रविवार, 26 अप्रैल 2015

मन मत करना रे अभिमान ...


मानस में तुलसी दास बाबा ने परमशक्तिशाली परमात्मा के लिए लिखा है...

बिन पद चलइ सुनइ बिनु काना, कर बिनु करम करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी, बिनु बानी वकता बड़ जोगी।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा, ग्र्रहई घान बिना बास असेषा।
असि सब भांति अलौकिक करनी
महिमा जासु जाइ नहि बरनी।
निर्गुण, निराकार प्रभु की यह स्तुति वाकई अद्भुत है। आज रविवार को जब दूसरी बार भूकंप का झटका महसूस किया है, तब ऐसा ही महसूस कर रहा हूं। प्रभु की लीला कोई नहीं जान सकता। विज्ञान भी नहीं। जो खुद को सर्वशक्तिमान मानता है। छह अरब की आबादी में कुछ हजार, कुछ सौ, कुछ इकाई की संख्या में मौतें हर दिन होती है, लेकिन न जाने क्यों हम प्रभु की लीला समझ नहीं पाते। शायद वजह है हमारा अहंकार। धर्मविमुख मार्ग पर चलने की वजह से उपजी हमारी अज्ञानता। दसानन को भी कुछ ऐसा ही हो गया था। वह खुद अपने अहंकार में इतना मदांध हो गया था कि दूसरे लोग उसे चीटीं समझ में आते हैं। सुंदर कांड में तुलसी बब्बा शायद इसीलिए रावण के दरबार का चित्रण कुछ इन शब्दों में करते हैं -कर जोड़े सुर, दिसिप विनीता। हमारे एक सहयोगी कल कुछ उग्र्र थे। उन्होंने मुझे भला -बुरा कहा। मैंने उसे तवज्जो नहीं दी। मैं इसे उनका अहंकार ही मानता हूं। रात में सोचता रहा, क्षमा वीरों का गुण है और अहंकार अज्ञानियों का। इसलिए शांत करूं मन को। मानव हूं, इसलिए धीरे-धीरे शांत कर पाया अपने मन को। शायद यही जिदंगी का उचित तरीका है। यदि आप ईश्वर को मानते हैं तो सब उन पर छोड़ दें, वह जो करेंगे अच्छा ही करेंगे। बस यही मान लीजिए। दोस्तों अपने अनुभव से कहता हूं कि जिंदगी संवर जाएगी। दरअसल लोभ, मोह का कोई अंत नहीं है। यह अनंत है। इससे जितना बचोगे, जिंदगी उतनी ही आसान हो जाएगी। 

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

दहशत की दोपहर


आज सुबह 11.40 बजे यूपी डेस्क के लिए प्रस्तावित खबरें भेजने की तैयारी कर रहा था। कम्युनिकेशन खोला ही था कि सहयोगी आशुतोष तिवारी ने जोर से आवाज लगाई, सर बाहर निकलें, भूंकप आ गया है...मैंने आवाज सुनी, लगा कि आशुतोष मजाक कर रहे हैं, फिर महसूस किया कि वह कुर्सी भी हिल रही है, जिस पर मैं बैठा हूं। कंप्यूटर भी हिलता नजर आया, करीब 10 सेकेंड चला यह क्रम। फिर सब थम गया। बाहर निकला, देखा कैंपस में सारे सहयोगी खड़े थे। घर फोन लगाया, बेटे को, पत्नी को। उनके मोबाइल की घंटी बजती रही,रिस्पांस नहीं मिला। मन में भय समा गया। ऊपर वाले का स्मरण किया। शुक्र है कुछ पलों बाद बेटे से बात हो गई। उसने कहा-पापा हम छत पर आ गए हैं, बिल्डिंग कांपने लगी थी। मैंने उसे कहा वह व्हाट्स एप पर यह मैसेज आगे बढ़ा दे। ऑफ्टर शॉक लगने की आशंका है, इसलिए खुद भी बैचेन हूं। नेपाल की तस्वीर आ रही है टेलीविजन स्क्रीन पर। वहां तबाही ही होगी, देर शाम तक तस्वीर साफ हो जाएगी। 7.9 तीव्रता वाले भूंकप की बात खबरिया चैनल बता रहे हैं। नेपाल का कांतिपुर टेलीविजन बर्बादी दिखाने लगा है। सिलीगुड़ी में भी बर्बादी दिख रही है। नेपाल में लांगचुक, काठमांडू व पोखरा में जो कुछ हुआ, उसकी कल्पना भी कर रहा हूं। राहत इतनी ही है कि नेपाल में शनिवार को बंदी रहती  है, इसलिए जान-माल का नुकसान कुछ कम हुआ होगा। पशुपतिनाथ मंदिर की सलामती मेरे लिए सुकूनदेह है। ईश्वर करें कि नुकसान कम से कम हों। भूंकप क्यों आता है, इसे तो वैज्ञानिक ही बताएंगे, मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि कहीं न कहीं यह हमारे कुकर्मों का भी सबब है। 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

