खुदगर्ज होने का एक सर्टिफिकेट मुझे हाल ही में मिला है। वह भी एक सहयोगी से जो जहां रहे सिर्फ विवाद में रहे। असल में उन्होंने तय कर लिया है कि वह इसी तरह रहेंगे। मुझे मानस में तुलसीदास बाबा की यह चौपाई ही याद आ रही है कि अपने कर्म जाएं अपकारी...। खैर संवाद आपके लिए प्रस्तुत है। विषय वस्तु हैं जागरण में हमारे सहयोगी रहे संजय मिश्र। अब संजय मिश्र इस दुनिया में नहीं हैं। बीती 11 मार्च को जब हम चुनाव नतीजों के दिन दफ्तर में ब्रेकिंग इत्यादि भेजने में जुटे थे, तब यह मनहूस खबर आई। संजय की त्रयोदशी के दिन हमारे ही एक साथी ने सोशल मीडिया पर मुझे और मेरे साथ -साथ पूरी टीम को नंगा करने की जो चेष्टा की वह मेरे लिए मृत्युतुल्य कष्ट से कम नहीं रही। मौत पर राजनीति सुनी थी, लेकिन पहली बार होती भी देखी किसी संस्थान में। आप भी पढि़ए
[5:22 PM, 3/23/2017] Ln Triphathi: संजय हमे अफ़सोस है...
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आज संजय मिश्र को हम सबको छोड़ कर गए 13 दिन हो गए। मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कभी नकारा नही जा सकता। जन्मना मृत्यु निश्चितमं। जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए एक न एक दिन तो तुम्हे जाना ही था। हम सब भी हमेशा यहां नही रहेंगे। काल ने हमारी विदाई की तिथि भी निर्धारित कर रखी है।
इन सबके बावजूद संजय के जाने का अत्यधिक अफ़सोस है। पैसे और इलाज के अभाव में जिस तरह वह गया वह अत्यधिक कष्टकारी और सोचनीय रहा।
संजय होने के मायने...
-कुंभ में मौनी अमावस्या की भोर में जब भारी भीड़ के दबाव में अधिकारियों ने भी अपने वाहन किनारे लगा दिए थे, जागरण टीम का कारों का काफिला अंदर ले जाना संजय के ही बस की बात थी। तत्कालीन संपादकीय प्रभारी आ. अवधेश गुप्ता जी भी उस क्षण के साक्षी थे। सोहबतिया बाग से ही वाहन रोक दिए गए थे पर जागरण के वाहन भोर में तीन बजे भारी भीड़ के बीच खुद एसएसपी एस्कोर्ट कर अंदर ले गए।
-विभिन्न गणमान्य अतिथियों के आगमन के दौरान उनके स्नान, मेले में प्रतिबंध के बीच वाहनों के काफिले के साथ घूमने आदि की व्यवस्था संजय के ही हवाले थी। ऐसे कई अवसर आए जब आ. अवधेश गुप्ता जी व्यवस्था को लेकर तनाव में आए पर मेरे साथ बाइक पर बैठकर जब मेला क्षेत्र पहुंचे तो सब ओके देख कर तनाव मुक्त हो गए। यह सब संजय के ही बस की बात थी। स्टीमर से लेकर एस्कार्ट तक उसी के हवाले था।
कुंभ में तमाम लोगो ने तमाम कार्य किए पर लाजिस्टिक (संसाधन व सुविधाएं)उपलब्ध कराने की अघोषित जवाबदारी इलाहाबाद सिटी टीम को दी गई थी। कुंभ टीम जहां रुक जाती, उसके आगे की व्यवस्था सीधे हमारे सिर पर होती। सिर्फ तीन सहयोगियों के साथ नगर संस्करण निकालने और कुंभ में आने वाले महत्वपूर्ण लोगों की व्यवस्था का दायित्व निभाने का काम संजय के बिना कत्तई नहीं हो पाता। तत्कालीन सिटी टीम को कभी कुंभ के आयोजन में निभाई गई बेहतरीन भूमिका की कोई क्रेडिट नहीं दी गई। मुझे इसी बात का हमेशा अफसोस रहा कि ताराचंद के साथ मिलकर संजय ने जो काम किया, उसे उसका श्रेय कभी नहीं मिल सका।
बतौर टीम लीडर मैं यह कह सकता हूं कि संजय के अंदर खबरों की समझ थी, लिखने का सलीका था, व्यवहार में विनम्रता थी और रिपोर्टर का तेवर था। क्राइम से साहित्य तक कुछ भी दे दिया जाता, वह बेहतर परिणाम ही देता। इसीलिए वह मेरा सबसे पसंदीदा रिपोर्टर था।
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टीम इलाहाबाद विचार करे--
-हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी हैं। वह खुद एक्सीडेंट में घायल होकर घर पर पड़े थे। अनुपस्थित रहने के कारण उनका भी वेतन रुक गया था। उस समय आ. आशुतोष शुक्ला जी की अगुवाई में हम सब जब उन्हें दीपावली पर आर्थिक सहायता व अन्य उपहार देने पहुंचे थे, वह भावविह्वल हो गए थे। उनके आंसू आज भी हम सबको द्रवित करते हैं और किसी अन्य की सहायता करने को प्रेरित करते हैं। उनके साथ मुसीबत के समय अच्छा किया गया पर जब ऐसी परिस्थिति किसी और के साथ आई तो वह सीन से नदारद हो गए। आर्थिक सहायता आदि तो दूर की बात है, आज तक वह संजय के घर पहुंच कर सहानुभूति के दो शब्द भी नहीं बोल पाए।
