रविवार, 20 मई 2018

साधौ संतन में रगरा भारी...

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शनिवार को कुछ घंटों के लिए शहर में थे। देखने आए थे तैयारी कुंभ 2019 की। एक मुख्यमंत्री के रूप में चिलचिलाती धूप में उनको खड़ा होकर कार्यों का मुआयना करते देखना अच्छा लगा। हो सकता है कुछ को यह रस्मी नजर आया हो, फिर भी यह मानने में गुरेज नहीं है कि उनकी चिंता दिव्य आयोजन को लेकर ज्यादा ही है। कम से कम स्थानीय अफसरों से थोड़ा ज्यादा। वैसे यहां यह कहने में भी संकोच नहीं कि अफसर उनकी आंखों में धूल झोंकने में अभी कामयाब रहे हैं। बता दिया कि 39 फीसद काम हो चुका है। यह तब है जबकि हाल के  दिनों में ही हुई प्रयागराज मेला प्राधिकरण की बैठक में अफसरों की समीक्षा के दौरान ही किसी काम की प्रगति आठ फीसद मिली  थी तो किसी की 20 से 25 फीसद। पता नहीं अफसरों का पैमाना क्या है... सीएम को बताने के लिए कुछ और, आपस में मशविरे के दौरान कुछ और। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, राज्य सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह, नागरिक उड्डयन मंत्री नंद गोपाल नंदी शहर से ही हैं, तब भी अफसर किस तरह सीएम की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब हो जा रहे हैं, यह दिलचस्प है। कुंभ के लिए लगभग छह हजार करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर काम होना है। फिलहाल डेढ़ हजार करोड़ रुपये आवंटित भी हो गए हैं, लेकिन जहां देखिए गड्ढे ही दिखते हैं।  यही कुंभ की तैयारियों का सच है, पर साधौ हमें चुप ही रहना चाहिए। कुंभ खत्म हो जाए तो कोई नया अरूण शौरी यह स्कूप देगा कि कुंभ में भी कामनवेल्थ 2010 दोहराया गया। मेरी चिंता तो आने वाली बरसात के दौरान होने वाली दिक्कत को लेकर है। अभी अफसरों से कहेंगे तो यह भी सुनने को मिलेगा कि बहुत आए -गए, कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया हमारा, जैसे हम अंग्रेजी हुकूमत में थे, वैसे ही काले अंग्रेजों की देसी हुकूमत में। व्यवस्था वैसी ही रहेगी चाहे भाजपा वाले सरकार में हों अथवा कांग्रेस, सपा व बसपा वाले। खालिस कामरेडों की सरकार हो तब भी भ्रष्टाचार और काहिली वाला रोग नहीं दूर होगा। अन्ना गन्ना चूसते रहें। केजरीवाल खांसते रहें तब भी।
करेंगे क्या, यही हमारे खून में है। हर कोई एक दूसरे को दीया दिखाता है उजाले का। आखिर वह संत जो ठहरा। संत माने ईमानदार, त्यागी संतोषी। आप किसी से भी पूछ लीजिए वह यही कहेगा कि हुजूर मैं तो सही हूं, बस सामने वाला गलत है। हम भारतीयों की दिक्कत यही है। आत्मविश्लेषण करते नहीं। आलोचना पर आपा खो देते हैं,  चूंकि संतई का अहं होता है मन के किसी कोने में, इसलिए हमेशा रगरा झगरा चलता है। अब भगवाधारी संतों को ही ले लीजिए। इलाहाबाद में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के दो शीर्ष पदाधिकारी