चीटियों का इशारा, भरेगा भंडार सारा



यूपी के कौशांबी जिले में सिराथू तहसील का एक गांव है उदिहिन खुर्द। क्षेत्र को करीब से जानने वाले ओम प्रकाश सिंह  ने बारिश और इस बारे में चीटियों से होने वाले एक टोटके का रोचक ब्योरा भेजा है। सो इसे ब्लॉग में सहेज रहा हूं, ताकि सनद रहे। उदिहिन खुर्द निवासी वयोवृद्ध संतशरण  सिंह उर्फ मुखिया बाबा क्षेत्र में आधुनिक घाघ कहलाते हैं। यानी मौसम के जानकार। वह 'सगुनौती विधि' अपनाते हैं। दावा यह है कि उनकी अब तक मौसम को लेकर सारी भविष्यवाणियां लगभग सौ फीसद सच रही हैं और इस बार उनका कहना है कि रबी में मौसम ने चाहे जैसे मारा हो, खरीफ में इतनी बारिश जरूर होगी कि किसानों के कोठर अन्न से लबालब होंगे। संतशरण,चीटियों से मिले फलित के आधार पर कहते हैं कि आषाढ़ में तो पानी कम रहेगा लेकिन सावन और भादों में झड़ी लगेगी। खेत लबालब रहेंगे। अगले रबी सीजन में वह गेहूं की बुआई के लिए भी पर्याप्त बारिश की भविष्यवाणी कर रहे हैं। उनकी मानें तो कार्तिक पानी से भरा रहेगा।
भारतीय मौसम विभाग ने इस बार 35 फीसद बारिश कम होने की संभावना जताई है। बुधवार को दिल्ली में केंद्रीय विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान मंत्री हर्षवर्धन ने तकनीक आधारित ज्ञान जिसे हम विज्ञान भी कह सकते हैं, के आधार पर आने वाले दिनों में बादलों की जानकारी दी थी। मैं अंधविश्वासी नहीं हूं, इसलिए चीटियों के टोटके को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहता, लेकिन हैरत तो मुझे भी है, ऐसी किसी जानकारी पर। खैर 22 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर 'सगुनौती विधि आजमाई गई। इसमें 11 जिंसों  को लेकर भविष्य फल निकाला गया। जिन जिंसों के लिए फलित निकाला गया, उनमें चना, सांवा, ज्वार, जौ, धान, बाजरा, उर्द, कपास, गेहूं, काकुन व मकर शामिल है।
यह है सगुनौती विधि
अक्षय तृतीया पर रात में करीब 11 बजे 11 ङ्क्षजस कपड़े में एक-एक तोला बांधकर मटके पर बांध दिए जाते हैं।  उस पर रोटी व मोटे अनाज से बने कई प्रकार के व्यंजन होते हैं। करीब ही पानी भरा मटका आषाढ़, सावन, भादों, कुंवार और काॢतक नाम से पांच मिट्टी के ढेले के ऊपर रखा जाता है। पौ फटने से पहले ही मटके हटाकर यह देखा जाता है कि क्या हुआ? रोटी में चीटियां लिपटीं मिलीं तो अनुमान लगाया जाता है कि गेहूं की पैदावार भरपूर होगी। दूसरे मटके के नीचे रखे गए माह नाम वाले ढेले जितना भीगे होते हैं उसके आधार पर कहा जाता है कि फलां महीने में पानी गिरेगा अथवा नहीं। मटकी के साथ एक-एक तोला के 11 ङ्क्षजस अलग-अलग बांधे जाते हैं। इन्हें चांदी के सिक्के से तौला जाता है। इसके बाद जब वापस मटकी हटाई जाती है तो जिस तराजू से ङ्क्षजस की तौल होती है, उसी तराजू से दूसरे दिन उनकी दोबारा तौल होती है। इसकी बाकायदा लिखा-पढ़ी होती है। दूसरे दिन दाना तौल में कम या ज्यादा अथवा बराबर उतरता है तो उससे आने वाली फसल की उपज का अनुमान लगाया जाता है। पिछली अक्षय तृतीया पर किए गए टोटके में रोटी गायब हो गई थी। तभी उन्होंने कह दिया था गेहूं की पैदावार बहुत कम होगी। ठीक वैसा ही हुआ और किसान बेमौत मर रहे हैं। यदि राजस्थान के दौसा के गजेंद्र सिंह को 'सगुनौती की जानकारी हो गई होती तो हो सकता है वह आज जिंदा होते और देश की सबसे बड़ी पंचायत में शोर-शराबे की जगह आम लोगों के लिए कुछ अच्छी बात भी होती। 

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

सब कुछ सीखा हमने पर सीखी न होशियारी...