- एक अन्य वरिष्ठ सहयोगी हैं। उनकी मां का देहांत हुआ, फिर छोटे भाई का देहांत हुआ। बाहर तैनात थे। जब भी मिलते थे मुझे यही कहते थे कि तीन गृहस्थी का खर्च जागरण के वेतन से निकालना मुश्किल हो गया है। मुझे तो अपने बच्चों की पढ़ाई बंद करा देनी पड़ेगी। आपको फला फला बहुत मानते हैं। मेरी सिफारिश करके इलाहाबाद बुला लीजिए। कुछ खर्च कम हो जाएगा। घर भी देख लेंगे। हम जब जगह जगह उनकी सिफारिश कर रहे थे तो आ. अवधेश गुप्ता जी बहुत बार टोके। उनका कहना था कि वह आ जाएगा तो पहले तुम्हारे पीछे ही पड़ेगा। एक दिन भी नहीं पट पाएगी। हुआ भी कुछ ऐसा ही। यहां मेरा मसला नहीं है। सोचने की बात यह है कि अपनी आर्थिक स्थिति के लिए इतना परेशान रहा बंदा संजय की आर्थिक स्थिति के बारे में सोचने को भी तैयार नहीं हुआ। बीमार होने के बावजूद छुट्टी देने में परेशानी, वेतन कट जाने देना आदि आम बात रही। जब संजय कार्यालय आने में लाचार हो गया तो उसका पूरा वेतन बंद हो जाने देना भी देखता रहा। जरा भी नहीं सोचा कि एक बीमार व्यक्ति बिना पैसे के काम कैसे चला रहा होगा।
यह सिर्फ नमूने हैं। टीम इलाहाबाद के सदस्यों को मदद लेना पसंद रहा है। सभी ने खुल कर मदद ली थी पर देने की स्थिति में कोई नहीं है। टीम के पुराने सदस्यों को किन किन गंभीर परिस्थितियों में कैसी कैसी मदद की गई है, चिंतन करेंगे तो सभी को खुद याद आ जाएगा।
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-आज की टीम इलाहाबाद आ. अवधेश गुप्ता जी के पसंदीदा सितारों से भरी हुई है। यह टीम, इसके इंचार्ज और हर सहयोगी को आज एक बार अपने बारे में सोचने की सख्त जरूरत है।
-संजय पिछले लंबे समय से बीमार चल रहा था। उसकी आर्थिक स्थिति के बारे में हम सभी जानते थे। अनुपस्थित रहने के चलते उसे कई महीनों से वेतन भी नहीं पा रहा था। इसके बावजूद किसी ने उसकी कोई मदद नहीं की।
अरे, ईएसआइ से ही उसकी सहायता करा दी जाती तब भी कुछ राहत रहती। नियमानुसार ईएसआइ से उसे छह माह तक ६० प्रतिशत वेतन, उसका और उसकी मां का किसी नर्सिंग होम में पूरा ईलाज हो सकता था। इलाहाबाद की टीम इतना भी नहीं कर पाई। साल भर से डॉक्टर उसको आराम करने और इलाज करने की सलाह दे रहे थे पर वेतन कटने के डर से वह बीमारी में कार्यालय पहुंच जाता था। अंत में जब चलने से लाचार हआ तो बिना वेतन घर पर बैठा रहा। सरकारी सहायता भी नहीं दिलाई जा सकी।
-आज इंचार्ज से लेकर रिपोर्टर तक की पूरी टीम में एक भी बंदा ऐसा नहीं है जो किसी नर्सिंग होम से इलाज की व्यवस्था कर सके। आज भी इलाहाबाद कार्यालय का स्टाफ उन्ही रवि उपाध्याय के पहचान पर सृजन और वात्सल्य नर्सिंग होम की सुविधाएं लिए पड़ा है, जिसे नकारा बता कर आ. अवधेश जी नौकरी से बाहर करने की हर संभव कोशिश करते रहे। अंत में जिला बदर करके माने। उनके पसंदीदा सितारे एक सहयोगी की इलाज तक नहीं करा पाए।
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-मेरा अफसोस यह है कि संजय ने मेरी मदद ली नहीं। उसे और उसकी मां को अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस तक भेज दी पर वह भर्ती होने को तैयार नहीं हुआ। उसका कहना था कि अस्पताल में हमें देखेगा कौन। कोई भी जरूरत पड़ने पर एक भी व्यक्ति उपलब्ध नहीं है। उसे टीम इलाहाबाद पर इतना भी भरोसा नहीं था कि वहां से कोई देखभाल के लिए उपलब्ध हो जाएगा।
-मैं सच में अमर उजाला के योगेन्द्र, संजय, ऋषि आदि का आभारी हूं। संजय मिश्र की अधिकांश समय सहायता उजाला के इन्ही सहयोगियों ने की। बेली से डॉक्टर बुलाना, दवा दिलाना, हृदय रोग विशेषज्ञ, फीजिशियन व अन्य विशेषज्ञों को दिखाने की व्यवस्था कराना, ईसीजी से लेकर एमआरआइ तक की जांच में रियायत कराना, अस्पताल व चिकित्सक तक ले जाने आदि तक के अधिकांश काम में इन लोगों ने सहायता की। संजय इनके बारे में बताया करता था। जागरण टीम में किसने कितनी मदद की, हर कोई खुद सोच सकता है।
संजय, तुम होते तो मैं आज शायद यही गीत गाता...
