शनिवार, 7 जनवरी 2023

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा 

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सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (अच्छा अच्छा) करने का। यह जानते हुए भी कि यह संकल्प शायद ही पूरा हो पाए। मेरी राशि मेष बताई गई थी बचपन में। कुंडली बनी नहीं। जो शुरूआती पत्रिका बनी, वह भी गायब हो गई किस्मत की तरह। इसलिए सही समय नहीं पता। इसका अफसोस रहेगा। 

चलिए आज शुरुआत में ही खटराग नहीं गाऊंगा। एक संकल्प लिया है कि सप्ताहनामा लिखा करूंगा आमतौर पर शनिवार को। तो आज इस सप्ताह के खास खास घटनाक्रम की चर्चा है। अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रादेशिक तथा स्थानीय । उनके इम्पैक्ट का अपनी समझ के अनुसार विश्लेषण भी करूंगा। विश्व परिदृश्य की बात करूं तो इस सप्ताह रूसी राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन की वह घोषणा में सबसे अहम मानता हूं जिसमें उन्होंने यूक्रेन के खिलाफ चल रहे युद्ध को रोक देने की अपने तरफ से एकतरफा घोषणा की है।  यूक्रेन के शासन प्रमुख जेलेंस्की की तरफ से कोई प्रत्युत्तर इन पंक्तियों के लिखने तक नहीं आया है, इसलिए संशय है फिर भी मेरा मानना है कि युद्ध खींचने की स्थिति में कोई नहीं है। कुछ हिस्सा रूस के कब्जे में जरूर है। वह कब तक रहेगा, कोई नहीं जानता। भारत के पड़ोसी देशों की बात करूं तो नेपाल से भी चुनौती मिलेगी इस साल। वहां चीनी शासकों के मंशानुरूप वामपंथियों ने सरकार जो बना ली है। चीन से अदावत है ही। पाकिस्तान में कुछ बचा नहीं है। आर्थिक रूप से दिवालिया हो चुका यह देश भी खतरा बना रहेगा। 

राष्ट्रीय परिदृश्य की बात की जाए तो कांग्रेस नेता व वायनाड से सांसद राहुल गांधी की अगुवाई वाली भारत जोड़ो यात्रा यूपी से भी गुजरी चुकी है। कई चेहरे इस यात्रा में राहुल के साथ दिखे। गजियाबाद के लोनी में पड़ाव के समय मंच पर बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को उनका प्यार भरा किस सुर्खी बना। टी-शर्ट पुराण पीछे छूट गया। आज इन पंक्तियों के लिखते समय कहा जा रहा है कि हाफ टी-शर्ट के अंदर भी कुछ पहन रखा है राहुल बाबा ने। रा के पूर्व प्रमुख दुल्लत की कदमताल भी कांग्रेसियों को भायी तो अभिनेत्री कमया पंजाबन व नीतू शिवपुरी की भी। लोकतंत्र में सभी को अपनी प्रतिबृद्धता के अनुरूप दल चुनने का हक है। इसलिए कुछ लोगों को यह सब पसंद आया तो कुछ को नापसंद । मुझे भी कोई आपत्ति नहीं है। बस एक बात थोड़ा खटकी है वह है जनेऊधारी बालक के साथ पदयात्रा। बालक को जनेऊ पहिनाने वाले ने गलती कर दी। बांयी तरफ से पहना दिया। हमारेे अवध में ऐसा तब किया जाता है जब घर में कोई स्वर्गवासी हो गया हो और उसकी आत्मा की संतुष्टि की निमित्त कर्मकांड किए जाने हों। राहुल बाबा के सलाहकार ऐसी ही गल्तियों के लिए जाने जाते हैं। कामरेड ही हैं न। कांग्रेसी तो हैं नहीं मूल रूप से।     

सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले इस सप्ताह चर्चा में रहे। पहला फैसला उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव को लेकर था दूसरा उत्तराखंड के हल्दवानी में रेलवे की कथित जमीन पर अर्से से काबिज लोगों को हटाए जाने संबंधी उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले पर स्टे का। योगी आदित्यनाथ की सरकार के लिए राहत वाली बात है और पुष्कर सिंह धामी के लिए मुश्किल भरी। उन्हें आगे भी चुनौतियां झेलनी पड़ेंगी। पंजाब गर्मा रहा है धीरे-धीरे। आम आदमी पार्टी की सरकार ला-एंड आर्डर के मोर्चे पर विफल दिख रही है। आखिर थानों में बंकर बनाए जाने की नौबत को तो हम इसी रूप में ही देख सकते हैं न। 


प्रदेश में ग्लोबल इनवेस्टमेंट समिट को सक्सेस बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार की मशीनरी पूरी तरह सक्रिय है। कितनी राशि का निवेश होगा, अभी कोई भी यह बताने की स्थिति में नहीं है। मेरे एक साथी बता रहे हैं कि अकेले प्रयागराज के आसपास 30 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश आएगा। फरवरी के आखिरी महीने में ही स्थिति (सरकारी दावे के अनुसार) साफ हो पाएगी।   