रहते हैं। स्वामी नरेंद्र गिरि व महंत हरि गिरि।  परिषद की एक बैठक में फैसला होता है कि अफसर मनमानी कर रहे हैं, इसलिए कुंभ में शाही स्नान का बहिष्कार किया जाएगा। अफसरों के हाथ पांव फूलते हैं। संत मुख्यमंत्री भी विचलित होते हैं। खैर उनके (सीएम के) प्रयाग पर चरण रखने से पहले मामला सुलट जाता है। शाही स्नान के बहिष्कार का फैसला वापस हो जाता है। संत सीएम भी खुश हो जाते हैं इसलिए प्रयाग आने पर वह मठ बाघंबरी गद्दी में भी पहुंचते हैं। मलमास चल रहा है, सो भोलेनाथ की पूजा करते हैं और यहां बना प्रसाद ग्रहण करते हैं। अब  संत भी खुश तथा उनके भक्त भी। अखबारों में बैठे लोग अपने -अपने हिसाब से खबर छापते हैं। मुझे बताया गया कि पहली बार कोई संत मठ बाघंबरी में पहुंचा है। महंत नरेंद्र गिरि इससे पहले वाले सीएम अखिलेश यादव के भी खास थे। हां, यह बात अलग है कि अखिलेश कभी मठ में नहीं आए। इसी मठ में सचिन दत्ता नामक एक व्यक्ति को भी महामंडलेश्वर की उपाधि दे दी गई थी, जो माल में डिस्कोथेक और पब चलाते थे एक दौर में। हंगामा मचा तो उपाधि वापस ले ली गई। एक और तथ्य।  कुछ और संतों को अखाड़ा परिषद ने फर्जी संत घोषित कर रखा है। मुझे लगता है कि असली संत कौन हैं, उनकी परिभाषा क्या हो, इस तय कर पाना वाकई मुश्किल भरा है।  कालनेमि पहले भी थे अब भी हैं आगे भी होंगे। सनातन धर्म की चिंता करने वाले चिंता से चिता पर जाए, उनकी बला से। राम-राम बोल कर पराया माल हड़पने वालों की कमी नहीं रहेगी।
खैर फिर लौटें आने वाले  कुंभ की तरफ। दुनिया भर के सबसे बड़े धार्मिक समागम के निमित्त संतों की निगरानी कमेटी बनाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री ने मान लिया है। एक प्रस्ताव और था वह था राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने का,  पर वह पूरा नहीं हो सका है। देखें यूपी के संत सीएम इसे मानते हैं अथवा नहीं। मप्र में शिवराज सिंह चौहान ने तो यह पहल कर दी है। राहुल गांधी समेत विपक्ष के सारे नेताओं को मेरा यह सुझाव है कि उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह घोषणा करनी चाहिए कि यदि उनकी सरकार बनी तो संतों को वीवीआइपी मान कर मंत्री पद का दर्जा दिया जाएगा।  पूज्यनीय व सम्मानीय संतों का राजरोग गजब का है, इसका इलाज नेताओं के पास है, यह जानना सुखद लगा। समाज में संतों की भूमिका क्या होनी चाहिए, इस पर कौन विचार करेगा। जाहिर है मुझ जैसा अज्ञानी तो कदापि नहीं, लेकिन इंटीलेक्चुअल को तो आगे आना ही होगा।   हिंदुत्व के लिए, सनातन मतावलंबियों के लिए यह विडंबना ही कही जाएगी कि संतों में संतोष भर नहीं दिखता। इसका उत्तर मुझे यही समझ में आता है कि साधो संतों में रगरा भारी। बड़े बड़े राजा महाराजा , महराज को संतुष्ट नहीं कर सके हैं तो संत सीएम की क्या बिसात। वाराणसी से लेकर इलाहाबाद, हरिद्वार जितनी भी धार्मिक जगहें हैं, वहां भगवाधारियों की सरकार होने के बाद भी संतों का असंतोष शायद इसीलिए है, क्योंकि हर किसी को कुछ चाहिए, सिवाय धर्म-अध्यात्मक के मार्ग के जरिए लोगों को सदमार्ग दिखाने के। तो चेलों जोर से बोलो -संतन की जय।  

