सुबह दफ्तर के लिए निकल रहा था। दरवाजे पर मिल गई अनु। जिस मकान में मैं किराये पर रहता हूं, उसके निचले हिस्से में अनु का परिवार भी रहता था। वैसे आम तौर पर मुझसे वह नहीं बोलती। रिजर्व ही रहती है, लेकिन आज सुबह उसने कहा...अंकल पपी मर गया। यूं तो सुबह ही मुझे श्रद्धा ने बताया दिया था कि उस पिल्ले को, जिसे हमारे शुभम हाल के दिनों में ग्लूकोज का बिस्कुट अपने पाकेट खर्च से लाकर खिलाते रहे हैं, वह किसी वाहन की चपेट में आकर रात में चल बसा। सुन कर मन थोड़ा द्रवित हुआ। बालकनी से देखा। मोहल्ले की सड़क पर वह निस्तेज पड़ा था। उसकी मां, दोनों भाई आसपास घूम जरूर रहे थे, पर उनके वश में कुछ नहीं था। वह कितने गम में थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि एक पपी को ब्रेड के टुकड़े दिए गए, लेकिन उसने उसकी तरफ झांका भी नहीं।
अल्पायु में ही दुनिया छोड़ गए इस पपी से मेरा इतना ही बावस्ता था कि शुभम के लिए वह महीने भर से अजीज हो गया था। करीब दो महीने चार पपीज इस दुनिया में आए थे। मोहल्ले में। एक काला, एक गेहुंआ, दो चितकबरे। काले वाले को कोई झोले में भर कर उठा ले गया। उसकी मां कुछ दिन तक कूं कूं कर रोयी फिर वह यह सोचकर शांत हो गई कि जो भी इसे ले गया होगा, कम से कम ठीक ठाक ढंग से रखेगा। अब तीन बचे थे। महीने भर से उनकी चहल कदमी गजब की हो गई थी। शुभम यूं तो तीनों को बिस्कुट देते थे, लेकिन गेहुंआ ज्यादा पसंद था। अनु और उनके समवय अभि भी इन तीनों से जाने अनजाने में मोहब्बत करने लगे। इंसान और जानवर के बीच रिश्ता कैसे प्रगाढ़ होता है, इसे जानने का मौका मिला। होली के दिन जब पूड़ी सब्जी, गुझिया मिठाई बनी तो वह भी तीनों को दी गई। कुछ हिस्सा उसकी मां के पेट में भी गया। अनु और मेरे परिवार के लिए यह पपीज खिलौना हो गए थे। आयुष जरूर ज्यादा मतलब नहीं रखते हैं इनसे, लेकिन कल जब गेहुंए पपीज के सोते समय किसी वाहन से दब कर अवसान की जानकारी उनको मिली तो उन्होंने वाट्सएप पर इसे शुभम का भेज दिया।
कुत्तों का इंसानों से रिश्ता बहुत पुराना है। कहते हैं कि धर्मराज युद्धिष्ठर को जब स्वर्ग में नरकाया में किसी एक को साथ ले जाने की अनुमति मिली तो वह अपने साथ कुत्ते को ही ले गए। जबलपुर में रहने के दौरान मेरा बावस्ता शेरू से पड़ा था। वह भी पपीज से युवा हुआ। अम्मा उसे हर दिन रोटी देती थीं, सुबह शाम। मैं भी देना लगा। वह कुछ ऐसा परच गया कि सुबह ठीक नौ बजे दरवाजे पर बैठ जाता। कहीं भी रहता। रात में जब दफ्तर से आता तो चाहे डेढ़ बजे हों अथवा दो इंतजार में दरवाजे पर मिलता। एक बार काली रात थी। दफ्तर से आया था, साइकिल खड़ी कर रहा था कि वह भौंकने लगा। उसके भौंकने के अंदाज पर कुछ शक हुआ। मैंने सतर्क होकर झांका तो नागदेवता था कुछ ही दूर पर। हालांकि मुझे नुकसान पहुंचाए बिना ही वह अंर्तध्यान हो गए। उस दिन से शेरू मेरा प्रिय बन गया। एक बार रात में उसे किसी चोर ने घायल कर दिया। उसकी बाईं टांग में फैक्चर आ गया। सुबह देखा तो लेकर सीधा घोड़ा अस्पताल भागा। लंबी चौड़ी ढील ढौल वाला शेरू करीब छह बरस रहा। जब तक कालोनी नहीं छूटी उससे रिश्ता बना रहा। आज उसकी भी याद आ गई। पपीज के बहाने। आदरणीय श्याम कटारे जी ने शेरू की दास्तान पर स्टोरी लिखने के लिए कहा था। मैंने वह लिखी, सड़क के कुत्ते को अखबार में जगह मिली। इस पपीज की किस्मत में शायद यह नसीब नहीं। पेपर का कागज महंगा हो गया है और ऐसी संवेदनाओं के लिए शायद स्थान भी नहीं है। कोई बात नहीं ब्लाग तो है। इस पर ही डाल दे रहा हूं इस प्रसंग को। कभी संस्मरण लिखने का मौका मिला तो यह प्रसंग उसका भी हिस्सा होगा।
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