रविवार, 4 फ़रवरी 2018

आइए,चिंता चिंता खेलें...

आइए चिंता चिंता खेलें। आज दफ्तर आ रहा था। सुबह सुबह समीक्षा करनी थी। रास्ते में दफ्तर के पास चार पहिया वाहन को नहाते देखा। नहाते माने धोते। जिस सज्जन का यह वाहन था, वह भद्र पुरुष हैं और प्रतिष्ठित संस्थान से वास्ता रखते हैं। प्यून था उनका, जो वाहन धो रहा था। यह भद्र पुरुष जल संरक्षण पर आए दिन लेक्चर देते हैं, इसलिए थोड़ी सी पीड़ा हुई पानी को बहते देखकर। लगा वाकई में भारत में पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाली बात ज्यादा होती है। अन्यथा देवभूमि की ऐसी गत...
दो दिन पहले ही जीटीवी देख रहा था रात में। सुधीर चौधरी का कार्यक्रम था डीएनए। डेली न्यूज एनालिसिस। बता रहे थे दक्षिण अफ्रीकी शहर केपटाउन की दास्तां। वहां तीन साल से पानी नहीं बरसा है। इसलिए राशनिंग शुरू हो गई है। यह हरा भरा शहर रेगिस्तान बनने की राह पर है। प्रकृति से छेड़छाड़ का ऐसा हश्र देखकर भी इंसान समझ क्यों नहीं पा रहा है, यह मेरी तो समझ से परे है। जब भी पानी बेकार बहते देखता हूं, झुंझला जाता हूं। रास्ते में हूं, किसी नल से बहता दिखता है तो टोंटी बंद कर देता हूं। घर वाले नाराज भी होते हैं गाहे बगाहे। कहते हैं समाज सेवा का ठेका तुम्हीं ने ले रखा है। मैं उन्हें जवाब नहीं देता। रहीम रखसान की पंक्तियां याद आ जाती हैं रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। भारत में पानी की त्रासदी बढ़ रही है। नदियों की प्रचुरता के बाद भी। इस बार माघ मेले में पांटून पुल नंबर पांच पर तीन बार सुरसरि में डुबकी लगाने का मौका मिला। एक बार बीच संगम में। अफसरों का दावा था कि पर्याप्त पानी छोड़ा गया है गंगा में डुबकी लगाने के लिए। लेकिन वितृष्णा हुई डुबकी लगाते समय। चंद मीटर दूर रेत का टीला नजर आ रहा था दूसरी धारा में। आचार्य चाणक्य ने भविष्यवाणी की है गंगा जी को लेकर। यह भविष्यवाणी यह है कि 10 हजार साल में गंगा जी सूख जाएंगी। क्या हम उसी रास्ते पर चल रहे हैं....
केंद्र और प्रदेश और पड़ोसी प्रदेश उत्तराखंड में भी अब भाजपा की सरकार है, लेकिन हमारी गंगा। वह बेचारी प्रवाह के लिए तरस रही हैं। पता नहीं जीवन में उन्हें निर्मल अविरल देख पाऊंगा अथवा नहीं। यमुना की धारा से भी छेड़छाड़ का साक्षी बना हूं दिल्ली में। नोएडा में हिंडन तो नाला बन गया है। प्रतापगढ़ में सई की बात करूं तो वह भी पैदल पार की जा सकती है। बचपन में एक बार उसमें डूबते डूबते बचा था। तब पुल नहीं था। घर में बड़की अम्मा (आजी)  ने मार लगाई थी, घर छोड़कर भाग निकला था गुस्से में। जबलपुर में जब तक रहे नर्मदा मैया की शरण लेते रहे। वहां पानी था। मजे का। अच्छा लगता था। अब तो पानी धीरे धीरे उतर रहा है हर किसी का। मेरा भी शायद।
जल संरक्षण से जुड़े लोगों के पास जादू की छड़ी होती तो वह आनन फानन सारी समस्या से पार पा गए होते। नदियां इठलाती होतीं। ऐसा नहीं है। इसलिए कि हमारी सोच संकुचित और स्वार्थी हो गई है। हम ऐसे नहीं होते तो जब टेम्स को नई जिंदगी मिल सकती है तो गंगा यमुना को भी नई जिंदगी दे सकते थे। गांव में मेरा कुआं सूख  गया है। आपके आसपास यदि जलस्रोत है तो वह कैसा है, जरूर बताएंगे। उसके लिए कुछ कर सकते हो तो करें। नहीं तो हम भी केपटाउन के हश्र से ज्यादा दूर नहीं हैं। 

कोई टिप्पणी नहीं:

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...