जिस पथ पर चला उस पथ पर मुझे
आँचल तो बिछाने दे
साथी न समझ कोई बात नही
मुझे साथ तो आने दे।
तुमने मेरी बात मान ली होती तो बेहतर रहा होता। मौत तो कोई नहीं टाल सकता पर तिलतिल कर किसी को मरते देखना और कुछ न कर पाने का अफसोस मेरे मन में न रहा होता। मुझे तनाव न देने की बात करते करते तुम मुझे जीवन भर का अफसोस दे गए।
(यह किस फिल्म का गाना है, मै भी नहीं जानता। टीम इलाहाबाद में कोई बता पाएगा क्या? संजय होता तो तुरंत बता देता। कला व साहित्य में उसकी रुचि थी और कई बेहतर खबरें उसकी क्रेडिट में थीं।)
यह मैसेज आ. अवधेश गुप्ता जी को भी सादर प्रेषित है। शायद इमानदार, मेहनती व कार्यकुशल जैसे शब्दों का कुछ मतलब समझ सकें और जहां भी रहें वहां ऐसे लोगों की कुछ कदर कर सकें। सालोसाल जिन्हें नकारा घोषित करते रहे, निकाल देने की धमकी देते रहे उन्हें ही अंत में ईनाम देकर गए। जिसने उनकी शान बढ़ाई, मान बढ़ाया, जो मौके पर खड़े रहे उसे इस कदर बेजार किया कि वह अपने इलाज के लिए पैसों का जुगा़ड़ करते करते ही मर गया।
आशा है, मेरे सहयोगी मेरी बात का बुरा मानने की जगह आत्मचिंतन करेंगे और खुद को इतना समर्थ बनाने की कोशिश अवश्य करेंगे कि किसी को मदद की जरूरत पड़ जाए तो डट कर वहां खडे तो रह सकें।
अंत में,
ना मुस्कुराने को जी चाहता है,
ना आंसू बहाने को जी चाहता है,
लिखूं तो क्या लिखूं तेरी याद में,
बस तेरे पास लौट आने को जी चाहता है।
सादर
एलएन
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[5:54 PM, 3/23/2017] +91 94152 26071: खेद है कि कोई साथी किस तरह किसी साथी की मौत को भी इस्तेमाल करता है.
संजय मिश्र के निधन की खबर आने पर पूरी टीम द्रवित थी.आज त्रयोदशाह है, उसमें इन पंक्तियों का लेखक भी था. और हां आफिस के सहयोगियों ने चंदा किया था परिवार को देने के लिए उस समय भी उसने पर्स में रखी तीन सौ रुपये में ढाई सौ रुपये की मदद की थी. जिस दिन निधन हुआ, जीएम साहब दफ्तर की तरफ से गए थे मौके पर. संपादकीय विभाग से भी कुछ सहयोगी गए थे, यहां तक कि शोक संबंधी खबर भी इस प्रतिनिधि इस प्रतिनिधि ने यूपी डेस्क भेजी थी.
इससे पहले संजय मिश्र जब शराब के अत्याधिक नशे के वशीभूत पूर्व एसएसपी के साथ गाली गुप्तार के कारण नौकरी से हटाए जाने की स्थिति में आ गए, यहां तक कि करीब डेढ़ महीने बैठाए गए थे, इस अदने से शख्स ने बार बार यही कोशिश की कि उन्हें काम पर ले लिया जाए. उन्हें लिया गया. आउटपुट टीम में.
संजय बीमार थे डेढ़ दो महीने से लेकिन उनकी चर्चा होती थी, निधन से दो दिन पहले आफिस के सहयोगी लक्ष्मी तिवारी उनके घर गए थे और आकर बताया था कि वह ठीक हो रहे हैं संभवत: 15 को ज्वाइन कर लेंगे.
बातें बहुत हैं पर उनको लिखने का यहां मतलब नहीं है. जहां तक मेरी बात है मेरे एक्सीडेंट के समय आशुतोष जी ने जो किया, वह शायद ही कोई करता.