संगमनगरी मेंं धर्म-अध्यात्म का सबसे बड़ा समागम माघ मेले के रूप में शुरू हो गया है। आमतौर पर यह मकर संक्रांति से शुरू होता है, लेकिन इस बार पौष पूर्णिमा पहले ही आ गई मकर संक्रांति से। पांच से छह डिग्री सेल्सियस तापमान में पावन त्रिवेणी में डुबकी लगाना आसान नहीं रहता, लेकिन आस्था की ऊर्जा तन को झंकृत कर देती है श्री हरि की तान में बजने के लिए। 



गंगा मैया की जय ....। 

रविवार, 21 मार्च 2021

मन का कोना तो जानता है सच

 रविवार का दिन थोड़ा सुकून वाला होता है। चाहता हूं खूब अखबार पढ़ूं लेकिन इतना समय नहीं मिल पाता। वैसे हमारे और प्रतिद्वंदी अखबारों में आज बहुत कुछ है। हर पंक्ति हर वाक्य हर शब्द तो जेहन में समा नहीं पाता लेकिन कुछ बातें समा ही जाती हैं। आज भी ऐसा है। जाने माने स्तंभकार का कालम पढ़ा। हिंदी पत्रकारिता का श्लाका पुरूष मानता हूं उनको। हैंड कंपोजिंग के जमाने से लेकर डेस्कटाप और लैपटाप तक की पत्रकारिता और विचार के मोर्चे पर वह रोल माडल रहे हैं हमारे जैसे कई पत्रकारों के लिए। उनकी विचारधारा, अखबार की पालिसी से कई बार इत्तेफाक नहीं रख पाता लेकिन आज तसल्ली हुई। लगा कि खेमा, विचारधारा कुछ भी हो पत्रकारीय कलम कभी न कभी सच लिख ही देती है। यह आपको पसंद आए अथवा नापसंद। 

तो मैं बात कर रहे थे लिखे हुए हर्फों की। यह हर्फ आज कोरोना के एक साल के इतिहास पर हैं। वाकई गुजरा साल हममें से तमाम लोगों के लिए किसी दुस्वप्न से कम नहीं रहा है। मेरे लिए तो पिता जी का देहावसान व्यक्तिगत क्षति है, तमाम लोगों ने किसी अपने को खोया है। कुछ लोगों ने पाया भी होगा, इससे इन्कार नहीं कर सकता। खैर, स्तंभकार ने अपने विश्लेषण में पाया है कि भारत की स्थितियों के मद्देनजर जो कुछ मार्च 2020 में किया गया, उसकी ही बदौलत हमारे देश मेंं स्थितियां बहुत कुछ नियंत्रित रहीं। 136 करोड़ की अनुमानित जनसंख्या वाले देश में अब तक डेढ़ लाख से कुछ ज्यादा लोग ही काल कवलित हुुुए हैं। सवा करोड़ के आसपास लोग संक्रमित हुए और मौजूदा समय में कुछ लाख को छोड़ दें तो बाकी लोग सही सलामत अपने परिवार के बीच हैं। वैसे जिन्होंने लाकडाउन की आलोचना की थी, उन्हें यह बात आज भी समझ में नहीं आएगी। उनके दिमाग में सरकार के विरोध का कीड़ा कुलबुला रहा है मई 2014 से। यह कीड़ा कोरोना ही मार सकता है। ऐसे लोगों के लिए मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि वह सरकार के किसी भी दिशा निर्देश को नहीं मानें। 

अंत में मुंबई । परमबीर सिंह के लेटर बम का धमाका दूर दूर तक सुनाई दे रहा है। सवाल यह नहीं है कि गृहमंत्री अनिल देशमुख की करतूत मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे जानते थे अथवा नहीं, सवाल यह है कि क्या नैतिकता मर गई है राजनीति में। महज एक लाख रुपये की रिश्वत लेते पकड़े गए बंगारू लक्ष्मण ने भाजपा के अध्यक्ष पद सेे इस्तीफा दे दिया और पार्टी शर्म से गड़ गई थी, लेकिन यहां एक मौजूदा अधिकारी वाट्सएप चैट के साथ प्रमाण दे रहा है और उसे झुठलाने की बेशर्म कोशिश की जा रही है। इस प्रसंग में  टिवटर पर आ रही प्रतिक्रियाएं तसल्लीबख्श हैं। जनता रूपी जनार्दन चोरों को पहचान चुकी है, कानून पहचाने अथवा नहीं। मेरा आकलन यह है कि आर्थिक राजधानी को साजिशों का शिकार बना कर देश को अस्थिर करने का कुचक्र रचा गया है। जो बिकाऊ थे, वह इस कुचक्र में फंस गए हैं। वैसे उम्मीद यही है कि जिस तरह परमबीर का जमीर जागा है, वैसे ही बिके हुए दूसरे लोगों का भी जमीर जागेगा। गंदगी साफ होगी। यह होना भी चाहिए। बहुत हो गया। सत्ता सिर्फ वसूली के लिए नहीं बननी चाहिए। जो भी ऐसा करे, उसका सत्यानाश हो। 

