रविवार, 27 अगस्त 2017

अकेला चना कैसे फोड़ेगा भाड़

देशकाल पर कागज कारे करने की बीमारी रही है मुझे। लगभग ढाई दशक से। पत्रकारिता की बीमारी लगने के बाद काफी समय तक ऐसा लगता रहा कि  अपने देश व दुनिया के बदलाव के लिए पहल करूंगा। एक ऐसा भारत बनाने में मेरे शब्द काम आएंगे, जहां न गरीबी हो, न अन्याय। समाज का हर तबका फले फूलेगा। मेरे जैसे तमाम लोग सोचते हैं, लेकिन कहावत है ना कि अकेला चना भाड़ तो नहीं फोड़ सकता। यही बात मुझ पर भी लागू होती है। अपने अब तक के अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि  हर किसी की अलग-अलग सोच रहती है और क्षमता भी।  देशकाल को लेकर विचारधाराएं है। मेरे विचार देश को एकजुट व मजबूत देखने के पक्ष में रहते हैं। दिक्कत तब होती है जब हम थोपते हैं अपनी बात। दूसरों को खारिज करने की धारणा हम हिंदुस्तानियों में सबसे अहम रही है।  बहरहाल यह लंबा विमर्श है। आज तो पिछले सप्ताह की कुछ घटनाओं -फैसलों का उल्लेख भर करूंगा ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत पडे़ तो काम आए। चीन से डोकलाम को लेकर चल रही तनातनी तीसरे महीने में पहुंच गई है। चीन रोज -रोज धमकी दे रहा है युद्ध की, लेकिन अब तक दोनों सेनाएं भिड़ी नहीं हैं। मुझे लगता है कि मौजूदा सरकार की दृढ़ता ने इस समय विश्व के दूसरे दरोगा को सोचने समझने के लिए मौका दिया है कि भारत किसी भी देश के लिए आसान भोजन नहीं है, तमाम विसंगतियों के बाद भी।
गुजरे सप्ताह की शुरुआत में तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला आ गया। इसमें पांच सदस्यीय खंडपीठ ने बहुमत से एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इसके बावजूद तीन तलाक देने की बातें आ रही हैं। क्या सबके लिए कानून नहीं है क्या इस देश में? यह मेरा सवाल है। कामन सिविल कोड देश की मांग है। इसे आप संकीर्ण सोच मान सकते हैं लेकिन गहराई से सोचेंगे तो पाएंगे कि इसके बिना बात नहीं बनेगी। गुजरे सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय खंडपीठ ने निजता को मौलिक अधिकार मान लिया है। यह काफी अहम फैसला है। मेरा अपना मत है कि हर किसी को स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन कितनी? देश -परिवार व समाज के प्रति कर्तव्य क्या हों, इसका ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए। आधार पर फैसला आना है। इसे निजता के अधिकार में शामिल करने से भ्रष्टाचार को लेकर हमारी लड़ाई कमजोर पड़ सकती है। उत्तराखंड व असम का एक प्रसंग यहां उल्लेखित करूंगा। वहां मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों के आंकड़े को आधार से जोड़ने की कवायद हुई तो करीब तीन चौथाई छात्र खारिज हो गए। यह मिले ही नहीं। यूपी में भी ऐसे ही आंकड़े हैं वजीफे को लेकर। यानि आधार से सरकारी कल्याण कारी योजनाएं लिंक किए जाने के सुफल आए हैं भ्रष्टाचार के खुलासे के रूप में। क्या इस तथ्य को खारिज कर देना चाहिए? किसी भी देश की तरक्की में सबसे बड़ा रोड़ा है भ्रष्टाचार। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संरक्षण के नाम पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा तो नहीं दिया जा सकता। चोर को चोर के रूप में पकड़ने के लिए यदि आधार का इस्तेमाल हो रहा है तो गलत क्या है?
सप्ताह के अंतिम दो दिनों में राम रहीम बाबा को दुष्कर्म के आरोप में सजा सुनाए जाने पर पंजाब और हरियाणा में हुई हिंसा ने मन व्यथित कर दिया। बाबा को चाहिए था कि कानून को अपना काम करने देते। सम्मान जताते।  बाबा यदि आसानी से कोर्ट में पेश हो गए होते तो शायद वह छूट भी जाते। अब ऐसा हो सकेगा, इसमें संदेह है। दरअसल हमारी न्यायापालिका से अदावत रखने वालों का भला नहीं हुआ है आज तक। इंदिरा गांधी से लेकर सहारा प्रमुख सुब्रत राय तक इसके उदाहरण हैं। विकसित समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं है, लेकिन चाहे दक्षिण पंथी हों अथवा वामपंथी, इस आग्रह के लिए गंभीर नहीं दिखते। यदि कश्मीर में हिंसा गलत है तो केरल में सही क्यों? कश्मीर से ही याद आ गया। पुलवामा में शनिवार को हुआ आतंकी हमला हमसे और सजगता की अपेक्षा करता है। आतंकवादी रक्तबीज की तरह हैं और देश की जनता को इनके विनाश के लिए मां काली की तरफ मुंह फैलाना होगा।
ध्यान रखिए कि राजनीति का अंतिम लक्ष्य समाज के सर्वहारा की खुशहाली है, भ्रष्टाचार के जरिए अपनी झोली भरना नहीं। दुर्भाग्य से इस देश ने 70 साल की आजादी में यही ज्यादा देखा है। हर दल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की बात जरूर की, लेकिन मौका मिला तो वह दूसरों से आगे निकलने की होड़ में नजर आए। केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार पर ऐसा कोई बड़ा दाग नहीं लगा है अब तक। यह कहीं कहीं आश्वस्त करता है, लेकिन जमीन पर चीजें नहीं बदलीं हैं ज्यादा। करीब 20 करोड़ गरीबों के लिए जनधन खाते खुले हैं, लेकिन इसमें करीब एक चौथाई खाली हैं, नोटबंदी के बाद भी। जीएसटी लागू होने के बाद इलाहाबाद में दूध व खाद्य वस्तुओं के दाम वही हैं जो पहले थे। सबको छत देने का वादा हवा हवाई ही रहा है। बदलाव की बातें भर नहीं होनी चाहिए। दिखना भी चाहिए। खबरिया चैनलों के पास इसके लिए वक्त नहीं है। यह काम पांचवां स्तंभ यानि सोशल मीडिया ही करा सकेगा। 