और हां आज ही पूरी टीम अजहर अंसारी के भी घर होकर आई है संपादकीय प्रभारी की अगुवाई में, उनकी मां का निधन हुआ है कुछ दिनों पहले.
अवधेश जी ने मुझसे तो नहीं दूसरे सहयोगियों से यह जरूर कहा था कि उनकी तरफ से भी आर्थिक मदद दी जाएगी. संजय के परिवार को मदद के लिए.
मौजूदा संपादकीय प्रभारी ने साथियों से कहा है कि वह संजय के मृत्योपरांत सीएम के विवेकाधीन कोष से मदद दिलाने के लिए पत्रावली तैयार कराएं.
संजय की माता जी को दस्तावेजी औपचारिकता पूरी होने पर पेंशन रूपी मदद दिलाई जाएगी.
[5:55 PM, 3/23/2017] +91 94152 26071: पेंशन की प्रक्रिया के लिए कार्यालय के सहयोगी लगे हैं.
[9:57 AM, 3/26/2017] Ln Triphathi: क्या जबरिया बात करते है सुरेशजी। हमे मौत का इस्तेमाल करने पर कौन सा सिंघासन दिलवा रहे आप? अशुतोषजी की भलमनसाहत आपको अगर कही भी छू गयी थी तो आप ने खुद कभी उसके घर का रुख क्यों नहींकिया। जाकर देख आते किस हाल में है वह लोग। पैसे न देते सिटी टीम पर दबाव डाल कर ईएसआई से ही इलाज में मदद करा देते। आपने जो किया वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि किस तरह की सम्वेदन हीनता हावी रही है।
एसएसपी को गालियां देने की जिस घटना का उल्लेख कर रहे है वह एक रिपोर्टर के मनोबल को तोड़ने वाली बात थी। क्या संजय एसएसपी से वसूली करने गया था? अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए एसएसपी से भिड़ा था? एसएसपी आईजी डीआईजी इन सबको तो भरी महफ़िल में मैंने भी बहुत गालिया दी थी। आशुतोष ने भी बहुत दी थी। श्यामेन्द्र कुशवाहा कांड में। पूछ लीजियेगा। हा तब मुखिया और लोग थे।
अरे जागरण पर जब पथराव हुआ था तब भी मैंने बहुत गालिया दी थी। आप भी गवाह थे। एसपी एसएसपी इन सबको बहुत गालिया दी थी। आईजी आलोक शर्मा को कार्यालय तलब कर खूब खरी खोटी सुनाइ थी। तब तो मुझे नही बिठा दिया गया।
यह सब जो भी किया गया था वह एक रिपोर्टर के मनोबल को तोड़ने वाला काम था। मैंने अपने किसी व्यक्तिगत काम से गालिया नही दी थी और न ही संजय ने दी रही होगी। अच्छे रिपोर्टर को संरक्षण न देने से आज यह हालत है कि हमारी कोई पकड़ ही नही रह गयी है।
और हा, उसकी माँ को पेंशन से ज्यादा इलाज की जरूरत है। पर यह बात आपको तब पता चलेगी जब दिल में अपने अलावा दूसरे का भी दर्द महसूस होगा और उसके घर तक पहुँच पाएंगे। अकेली बुढ़िया कैसे रह रही होगी यह तो जाने पर ही प्तव चलेगा सर।
हमने तो आपको झकझोरने जगाने की कोशिश की थी। एक मित्र के नाते सही राह दिखाने की कोशिश की थी पर आपने इसे अन्यथा लिया। चलिये जो ठीक लगे करिये।
[10:13 AM, 3/26/2017] +91 94152 26071: एलएन बाबू कृपया मुझसे किसी तरह का व्यक्तिगत संवाद भविष्य में नहीं करेंगे.
संजय मिश्र की असमय मौत पर सियासत आपको मुबारक.आप जहां जहां संभव हो मुझे असंवेदनहीन बताकर मैसेज वायरल करते रहें. संजय मिश्र की आत्मा गवाह है कि आपने उसका कितना भला किया, मेरे पास भी बैठते थे संजय मिश्र, पता नहीं क्या क्या कहा है आपके लिए, खैर अब वह नहीं हैं तो उनका प्रसंग समाप्त. संजय मिश्र के बहाने से ही सही ....बहुत कुछ सामने आ गया..
[10:27 AM, 3/26/2017] Ln Triphathi: मौत पर सियासत करनी होती तो आपके नाम के साथ मैसेज चलाते। बेनाम नही। जैसा आपको ठीक लगे। यह बात सही कही कि संजय के बहाने बहुत कुछ बाहर आ गया। अगर आपको अपना स्टैंड सही लग रहा हो तो बोलिये इसे ऐसे ही अशुतोषजी को अग्रसारित कर दूँ। वह भी देख और समझ ले।
[10:30 AM, 3/26/2017] +91 94152 26071: अब तो आशुतोष सर को यह मैसेज और हमारे बीच हुआ पूरा संवाद अग्रसारित कर ही दें बड़ी कृपा होगी आपकी.