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

जिंदगी यूं ही चलती रहे

बहुत दिन बाद आज कागद कारे कर रहा हूं। वर्ष 2021 की सबसे पहली पोस्ट है यह। इसे लिखते हुए बाबू जी को भूल जाऊं, यह हो नहीं सकता। बाबू जी हमारे बीच अब सशरीर नहीं हैं। उनकी यादें हैं, बातेंं हैं । पहली अक्टूबर 2020 को वह अनंत लोक में चले गए। हमें छोड़ कर। फिर भी बीते शुक्रवार को संगम में डुबकी लगाई तो एक उनके नाम से भी थी। जितनी भी गंगा में नहाया हूं, बाबू जी, अम्मा, बाबा, बड़की अम्मा (आजी) नाना, नानी और बुआ के नाम से भी डुबकी लगाई है। और भी जितने रिश्ते हैं खून के, उनके नाम से भी डुबकियां लगाई हैं सुरेश पांडे नामधारी शरीर ने। करूं क्या संस्कारों में यह मिला है। जब तक इन विभूतियों के आशीष से ऐसा सौभाग्य मिलता रहेगा, उनके नाम की डुबकी लगती रहेगी। यह बड़ा आत्मिक संतोष देती है। बाबू जी कहा करते थे कि संतोष से बड़ा धन कुछ नहीं है। सो उनकी सीख जीवन में उतार ली है, जो मिला उसके लिए भी ईश्वर को धन्यवाद देता हूं, जो नहीं मिला उसके लिए भी। जिंदगी यूं ही चलती रहेगी। ऐसा विश्वास है। ईश कृपा ही जीवन की गाड़ी सुगमता से चलाएगी। इसमें सुख भी होगा और दुख भी। 

बाबू जी जब तक सशरीर थे, गंगा स्नान के बाद उनसे फोन पर पैलगी कर लेता था। दूसरी तरफ से आशीष मिलता था। कहते थे भाग्य वाले हो-गंगा में डुबकी लगा लेते हो, माघ महीने में। वह भी गंगा में डुबकी लगाकर आल्हादित होते थे। पांच साल पहले उन्होंने डुबकी लगाई थी माघ मेले में। तीन रात गुजारी थी स्वामी जी के शिविर में। चलने मेंं तकलीफ थी। इसके बावजूद उत्साह से भरे थे। बहुत खुश थे। घर आए तो बोले -मन प्रसन्न हो गया। फिर आने का वादा किया था, लेकिन ईश्वर ने उनके पैरों की शक्ति छीन ली थी। बनारस में दीपू के निवास पर रहने लगे तो उतना ही चल फिर पाते थे, जितना दैनंदिनी के लिए जरूरी था। इधर जब मैं गंगा में नहाता और उन्हें पता चलता कि मैंने डुबकी लगा ली है तो खुश हो जाते थे। वाराणसी में जिस दिन उन्होंने आखिरी सांस ली, मैं उस मौके पर नहीं था। प्रयागराज से निकला जरूर, लेकिन उनकी पार्थिव देह से ही मुलाकात हुई। संतोष इसी बात का है कि जैसा भोपाल से वाराणसी आने के बाद मैंने कहा था, कुछ वैसा ही हुआ। पिशाच मोचन स्थित उमापति यादव के मकान में रहते समय एक बार मैंने कहा था कि बाबू जी आपकी आखिरी विदाई  महाश्मशान मणिर्काणिका घाट से ही होगी। संयोग देखिए कि वहीं उनकी पार्थिव देह पंचभूत में विलीन हुई। अंतिम समय में मैंने दीपू, शुभम व आयुष के साथ कंधा दिया। गंंगा में स्नान करा उनकी पार्थिव देह चिता पर रखी। फिर अस्थियां विसर्जित कीं। उसके बाद वाराणसी मेंं ही त्रयोदशाह कर्म हुआ और पैतृक गांव स्थित निवास में बरसी। उनकी कृपा ही थी कि सब कुछ निर्विघ्नता से पूर्ण हुआ। न सर्दी सताई न गर्मी। बरसी के लिए गांव पहुंचे तो वहां करीब छह माह से बंद पड़े घर में विषखोपड़ा भी निकला, लेकिन नुकसान नहीं हुआ। नवंबर से अब तक फिर गांव जाना नहीं हो सका है। माघ मेला खत्म होते ही फिर जाऊंगा। कहते हैं ना कि खाली घर शैतान का...। इसलिए जाना जरूरी है।  उसे शैतान का घर नहीं बनने दूंगा, जब तक सामर्थ्य है। अखबार की नौकरी में समय कहां मिलता है? लेकिन कोशिश जरूर रहेगी। आगे ईश्वर जानें। 

अब थोड़ी सी देश दुनिया की... 