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

पुस्तक दिवस पर पुरानी यादें

नमस्कार।
विश्व पुस्तक दिवस (23 अप्रैल) से एक दिन पहले  ब्लाग का यह पेज काला कर रहा हूं। बचपन की स्मृतियों के साथ। जबलपुर में राजकीय पुस्तकालय की पता नहीं कितनी सुबह शाम याद आ रही हैं बता नहीं सकता। छुटपन में अमर चित्र कथा सीरीज की कामिक्स। किशोरावस्था हुई तो कांदिबनी, दिनमान, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान। रविवार, दिनमान इत्यादि- इत्यादि। कंप्यूटर व इंटरनेट के दौर में आने के बाद दो चार पुस्तकें ही ऐसी रहीं जिन्हें कायदे से पढ़ा। इंडिया टुडे समय समय पर पढ़ता हूं, लेकिन करीब दो साल से निरंतरता टूट गईहै। खैर जिन कालजयी रचनाओं को पढ़ा है हाल के वर्षों में, इसमें एक है रागदरबारी। वाराणसी में हुए हादसे के बाद रामचरित मानस से नाता जोड़ लिया है। भरसक कोशिश रहती है कि कुछ चौपाइयां जरूर पढ़ लूं, हनुमान चालीसा पाठ के साथ।
पढ़ने लिखने से नाता पता नहीं कैसे आया... लेकिन अब भी खूब पढ़ना चाहता हूं। किसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए नहीं। स्वान्तः सुखाय मूल में रहता है।  मस्तिष्क की ममोरी कार्ड तथ्यों, बातों को पहले जैसा ग्रहण नहीं करती। इसकी वजह संभवतः उम्र का फेर भी है। अखबारों को सरसरी तौर पर पढ़ता हूं। गहराई से पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। मेरा मानना है कि एक अखबार के सारे पेजों पर दी गई पूरी सामग्री शायद ही कोई पढ़ पाता हो। यदि कोई यह दावा करता है तो कम से कम मैं उसकी इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता। निश्चित तौर पर नई पीढ़ी का किताबी पठन पाठन से नाता टूटा है। इंटर व कालेज स्तर पर बच्चे  पढ़ते हैं लेकिन कोर्स तक ही सीमित रहते हैं। ऐसे छात्रों को मैं सलाह देता हूं कि हिंदी में भी गद्य पद्य पढ़ें, लेकिन वह कहते हैं कि कोर्स का दवाब इतना है कि कला से जुड़े विषयों के लिए उनके पास समय नहीं।
किताबों से बेरुखी की एक वजह मुझे यह समझ में आती हैं कि यह महंगी हो चली हैं। साथ ही अंतर्विरोध भी पैदा करती हैं। यदि गांधी जी अहिंसा की बात कहते हैं तो हनुमान जी जैसे को तैसा जवाब देने की। फिर भी एक समझ तो पैदा होती ही है। आज 200 पेज की किताब के लिए दो सौ रुपये खर्च करना सबके बस की बात नहीं। फिर इन्हें सहेज कर रखना भी किसी चुनौती से कम नहीं। सेल्फ इत्यादि सबके घर में नहीं होते। अपन जैसे खानाबदोश के पास तो आज तक यह नसीब नहीं है। जबलपुर में पिता जी ने लकड़ी की आलमारी बनवाई थी, किताबें रखने के लिए, लेकिन चूहों का खौफ था। न जाने कितनी किताबें कुतर गए वह। 

रविवार, 18 मार्च 2018

महाराजा वीर सिंह का किला...

विक्रम संवत 2075 और चैत्र नवरात्र की शुभकामनाएं। मां भगवती हम सभी का कल्याण हमेशा करती रहें, यही कामना है। दो दिन पूर्व दतिया में मां पीतांबरा के दर्शन का मौका मिला। मां के दरबार में इस बार सपरिवार हाजिरी लगी। सुखद अध्यात्मिक अनुभूति हुई। शायद यही असली पूंजी है मेरी। मां पीतांबरा व धूमावती की आरती में शामिल होने पर यह जीवन सार्थक लगा। मां बार -बार बुलाएं उनके दरबार में हाजिरी लगती रहे, यही चाहूंगा अब।
इस बार दतिया प्रवास में महाराजा वीर सिंह बुंदेला के महल में भी जाने का अवसर मिला। यह विशालकाय किला उपेक्षित ही है। ज्यादातर लोग नहीं जानते इसके बारे में। बड़े बेटे  शुभम ने दर्शन उपरांत  विकिपीडिया पर इस किले की जानकारी देखी, फिर कहा पापा चलिए देख आते हैं। यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। वही इसकी देखभाल करता है। दोपहर में जब हम वहां पहुंचे तो गिने चुने लोग थे। ओरछा के बुंदेला शासक महाराजा वीर सिंह ने इसे वर्ष 1620 में बनवाया था। ऐसी जानकारी पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रस्तर से मिली। घर आने पर और पढ़ा तो पता चला कि केशव की किताब पढ़नी होगी, ज्यादा जानकारी के लिए। वह महाराजा वीर सिंह के दरबार में थे। अब जब मौका मिलेगा तो जरूर पढ़ना चाहूंगा, दरअसल दिलचस्पी बढ़ गई है। एक जानकारी यह मिली है कि यह किला जब बना था तब 35 लाख रुपये खर्च हुए थे। वर्तमान कीमत लगभग 35 लाख हजार करोड़ रुपये से ज्यादा ही होगी, ऐसा मेरा अनुमान है। इस किले की खासियत यह है कि इसमें लोहे और लकड़ी का इस्तेमाल नहीं हुआ है। 

शनिवार, 10 मार्च 2018

अंकल पपी मर गया...