[10:41 AM, 3/26/2017] Ln Triphathi: ओके सर😊
पुनश्चः
9415226071 दैनिक जागरण की तरफ से मुझे मोबाइल फोन के लिए दिए गए सीयूजी सिम का नंबर है। फिलहाल मैं इसका इस्तेमाल कर रहा हूं। अब पूरा प्रसंग आपके सामने हैं यदि आप भी मुझे गुनहगार मान रहे हों तो मैं कुछ नहीं कर सकता। आखिर तमगा देने का अधिकार तो आपको ही है। हां इतना जरूर कह सकता हूं कि आशुतोष सर जरूर इस प्रसंग को पढ़कर थोड़े नाखुश होंगे।
[5:22 PM, 3/23/2017] Ln Triphathi: संजय हमे अफ़सोस है...
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आज संजय मिश्र को हम सबको छोड़ कर गए 13 दिन हो गए। मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कभी नकारा नही जा सकता। जन्मना मृत्यु निश्चितमं। जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए एक न एक दिन तो तुम्हे जाना ही था। हम सब भी हमेशा यहां नही रहेंगे। काल ने हमारी विदाई की तिथि भी निर्धारित कर रखी है।
इन सबके बावजूद संजय के जाने का अत्यधिक अफ़सोस है। पैसे और इलाज के अभाव में जिस तरह वह गया वह अत्यधिक कष्टकारी और सोचनीय रहा।
संजय होने के मायने...
-कुंभ में मौनी अमावस्या की भोर में जब भारी भीड़ के दबाव में अधिकारियों ने भी अपने वाहन किनारे लगा दिए थे, जागरण टीम का कारों का काफिला अंदर ले जाना संजय के ही बस की बात थी। तत्कालीन संपादकीय प्रभारी आ. अवधेश गुप्ता जी भी उस क्षण के साक्षी थे। सोहबतिया बाग से ही वाहन रोक दिए गए थे पर जागरण के वाहन भोर में तीन बजे भारी भीड़ के बीच खुद एसएसपी एस्कोर्ट कर अंदर ले गए।
-विभिन्न गणमान्य अतिथियों के आगमन के दौरान उनके स्नान, मेले में प्रतिबंध के बीच वाहनों के काफिले के साथ घूमने आदि की व्यवस्था संजय के ही हवाले थी। ऐसे कई अवसर आए जब आ. अवधेश गुप्ता जी व्यवस्था को लेकर तनाव में आए पर मेरे साथ बाइक पर बैठकर जब मेला क्षेत्र पहुंचे तो सब ओके देख कर तनाव मुक्त हो गए। यह सब संजय के ही बस की बात थी। स्टीमर से लेकर एस्कार्ट तक उसी के हवाले था।
कुंभ में तमाम लोगो ने तमाम कार्य किए पर लाजिस्टिक (संसाधन व सुविधाएं)उपलब्ध कराने की अघोषित जवाबदारी इलाहाबाद सिटी टीम को दी गई थी। कुंभ टीम जहां रुक जाती, उसके आगे की व्यवस्था सीधे हमारे सिर पर होती। सिर्फ तीन सहयोगियों के साथ नगर संस्करण निकालने और कुंभ में आने वाले महत्वपूर्ण लोगों की व्यवस्था का दायित्व निभाने का काम संजय के बिना कत्तई नहीं हो पाता। तत्कालीन सिटी टीम को कभी कुंभ के आयोजन में निभाई गई बेहतरीन भूमिका की कोई क्रेडिट नहीं दी गई। मुझे इसी बात का हमेशा अफसोस रहा कि ताराचंद के साथ मिलकर संजय ने जो काम किया, उसे उसका श्रेय कभी नहीं मिल सका।
बतौर टीम लीडर मैं यह कह सकता हूं कि संजय के अंदर खबरों की समझ थी, लिखने का सलीका था, व्यवहार में विनम्रता थी और रिपोर्टर का तेवर था। क्राइम से साहित्य तक कुछ भी दे दिया जाता, वह बेहतर परिणाम ही देता। इसीलिए वह मेरा सबसे पसंदीदा रिपोर्टर था।
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टीम इलाहाबाद विचार करे--
-हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी हैं। वह खुद एक्सीडेंट में घायल होकर घर पर पड़े थे। अनुपस्थित रहने के कारण उनका भी वेतन रुक गया था। उस समय आ. आशुतोष शुक्ला जी की अगुवाई में हम सब जब उन्हें दीपावली पर आर्थिक सहायता व अन्य उपहार देने पहुंचे थे, वह भावविह्वल हो गए थे। उनके आंसू आज भी हम सबको द्रवित करते हैं और किसी अन्य की सहायता करने को प्रेरित करते हैं। उनके साथ मुसीबत के समय अच्छा किया गया पर जब ऐसी परिस्थिति किसी और के साथ आई तो वह सीन से नदारद हो गए। आर्थिक सहायता आदि तो दूर की बात है, आज तक वह संजय के घर पहुंच कर सहानुभूति के दो शब्द भी नहीं बोल पाए।
