करीब आठ साल पहले की बात है। वह गर्मियों के दिन थे। बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे आ रहे थे। मैं गांव में था। परिवार के साथ। एक दिन चौहर्जन जाना हुआ, देवि के दरबार में। वाराही देवि का मंदिर प्रतापगढ़ में सिद्धस्थली माना जाता है। रास्ते में सई नदी पड़ती है। तब पुल नहीं था। नाव का ही सहारा था। कुछ लड़के सवार हुए। नाव चला रहे नाविक ने अवधी में एक से पूछा, क पास हुइ गया...। उत्तर था हां -फर्स्ट डिवीजन। नाविक ने कहा -एकाध थर्ड डिवीजन वाला हो तो बताना। मैं चौंका। सवाल कर बैठा, ऐसा क्यों,,, क्या कोई फर्स्ट डिवीजन नहीं आता। बोला-- अब त सबै आवत है, नकल होत है हीक भर। कल्याण सिंह क जमाना रहा, हम उनके टैम का सेकेंड डिवीजन पास हई, जानित हि हम अब कस पढ़ाई होत ह। मेरी जुगुप्सा बढ़ी। मैंने कहा कि कल्याण सिंह के टैम नकल नाय भ रहा का...। नाविक ने कहा -नकल... अरे भइया, गर्दन तक न हिलाय पावत रहे। तब तीन गांव में हमहिन रहे जोन सेकेंड डिवीजन पास भयै रहे। बारघाट का एक पंडत जी रहेन, उहव सेकेंड डिवीजन पास भय रहिन। मेरे पास उस समय उसकी बात पर ऐतबार करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। इसके बाद के सालों में नकल की तस्वीरों, खबरों ने परीक्षा और उसकी शुचिता पर से भरोसा हटा दिया। यूपी बिहार की ऐसी ऐसी तस्वीरें देखीं कि लगा कि गुरु अपन थर्ड डिवीजनर ही ठीक। दो साल पहले बिहार के हजारीबाग की एक तस्वीर देखी थी, उसमें बिल्डिंग के हर मंजिल पर नकल कराने वाले नजर आए थे। पिछले साल इलाहाबाद के मांडा से भी कुछ कुछ ऐसी ही तस्वीर आई थी। इस साल अब तक ऐसी कोई तस्वीर नहीं दिखी है अखबारों में। लोग कह रहे हैं कि अभी नकल का दौर नहीं आया है, कठिन पर्चे होने बाकी हैं।
चावल कितना पका है, इसे कैसे देखा जाता है ...क्या बटुली में हाथ डाल कर। शायद नहीं। एकाध दाना देख लेते हैं भंडारी। यही बात कम से कम बोर्ड परीक्षा के मौजूदा सूरत पर कही जा सकती है। साथी धर्मेश अवस्थी की रिपोर्ट है कि 10 लाख से ज्यादा बच्चे परीक्षा से तौबा कर चुके हैं। कौशांबी में शनिवार को हाईस्कूल संगीत की परीक्षा में एक भी छात्र नहीं पहुंचा। इसी जिले में इंटरमीडिएट गृह विज्ञान में इकलौते छात्र समेत 125 छात्राओं ने परीक्षा छोड़ दी। पांच केंद्रों पर एक एक छात्र ही मौजूद रहे। तो क्या हम मान लें कि नकल विरोधी अभियान सफल है, इसका उत्तर फिलहाल हां में ही है। नकल से निश्चित तौर पर प्रतिभाशाली युवाओं को अपूरणीय क्षति होती है। प्रतिभाएं सही जगह पहुंच नहीं पातीं। नकल कर अच्छे अंक पा लेने वाले उस खोटे सिक्के की तरह होते हैं जो बाजार में कभी कभी चल जाते हैं। जहां भर्ती में सिर्फ अंक चाहिए, वहां सेटिंग गेटिंग के सहारे भी उन्हें कामयाबी मिल जाती है। बिहार में तो ऐसे ऐसे टापर हुए जिन्हें बाद में जेल तक जाना पड़ गया। सोशल मीडिया पर ऐसी ऐसी पोस्ट पढ़ने मिली कि पढ़ाई और परीक्षा दोनों माखौल बनती नजर आईं। एक संदेश था -मैं टापर नहीं बनना चाहता।
