देशकाल पर कागज कारे करने की बीमारी रही है मुझे। लगभग ढाई दशक से। पत्रकारिता की बीमारी लगने के बाद काफी समय तक ऐसा लगता रहा कि अपने देश व दुनिया के बदलाव के लिए पहल करूंगा। एक ऐसा भारत बनाने में मेरे शब्द काम आएंगे, जहां न गरीबी हो, न अन्याय। समाज का हर तबका फले फूलेगा। मेरे जैसे तमाम लोग सोचते हैं, लेकिन कहावत है ना कि अकेला चना भाड़ तो नहीं फोड़ सकता। यही बात मुझ पर भी लागू होती है। अपने अब तक के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि हर किसी की अलग-अलग सोच रहती है और क्षमता भी। देशकाल को लेकर विचारधाराएं है। मेरे विचार देश को एकजुट व मजबूत देखने के पक्ष में रहते हैं। दिक्कत तब होती है जब हम थोपते हैं अपनी बात। दूसरों को खारिज करने की धारणा हम हिंदुस्तानियों में सबसे अहम रही है। बहरहाल यह लंबा विमर्श है। आज तो पिछले सप्ताह की कुछ घटनाओं -फैसलों का उल्लेख भर करूंगा ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत पडे़ तो काम आए। चीन से डोकलाम को लेकर चल रही तनातनी तीसरे महीने में पहुंच गई है। चीन रोज -रोज धमकी दे रहा है युद्ध की, लेकिन अब तक दोनों सेनाएं भिड़ी नहीं हैं। मुझे लगता है कि मौजूदा सरकार की दृढ़ता ने इस समय विश्व के दूसरे दरोगा को सोचने समझने के लिए मौका दिया है कि भारत किसी भी देश के लिए आसान भोजन नहीं है, तमाम विसंगतियों के बाद भी।
गुजरे सप्ताह की शुरुआत में तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला आ गया। इसमें पांच सदस्यीय खंडपीठ ने बहुमत से एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इसके बावजूद तीन तलाक देने की बातें आ रही हैं। क्या सबके लिए कानून नहीं है क्या इस देश में? यह मेरा सवाल है। कामन सिविल कोड देश की मांग है। इसे आप संकीर्ण सोच मान सकते हैं लेकिन गहराई से सोचेंगे तो पाएंगे कि इसके बिना बात नहीं बनेगी। गुजरे सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय खंडपीठ ने निजता को मौलिक अधिकार मान लिया है। यह काफी अहम फैसला है। मेरा अपना मत है कि हर किसी को स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन कितनी? देश -परिवार व समाज के प्रति कर्तव्य क्या हों, इसका ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए। आधार पर फैसला आना है। इसे निजता के अधिकार में शामिल करने से भ्रष्टाचार को लेकर हमारी लड़ाई कमजोर पड़ सकती है। उत्तराखंड व असम का एक प्रसंग यहां उल्लेखित करूंगा। वहां मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों के आंकड़े को आधार से जोड़ने की कवायद हुई तो करीब तीन चौथाई छात्र खारिज हो गए। यह मिले ही नहीं। यूपी में भी ऐसे ही आंकड़े हैं वजीफे को लेकर। यानि आधार से सरकारी कल्याण कारी योजनाएं लिंक किए जाने के सुफल आए हैं भ्रष्टाचार के खुलासे के रूप में। क्या इस तथ्य को खारिज कर देना चाहिए? किसी भी देश की तरक्की में सबसे बड़ा रोड़ा है भ्रष्टाचार। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संरक्षण के नाम पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा तो नहीं दिया जा सकता। चोर को चोर के रूप में पकड़ने के लिए यदि आधार का इस्तेमाल हो रहा है तो गलत क्या है?
सप्ताह के अंतिम दो दिनों में राम रहीम बाबा को दुष्कर्म के आरोप में सजा सुनाए जाने पर पंजाब और हरियाणा में हुई हिंसा ने मन व्यथित कर दिया। बाबा को चाहिए था कि कानून को अपना काम करने देते। सम्मान जताते। बाबा यदि आसानी से कोर्ट में पेश हो गए होते तो शायद वह छूट भी जाते। अब ऐसा हो सकेगा, इसमें संदेह है। दरअसल हमारी न्यायापालिका से अदावत रखने वालों का भला नहीं हुआ है आज तक। इंदिरा गांधी से लेकर सहारा प्रमुख सुब्रत राय तक इसके उदाहरण हैं। विकसित समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं है, लेकिन चाहे दक्षिण पंथी हों अथवा वामपंथी, इस आग्रह के लिए गंभीर नहीं दिखते। यदि कश्मीर में हिंसा गलत है तो केरल में सही क्यों? कश्मीर से ही याद आ गया। पुलवामा में शनिवार को हुआ आतंकी हमला हमसे और सजगता की अपेक्षा करता है। आतंकवादी रक्तबीज की तरह हैं और देश की जनता को इनके विनाश के लिए मां काली की तरफ मुंह फैलाना होगा।