- एक अन्य वरिष्ठ सहयोगी हैं। उनकी मां का देहांत हुआ, फिर छोटे भाई का देहांत हुआ। बाहर तैनात थे। जब भी मिलते थे मुझे यही कहते थे कि तीन गृहस्थी का खर्च जागरण के वेतन से निकालना मुश्किल हो गया है। मुझे तो अपने बच्चों की पढ़ाई बंद करा देनी पड़ेगी। आपको फला फला बहुत मानते हैं। मेरी सिफारिश करके इलाहाबाद बुला लीजिए। कुछ खर्च कम हो जाएगा। घर भी देख लेंगे। हम जब जगह जगह उनकी सिफारिश कर रहे थे तो आ. अवधेश गुप्ता जी बहुत बार टोके। उनका कहना था कि वह आ जाएगा तो पहले तुम्हारे पीछे ही पड़ेगा। एक दिन भी नहीं पट पाएगी। हुआ भी कुछ ऐसा ही। यहां मेरा मसला नहीं है। सोचने की बात यह है कि अपनी आर्थिक स्थिति के लिए इतना परेशान रहा बंदा संजय की आर्थिक स्थिति के बारे में सोचने को भी तैयार नहीं हुआ। बीमार होने के बावजूद छुट्टी देने में परेशानी, वेतन कट जाने देना आदि आम बात रही। जब संजय कार्यालय आने में लाचार हो गया तो उसका पूरा वेतन बंद हो जाने देना भी देखता रहा। जरा भी नहीं सोचा कि एक बीमार व्यक्ति बिना पैसे के काम कैसे चला रहा होगा।
यह सिर्फ नमूने हैं। टीम इलाहाबाद के सदस्यों को मदद लेना पसंद रहा है। सभी ने खुल कर मदद ली थी पर देने की स्थिति में कोई नहीं है। टीम के पुराने सदस्यों को किन किन गंभीर परिस्थितियों में कैसी कैसी मदद की गई है, चिंतन करेंगे तो सभी को खुद याद आ जाएगा।
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-आज की टीम इलाहाबाद आ. अवधेश गुप्ता जी के पसंदीदा सितारों से भरी हुई है। यह टीम, इसके इंचार्ज और हर सहयोगी को आज एक बार अपने बारे में सोचने की सख्त जरूरत है।
-संजय पिछले लंबे समय से बीमार चल रहा था। उसकी आर्थिक स्थिति के बारे में हम सभी जानते थे। अनुपस्थित रहने के चलते उसे कई महीनों से वेतन भी नहीं पा रहा था। इसके बावजूद किसी ने उसकी कोई मदद नहीं की।
अरे, ईएसआइ से ही उसकी सहायता करा दी जाती तब भी कुछ राहत रहती। नियमानुसार ईएसआइ से उसे छह माह तक ६० प्रतिशत वेतन, उसका और उसकी मां का किसी नर्सिंग होम में पूरा ईलाज हो सकता था। इलाहाबाद की टीम इतना भी नहीं कर पाई। साल भर से डॉक्टर उसको आराम करने और इलाज करने की सलाह दे रहे थे पर वेतन कटने के डर से वह बीमारी में कार्यालय पहुंच जाता था। अंत में जब चलने से लाचार हआ तो बिना वेतन घर पर बैठा रहा। सरकारी सहायता भी नहीं दिलाई जा सकी।
-आज इंचार्ज से लेकर रिपोर्टर तक की पूरी टीम में एक भी बंदा ऐसा नहीं है जो किसी नर्सिंग होम से इलाज की व्यवस्था कर सके। आज भी इलाहाबाद कार्यालय का स्टाफ उन्ही रवि उपाध्याय के पहचान पर सृजन और वात्सल्य नर्सिंग होम की सुविधाएं लिए पड़ा है, जिसे नकारा बता कर आ. अवधेश जी नौकरी से बाहर करने की हर संभव कोशिश करते रहे। अंत में जिला बदर करके माने। उनके पसंदीदा सितारे एक सहयोगी की इलाज तक नहीं करा पाए।
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-मेरा अफसोस यह है कि संजय ने मेरी मदद ली नहीं। उसे और उसकी मां को अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस तक भेज दी पर वह भर्ती होने को तैयार नहीं हुआ। उसका कहना था कि अस्पताल में हमें देखेगा कौन। कोई भी जरूरत पड़ने पर एक भी व्यक्ति उपलब्ध नहीं है। उसे टीम इलाहाबाद पर इतना भी भरोसा नहीं था कि वहां से कोई देखभाल के लिए उपलब्ध हो जाएगा।
-मैं सच में अमर उजाला के योगेन्द्र, संजय, ऋषि आदि का आभारी हूं। संजय मिश्र की अधिकांश समय सहायता उजाला के इन्ही सहयोगियों ने की। बेली से डॉक्टर बुलाना, दवा दिलाना, हृदय रोग विशेषज्ञ, फीजिशियन व अन्य विशेषज्ञों को दिखाने की व्यवस्था कराना, ईसीजी से लेकर एमआरआइ तक की जांच में रियायत कराना, अस्पताल व चिकित्सक तक ले जाने आदि तक के अधिकांश काम में इन लोगों ने सहायता की। संजय इनके बारे में बताया करता था। जागरण टीम में किसने कितनी मदद की, हर कोई खुद सोच सकता है।
संजय, तुम होते तो मैं आज शायद यही गीत गाता...