अप्रैल का महीना कुछ खास होता है। मेरे जैसे उन कर्मचारियों के लिए, जो निजी क्षेत्र के एम्पलाई होते हैं। दरअसल इसी महीने ज्यादातर संस्थानों में इंक्रीमेंट-प्रमोशन का दौर चलता है। आपकी साल भर की परफारमेंस बास के मूड पर होती है, यदि फैसले के वक्त किसी भी कारण से आपके बास का मूड खराब हो आपसे, तो बैठ जाता है भट्ठा। बाबा जी का टुल्लू मिलने वाली बात ही रह जाती है कर्मचारियों के लिए। साल भर संस्थान अथवा बास को कोसें, या अपनी किस्मत पर रोएं , इसका कोई मतलब नहीं रह जाता। ऐसे लोग विरले ही रहते हैं जो इस कवायद से अप्रभावित होते होंगे। मैं भी इनमें नहीं हूं। मुझे पीड़ा होती है मई में, जब अपना इंक्रीमेंट देखता हूं। मेरे काम के मूल्यांकन कैसा हुआ, मुझमें क्या कमी रह गई? ऐसे सवालों से जूझता हूं, पर कहते हैं न कि समय सबसे बड़ा मरहम होता है, धीरे-धीरे भूल जाता हूं। जुट रहता हूं उत्साह से। अपनी सामर्थ्य भर। दूसरों को सलाह देता हूं कि कम से कम जनवरी से लेकर मार्च तक किसी भी सूरत में पंगा न लें बास से, लेकिन खुद भी यही भूल कर बैठता हूं। करूं क्या, अनाड़ी जो ठहरा।
आदरणीय ज्ञानरंजन सर ने मुझे एक सलाह दी थी। जबलपुर में मई 2010 में। अवसाद के दिन थे वे। पीपुल्स समाचार की नौकरी छोड़ दी थी, तथाकथित अहं को ठोस लगने पर। किसी और ठौर की तलाश में मदद के लिए गया था, उनके पास। उन्होंने मदद भी की। सिफारिशी पत्र लिखा था मेरे लिए। यह बात दीगर रही कि उस पत्र की गति मेरी किस्मत से तेज नहीं निकली। जिन विभूति से  उन्होंने मेरे लिए कोई गुंजाइश निकालने की गुजारिश की, उन्होंने भी सिर्फ आश्वासन दिया। संभवतः समय का फेर था। खैर, ज्ञानरंजन सर की सलाह बता दूं। उन्होंने कहा था, -सुरेश तुम्हें थोड़ा डिप्लोमेटिक होना चाहिए। सर स्वीकार करता हूं कि कोशिश की, लेकिन बन नहीं सका हूं। इस जीवन में शायद यह संभव भी नहीं हो पाएगा।  क्षमा करेंगे। तकदीर से ज्यादा और वक्त से पहले कुछ नहीं मिल सकता, अब इस पर और यकीन बढ़ गयाहै। इस बार मई के बाद शायद कुछ और भी बढ़ जाएगा। यदि गलत साबित होता हूं, तो इसी ब्लाग पर फिर से कुछ शब्दों से अपनी भावना व्यक्त करूंगा। 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

दोनों देवियां हैं रूठीं...



आज अक्षय तृतीया है। सुबह टेलीविजन पर बताया जा रहा है कि मुद्दत बाद यह संयोग बना है। हर साल ऐसा ही संयोग बताया जाता है। ज्ञानी पंडित यही बताते हैं, इस बार भी कुछ ऐसा ही था। खैर बात सुबह की कर रहा हूं। खबरिया चैनल न्यूज 24 खुला था टेलीविजन स्क्रीन पर। मेरे उस ठिकाने पर जो किराए का मकान कहलाता है। पंडित जी बतलाते जा रहे थे कि फलां -फलां राशि वाले क्या- क्या चीजें खरीदें तो धन-संपदा बढ़ेगी। मुझे हंसी आ गई। दरअसल मेरी राशि वालों के लिए चांदी खरीदने की सलाह थी, (पता नहीं किस पंचांगकार ने मेरी राशि मेष तय कर दी है)। श्रीमती जी खुश हो गईं, बोली मैं कब से पायल के लिए कह रही थी, अब आज खरीद दो। मुझे अपना बैंक बैलेंस याद आ गया। कोई 2100 रुपये ही इसमें हैं, मैंने कहा, दो चार सौ की बात हो तो सोचूं भी। खैर स्क्रीन पर एक और सलाह आई पंडित सुरेश पांडेय की। बोले तुला राशि वालों के लिए नया वस्त्र खरीदना शुभ रहेगा। बेटा शुभम खुशी से उछल पड़ा। उसकी राशि तुला ही है, पंडित जी लोगों ने ऐसा ही विचारा है। मैंने शुभम से कहा जाओ खरीद लो...। जबाव मिला, तीन हजार रुपये दे दो। इससे कम में कुर्ते नहीं आ रहे हैं। मैं फिर बैकफुट पर था। क्या कहता? दोबारा याद आ गया बैंक बैलेंस। सोचने लगा न लक्ष्मी देवी की किरपा है न सरस्वती देवी की। जब दोनों देवियां रूठीं हैं तो लाख अक्षय तृतीया आए, मेरे लिए बेमतलब। हां, कल रात में अपना ब्लॉग ढूंढ लिया था, संस्थान से मिले टैब की बदौलत। इस पर जरूर दर्ज कर दूं अपनी सुबह की दास्तां। ताकि कभी रहूं, न रहूं, यह तो सनद रहे। दरअसल अपन का क्षय तो होना ही है एक दिन। अपन अक्षय नहीं हैं ना...। 

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...