सुबह दफ्तर के लिए निकल रहा था। दरवाजे पर मिल गई अनु। जिस मकान में मैं किराये पर रहता हूं, उसके निचले हिस्से में अनु का परिवार भी रहता था। वैसे आम तौर पर मुझसे वह नहीं बोलती। रिजर्व ही रहती है, लेकिन आज सुबह उसने कहा...अंकल पपी मर गया। यूं तो सुबह ही मुझे श्रद्धा ने बताया  दिया था कि उस पिल्ले को, जिसे हमारे शुभम हाल के दिनों में ग्लूकोज का बिस्कुट अपने पाकेट खर्च से लाकर खिलाते रहे हैं, वह किसी वाहन की चपेट में आकर रात में चल बसा। सुन कर मन थोड़ा द्रवित हुआ। बालकनी से देखा। मोहल्ले की सड़क पर वह निस्तेज पड़ा था। उसकी मां, दोनों भाई आसपास घूम जरूर रहे थे, पर उनके वश में कुछ नहीं था। वह कितने गम में थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि एक पपी को ब्रेड के टुकड़े दिए गए, लेकिन उसने उसकी तरफ झांका भी नहीं।
अल्पायु में ही दुनिया छोड़ गए इस पपी से मेरा इतना ही बावस्ता था कि शुभम के लिए वह महीने भर से अजीज हो गया था। करीब दो महीने चार पपीज इस दुनिया में आए थे। मोहल्ले में। एक काला, एक गेहुंआ, दो चितकबरे। काले वाले को कोई झोले में भर कर उठा ले गया। उसकी मां कुछ दिन तक कूं कूं कर रोयी फिर वह यह सोचकर शांत हो गई कि जो भी इसे ले गया होगा, कम से कम ठीक ठाक ढंग से रखेगा। अब तीन बचे थे। महीने भर से उनकी चहल कदमी गजब की हो गई थी। शुभम यूं तो तीनों को बिस्कुट देते थे, लेकिन गेहुंआ ज्यादा पसंद था। अनु और उनके समवय अभि भी इन तीनों से जाने अनजाने में मोहब्बत करने लगे। इंसान और जानवर के बीच रिश्ता कैसे प्रगाढ़ होता है, इसे जानने का मौका मिला। होली के दिन जब पूड़ी सब्जी, गुझिया मिठाई बनी तो वह भी तीनों को दी गई। कुछ हिस्सा उसकी मां के पेट में भी गया। अनु और मेरे परिवार के लिए यह पपीज खिलौना हो गए थे। आयुष जरूर ज्यादा मतलब नहीं रखते हैं इनसे, लेकिन कल जब गेहुंए पपीज के सोते समय किसी वाहन से दब कर अवसान की जानकारी उनको मिली तो उन्होंने वाट्सएप पर इसे शुभम का भेज दिया।
कुत्तों का इंसानों से  रिश्ता बहुत पुराना है। कहते हैं कि धर्मराज युद्धिष्ठर को जब स्वर्ग में नरकाया में किसी एक को साथ ले जाने की अनुमति मिली तो वह अपने साथ कुत्ते को ही ले गए। जबलपुर में रहने के दौरान मेरा बावस्ता शेरू से पड़ा था। वह भी पपीज से युवा हुआ। अम्मा उसे हर दिन रोटी देती थीं, सुबह शाम। मैं भी देना लगा। वह कुछ ऐसा परच गया कि सुबह ठीक नौ बजे दरवाजे पर बैठ जाता। कहीं भी रहता। रात में जब दफ्तर से आता तो चाहे डेढ़ बजे हों अथवा दो इंतजार में दरवाजे पर मिलता। एक बार काली रात थी। दफ्तर से आया था, साइकिल खड़ी कर रहा था कि वह भौंकने लगा। उसके भौंकने के अंदाज पर कुछ शक हुआ। मैंने सतर्क होकर झांका तो नागदेवता था कुछ ही दूर पर। हालांकि मुझे नुकसान पहुंचाए बिना ही वह अंर्तध्यान हो गए। उस  दिन से शेरू मेरा प्रिय बन गया। एक बार रात में उसे किसी चोर ने घायल कर दिया। उसकी बाईं टांग में फैक्चर आ गया। सुबह देखा तो लेकर सीधा घोड़ा अस्पताल भागा। लंबी चौड़ी ढील ढौल वाला शेरू करीब छह बरस रहा। जब तक कालोनी नहीं छूटी उससे रिश्ता बना रहा। आज उसकी भी याद आ गई। पपीज के बहाने। आदरणीय श्याम कटारे जी ने शेरू की दास्तान पर स्टोरी लिखने के लिए कहा था। मैंने वह लिखी, सड़क के कुत्ते को अखबार में जगह मिली। इस पपीज की किस्मत में शायद यह नसीब नहीं। पेपर का कागज महंगा हो गया है और ऐसी संवेदनाओं के लिए शायद स्थान भी नहीं है। कोई बात नहीं ब्लाग तो है। इस पर ही डाल दे रहा हूं इस प्रसंग को। कभी संस्मरण लिखने का मौका मिला तो यह प्रसंग उसका भी हिस्सा होगा। 

