई न गर्मी। बरसी के लिए गांव पहुंचे तो वहां करीब छह माह से बंद पड़े घर में विषखोपड़ा भी निकला, लेकिन नुकसान नहीं हुआ। नवंबर से अब तक फिर गांव जाना नहीं हो सका है। माघ मेला खत्म होते ही फिर जाऊंगा। कहते हैं ना कि खाली घर शैतान का...। इसलिए जाना जरूरी है।  उसे शैतान का घर नहीं बनने दूंगा, जब तक सामर्थ्य है। अखबार की नौकरी में समय कहां मिलता है? लेकिन कोशिश जरूर रहेगी। आगे ईश्वर जानें। 

अब थोड़ी सी देश दुनिया की... 

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हार गए हैं। जोय बाइडन अब अमेरिका के राष्ट्रपति हैं। भारत को लेकर अमेरिकी नीति में क्या-क्या बदलाव आएंगे, यह बात देखने लायक होगी। समय धीरे धीरे इसे साफ करेगा। पाकिस्तान में विपक्षी दल इमरान खान की सत्ता के खिलाफ एकजुट हो चले हैं। वहां धरना प्रदर्शन जारी हैं। अपने भारत में कुछ किसान आंदोलित हैं नए कृषि कानून के विरोध में। यह आंदोलन बहुत लंबा खींचने का इरादा है। सरकार की तरफ से यह स्पष्ट किए जाने के बावजूद कि यह कानून वैकल्पिक है। जिसे मानना हो माने, जिसे नहीं मानना हो वह नहीं माने। इसके बावजूद जिस तरह की हठधर्मिता कथित किसानों की तरफ से दिखाई जा रही है, उससे साफ है कि इसके पीछे गहरी साजिश है। मैंने फेसबुक पर आशंका जताई थी कि 26 जनवरी को हिंसा होगी, किसान नेताओं ने जो वादा किया है, वह धरातल पर नहीं टिकेगा। सोनभद्र में राबर्टसगंज निवासी पत्रकार राजेंद्र द्विवेदी ने मेरी आशंका की हंसी यह कहते हुए उड़ाई थी कि जिन्होंने वादा किया है वह भगवाधारी नहीं हैं, इसलिए निश्चिंत रहें। दरअसल मैंने 1992 के कारसेवा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा था कि तब भी वादा कुछ ऐसा ही था, लेकिन जो हुआ वह इतिहास में दर्ज है। मैं अब इस बात पर गर्व महसूस कर सकता हूंं कि मैंने जो आकलन किया था वह सटीक निकला।  ज्योतिषविद मित्र अमित बहोरे ने मुझे बताया है कि मकर राशि में आठ सौ साल बाद केतु व शनि बैठे हैं, इसलिए उपद्रव होते रहेंगे अप्रैल तक। यू-ट्यूब पर सक्रिय एक और एस्ट्रोलाजर ने कुछ ऐसा ही कहा है। अतएव मैं यह मान कर चल रहा हूं कि इस अवधि तक आंदोलन जारी रहेगा।             

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