जिस पथ पर चला उस पथ पर मुझे
आँचल तो बिछाने दे
साथी न समझ कोई बात नही
मुझे साथ तो आने दे।
तुमने मेरी बात मान ली होती तो बेहतर रहा होता। मौत तो कोई नहीं टाल सकता पर तिलतिल कर किसी को मरते देखना और कुछ न कर पाने का अफसोस मेरे मन में न रहा होता। मुझे तनाव न देने की बात करते करते तुम मुझे जीवन भर का अफसोस दे गए।
(यह किस फिल्म का गाना है, मै भी नहीं जानता। टीम इलाहाबाद में कोई बता पाएगा क्या? संजय होता तो तुरंत बता देता। कला व साहित्य में उसकी रुचि थी और कई बेहतर खबरें उसकी क्रेडिट में थीं।)
यह मैसेज आ. अवधेश गुप्ता जी को भी सादर प्रेषित है। शायद इमानदार, मेहनती व कार्यकुशल जैसे शब्दों का कुछ मतलब समझ सकें और जहां भी रहें वहां ऐसे लोगों की कुछ कदर कर सकें। सालोसाल जिन्हें नकारा घोषित करते रहे, निकाल देने की धमकी देते रहे उन्हें ही अंत में ईनाम देकर गए। जिसने उनकी शान बढ़ाई, मान बढ़ाया, जो मौके पर खड़े रहे उसे इस कदर बेजार किया कि वह अपने इलाज के लिए पैसों का जुगा़ड़ करते करते ही मर गया।
आशा है, मेरे सहयोगी मेरी बात का बुरा मानने की जगह आत्मचिंतन करेंगे और खुद को इतना समर्थ बनाने की कोशिश अवश्य करेंगे कि किसी को मदद की जरूरत पड़ जाए तो डट कर वहां खडे तो रह सकें।
अंत में,
ना मुस्कुराने को जी चाहता है,
ना आंसू बहाने को जी चाहता है,
लिखूं तो क्या लिखूं तेरी याद में,
बस तेरे पास लौट आने को जी चाहता है।
सादर
एलएन
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[5:54 PM, 3/23/2017] +91 94152 26071: खेद है कि कोई साथी किस तरह किसी साथी की मौत को भी इस्तेमाल करता है.
संजय मिश्र के निधन की खबर आने पर पूरी टीम द्रवित थी.आज त्रयोदशाह है, उसमें इन पंक्तियों का लेखक भी था. और हां आफिस के सहयोगियों ने चंदा किया था परिवार को देने के लिए उस समय भी उसने पर्स में रखी तीन सौ रुपये में ढाई सौ रुपये की मदद की थी. जिस दिन निधन हुआ, जीएम साहब दफ्तर की तरफ से गए थे मौके पर. संपादकीय विभाग से भी कुछ सहयोगी गए थे, यहां तक कि शोक संबंधी खबर भी इस प्रतिनिधि इस प्रतिनिधि ने यूपी डेस्क भेजी थी.
इससे पहले संजय मिश्र जब शराब के अत्याधिक नशे के वशीभूत पूर्व एसएसपी के साथ गाली गुप्तार के कारण नौकरी से हटाए जाने की स्थिति में आ गए, यहां तक कि करीब डेढ़ महीने बैठाए गए थे, इस अदने से शख्स ने बार बार यही कोशिश की कि उन्हें काम पर ले लिया जाए. उन्हें लिया गया. आउटपुट टीम में.
संजय बीमार थे डेढ़ दो महीने से लेकिन उनकी चर्चा होती थी, निधन से दो दिन पहले आफिस के सहयोगी लक्ष्मी तिवारी उनके घर गए थे और आकर बताया था कि वह ठीक हो रहे हैं संभवत: 15 को ज्वाइन कर लेंगे.
बातें बहुत हैं पर उनको लिखने का यहां मतलब नहीं है. जहां तक मेरी बात है मेरे एक्सीडेंट के समय आशुतोष जी ने जो किया, वह शायद ही कोई करता.
और हां आज ही पूरी टीम अजहर अंसारी के भी घर होकर आई है संपादकीय प्रभारी की अगुवाई में, उनकी मां का निधन हुआ है कुछ दिनों पहले.
अवधेश जी ने मुझसे तो नहीं दूसरे सहयोगियों से यह जरूर कहा था कि उनकी तरफ से भी आर्थिक मदद दी जाएगी. संजय के परिवार को मदद के लिए.
मौजूदा संपादकीय प्रभारी ने साथियों से कहा है कि वह संजय के मृत्योपरांत सीएम के विवेकाधीन कोष से मदद दिलाने के लिए पत्रावली तैयार कराएं.