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

मैं कल्याण सिंह के जमाने का सेकेंड डिवीजनर...

करीब आठ साल पहले की बात है। वह गर्मियों के दिन थे। बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे आ रहे थे। मैं गांव में था। परिवार के साथ। एक दिन चौहर्जन जाना हुआ, देवि के दरबार में। वाराही देवि का मंदिर प्रतापगढ़ में सिद्धस्थली माना जाता है। रास्ते में सई नदी पड़ती है। तब पुल नहीं था। नाव का ही सहारा था। कुछ लड़के सवार हुए। नाव चला रहे नाविक ने अवधी में एक से पूछा, क पास हुइ गया...। उत्तर था हां -फर्स्ट डिवीजन। नाविक ने कहा -एकाध थर्ड डिवीजन वाला हो तो बताना। मैं चौंका। सवाल कर बैठा, ऐसा क्यों,,, क्या कोई फर्स्ट डिवीजन नहीं आता। बोला-- अब त सबै आवत है, नकल होत है हीक भर। कल्याण सिंह क जमाना रहा, हम उनके टैम का सेकेंड डिवीजन पास हई, जानित हि हम अब कस पढ़ाई होत ह। मेरी जुगुप्सा बढ़ी। मैंने कहा कि कल्याण सिंह के टैम नकल नाय भ रहा का...। नाविक ने कहा -नकल... अरे भइया, गर्दन तक न हिलाय पावत रहे। तब तीन गांव में हमहिन रहे जोन सेकेंड डिवीजन पास भयै रहे। बारघाट का एक पंडत जी रहेन, उहव सेकेंड डिवीजन पास भय रहिन। मेरे पास उस समय उसकी बात पर ऐतबार करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। इसके बाद के सालों में नकल की तस्वीरों, खबरों ने परीक्षा और उसकी शुचिता पर से भरोसा हटा दिया। यूपी बिहार की ऐसी ऐसी तस्वीरें देखीं कि लगा कि गुरु अपन थर्ड डिवीजनर ही ठीक। दो साल पहले बिहार के हजारीबाग की एक तस्वीर देखी थी, उसमें बिल्डिंग के हर मंजिल पर नकल कराने वाले नजर आए थे। पिछले साल इलाहाबाद के  मांडा से भी कुछ कुछ ऐसी ही तस्वीर आई थी। इस साल अब तक ऐसी कोई तस्वीर नहीं दिखी है अखबारों में। लोग कह रहे हैं कि अभी नकल का दौर नहीं आया है, कठिन पर्चे होने बाकी हैं।