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हार गए हैं। जोय बाइडन अब अमेरिका के राष्ट्रपति हैं। भारत को लेकर अमेरिकी नीति में क्या-क्या बदलाव आएंगे, यह बात देखने लायक होगी। समय धीरे धीरे इसे साफ करेगा। पाकिस्तान में विपक्षी दल इमरान खान की सत्ता के खिलाफ एकजुट हो चले हैं। वहां धरना प्रदर्शन जारी हैं। अपने भारत में कुछ किसान आंदोलित हैं नए कृषि कानून के विरोध में। यह आंदोलन बहुत लंबा खींचने का इरादा है। सरकार की तरफ से यह स्पष्ट किए जाने के बावजूद कि यह कानून वैकल्पिक है। जिसे मानना हो माने, जिसे नहीं मानना हो वह नहीं माने। इसके बावजूद जिस तरह की हठधर्मिता कथित किसानों की तरफ से दिखाई जा रही है, उससे साफ है कि इसके पीछे गहरी साजिश है। मैंने फेसबुक पर आशंका जताई थी कि 26 जनवरी को हिंसा होगी, किसान नेताओं ने जो वादा किया है, वह धरातल पर नहीं टिकेगा। सोनभद्र में राबर्टसगंज निवासी पत्रकार राजेंद्र द्विवेदी ने मेरी आशंका की हंसी यह कहते हुए उड़ाई थी कि जिन्होंने वादा किया है वह भगवाधारी नहीं हैं, इसलिए निश्चिंत रहें। दरअसल मैंने 1992 के कारसेवा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा था कि तब भी वादा कुछ ऐसा ही था, लेकिन जो हुआ वह इतिहास में दर्ज है। मैं अब इस बात पर गर्व महसूस कर सकता हूंं कि मैंने जो आकलन किया था वह सटीक निकला।  ज्योतिषविद मित्र अमित बहोरे ने मुझे बताया है कि मकर राशि में आठ सौ साल बाद केतु व शनि बैठे हैं, इसलिए उपद्रव होते रहेंगे अप्रैल तक। यू-ट्यूब पर सक्रिय एक और एस्ट्रोलाजर ने कुछ ऐसा ही कहा है। अतएव मैं यह मान कर चल रहा हूं कि इस अवधि तक आंदोलन जारी रहेगा।             

रविवार, 7 जुलाई 2019

ई बैकुंठपुरी है भाय...

