शनिवार, 30 दिसंबर 2017

आइए 2018, स्वागत है

ठीक 11 घंटे बाद हम 2018 में होंगे। आप सभी को शुभकामनाएं। साल 2017 की यह आखिरी पोस्ट लिख रहा हूं तो कश्मीर में आतंकियों के हमले की खबर आ रही है।इसमें दो सीआरपीएफ जवानों की मौत हो गई है।  पाकिस्तानी सेना के स्नाइपर दस्ते के हमले में भी एक जवान की मौत हो गई है। 2018 में ऐसा कोई दिन न हो, यह कामना करता हूं। सीमा पर तैनात हमारे जवान सलामत रहें, उनका परिवार हंसता खेलता रहे, यह ईश्वर से मेरी पहली प्रार्थना होगी। जब सीमा पर शांति होगी तभी प्रगति, खुशहाली होगी।
2016 के आखिरी दिनों में उड़ी सेना के शिविर में आतंकी हमला हुआ था। मन के एक कोने में कहीं न कहीं था कि इस बार भी ऐसा कुछ हो सकता है। यह आशंका सही साबित हुई। लगता है कि पाकिस्तान मान नहीं सकता। यह तय हो गया है। कुलभूषण जाधव के परिवार वालों से उसका व्यवहार इस बात का प्रमाण है। कह सकता हूं कि वह कुत्ते की पूंछ है, कभी नहीं सीधी हो सकती... तब हम क्या करें। बस, प्रण प्राण से देश के लिए मर मिटने का संकल्प लें, इजराइल के लोगों की तरह। देश को पहले मानें , दल विचारधारा की बात बाद में करें। हिंदू हों अथवा मुसलमान, सिख या फिर ईसाई । किसी भी तरह की कट्टरता हमारे लिए नुकसान देह है यह जान लें। दलों का क्या है, वोट लेंगे बरगलाकर फिर भुला देंगे। हम आपस में लड़ते भिड़ते रह जाएंगे और वह अपना पेट भरते रहेंगे।
वैसे गुजरते साल में बहुत कुछ मन का हुआ। बहुत कुछ बेमन का भी। मार्च में यूपी में विधानसभा के चुनाव हुए। जैसी कल्पना की थी, नतीजे उससे बेहतर रहे। यह बात दीगर है कि जीते लोगों से की गई अपेक्षा अब तक पूरी नहीं हो सकी। मुझे कुछ खास चाहिए भी नहीं था, लेकिन सरकारी योजनाओं के जिस तरह धरातल पर आने का मेरा सपना था ,वह अधूरा ही है। फिर भी स्वच्छता की ललक बढ़ी है लोगों में। कम से कम हमारे प्रधानमंत्री जी का यह आह्वान कुछ साकार रूप लेता दिख रहा है, इसकी खुशी है। उनकी सोच देश के समग्र विकास की है। स्वच्छता बिना लक्ष्मी नहीं बसतीं। हर हिंदुस्तानी को इसे हाथों हाथ लेना चाहिए। एक ही समय में ही तीन बार तलाक -तलाक तलाक कहने वालों को सजा के प्रावधान का विधेयक लोकसभा से पारित हो गया है, यह राज्यसभा से भी पारित हो जाएगा, ऐसी उम्मीद है। मेरा दलों से आग्रह है कि अखंड भारत के लिए यूनीफार्म सिविल कोड की तरफ वह जरूर सोचें। बहुधर्मी, बहुभाषी समाज में इतने विघ्नसंतोषी हैं कि छोटे छोटे असंतोष को वह हवा देते हैं। विकसित गुजरात के हालिया चुनाव नतीजों से साफ है कि जातिवाद रूपी सर्प डसने के लिए हमारे बीच मौजूद है। भारत की तरक्की से जलने वाले देश ऐसे विवादों को हवा देते हैं। जातियां सच हैं, लेकिन आरक्षण जैसे प्रावधान पर विचार करना चाहिए। यह आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को ही मिलना चाहिए। यदि कोई दलित आइएएस, आइपीएस बन जाता है तो उसके परिवार को इसका लाभ क्यों दिया जाए। कम से कम फर्स्ट एवं सेकेंड क्लास की सेवा में आने वाले एससी-एसटी व ओबीसी वर्ग के लोगों को खुद आगे आकर इसके लिए आवाज उठानी चाहिए। क्रीमी लेयर हर समाज में हैं। वही योजनाओं का लाभ उठा लेते हैं ऐसे में आम जनमानस के लिए क्या है। त्रिपुरा में सिर्फ सरकारी नौकरियां हैं। 10 हजार रुपये के मासिक पगार वाली। यूपी में प्राइमरी के एक मास्टर की शुरुआती तनख्वाह 33 हजार रुपये के आसपास। यह विसंगति ही है। इस पर केंद्र सरकार को सोचना चाहिए। एक देश के रूप में हमें बहुत कुछ बदलाव करने होंगे तभी हम 2030 तक विकसित देश की श्रेणी में आ सकते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत है, लेकिन सामाजिक व्यवस्था कमजोर।  
खैर, चलिए।कुछ और बातें। 2017 में मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत कुछ मिला। तमाम रिश्तों पर पड़े पर्दे उठे। जिन्हें अपना हितैषी करीबी मानता था, उनकी असलियत सामने आई। परिवार, भाई बंधु बांधव सबकी। कुछ खट्टा कुछ मीठा। यह अनुभव 2018 में काम आएगा, ऐसा मेरा मानना है। जीवन के 48 वसंत देखने के बाद अब कह सकता हूं कि  बिना धन जीवन अधूरा है। शुभम आयुष के जीवन में यह साल खुशहाली लेकर आएगा, यह उम्मीद है। उनकी मां का अब तक सबसे बड़ा सपना पूरा हो, इसके लिए प्रयास करूंगा, लेकिन यह पूर्ण हो पाएगा, अथवा नहीं इस सिलसिले में कोई दावा करने की स्थिति में अभी नहीं हूं। ...पानी केरा बुलबुला, अस मानुष की जात.... कब किस क्षण किस मोड़ पर जिंदगी में तूफान आ जाए कुछ निश्चित नहीं। वाराणसी में दीपू का मकान इसलिए बन जाएगा, इसका जरूर विश्वास है। कम से कम परिवार में एक खुशी तो आएगी। बाबू जी स्वस्थ्य एवं सलामत रहें, इसकी कामना भी करूंगा। जब तक वह हैं घर में एक छाया है। बहन बेबी उनकी बेटियों शुभांगी, आदिति व भांजे आनंद के लिए भी दुआ। ...