चावल कितना पका है, इसे कैसे देखा जाता है ...क्या बटुली में हाथ डाल कर। शायद नहीं। एकाध दाना देख लेते हैं भंडारी। यही बात कम से कम बोर्ड परीक्षा के मौजूदा सूरत पर कही जा सकती है। साथी धर्मेश अवस्थी की रिपोर्ट है कि 10 लाख से ज्यादा बच्चे परीक्षा से तौबा कर चुके हैं। कौशांबी में शनिवार को हाईस्कूल संगीत की परीक्षा में एक भी छात्र नहीं पहुंचा। इसी जिले में इंटरमीडिएट गृह विज्ञान में इकलौते छात्र समेत 125 छात्राओं ने परीक्षा छोड़ दी। पांच केंद्रों पर एक एक छात्र ही मौजूद रहे। तो क्या हम मान लें कि नकल विरोधी अभियान सफल है, इसका उत्तर फिलहाल हां में ही है। नकल से निश्चित तौर पर प्रतिभाशाली युवाओं को अपूरणीय क्षति होती है। प्रतिभाएं सही जगह पहुंच नहीं पातीं। नकल कर अच्छे अंक पा लेने वाले उस खोटे सिक्के की तरह होते हैं जो बाजार में कभी कभी चल जाते हैं। जहां भर्ती में सिर्फ अंक चाहिए, वहां सेटिंग गेटिंग के सहारे भी उन्हें कामयाबी मिल जाती है। बिहार में तो ऐसे ऐसे टापर हुए जिन्हें बाद में जेल तक जाना पड़ गया। सोशल मीडिया पर ऐसी ऐसी पोस्ट पढ़ने मिली कि पढ़ाई और परीक्षा दोनों माखौल बनती नजर आईं। एक संदेश था -मैं टापर नहीं बनना चाहता।
परीक्षा में नकल नहीं होने देना बेहतर भारत की गारंटी हो सकती है, लेकिन सरकार को यह भी देखना चाहिए कि स्कूलों में पढ़ाई हो रही है अथवा नहीं। मैंने कुछ अखबार नवीसों से बात की। पब्लिक रिएक्शन के बारे में। उनका कहना था कि आमतौर पर लोग इस कदम के साथ हैं। सिर्फ वही नाराज हैं जो नकल नहीं कर पा रहे हैं। आमतौर पर लोग नकल के विरूद्ध हैं, लेकिन उनका कहना है कि प्रदेश की सरकार को स्कूलों में पठनपाठन का माहौल भी तो देखना चाहिए। स्कूलों में दो दो सौ छात्र छात्राएं हैं लेकिन दो से तीन टीचर ही हैं वहां। मांडा के लाल बहादुर शास्त्री तकनीकी इंटर कालेज में 10 से 15 साल पहले 26 -27 टीचर थे। अब यहां बमुश्किल तीन से चार टीचर हैं। क्या पढ़ाई होती होगी, कैसे होगी, कल्पना भर कर सकते हैं आप। योगी आदित्यनाथ सरकार को इस दिशा में समुचित पहल करनी होगी। उन्होंने इस बात का भरोसा तो दिया है कि अगले साल छात्र छात्राओं के सिर पर बोर्ड परीक्षाओं का हौव्वा नहीं रहेगा। दुआ करें, ऐसा ही होगा।----
इस पोस्ट के अंत में जो तस्वीर है यह साल 2017 की है। इलाहाबाद के मांडा स्थित मंगला प्रसाद इंटरमीडिएट कालेज भामपुर में कैमरे ने कैद किया था इसे। इस साल इस केंद्र पर भी सन्नाटा पसरा है।