रविवार, 6 अगस्त 2017

कलाई आपकी, प्यार हमारा...

फौज में जाना मेरा सपना था। फौजी मेरे आदर्श हैं । जबलपुर में मैट्रिककुलेशन के बाद इंडियन नेवी की आर्टिफिशयल अप्रेंट्रिस की परीक्षा दी थी। इसमें सफल नहीं हो सका। देखते ही देखते वह उम्र गुजर गई, जब फौज में जा सकता था। मन भटक गया कहीं और। लिखने पढ़ने की दुनिया में आना था, इसलिए फौज की जिंदगी ख्वाब ही रह गई। लगभग उन्हीं दिनों में टेलीविजन पर शाहरुख खान का सीरियल आने लगा फौजी। इसलिए भी फौज को लेकर उत्सुकता बढ़ गई। ऐसे शहर में बचपन बीता है, जो भारतीय सशस्त्र सेनाओं के लिए खास है। एरिया कमांड है जबलपुर। थल सेना के लगभग लगभग सभी सिपाहियों, अफसरों का वास्ता जीवन में एकाध बार यहां से जरूर पड़ता है, ऐसा पता चला था। खैर, देखते ही देखते ढाई दशक से ज्यादा का समय गुजर गया। फौज में जाने का ख्वाब अब इस जिंदगी में पूरा नहीं हो सकेगा। अगले जन्म में ईश्वर ने साथ दिया तो जरूर जाऊंगा फौज में।
आज फौज की बात क्यों? यह सवाल आप कर सकते हैं। चलिए उत्तर भी दे देता हूं। असल में कल कुछ देर फौजियों के बीच रहने का मौका मिला। दैनिक जागरण दशक भर से ज्यादा समय से भारत रक्षा पर्व मानता आ रहा है। इस पर्व के तहत विभिन्न संस्करण (प्रकाशन केंद्र) में कार्यरत सहयोगी अपने -अपने शहर की बहन बेटियों के हाथ की बनी राखियां जुटाते हैं। इन राखियों को ट्रक के जरिए सीमा पर तैनात जवानों को भेजा जाता है। सरहद प्रहरियों पर प्यार जताने का पर्व होता है एक तरह से यह। हम सिविलयन तो हर तीज त्योहार का आनंद ले लेते हैं अपनों के बीच, लेकिन यह ऐसा दिन होता है जब एक फौजी भाई को उसकी बहन की कमी खलती है। आखिर वह भी परिवार छोड़कर मोर्चे पर हैं। कभी पत्थर खाते, कभी गोलियां झेलते। इस अभियान से जहनी जुड़ाव पहली बार महसूस हुआ, शनिवार को इलाहाबाद स्थित पूर्व यूपी -एमपी एरिया सब कमांड मुख्यालय पहुंचकर। अनुशासित फौज और उसके सिपाही वाकई में अदभुत नजर आए। यह दुनिया कुछ अलग ही दिखी। हम (आदरणीय संपादकीय प्रभारी जगदीश जोशी, उपमहाप्रबंधक मनीष चतुर्वेदी, सहयोगी अवधेश पांडेय, रमेश यादव, दिव्यानंद पांडेय, शानू सिंह) मुख्यालय की हरियाली, सुरक्षा देख ओतप्रोत थे। कुछ ही देर में हमारे बीच में थे मेजर जनरल एसके सिंह। संपादकीय प्रभारी जगदीश जोशी ने कार्यक्रम का संक्षिप्त परिचय दिया। हमने राखियां भेंट की। फिर बारी थी मेजर जनरल एसके सिंह की। हिंदी पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। कहा कि सिविलयन की तरफ से ऐसे उपक्रम हमें (फौज को) यह बताते हैं कि हम उनके लिए खास हैं।)  उन्होंने चंद पंक्तियां पढ़ फौजी की जिंदगी और देश में उसके योगदान को रेखांकित कर दिया। उनकी पंक्तियां थीं....
कभी ठंड में ठिठुर कर देखो, कभी गर्मी में तप कर देखो
देश की हिफाजत कैसे होती है कभी सरहद पर आकर देखो...
उपरोक्त पंक्तियां दिल में उतर गईं। गहरे से। राखियां सौंपे जाने के बाद हमारे साथ ही परिसर में पहुंची एमपीवीएम गंगा गुरुकुलम स्कूल की छात्राओं ने तिलक किया फौजी भाईयों का और राखियां बांधने लगीं। तमाम फौजी भाईयों ने हाथ पर राखियां बंधवाई और पर्स निकाल कर नेग दिया। मुझे याद आ गई अपनी बहन की। मैं भी ऐसे ही करता हूं। एकबारगी आंख छलछला आईं। यह दृश्य भुलाए नहीं भूलेगा। रक्षाबंधन तो और भी आएंगे। हमारा समाज, हमारी नई पीढ़ी कितनी संवेदनशील है फौजी भाईयों को लेकर, यह शब्दों में बता पाना संभव नहीं। कल रक्षा बंधन है। इस बार कुछ ही घंटों का वक्त रहेगा राखियां बांधने के लिए। सीमा पर मौजूद सारे जवानों के हाथ में देश के नेह का बंधन होगा, ऐसा विश्वास करता हूं। बहनें निश्चित तौर पर नहीं चूकेंगी। आखिर इन्हीं भाईयों के हाथ ही है उनकी लाज। तो कह सकते हैं कि कलाई आपकी, प्यारा हमारा... रक्षा बंधन का पर्व है प्यारा।
    

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...