संजय की माता जी को दस्तावेजी औपचारिकता पूरी होने पर पेंशन रूपी मदद दिलाई जाएगी.
[5:55 PM, 3/23/2017] +91 94152 26071: पेंशन की प्रक्रिया के लिए कार्यालय के सहयोगी लगे हैं.
[9:57 AM, 3/26/2017] Ln Triphathi: क्या जबरिया बात करते है सुरेशजी। हमे मौत का इस्तेमाल करने पर कौन सा सिंघासन दिलवा रहे आप? अशुतोषजी की भलमनसाहत आपको अगर कही भी छू गयी थी तो आप ने खुद कभी उसके घर का रुख क्यों नहींकिया। जाकर देख आते किस हाल में है वह लोग। पैसे न देते सिटी टीम पर दबाव डाल कर ईएसआई से ही इलाज में मदद करा देते। आपने जो किया वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि किस तरह की सम्वेदन हीनता हावी रही है।
एसएसपी को गालियां देने की जिस घटना का उल्लेख कर रहे है वह एक रिपोर्टर के मनोबल को तोड़ने वाली बात थी। क्या संजय एसएसपी से वसूली करने गया था? अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए एसएसपी से भिड़ा था? एसएसपी आईजी डीआईजी इन सबको तो भरी महफ़िल में मैंने भी बहुत गालिया दी थी। आशुतोष ने भी बहुत दी थी। श्यामेन्द्र कुशवाहा कांड में। पूछ लीजियेगा। हा तब मुखिया और लोग थे।
अरे जागरण पर जब पथराव हुआ था तब भी मैंने बहुत गालिया दी थी। आप भी गवाह थे। एसपी एसएसपी इन सबको बहुत गालिया दी थी। आईजी आलोक शर्मा को कार्यालय तलब कर खूब खरी खोटी सुनाइ थी। तब तो मुझे नही बिठा दिया गया।
यह सब जो भी किया गया था वह एक रिपोर्टर के मनोबल को तोड़ने वाला काम था। मैंने अपने किसी व्यक्तिगत काम से गालिया नही दी थी और न ही संजय ने दी रही होगी। अच्छे रिपोर्टर को संरक्षण न देने से आज यह हालत है कि हमारी कोई पकड़ ही नही रह गयी है।
और हा, उसकी माँ को पेंशन से ज्यादा इलाज की जरूरत है। पर यह बात आपको तब पता चलेगी जब दिल में अपने अलावा दूसरे का भी दर्द महसूस होगा और उसके घर तक पहुँच पाएंगे। अकेली बुढ़िया कैसे रह रही होगी यह तो जाने पर ही प्तव चलेगा सर।
हमने तो आपको झकझोरने जगाने की कोशिश की थी। एक मित्र के नाते सही राह दिखाने की कोशिश की थी पर आपने इसे अन्यथा लिया। चलिये जो ठीक लगे करिये।
[10:13 AM, 3/26/2017] +91 94152 26071: एलएन बाबू कृपया मुझसे किसी तरह का व्यक्तिगत संवाद भविष्य में नहीं करेंगे.
संजय मिश्र की असमय मौत पर सियासत आपको मुबारक.आप जहां जहां संभव हो मुझे असंवेदनहीन बताकर मैसेज वायरल करते रहें. संजय मिश्र की आत्मा गवाह है कि आपने उसका कितना भला किया, मेरे पास भी बैठते थे संजय मिश्र, पता नहीं क्या क्या कहा है आपके लिए, खैर अब वह नहीं हैं तो उनका प्रसंग समाप्त. संजय मिश्र के बहाने से ही सही ....बहुत कुछ सामने आ गया..
[10:27 AM, 3/26/2017] Ln Triphathi: मौत पर सियासत करनी होती तो आपके नाम के साथ मैसेज चलाते। बेनाम नही। जैसा आपको ठीक लगे। यह बात सही कही कि संजय के बहाने बहुत कुछ बाहर आ गया। अगर आपको अपना स्टैंड सही लग रहा हो तो बोलिये इसे ऐसे ही अशुतोषजी को अग्रसारित कर दूँ। वह भी देख और समझ ले।
[10:30 AM, 3/26/2017] +91 94152 26071: अब तो आशुतोष सर को यह मैसेज और हमारे बीच हुआ पूरा संवाद अग्रसारित कर ही दें बड़ी कृपा होगी आपकी.
[10:41 AM, 3/26/2017] Ln Triphathi: ओके सर😊
पुनश्चः
9415226071 दैनिक जागरण की तरफ से मुझे मोबाइल फोन के लिए दिए गए सीयूजी सिम का नंबर है। फिलहाल मैं इसका इस्तेमाल कर रहा हूं। अब पूरा प्रसंग आपके सामने हैं यदि आप भी मुझे गुनहगार मान रहे हों तो मैं कुछ नहीं कर सकता। आखिर तमगा देने का अधिकार तो आपको ही है। हां इतना जरूर कह सकता हूं कि आशुतोष सर जरूर इस प्रसंग को पढ़कर थोड़े नाखुश होंगे।