 

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

आइए,चिंता चिंता खेलें...

आइए चिंता चिंता खेलें। आज दफ्तर आ रहा था। सुबह सुबह समीक्षा करनी थी। रास्ते में दफ्तर के पास चार पहिया वाहन को नहाते देखा। नहाते माने धोते। जिस सज्जन का यह वाहन था, वह भद्र पुरुष हैं और प्रतिष्ठित संस्थान से वास्ता रखते हैं। प्यून था उनका, जो वाहन धो रहा था। यह भद्र पुरुष जल संरक्षण पर आए दिन लेक्चर देते हैं, इसलिए थोड़ी सी पीड़ा हुई पानी को बहते देखकर। लगा वाकई में भारत में पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाली बात ज्यादा होती है। अन्यथा देवभूमि की ऐसी गत...
दो दिन पहले ही जीटीवी देख रहा था रात में। सुधीर चौधरी का कार्यक्रम था डीएनए। डेली न्यूज एनालिसिस। बता रहे थे दक्षिण अफ्रीकी शहर केपटाउन की दास्तां। वहां तीन साल से पानी नहीं बरसा है। इसलिए राशनिंग शुरू हो गई है। यह हरा भरा शहर रेगिस्तान बनने की राह पर है। प्रकृति से छेड़छाड़ का ऐसा हश्र देखकर भी इंसान समझ क्यों नहीं पा रहा है, यह मेरी तो समझ से परे है। जब भी पानी बेकार बहते देखता हूं, झुंझला जाता हूं। रास्ते में हूं, किसी नल से बहता दिखता है तो टोंटी बंद कर देता हूं। घर वाले नाराज भी होते हैं गाहे बगाहे। कहते हैं समाज सेवा का ठेका तुम्हीं ने ले रखा है। मैं उन्हें जवाब नहीं देता। रहीम रखसान की पंक्तियां याद आ जाती हैं रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। भारत में पानी की त्रासदी बढ़ रही है। नदियों की प्रचुरता के बाद भी। इस बार माघ मेले में पांटून पुल नंबर पांच पर तीन बार सुरसरि में डुबकी लगाने का मौका मिला। एक बार बीच संगम में। अफसरों का दावा था कि पर्याप्त पानी छोड़ा गया है गंगा में डुबकी लगाने के लिए। लेकिन वितृष्णा हुई डुबकी लगाते समय। चंद मीटर दूर रेत का टीला नजर आ रहा था दूसरी धारा में। आचार्य चाणक्य ने भविष्यवाणी की है गंगा जी को लेकर। यह भविष्यवाणी यह है कि 10 हजार साल में गंगा जी सूख जाएंगी। क्या हम उसी रास्ते पर चल रहे हैं....
केंद्र और प्रदेश और पड़ोसी प्रदेश उत्तराखंड में भी अब भाजपा की सरकार है, लेकिन हमारी गंगा। वह बेचारी प्रवाह के लिए तरस रही हैं। पता नहीं जीवन में उन्हें निर्मल अविरल देख पाऊंगा अथवा नहीं। यमुना की धारा से भी छेड़छाड़ का साक्षी बना हूं दिल्ली में। नोएडा में हिंडन तो नाला बन गया है। प्रतापगढ़ में सई की बात करूं तो वह भी पैदल पार की जा सकती है। बचपन में एक बार उसमें डूबते डूबते बचा था। तब पुल नहीं था। घर में बड़की अम्मा (आजी)  ने मार लगाई थी, घर छोड़कर भाग निकला था गुस्से में। जबलपुर में जब तक रहे नर्मदा मैया की शरण लेते रहे। वहां पानी था। मजे का। अच्छा लगता था। अब तो पानी धीरे धीरे उतर रहा है हर किसी का। मेरा भी शायद।
जल संरक्षण से जुड़े लोगों के पास जादू की छड़ी होती तो वह आनन फानन सारी समस्या से पार पा गए होते। नदियां इठलाती होतीं। ऐसा नहीं है। इसलिए कि हमारी सोच संकुचित और स्वार्थी हो गई है। हम ऐसे नहीं होते तो जब टेम्स को नई जिंदगी मिल सकती है तो गंगा यमुना को भी नई जिंदगी दे सकते थे। गांव में मेरा कुआं सूख  गया है। आपके आसपास यदि जलस्रोत है तो वह कैसा है, जरूर बताएंगे। उसके लिए कुछ कर सकते हो तो करें। नहीं तो हम भी केपटाउन के हश्र से ज्यादा दूर नहीं हैं। 

