रविवार, 17 दिसंबर 2017

उजाले संग अंधेरे से दोस्ती ...

किसी शायर की एक रचना सुनी  थी कभी। समय था दीवाली के आसपास। बोल थे -आओ ऐसा दीया जलाएं किसी रोते हुए को हंसाएं। माना कि इंसान ईश्वर का अंश है, इसलिए वह ऐसा कर सकता है लेकिन उजाले संग अंधेरे का भी साथ होता है। आखिर अंधेरे को कैसे मात दी जाए... तो चलिए मेरे साथ शब्दों के सफर पर।  दो दिन पहले महामहिम रामनाथ कोविंद इलाहाबाद में थे। शहर लकदक नजर आ रहा था। न जाम का झाम न बदरंग सड़कें, फुटपाथ। मुझे साफ सुथरा शहर खूब भाया। मन ही मन सोच रहा था कि काश हमेशा ऐसा रहता ...। नगर निगम वाले सब कुछ बदल देने के लिए आमादा नजर आएं और पुलिस वाले  व्यवस्था को व्यवस्थित रखने के लिए।
जाहिर है ऐसा होगा नहीं। इसलिए  उजाले के लिए अंधेरा तो करना ही होगा। जिस दिन महामहिम थे उस दिन फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों के लिए कर्फ्यू मानिंद था। हर वीवीआइपी के आगमन पर ऐसा ही होता है। म्यो हाल चौराहे के आसपास ठेले वाले हटा दिए जाते हैं। टेंपों वालों के लिए भी कोई जगह नहीं बचती। रिक्शे वालों का भी निवाला मुश्किल भरा हो जाता है। इसलिए उनकी जिंदगी में अंधेरा पसर जाता है।
लोकतंत्र , चाहे वह भारत का हो अथवा चाइना का ...क्या ऐसा ही है...।
एक खबर मैंने पढ़ी थी किसी वेब साइट पर। अमेरिका में भी लोग सीवर लाइन के लिए डाली गई पाइप लाइनों में रहते हैं। मेरे लिए अचरज की बात थी। अमेरिका -चीन जैसे विकसित देशों में जहां शहरों और गांवों में आवासों की उपलब्धता का अनुपात क्रमशः 100 व 80 है, वहां भी क्राइसिस। भारत में झुग्गियां बसती हैं चुनाव के लिए। लोकतंत्र के लिए। दिल्ली मुंबई हो अथवा चेन्नई। वैसे दक्षिण भारत के राज्यों में स्थिति कुछ बेहतर है, लेकिन उत्तर भारत अभिशप्त है। गरीबी हटाने के नारे यहां आजादी के बाद से चल रहे हैं, पर मुई गरीबी जस की तस है। वह हटने के लिए तैयार नहीं दिखती। उसने कसम खा रखी है कि वह नहीं हटेगी। मीडिया गरीबी बेचेगा, नेता बेचेगा लेकिन वह हटेगी नहीं। हां जब कोई नेता मन की गरीबी की बात कर देगा तो उसकी हंसी जरूर उड़ेगी। वैसे हम भारतीयों के मन की गरीबी भी दिलचस्प है। मैं जिस पेश में हूं उसे लेकर अनुभव यह है कि यहां छुट्टियों को लेकर सौतिया डाह की स्थिति है। भाई लोग छुट्टियों को अपना संवैधानिक विशेषाधिकार समझते हैं। काम नहीं करना पड़े, लिखना पढ़ना नहीं पढ़े लेकिन खुद को काम के बोझ से दबा बताते हैं। नकारात्मकता इतनी भरी है कि पूछिए नहीं। आज संडे हैं, एक एप्लीकेशन पहले से पेंडिंग था, दो और आ गए हैं, कैसे मैनेज किया जाएगा, इससे किसी को मतलब नहीं। मेरे एक सहयोगी हैं ईयर एंड पर नौ दिन गायब रहेंगे। चार दिन बीमारी के नाम पर, चार दिन बिटिया को खिलाने के नाम पर। दूसरे सहयोगी यदि अपने अवकाश के दिन आ गए हैं तो उन्हें अवकाश चाहिए। जबरिया। क्या कर लेंगे। यदि ऐसे महानुभावों का किसी दूर जिले में तबादला हो जाए तब रोएंगे, मानवाधिकार की दुहाई देंगे अब बताइए कि ऐसे लोगों के लिए लोकतंत्र होना चाहिए क्या... लेकिन उजाले संग अंधेरे की दोस्ती रखनी होगी। इसलिए यह क्रम चलेगा। 

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