ध्यान रखिए कि राजनीति का अंतिम लक्ष्य समाज के सर्वहारा की खुशहाली है, भ्रष्टाचार के जरिए अपनी झोली भरना नहीं। दुर्भाग्य से इस देश ने 70 साल की आजादी में यही ज्यादा देखा है। हर दल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की बात जरूर की, लेकिन मौका मिला तो वह दूसरों से आगे निकलने की होड़ में नजर आए। केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार पर ऐसा कोई बड़ा दाग नहीं लगा है अब तक। यह कहीं कहीं आश्वस्त करता है, लेकिन जमीन पर चीजें नहीं बदलीं हैं ज्यादा। करीब 20 करोड़ गरीबों के लिए जनधन खाते खुले हैं, लेकिन इसमें करीब एक चौथाई खाली हैं, नोटबंदी के बाद भी। जीएसटी लागू होने के बाद इलाहाबाद में दूध व खाद्य वस्तुओं के दाम वही हैं जो पहले थे। सबको छत देने का वादा हवा हवाई ही रहा है। बदलाव की बातें भर नहीं होनी चाहिए। दिखना भी चाहिए। खबरिया चैनलों के पास इसके लिए वक्त नहीं है। यह काम पांचवां स्तंभ यानि सोशल मीडिया ही करा सकेगा।
गुजरे सप्ताह की शुरुआत में तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला आ गया। इसमें पांच सदस्यीय खंडपीठ ने बहुमत से एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इसके बावजूद तीन तलाक देने की बातें आ रही हैं। क्या सबके लिए कानून नहीं है क्या इस देश में? यह मेरा सवाल है। कामन सिविल कोड देश की मांग है। इसे आप संकीर्ण सोच मान सकते हैं लेकिन गहराई से सोचेंगे तो पाएंगे कि इसके बिना बात नहीं बनेगी। गुजरे सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय खंडपीठ ने निजता को मौलिक अधिकार मान लिया है। यह काफी अहम फैसला है। मेरा अपना मत है कि हर किसी को स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन कितनी? देश -परिवार व समाज के प्रति कर्तव्य क्या हों, इसका ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए। आधार पर फैसला आना है। इसे निजता के अधिकार में शामिल करने से भ्रष्टाचार को लेकर हमारी लड़ाई कमजोर पड़ सकती है। उत्तराखंड व असम का एक प्रसंग यहां उल्लेखित करूंगा। वहां मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों के आंकड़े को आधार से जोड़ने की कवायद हुई तो करीब तीन चौथाई छात्र खारिज हो गए। यह मिले ही नहीं। यूपी में भी ऐसे ही आंकड़े हैं वजीफे को लेकर। यानि आधार से सरकारी कल्याण कारी योजनाएं लिंक किए जाने के सुफल आए हैं भ्रष्टाचार के खुलासे के रूप में। क्या इस तथ्य को खारिज कर देना चाहिए? किसी भी देश की तरक्की में सबसे बड़ा रोड़ा है भ्रष्टाचार। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संरक्षण के नाम पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा तो नहीं दिया जा सकता। चोर को चोर के रूप में पकड़ने के लिए यदि आधार का इस्तेमाल हो रहा है तो गलत क्या है?
सप्ताह के अंतिम दो दिनों में राम रहीम बाबा को दुष्कर्म के आरोप में सजा सुनाए जाने पर पंजाब और हरियाणा में हुई हिंसा ने मन व्यथित कर दिया। बाबा को चाहिए था कि कानून को अपना काम करने देते। सम्मान जताते। बाबा यदि आसानी से कोर्ट में पेश हो गए होते तो शायद वह छूट भी जाते। अब ऐसा हो सकेगा, इसमें संदेह है। दरअसल हमारी न्यायापालिका से अदावत रखने वालों का भला नहीं हुआ है आज तक। इंदिरा गांधी से लेकर सहारा प्रमुख सुब्रत राय तक इसके उदाहरण हैं। विकसित समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं है, लेकिन चाहे दक्षिण पंथी हों अथवा वामपंथी, इस आग्रह के लिए गंभीर नहीं दिखते। यदि कश्मीर में हिंसा गलत है तो केरल में सही क्यों? कश्मीर से ही याद आ गया। पुलवामा में शनिवार को हुआ आतंकी हमला हमसे और सजगता की अपेक्षा करता है। आतंकवादी रक्तबीज की तरह हैं और देश की जनता को इनके विनाश के लिए मां काली की तरफ मुंह फैलाना होगा।
ध्यान रखिए कि राजनीति का अंतिम लक्ष्य समाज के सर्वहारा की खुशहाली है, भ्रष्टाचार के जरिए अपनी झोली भरना नहीं। दुर्भाग्य से इस देश ने 70 साल की आजादी में यही ज्यादा देखा है। हर दल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की बात जरूर की, लेकिन मौका मिला तो वह दूसरों से आगे निकलने की होड़ में नजर आए। केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार पर ऐसा कोई बड़ा दाग नहीं लगा है अब तक। यह कहीं कहीं आश्वस्त करता है, लेकिन जमीन पर चीजें नहीं बदलीं हैं ज्यादा। करीब 20 करोड़ गरीबों के लिए जनधन खाते खुले हैं, लेकिन इसमें करीब एक चौथाई खाली हैं, नोटबंदी के बाद भी। जीएसटी लागू होने के बाद इलाहाबाद में दूध व खाद्य वस्तुओं के दाम वही हैं जो पहले थे। सबको छत देने का वादा हवा हवाई ही रहा है। बदलाव की बातें भर नहीं होनी चाहिए। दिखना भी चाहिए। खबरिया चैनलों के पास इसके लिए वक्त नहीं है। यह काम पांचवां स्तंभ यानि सोशल मीडिया ही करा सकेगा।
