रविवार, 3 जनवरी 2016

अब दिन यादों को संजोने के

वर्ष 2016  शुभ हो। हम सभी के लिए।खास तौर पर आर्थिक, सामाजिक व सेहत के मोर्चे पर । आज रविवार है और जब अपने ब्लाग पर यह पंक्तियां लिख रहा हूं तब पठानकोठ एयरबेस में हुए आतंकी हमले की खबर टेलीविजन पर चल रही है। हमारे शहीदों की संख्या 11 हो गई है अब तक। छप्पन इंच का सीना वालों की सरकार इसका क्या जवाब देती है, मुझे भी इसका इंतजार रहेगा देश के अन्य लोगों की तरह। खैर। कुछ ही देर पहले संजीव सर (अमर उजाला वाराणसी में संपादक थे हमारे) से बात हुई थी मोबाइल पर। उन्होंने आशीर्वाद दिया, नए साल की मंगलकामनाओं के साथ। मैंने उस मंगल कामना को सिर पर धर लिया। बड़े-छोटे मित्रों, शुभचिंतकों की शुभकामनाएं ही हैं कि कुछ मानसिक तनाव के बाद भी यहां ब्लाग काला कर रहा हूं। पिता जी गुजरते साल में एक बार फिर चिंता का सबब बन गए हैं हम सबके लिए। उसके बाद भी। गांव में तीस दिसंबर को बाबू जी गिर गए थे पानी भरते समय हैंडपंप के पास। बाएं हाथ की कलाई में फ्रैक्चर हो गया और कमर में क्रेक। मैं उन्हें नहीं ला सका इलाहाबाद। दीपू के पास हैं वह वाराणसी में। हड्डी की चोटों के लिए विख्यात चिकित्सक संजय मारवाह कर रहे हैं उनका इलाज। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह जल्द ही फिर सामान्य हों जाएं। उनको खोने की कल्पना मात्र से सिहर जाता हूं। घर में किससे कहूं यह सब? शुभम-आयुष शायद ही मेरी पीड़ा को समझ सकते हैं। मैं उनका नालायक बेटा हूं ना। मना किया था बाबू जी को वाराणसी से जाने के लिए। छोटे भाई ने यह कह कर मुझे सांत्वना दी कि क्या वाराणसी में हादसे नहीं होते। लेकिन मन तो मन है घोड़ों की तरह दौड़ता है। 
संजीव सर से बातचीत के दौरान मैंने कहा कि सर, अब पता नहीं क्यों मन कमजोर पड़ जाता है, विपत्ति में। सितंबर में सरहज गुजरीं नवंबर में बुआ जी। दस साल पहले यदि कहीं अपना घर बनवा लिया होता तो पिता जी को साथ ही रखता। आप थे लोन भी पास हो गया होता अासानी से। वह (संजीव सर) बोले, हां- तब अतुल जी थे, वाकई में अतुलनीय। उन्होंने मेरी किसी भी बात को अनुसुना किया हो, याद नहीं आता। काम करने वालों की कद्र वह जानते थे। मैंने कहा, सर-संयोग देखिए आज अतुल जी की पुण्यतिथि है पांचवी। हम उनका जिक्र कर रहे हैं। मेरा अतुल जी से सीधा बावस्ता कभी नहीं रहा। एक बार मिर्जापुर के उनके प्रवास से जुड़ा प्रसंग ही सुना हूं, अभिभूत करने वाला। उन्होंने वाराणसी दफ्तर में किसी को नहीं बताया था। चुपचाप आए, आम दर्शनार्थियों की भांति दर्शन कर चले गए। आज ऐसे कितने मालिकान हैं? इस सवाल का जवाब मेरे लिए कठिन है। अमर उजाला अब भी है, पर अतुल जी नहीं हैं। संजीव सर ने बताया कि एक बार तुम्हारा (मेरा) जिक्र मैंने अतुल जी से बोर्ड की बैठक के दौरान किया था। अच्छे सहकर्मी के रूप में। कुछ बेहतर करने की तैयारी थी, लेकिन मुई किस्मत आड़े आ गई। 
अमर उजाला में अच्छे दिन ज्यादा थे। जागरण में भी बहुत प्यार मिला है। अमर उजाला के साथी रजनीश त्रिपाठी ने यह नियुक्ति दिलाने में मदद की। संपादकीय प्रभारी राघवेंद्र चड्ढा जी से भी स्नेह ही मिला। आशुतोष सर (आशुतोष शुक्ला) सर का तो कृपा पात्र मैं खुद को मानता ही हूं। उन्होंने एक्सीडेंट के बाद जिस तरह से मुझे नई जिंदगी दिलाने में मदद दी, वह कभी नहीं भुलाऊंगा। पत्रकारिता में आज शीर्षस्थ नाम है शशिशेखर जी का। उन्होंने भी मुझे अवसाद के एक दौर से निकाला था। कुछ गलतियां नासमझी मैंने की और उसका खमियाजा आज भुगत रहा हूं। बहरहाल, यह सब बातें आज क्यों? इसे नहीं करना चाहिए। इसलिए विराम देता हूं इसको। विस्तार से इसका जिक्र फिर कभी करूंगा। इस साल मेरा संकल्प पत्रकारिता की अब तक की अपनी यात्रा को क्रमबृद्ध करना रहेगा। तो अगले इतवार से इस क्रम की शुरूआत करूंगा। ऐसा इसलिए क्योंकि अनुभव कहीं न कहीं किसी भी रूप में दूसरों के काम भी आ सकें। यदि लक्ष्मी की किरपा हुई तो मन की यह सरस्वती किसी पुस्तक के रूप में सजेंगी। अमरत्व की प्राप्ति के लिए यह तन और मन कितना साथ देता है, यही बात देखने लायक होगी। दरअसल वक्त रेत के घरौदें की तरह है यह कितनी तेजी से खत्म होता है पता ही नहीं चलता। इसलिए जितना भी समय मिले, उसका सार्थक उपयोग कर लेना चाहिए। अब उम्र के उस दौर में पहुंच भी गया हूं, जहां चीजें करीने से सजाई जानी चाहिए। 

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