ई बैकुंठपुरी है भाय...
बैकुंठपुरी की उस बैठक में मिश्रित भाव था। जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु मंद मंद मुस्करा रहे थे। संहारकर्ता भोले भंडारी अपने में 'टुन्नÓ थे। बस जगत के रचियता ब्रह्मïा जी के मन में उमड़ घुमड़ चल रही थी। तेज-तेज चल रही थी, उन बादलों की तरह जो उड़ते हैं आसमान में तेजी से पर टिकते नहीं। समझ में नहीं आ रहा था कि पृथ्वीलोक से आई सुरेंद्र नामक जीव (आत्मा) का किया क्या जाए?
...सुरेंद्र! पत्रकार था धरती पर। आर्यावर्ते जंबू दीपे भारतखंडे नामक खंड पर। ईमानदारी का चोला उसने बचपन से ओढ़ रखा था। असल में बेईमानी का मौका मिला ही नहीं था उसे, अथवा यह कह लें कि वह डरपोक था। साहस ही नहीं जुटा सका। बचपन में शेख चिल्ली टाइप कल्पनाओं में जीता था। उसे लगता था कि जिंदगी में दूसरों का भला करने से भला ही होता है, पर यह उसकी भूल साबित हुई कालांतर में। पढ़ाया यही गया था। जिन जिन के लिए उसने जो कुछ भी किया सब उसे 'चूतियाÓ समझने लगे। हालांकि सुरेंद्र को हमेशा यही लगता था कि वही होशियार है, समझदार है। वह जो कुछ है जैसा भी है प्रकृति की कृपा से है। प्रारब्ध से बढ़ कर कुछ नहीं। जब भी अवसाद में होता, मन को संतोष देने के लिए इसी प्रकार की बातें सोचता। पर सोचने तक ही रह जाता। कर्म करता-फल की इच्छा करता। तरक्की व अच्छे वेतन रूपी फल की, लेकिन वह उसको नहीं मिलती। थोथे आदर्श गढ़ता। उसके सहकर्मी उसके मुंह पर ठकुरसुहाती करते लेकिन पीठ पीछे... बस गरियाते।
सुरेंद्र किन कर्मों की वजह से बैकुंठपुरी ट्रांसफर हुआ था, यह उसे याद नहीं आ रहा था। वह तो ब्रह्मïा जी की तरफ देख रहा था। जिन्हें उसके अगले जन्म का फैसला करना था। अट्ठासी लाख योनियां हैं, बड़े भाग (भाग्य) थे तो कलिकाल (कलियुग) में एक युग मानव रूप में बीत चुका था सुरेंद्र का।
श्रीहरि ने ब्रह्मïा की जी तंद्रा तोड़ी-पूछा? ब्रह्मï कुछ सोचा...इसका?
ब्रह्मïा जी बोले, यही तो नहीं समझ पा रहा हूं नारायण। का करूं इसका, सरवा हमेशा गरियाता था मुझे बात बात पर। कहता था -ये दुनिया, ये महफिल मेरे काम की नहीं..। अब इसको किस दुनिया में भेजूं...। दारू पी लेता था तो सब कुछ भूल जाता था लेकिन इतना लंठ था कि गले तक गटक लेता था, इसलिए इसकी किडनी खराब हो गई। सिगरेट -तंबाकू भी इसने इतनी भकोसी कि पूछिए नहीं। मैं नहीं चाहता कि अगले जनम में भी यह भोगे और मुझे गरियाए।
श्री हरि फिर मुस्कराए । बोले तब क्या करोगे? करना तुम्ही को है इसका जो भी करना है।...
ब्रह्मïा जी समझ गए कि श्री हरि अंटी ढीली नहीं करने वाले। बुद्धि दौड़ाई और फिर बोले- प्रभु यह अकेले मेरे बस का प्राणी नहीं है। चोर है चाई हैं, पर स्त्री लोलुप भी है, जब भी सुंदर महिलाएं देखता था, लïट्टू हो जाता था। हां, उनका बिगाड़ कुछ नहीं पाता था। विगत जन्म में राजा नहीं था लेकिन राजसी ठाठ के बारे में सोचता था...! और हां, यदा कदा मेरे साथ-साथ आप लोगों को भी गरियाता था।
हम लोगों को क्यों? श्री हरि ने विस्मय के साथ पूछा...!
आपको इसलिए क्योंकि आप जगत के पालन कर्ता हैं और आपने इसके लिए कुछ नहीं किया। माना कि मैंने इसे भाग्य नहीं दिया लेकिन फिर भी यह कभी कभी विष्णु सहस्त्रनामस्रोत पढ़ता था। आपकी सहधर्मिणी लक्ष्मी की कृपा की प्राप्ति के लिए वह कनकधारा स्रोत भी पढ़ता था, जिसे पढ़कर शंकराचार्य ने सुवर्ण वर्षा करा दी थी।
श्री हरि को सृष्टिकर्ता के रचियता की इस बात में व्यंग समझ में आया। बोले...मैं क्या करता-आपने तो इसको भाग्य दिया ही नहीं? आपकी लेखनी मैं कैसे मिटाकर इसकी मदद करता? आपका अनादर नहीं हो जाता। खैर यह बताओ भोलेनाथ को किसलिए गरियाता था?
--भोलेनाथ को इसलिए कि उन्होंने इसे तीन बार तोड़ा, लेकिन इसकी जिंदगी बख्श दी। इसे जिंदगी के 52 साल दे दिए। एक बार एक्सीडेंट करवाया तो बख्श दिया। अरे इसे मार दिए होते अथवा इतने नशे में रखे होते कि कुछ सोच ही नहीं पाता। जब सोच ही नहीं पाता तो गरियाता कैसे?
शिवजी मुस्करा कर इतना ही बोले-जिंदगी के दिन तो आपने तय किए थे ब्रह्मï? मैं क्या करता। वैसे भी मैं ठहरा आशुतोष औघड़दानी। इस पर जब कभी प्रसन्न हुआ थोड़ा बहुत दे दिया नशा पाती के लिए।
...तो क्या मैं ही दोषी हूं इस जीव की बीती जिंदगी के लिए? अचरज में आए ब्रह्मïा जी ने पूछा?
हमें तो ऐसा ही लगता है--श्री हरि और आशुतोष औघड़दानी एक साथ बोले।
चलिए मैंने मान लिया कि मैंने इसके इस जनम में भाग्य नहीं दिया था, लेकिन अगले जन्म के लिए ऐसा क्या करूं कि यह गरियाए नहीं? ब्रहमा जी बोले...।
-यह आप ही तय करें, यह आपका केआरए (की-रिजल्ट-एरिया) है। हमारा नहीं। अच्छा अब जल्दी फैसला करें। बैकुंठपुरी खाली कराएं सुरेंद्र नामक इस गलीज जीव से....। हमारा वक्त जाया ना करें।
ठीक है तो इसे फिर से पत्रकार के रूप में एक मौका दिया जाता है...अपनी भूल सुधारने के लिए।।। ब्रह्मïा जी ने कलम उठा ली, अगले जनम का लेखा जोखा लिखने के लिए....।
सुरेंद्र की तंद्रा टूटी -त्रिदेव सामने थे। जोर से चीखा -प्रभु अगले जनम मोहे पत्रकार न कीजो...। नेता बना दो...सुअर बना दो, चींटी बना दो, शेर बना दो, कोबरा सांप बना दो...गधा बना दो !!!
ब्रह्मïा जी हंसे।  बोले नहीं। तुम्हारे कर्म इतने अच्छे भी नहीं। तुम्हारी यही सजा है। जाओ अगले जनम में भी कलम घसीटू बनो। गाली खाओ। घर परिवार, दोस्त यार सबकी। और हां जितना बन पड़े, मुझे गरियाओ।
....बैकुंठपुरी की बैठक खत्म हो चुकी थी।  

रविवार, 31 मार्च 2019

जिंदगी तू तो नाम है उम्मीदों की...