परीक्षा में नकल नहीं होने देना बेहतर भारत की गारंटी हो सकती है, लेकिन सरकार को यह भी देखना चाहिए कि स्कूलों में पढ़ाई हो रही है अथवा नहीं। मैंने कुछ अखबार नवीसों से बात की। पब्लिक रिएक्शन के बारे में। उनका कहना था कि आमतौर पर लोग इस कदम के साथ हैं। सिर्फ वही नाराज हैं जो नकल नहीं कर पा रहे हैं। आमतौर पर लोग नकल के विरूद्ध हैं, लेकिन उनका कहना है कि प्रदेश की सरकार को स्कूलों में पठनपाठन का माहौल भी तो देखना चाहिए। स्कूलों में दो दो सौ छात्र छात्राएं हैं लेकिन दो से तीन टीचर ही हैं वहां। मांडा के लाल बहादुर शास्त्री तकनीकी इंटर कालेज में 10 से 15 साल पहले 26 -27 टीचर थे। अब यहां बमुश्किल तीन से चार टीचर हैं। क्या पढ़ाई होती होगी, कैसे होगी, कल्पना भर कर सकते हैं आप। योगी आदित्यनाथ सरकार को इस दिशा में समुचित पहल करनी होगी। उन्होंने इस बात का भरोसा तो दिया है कि अगले साल छात्र छात्राओं के सिर पर बोर्ड परीक्षाओं का हौव्वा नहीं रहेगा। दुआ करें, ऐसा ही होगा।----
इस पोस्ट के अंत में जो तस्वीर है यह साल 2017 की है। इलाहाबाद के मांडा स्थित मंगला प्रसाद इंटरमीडिएट कालेज भामपुर में कैमरे ने कैद किया था इसे। इस साल इस केंद्र पर भी सन्नाटा पसरा है।
चावल कितना पका है, इसे कैसे देखा जाता है ...क्या बटुली में हाथ डाल कर। शायद नहीं। एकाध दाना देख लेते हैं भंडारी। यही बात कम से कम बोर्ड परीक्षा के मौजूदा सूरत पर कही जा सकती है। साथी धर्मेश अवस्थी की रिपोर्ट है कि 10 लाख से ज्यादा बच्चे परीक्षा से तौबा कर चुके हैं। कौशांबी में शनिवार को हाईस्कूल संगीत की परीक्षा में एक भी छात्र नहीं पहुंचा। इसी जिले में इंटरमीडिएट गृह विज्ञान में इकलौते छात्र समेत 125 छात्राओं ने परीक्षा छोड़ दी। पांच केंद्रों पर एक एक छात्र ही मौजूद रहे। तो क्या हम मान लें कि नकल विरोधी अभियान सफल है, इसका उत्तर फिलहाल हां में ही है। नकल से निश्चित तौर पर प्रतिभाशाली युवाओं को अपूरणीय क्षति होती है। प्रतिभाएं सही जगह पहुंच नहीं पातीं। नकल कर अच्छे अंक पा लेने वाले उस खोटे सिक्के की तरह होते हैं जो बाजार में कभी कभी चल जाते हैं। जहां भर्ती में सिर्फ अंक चाहिए, वहां सेटिंग गेटिंग के सहारे भी उन्हें कामयाबी मिल जाती है। बिहार में तो ऐसे ऐसे टापर हुए जिन्हें बाद में जेल तक जाना पड़ गया। सोशल मीडिया पर ऐसी ऐसी पोस्ट पढ़ने मिली कि पढ़ाई और परीक्षा दोनों माखौल बनती नजर आईं। एक संदेश था -मैं टापर नहीं बनना चाहता।
परीक्षा में नकल नहीं होने देना बेहतर भारत की गारंटी हो सकती है, लेकिन सरकार को यह भी देखना चाहिए कि स्कूलों में पढ़ाई हो रही है अथवा नहीं। मैंने कुछ अखबार नवीसों से बात की। पब्लिक रिएक्शन के बारे में। उनका कहना था कि आमतौर पर लोग इस कदम के साथ हैं। सिर्फ वही नाराज हैं जो नकल नहीं कर पा रहे हैं। आमतौर पर लोग नकल के विरूद्ध हैं, लेकिन उनका कहना है कि प्रदेश की सरकार को स्कूलों में पठनपाठन का माहौल भी तो देखना चाहिए। स्कूलों में दो दो सौ छात्र छात्राएं हैं लेकिन दो से तीन टीचर ही हैं वहां। मांडा के लाल बहादुर शास्त्री तकनीकी इंटर कालेज में 10 से 15 साल पहले 26 -27 टीचर थे। अब यहां बमुश्किल तीन से चार टीचर हैं। क्या पढ़ाई होती होगी, कैसे होगी, कल्पना भर कर सकते हैं आप। योगी आदित्यनाथ सरकार को इस दिशा में समुचित पहल करनी होगी। उन्होंने इस बात का भरोसा तो दिया है कि अगले साल छात्र छात्राओं के सिर पर बोर्ड परीक्षाओं का हौव्वा नहीं रहेगा। दुआ करें, ऐसा ही होगा।----
इस पोस्ट के अंत में जो तस्वीर है यह साल 2017 की है। इलाहाबाद के मांडा स्थित मंगला प्रसाद इंटरमीडिएट कालेज भामपुर में कैमरे ने कैद किया था इसे। इस साल इस केंद्र पर भी सन्नाटा पसरा है।

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