मानस में तुलसी दास बाबा ने परमशक्तिशाली परमात्मा के लिए लिखा है...
बिन पद चलइ सुनइ बिनु काना, कर बिनु करम करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी, बिनु बानी वकता बड़ जोगी।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा, ग्र्रहई घान बिना बास असेषा।
असि सब भांति अलौकिक करनी
महिमा जासु जाइ नहि बरनी।
निर्गुण, निराकार प्रभु की यह स्तुति वाकई अद्भुत है। आज रविवार को जब दूसरी बार भूकंप का झटका महसूस किया है, तब ऐसा ही महसूस कर रहा हूं। प्रभु की लीला कोई नहीं जान सकता। विज्ञान भी नहीं। जो खुद को सर्वशक्तिमान मानता है। छह अरब की आबादी में कुछ हजार, कुछ सौ, कुछ इकाई की संख्या में मौतें हर दिन होती है, लेकिन न जाने क्यों हम प्रभु की लीला समझ नहीं पाते। शायद वजह है हमारा अहंकार। धर्मविमुख मार्ग पर चलने की वजह से उपजी हमारी अज्ञानता। दसानन को भी कुछ ऐसा ही हो गया था। वह खुद अपने अहंकार में इतना मदांध हो गया था कि दूसरे लोग उसे चीटीं समझ में आते हैं। सुंदर कांड में तुलसी बब्बा शायद इसीलिए रावण के दरबार का चित्रण कुछ इन शब्दों में करते हैं -कर जोड़े सुर, दिसिप विनीता। हमारे एक सहयोगी कल कुछ उग्र्र थे। उन्होंने मुझे भला -बुरा कहा। मैंने उसे तवज्जो नहीं दी। मैं इसे उनका अहंकार ही मानता हूं। रात में सोचता रहा, क्षमा वीरों का गुण है और अहंकार अज्ञानियों का। इसलिए शांत करूं मन को। मानव हूं, इसलिए धीरे-धीरे शांत कर पाया अपने मन को। शायद यही जिदंगी का उचित तरीका है। यदि आप ईश्वर को मानते हैं तो सब उन पर छोड़ दें, वह जो करेंगे अच्छा ही करेंगे। बस यही मान लीजिए। दोस्तों अपने अनुभव से कहता हूं कि जिंदगी संवर जाएगी। दरअसल लोभ, मोह का कोई अंत नहीं है। यह अनंत है। इससे जितना बचोगे, जिंदगी उतनी ही आसान हो जाएगी।