होली गुजर चुकी है। उसकी शुभकामनाएं ब्लाग पर नहीं दे सका। खैर बहुत दिनों बाद ब्लाग पर हूं। दरअसल कुछ लिखने का मन नहीं होता इन दिनों। फिर भी दिल है कि मानता नहीं...। समाज, राजनीति पर फेसबुक पर कुछ टिप्पणियां की, लेकिन अलग अलग विचारधाराओं का चश्मा पहनने वालों की टिप्पणी ऐसी रहीं कि उस मंच पर भी खुद को संकुचित करना ही बेहतर मानता हूं फिलहाल। लोकसभा चुनाव के नतीजों तक यही खामोशी धारण किए रखूंगा। अभी यही कह सकता हूं। मौजूदा दौर में एक तरह से वीतराग है जीवन में। उम्मीदों का जिंदा होकर मरना और मर कर जिंदा होना।
हर दिन कुछ नया सोचता हूं। पर खटराग वही पुराना। 10 बजे के करीब सोकर उठने के बाद अखबार। समीक्षा। साथियों की, अपने काम की। फिर दोपहर में दफ्तर, रात में दफ्तर। आधी रात वापसी। कुछ निवाला पेट में जाता है। इसके बाद टिवटर, वाट्सएप होते हैं साथ में। ब्रह्म बेला में नींद लगती है। उससे पहले नहीं। इधर बीच अवकाशों का पता नहीं है। पहला कुंभ था, अब चुनाव आ गया। बीच में दो दिन का अवकाश मिला। इसमें एक साप्ताहिक अवकाश जोड़ दूं तो तीन दिन। एक छोटी सी संक्षिप्त यात्रा। एक वैवाहिक आयोजन में शिरकत। उसके बाद फिर दफ्तर। 26 जनवरी, होली अवकाश जोड़ दें तो मार्च एंड तक पांच दिन छुट्टी। ऐसे में यदि सोचता हूं कि नीरस जिंदगी कब ढोऊं ? तो क्या गलत सोचता हूं, मार्गदर्शन करेंगे। वैसे जब भी ऐसा सोचता हूं, मन के किसी कोने में आशा की किरण फूटती है कि जब घूरे के भी  दिन बहुरते हैं तो मेरे क्यों नहीं बदलेंगे। जरूर बदलेंगे। यहां यह भी साफ कर दूं कि निराशावादी कतई नहीं हूं। आप भले चाहे जो मानें मुझे। असल में आज की जिंदगी में आप क्या हैं, इससे अधिक महत्व इस बात का होता है कि लोगों की धारणा क्या है आपके प्रति। मुझे लेकर भी ऐसी धारणा बन गई है कि निगेटिव एटीट्यूड है। इसका इलाज मेरे पास नहीं। दिन जरूर बदलेंगे। आखिर जिंदगी का दूसरा नाम ही है उम्मीद। बस सितारों को चमत्कार दिखाने दीजिए। दिल का एक कोना कहीं ना कहीं इसका संकेत दे रहा है। 

रविवार, 20 मई 2018

साधौ संतन में रगरा भारी...

