रविवार, 25 जून 2017

धूप छांव के यह भी दिन

हर इतवार चाहता हूं ब्लाग के इस पेज पर मन की उमड़ घुमड़ को साझा करना। कर नहीं पाता हूं। वजह -अलाली। आज भी ज्यादा नहीं लिख पाऊंगा। पहले इतना बता दूं कि आज बाबू जी से फोन पर बात हुई। लगभग दस दिन बाद। उन्होंने बताया है कि वह थोड़ा बहुत चलने लगे हैं। एक दिन गिर गए थे। उनको देखने की इच्छा है, लेकिन समय नहीं निकाल पा रहा हूं। वाराणसी जाने का मतलब है कि एक दिन पूरा। आखिर श्री और देव भी हैं वहां। कुछ देर उनसे भी खेलना होगा। दीपू ने कुछ दिन पहले बाबू जी का वीडियो भेजा था। इसमें वह छड़ी के सहारे कुछ चहल कदमी करते दिख रहे थे। वाकई में सुखद अनुभूति हुई। यह दीपू और उनके परिवार की सेवा है कि बाबू जी कम से कम बिस्तर से उठ बैठ रहे हैं। हो सकता है कि दीपू अस्पताल इत्यादि के चक्कर लगाने की वजह से मानसिक तौर पर पीड़ित हुए हों, उनका परिवार भी असहज हो, लेकिन उनकी साधना बेकार नहीं जाएगी। उन्हें इसका सुफल जरूर मिलेगा। किसी बड़ी सौगात के रूप में। 
बाबू जी से मैं कई बातों को लेकर अतीत में नाराज रहा हूं। मेरी कई सलाहें उन्हें दाएं कान से सुनीं, बायें से निकाल दीं। तकलीफ होती थी तब। अब भी होती है। खासकर शहर में कहीं मकान न होने को लेकर। लेकिन अब सोचता हूं कि यह अपना प्रारब्ध है। इसमें उनका कोई दोष नहीं। जब वह जबलपुर में सरकारी सेवा से रिटायर हुए थे तभी मैंने चाहा था वह वहीं घर खरीद लें। इतना पैसा तो मिला ही था कि कोई एमआइजी लिया जा सकता था, पर उन्होंने नहीं लिया। यदि ले लिया होता तो मेरी स्थिति यायावर जैसी नहीं रहती। मेरी ही नहीं, दीपू की भी। हम दोनों भाई किराए के मकान में हैं। हमारी कमाई का एक बड़ा हिस्सा किराये के रूप में चला जा रहा है। मैं अपनी बात करूं तो गांव में पुराने घर को नई शक्ल देने में मशरूफ होने के बाद मैंने शहर में मकान की दिशा में उतनी गंभीरता से नहीं सोचा, जितना अब सोच रहा हूं। अब इतना पैसा नहीं है कि पचास से साठ लाख का कोई मकान खरीद सकूं। शहर में जिनके मकान हैं, उन्हें मैं सौभाग्यशाली मानता हूं। वैसे मेरे एक मित्र हैं कहते हैं मकान भी जी का जंजाल है। किरायेदार ठीक हैं, जब तक जंचा रहे, नहीं तो चलते बने। वह मकान मालिक हैं, इसलिए ऐसा कह सकते हैं। मैं किरायेदार ठहरा लगभग दो दशक से, इसलिए दर्द जानता हूं।  यदि कभी किस्मत ने पलटी मारी तो हो सकता है कि मैं भी मकान मालिक बन जाऊं, पर अभी तो ऐसा नहीं है। सरकार की योजनाओं के सब्जबाग में विचरण कर रहा हूं। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी स्कीमें मेरे लिए मृगतष्णा ही हैं। ईपीएफओ की योजना आई, पत्नी ने अखबार में पढ़ा, बोली पहल करो। मैंने कहा आसान नहीं है यह। आजादी के बाद से ही ऐसी योजनाएं चल रही हैं। किस्मत के बली लोग ही इससे लाभान्वित हो रहे हैं। कमजोर तकदीर वाले नहीं। 
हो सकता है कि बार बार किस्मत से नाराजगी वाली मेरी बात से आपको झुंझलाहट हो, लेकिन सच ऐसा ही है। किस्मत का धनी जरूर होना चाहिए इंसान को। यदि वह बली है तो इंसान हर जगह बली। यदि ब्रह्मा ने किस्मत में धक्के ही लिखे हैं तो कोई नहीं बदल सकता। योग्यता, विचार, अनुभव सब कुछ शून्य। तकदीर बली कैसे हो, इसका उपाय खोज रहा हूं, लेकिन सैंतालीस साल की उम्र में ऐसा कोई गुरु नहीं मिला है जो इसे बता सके। अम्मा जिंदा थीं तो कहती थीं, बब्बू (मेरा घर का नाम) संतोषी है। संतोष कर लेता है। शायद यही उत्तम मार्ग भी है जीने का। धूप छांव के दिन कब तक चलते हैं, ईश्वर जाने। पर उसका स्मरण इसी बहाने हो रहा है, वही अच्छा। 

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...