रविवार का दिन थोड़ा सुकून वाला होता है। चाहता हूं खूब अखबार पढ़ूं लेकिन इतना समय नहीं मिल पाता। वैसे हमारे और प्रतिद्वंदी अखबारों में आज बहुत कुछ है। हर पंक्ति हर वाक्य हर शब्द तो जेहन में समा नहीं पाता लेकिन कुछ बातें समा ही जाती हैं। आज भी ऐसा है। जाने माने स्तंभकार का कालम पढ़ा। हिंदी पत्रकारिता का श्लाका पुरूष मानता हूं उनको। हैंड कंपोजिंग के जमाने से लेकर डेस्कटाप और लैपटाप तक की पत्रकारिता और विचार के मोर्चे पर वह रोल माडल रहे हैं हमारे जैसे कई पत्रकारों के लिए। उनकी विचारधारा, अखबार की पालिसी से कई बार इत्तेफाक नहीं रख पाता लेकिन आज तसल्ली हुई। लगा कि खेमा, विचारधारा कुछ भी हो पत्रकारीय कलम कभी न कभी सच लिख ही देती है। यह आपको पसंद आए अथवा नापसंद।
तो मैं बात कर रहे थे लिखे हुए हर्फों की। यह हर्फ आज कोरोना के एक साल के इतिहास पर हैं। वाकई गुजरा साल हममें से तमाम लोगों के लिए किसी दुस्वप्न से कम नहीं रहा है। मेरे लिए तो पिता जी का देहावसान व्यक्तिगत क्षति है, तमाम लोगों ने किसी अपने को खोया है। कुछ लोगों ने पाया भी होगा, इससे इन्कार नहीं कर सकता। खैर, स्तंभकार ने अपने विश्लेषण में पाया है कि भारत की स्थितियों के मद्देनजर जो कुछ मार्च 2020 में किया गया, उसकी ही बदौलत हमारे देश मेंं स्थितियां बहुत कुछ नियंत्रित रहीं। 136 करोड़ की अनुमानित जनसंख्या वाले देश में अब तक डेढ़ लाख से कुछ ज्यादा लोग ही काल कवलित हुुुए हैं। सवा करोड़ के आसपास लोग संक्रमित हुए और मौजूदा समय में कुछ लाख को छोड़ दें तो बाकी लोग सही सलामत अपने परिवार के बीच हैं। वैसे जिन्होंने लाकडाउन की आलोचना की थी, उन्हें यह बात आज भी समझ में नहीं आएगी। उनके दिमाग में सरकार के विरोध का कीड़ा कुलबुला रहा है मई 2014 से। यह कीड़ा कोरोना ही मार सकता है। ऐसे लोगों के लिए मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि वह सरकार के किसी भी दिशा निर्देश को नहीं मानें।
अंत में मुंबई । परमबीर सिंह के लेटर बम का धमाका दूर दूर तक सुनाई दे रहा है। सवाल यह नहीं है कि गृहमंत्री अनिल देशमुख की करतूत मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे जानते थे अथवा नहीं, सवाल यह है कि क्या नैतिकता मर गई है राजनीति में। महज एक लाख रुपये की रिश्वत लेते पकड़े गए बंगारू लक्ष्मण ने भाजपा के अध्यक्ष पद सेे इस्तीफा दे दिया और पार्टी शर्म से गड़ गई थी, लेकिन यहां एक मौजूदा अधिकारी वाट्सएप चैट के साथ प्रमाण दे रहा है और उसे झुठलाने की बेशर्म कोशिश की जा रही है। इस प्रसंग में टिवटर पर आ रही प्रतिक्रियाएं तसल्लीबख्श हैं। जनता रूपी जनार्दन चोरों को पहचान चुकी है, कानून पहचाने अथवा नहीं। मेरा आकलन यह है कि आर्थिक राजधानी को साजिशों का शिकार बना कर देश को अस्थिर करने का कुचक्र रचा गया है। जो बिकाऊ थे, वह इस कुचक्र में फंस गए हैं। वैसे उम्मीद यही है कि जिस तरह परमबीर का जमीर जागा है, वैसे ही बिके हुए दूसरे लोगों का भी जमीर जागेगा। गंदगी साफ होगी। यह होना भी चाहिए। बहुत हो गया। सत्ता सिर्फ वसूली के लिए नहीं बननी चाहिए। जो भी ऐसा करे, उसका सत्यानाश हो।
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