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शनिवार को कुछ घंटों के लिए शहर में थे। देखने आए थे तैयारी कुंभ 2019 की। एक मुख्यमंत्री के रूप में चिलचिलाती धूप में उनको खड़ा होकर कार्यों का मुआयना करते देखना अच्छा लगा। हो सकता है कुछ को यह रस्मी नजर आया हो, फिर भी यह मानने में गुरेज नहीं है कि उनकी चिंता दिव्य आयोजन को लेकर ज्यादा ही है। कम से कम स्थानीय अफसरों से थोड़ा ज्यादा। वैसे यहां यह कहने में भी संकोच नहीं कि अफसर उनकी आंखों में धूल झोंकने में अभी कामयाब रहे हैं। बता दिया कि 39 फीसद काम हो चुका है। यह तब है जबकि हाल के  दिनों में ही हुई प्रयागराज मेला प्राधिकरण की बैठक में अफसरों की समीक्षा के दौरान ही किसी काम की प्रगति आठ फीसद मिली  थी तो किसी की 20 से 25 फीसद। पता नहीं अफसरों का पैमाना क्या है... सीएम को बताने के लिए कुछ और, आपस में मशविरे के दौरान कुछ और। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, राज्य सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह, नागरिक उड्डयन मंत्री नंद गोपाल नंदी शहर से ही हैं, तब भी अफसर किस तरह सीएम की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब हो जा रहे हैं, यह दिलचस्प है। कुंभ के लिए लगभग छह हजार करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर काम होना है। फिलहाल डेढ़ हजार करोड़ रुपये आवंटित भी हो गए हैं, लेकिन जहां देखिए गड्ढे ही दिखते हैं।  यही कुंभ की तैयारियों का सच है, पर साधौ हमें चुप ही रहना चाहिए। कुंभ खत्म हो जाए तो कोई नया अरूण शौरी यह स्कूप देगा कि कुंभ में भी कामनवेल्थ 2010 दोहराया गया। मेरी चिंता तो आने वाली बरसात के दौरान होने वाली दिक्कत को लेकर है। अभी अफसरों से कहेंगे तो यह भी सुनने को मिलेगा कि बहुत आए -गए, कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया हमारा, जैसे हम अंग्रेजी हुकूमत में थे, वैसे ही काले अंग्रेजों की देसी हुकूमत में। व्यवस्था वैसी ही रहेगी चाहे भाजपा वाले सरकार में हों अथवा कांग्रेस, सपा व बसपा वाले। खालिस कामरेडों की सरकार हो तब भी भ्रष्टाचार और काहिली वाला रोग नहीं दूर होगा। अन्ना गन्ना चूसते रहें। केजरीवाल खांसते रहें तब भी।
करेंगे क्या, यही हमारे खून में है। हर कोई एक दूसरे को दीया दिखाता है उजाले का। आखिर वह संत जो ठहरा। संत माने ईमानदार, त्यागी संतोषी। आप किसी से भी पूछ लीजिए वह यही कहेगा कि हुजूर मैं तो सही हूं, बस सामने वाला गलत है। हम भारतीयों की दिक्कत यही है। आत्मविश्लेषण करते नहीं। आलोचना पर आपा खो देते हैं,  चूंकि संतई का अहं होता है मन के किसी कोने में, इसलिए हमेशा रगरा झगरा चलता है। अब भगवाधारी संतों को ही ले लीजिए। इलाहाबाद में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के दो शीर्ष पदाधिकारी
रहते हैं। स्वामी नरेंद्र गिरि व महंत हरि गिरि।  परिषद की एक बैठक में फैसला होता है कि अफसर मनमानी कर रहे हैं, इसलिए कुंभ में शाही स्नान का बहिष्कार किया जाएगा। अफसरों के हाथ पांव फूलते हैं। संत मुख्यमंत्री भी विचलित होते हैं। खैर उनके (सीएम के) प्रयाग पर चरण रखने से पहले मामला सुलट जाता है। शाही स्नान के बहिष्कार का फैसला वापस हो जाता है। संत सीएम भी खुश हो जाते हैं इसलिए प्रयाग आने पर वह मठ बाघंबरी गद्दी में भी पहुंचते हैं। मलमास चल रहा है, सो भोलेनाथ की पूजा करते हैं और यहां बना प्रसाद ग्रहण करते हैं। अब  संत भी खुश तथा उनके भक्त भी। अखबारों में बैठे लोग अपने -अपने हिसाब से खबर छापते हैं। मुझे बताया गया कि पहली बार कोई संत मठ बाघंबरी में पहुंचा है। महंत नरेंद्र गिरि इससे पहले वाले सीएम अखिलेश यादव के भी खास थे। हां, यह बात अलग है कि अखिलेश कभी मठ में नहीं आए। इसी मठ में सचिन दत्ता नामक एक व्यक्ति को भी महामंडलेश्वर की उपाधि दे दी गई थी, जो माल में डिस्कोथेक और पब चलाते थे एक दौर में। हंगामा मचा तो उपाधि वापस ले ली गई। एक और तथ्य।  कुछ और संतों को अखाड़ा परिषद ने फर्जी संत घोषित कर रखा है। मुझे लगता है कि असली संत कौन हैं, उनकी परिभाषा क्या हो, इस तय कर पाना वाकई मुश्किल भरा है।  कालनेमि पहले भी थे अब भी हैं आगे भी होंगे। सनातन धर्म की चिंता करने वाले चिंता से चिता पर जाए, उनकी बला से। राम-राम बोल कर पराया माल हड़पने वालों की कमी नहीं रहेगी।
खैर फिर लौटें आने वाले  कुंभ की तरफ। दुनिया भर के सबसे बड़े धार्मिक समागम के निमित्त संतों की निगरानी कमेटी बनाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री ने मान लिया है। एक प्रस्ताव और था वह था राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने का,  पर वह पूरा नहीं हो सका है। देखें यूपी के संत सीएम इसे मानते हैं अथवा नहीं। मप्र में शिवराज सिंह चौहान ने तो यह पहल कर दी है। राहुल गांधी समेत विपक्ष के सारे नेताओं को मेरा यह सुझाव है कि उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह घोषणा करनी चाहिए कि यदि उनकी सरकार बनी तो संतों को वीवीआइपी मान कर मंत्री पद का दर्जा दिया जाएगा।  पूज्यनीय व सम्मानीय संतों का राजरोग गजब का है, इसका इलाज नेताओं के पास है, यह जानना सुखद लगा। समाज में संतों की भूमिका क्या होनी चाहिए, इस पर कौन विचार करेगा। जाहिर है मुझ जैसा अज्ञानी तो कदापि नहीं, लेकिन इंटीलेक्चुअल को तो आगे आना ही होगा।   हिंदुत्व के लिए, सनातन मतावलंबियों के लिए यह विडंबना ही कही जाएगी कि संतों में संतोष भर नहीं दिखता। इसका उत्तर मुझे यही समझ में आता है कि साधो संतों में रगरा भारी। बड़े बड़े राजा महाराजा , महराज को संतुष्ट नहीं कर सके हैं तो संत सीएम की क्या बिसात। वाराणसी से लेकर इलाहाबाद, हरिद्वार जितनी भी धार्मिक जगहें हैं, वहां भगवाधारियों की सरकार होने के बाद भी संतों का असंतोष शायद इसीलिए है, क्योंकि हर किसी को कुछ चाहिए, सिवाय धर्म-अध्यात्मक के मार्ग के जरिए लोगों को सदमार्ग दिखाने के। तो चेलों जोर से बोलो -संतन की जय।  