रविवार, 17 दिसंबर 2017

उजाले संग अंधेरे से दोस्ती ...

किसी शायर की एक रचना सुनी  थी कभी। समय था दीवाली के आसपास। बोल थे -आओ ऐसा दीया जलाएं किसी रोते हुए को हंसाएं। माना कि इंसान ईश्वर का अंश है, इसलिए वह ऐसा कर सकता है लेकिन उजाले संग अंधेरे का भी साथ होता है। आखिर अंधेरे को कैसे मात दी जाए... तो चलिए मेरे साथ शब्दों के सफर पर।  दो दिन पहले महामहिम रामनाथ कोविंद इलाहाबाद में थे। शहर लकदक नजर आ रहा था। न जाम का झाम न बदरंग सड़कें, फुटपाथ। मुझे साफ सुथरा शहर खूब भाया। मन ही मन सोच रहा था कि काश हमेशा ऐसा रहता ...। नगर निगम वाले सब कुछ बदल देने के लिए आमादा नजर आएं और पुलिस वाले  व्यवस्था को व्यवस्थित रखने के लिए।
जाहिर है ऐसा होगा नहीं। इसलिए  उजाले के लिए अंधेरा तो करना ही होगा। जिस दिन महामहिम थे उस दिन फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों के लिए कर्फ्यू मानिंद था। हर वीवीआइपी के आगमन पर ऐसा ही होता है। म्यो हाल चौराहे के आसपास ठेले वाले हटा दिए जाते हैं। टेंपों वालों के लिए भी कोई जगह नहीं बचती। रिक्शे वालों का भी निवाला मुश्किल भरा हो जाता है। इसलिए उनकी जिंदगी में अंधेरा पसर जाता है।
लोकतंत्र , चाहे वह भारत का हो अथवा चाइना का ...क्या ऐसा ही है...।
एक खबर मैंने पढ़ी थी किसी वेब साइट पर। अमेरिका में भी लोग सीवर लाइन के लिए डाली गई पाइप लाइनों में रहते हैं। मेरे लिए अचरज की बात थी। अमेरिका -चीन जैसे विकसित देशों में जहां शहरों और गांवों में आवासों की उपलब्धता का अनुपात क्रमशः 100 व 80 है, वहां भी क्राइसिस। भारत में झुग्गियां बसती हैं चुनाव के लिए। लोकतंत्र के लिए। दिल्ली मुंबई हो अथवा चेन्नई। वैसे दक्षिण भारत के राज्यों में स्थिति कुछ बेहतर है, लेकिन उत्तर भारत अभिशप्त है। गरीबी हटाने के नारे यहां आजादी के बाद से चल रहे हैं, पर मुई गरीबी जस की तस है। वह हटने के लिए तैयार नहीं दिखती। उसने कसम खा रखी है कि वह नहीं हटेगी। मीडिया गरीबी बेचेगा, नेता बेचेगा लेकिन वह हटेगी नहीं। हां जब कोई नेता मन की गरीबी की बात कर देगा तो उसकी हंसी जरूर उड़ेगी। वैसे हम भारतीयों के मन की गरीबी भी दिलचस्प है। मैं जिस पेश में हूं उसे लेकर अनुभव यह है कि यहां छुट्टियों को लेकर सौतिया डाह की स्थिति है। भाई लोग छुट्टियों को अपना संवैधानिक विशेषाधिकार समझते हैं। काम नहीं करना पड़े, लिखना पढ़ना नहीं पढ़े लेकिन खुद को काम के बोझ से दबा बताते हैं। नकारात्मकता इतनी भरी है कि पूछिए नहीं। आज संडे हैं, एक एप्लीकेशन पहले से पेंडिंग था, दो और आ गए हैं, कैसे मैनेज किया जाएगा, इससे किसी को मतलब नहीं। मेरे एक सहयोगी हैं ईयर एंड पर नौ दिन गायब रहेंगे। चार दिन बीमारी के नाम पर, चार दिन बिटिया को खिलाने के नाम पर। दूसरे सहयोगी यदि अपने अवकाश के दिन आ गए हैं तो उन्हें अवकाश चाहिए। जबरिया। क्या कर लेंगे। यदि ऐसे महानुभावों का किसी दूर जिले में तबादला हो जाए तब रोएंगे, मानवाधिकार की दुहाई देंगे अब बताइए कि ऐसे लोगों के लिए लोकतंत्र होना चाहिए क्या... लेकिन उजाले संग अंधेरे की दोस्ती रखनी होगी। इसलिए यह क्रम चलेगा। 

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...