बुधवार, 24 जनवरी 2018

वाह मिश्र जी वाह

कुछ बातें सनद कर रख लेनी चाहिए... ताकि वक्त जरूरत पर काम आए.
विधिवेत्ता व बार काउंसिल आफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता वीसी मिश्र सोमवार को हमारे साथ थे। अकादमिक बैठक में। आगामी आठ फरवरी को वह 89 साल के हो जाएंगे। संपादकीय साथियों के बीच उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा संकट पर चर्चा की। माना कि इससे न्यायपालिका की गरिमा गिरी है। बताया कि यह दौर तो 1975 से ही शुरू हो गया था जब, सुप्रीम कोर्ट के आह्वान पर वकीलों ने पहली बार हड़ताल की थी। इससे पहले कभी भी वकीलों की हड़ताल नहीं होती थी। मेरे लिए यह अचरज वाली बात थी। होश संभालने के बाद से मैंने आए दिन वकीलों के हड़ताल की जानकारी अखबार में छापी है और पढ़ी है। किसी वकील से बदसलूकी तो हड़ताल, किसी की हत्या तो हड़ताल। बहाना कोई भी हो हड़ताल। सच है न्यायपालिका पर भरोसा नहीं रह गया है अब। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात साकार हो रही है सच में। तुलसीदास बाबा बहुत पहले ही लिख गए थे ---समरथ को नहिं दोष गुंसाईं।
सुप्रीम कोर्ट-हाई कोर्ट के जज भगवान सदृश माने जाते हैं इस देश में। जनता के धन से इनकी भगवान घांई (भांति) भक्ति भी होती है। कहीं भी टेबिल कुर्सी लगाकर अदालत लगाकर सजा सुना सकते हैं यह। इन्हें संविधान का रक्षक कहा जाता है। हमारा संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन हम फैसले पर टिप्पणी करें तो उसे अवमानना मान लिया जाता है। वीसी मिश्र को अदालत की अवमानना में सजा हुई है। तीन साल तक उन्हें प्रैक्टिस के  लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। उनका दर्द उनके शब्दों में...मैं सामान्य घर से था, इसलिए ऐसा हुआ। मुझे उनकी बात में दम लगा। इसी चर्चा में उन्होंने हाईकोर्ट के एक न्यायमूर्ति के बेटों के बारे में जानकारी दी। बताया कि एक ने हाईकोर्ट में प्रैक्टिस की, दूसरे ने सुप्रीम कोर्ट में। एक ही साल में आठ करोड़ रुपये का टर्नओवर अपनी इनकम टैक्स रिटर्न में दिखा दिया कानून के इस जानकार ने। सुना बहुत था, पर न्याय जगत की किसी हस्ती के मुंह से तो सच ही लगा। बेंगुलरू के रिजार्ट में आराम फरमाते न्याय के देवताओं की स्टोरी की हत्या पढ़ी और सुनी थी कभी। इसी इलाहाबाद में एक अपार्टमेंट को ध्वस्त कराने का प्रसंग भी नहीं भूला हूं मैं। कह सकता हूं कि न्याय के देवताओं में बहुत ताकत है, कुछ भी कर सकते हैं। इनके इर्द गिर्द ऐसा बाह्य आवरण है कि किसी में जुर्रत नहीं है उसे भेद पाने की। बहरहाल न्याय के देवता जर्नादन (जनता)  से न्याय मांगने सामने आए हैं और नई लकीर खींच दी है। यह कालांतर में अच्छा ही होगा। एक दूसरे की पैंट उतारने पर ही सच सामने आएगा, ऐसा मेरा मानना है।
लगाइए ठहाका ---नीचे की पंक्तियां वीसी की मिश्र की जुबानी
सिंह कौन हैं... कोई बता सकता है क्या। साथी ज्ञानेंद्र सिंह का जवाब ....नहीं पता। बताऊं सिंह कौन हैं ...मुगल राजाओं को बीवियां बहन भेंट करते थे तो राजा कहते थे सिंह है भाई सिंह....। बताओ रामचंद्र, लक्ष्मण, भरत व शत्रुध्न के नाम में सिंह है क्या.... (ठहाका)
अच्छा राजपूत कौन है.... राजाओं का मन किले में आई, ग्वालिन, पंडताइन, मालिन, धोबिन पर आ गया और सामने आ गए राज के पूत यानि राज पूत।  (ठहाका)
मुसलमान कौन हैं... कोई नहीं। सभी हिंदू ही हैं इस देश के। डीएनए की जांच करा लो। किसी ने तलवार के जोर पर धर्म बदल लिया, किसी ने प्रलोभन में आकर।
क्षत्रिय। ... एक से पूछा कितने साल के हो। जवाब मिला 40 साल के। तीन साल बाद पूछा तो जवाब मिला 40 के हैं। मैंने कहा यार गजब हो...तीन साल पहले भी 40 के थे, अब भी। उसने कहा (उत्तरकर्ता पढ़ें इसे) क्षत्रिय की एक जुबान होती है।
-मुलायम सिंह समझदार हैं, लेकिन अखिलेश में क्लर्क बनने तक का गुण नहीं है। मैंने मना किया था अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने से, लेकिन मुलायम सिंह ने कहा था कि यदि इसे अभी नहीं बनाया तो कभी नहीं बन सकेगा यह।
-साथी बृजेश श्रीवास्तव ने चलते चलते एक सवाल पूछा--- यदि आपको एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बना दिया जाए तो क्या करेंगे।
उत्तर था--मैं बनूंगा ही नहीं। एक दिन में क्या उखाड़ लूंगा।
(मान गए मिश्र जी। अद्भभुत ) 

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...