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

पुस्तक दिवस पर पुरानी यादें

नमस्कार।
विश्व पुस्तक दिवस (23 अप्रैल) से एक दिन पहले  ब्लाग का यह पेज काला कर रहा हूं। बचपन की स्मृतियों के साथ। जबलपुर में राजकीय पुस्तकालय की पता नहीं कितनी सुबह शाम याद आ रही हैं बता नहीं सकता। छुटपन में अमर चित्र कथा सीरीज की कामिक्स। किशोरावस्था हुई तो कांदिबनी, दिनमान, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान। रविवार, दिनमान इत्यादि- इत्यादि। कंप्यूटर व इंटरनेट के दौर में आने के बाद दो चार पुस्तकें ही ऐसी रहीं जिन्हें कायदे से पढ़ा। इंडिया टुडे समय समय पर पढ़ता हूं, लेकिन करीब दो साल से निरंतरता टूट गईहै। खैर जिन कालजयी रचनाओं को पढ़ा है हाल के वर्षों में, इसमें एक है रागदरबारी। वाराणसी में हुए हादसे के बाद रामचरित मानस से नाता जोड़ लिया है। भरसक कोशिश रहती है कि कुछ चौपाइयां जरूर पढ़ लूं, हनुमान चालीसा पाठ के साथ।
पढ़ने लिखने से नाता पता नहीं कैसे आया... लेकिन अब भी खूब पढ़ना चाहता हूं। किसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए नहीं। स्वान्तः सुखाय मूल में रहता है।  मस्तिष्क की ममोरी कार्ड तथ्यों, बातों को पहले जैसा ग्रहण नहीं करती। इसकी वजह संभवतः उम्र का फेर भी है। अखबारों को सरसरी तौर पर पढ़ता हूं। गहराई से पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। मेरा मानना है कि एक अखबार के सारे पेजों पर दी गई पूरी सामग्री शायद ही कोई पढ़ पाता हो। यदि कोई यह दावा करता है तो कम से कम मैं उसकी इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता। निश्चित तौर पर नई पीढ़ी का किताबी पठन पाठन से नाता टूटा है। इंटर व कालेज स्तर पर बच्चे  पढ़ते हैं लेकिन कोर्स तक ही सीमित रहते हैं। ऐसे छात्रों को मैं सलाह देता हूं कि हिंदी में भी गद्य पद्य पढ़ें, लेकिन वह कहते हैं कि कोर्स का दवाब इतना है कि कला से जुड़े विषयों के लिए उनके पास समय नहीं।
किताबों से बेरुखी की एक वजह मुझे यह समझ में आती हैं कि यह महंगी हो चली हैं। साथ ही अंतर्विरोध भी पैदा करती हैं। यदि गांधी जी अहिंसा की बात कहते हैं तो हनुमान जी जैसे को तैसा जवाब देने की। फिर भी एक समझ तो पैदा होती ही है। आज 200 पेज की किताब के लिए दो सौ रुपये खर्च करना सबके बस की बात नहीं। फिर इन्हें सहेज कर रखना भी किसी चुनौती से कम नहीं। सेल्फ इत्यादि सबके घर में नहीं होते। अपन जैसे खानाबदोश के पास तो आज तक यह नसीब नहीं है। जबलपुर में पिता जी ने लकड़ी की आलमारी बनवाई थी, किताबें रखने के लिए, लेकिन चूहों का खौफ था। न जाने कितनी किताबें कुतर गए वह। 

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...