रविवार, 25 सितंबर 2016

राष्ट्रवाद बनाम इंसानवाद

राष्ट्रवाद बनाम इंसानवाद
प्रसंग है उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद पर उड़ती बहसें, अफवाहें। राष्टभक्ति और इंसानियत की बातें। चुनांचे हर शब्दवीर अमोघ अस्त्र छोड़ता नजर आ रहा है, यह मानकर कि दूसरा मर जाएगा या घायल हो जाएगा। घायल नहीं होगा तो कम से कम मार जरूर जाएगा शब्दों से ही। मर भी रहे हैं हम,जिंदा होते हुए। सोच से। विचारों से।
मेरे एक फेसबुकिया मित्र ने अपने पाकिस्तानी मित्र से हुई टि्वटरबाजी पोस्ट की है, पढ़ा फिर लगा कि कामरेड को कुछ बतलाने की कोशिश करूं। जेहन में सवाल उठा कि आखिर किस वामपंथी देश में राष्ट्रवाद की सोच नहीं है? रूस में, चाइना में ? वियतनाम में। चाइना में थ्योनमान चौक हुआ, किस मानवाधिकारवादी ने झंडा बुलंद किया न्याय का। दूर नहीं जाएं। अभी-अभी चीन के ग्वांगझू में G-20 सम्मेलन हुआ था। चीन ने पाकिस्तानियों को होटल का कमरा देने से मना कर दिया था, क्यों? मित्र देश के लोगों के लिए ऐसा बर्ताब? चीन में मार्क्सवादी सोच वाले विचारकों की सरकार है, जनसंख्या नियोजन के लिए क्या किया गया वहां, यह भी जान लें। मैंने बहुत पहले नवनीत डाइजेस्ट में एक अमेरिकी लेखक का उपन्यास पढ़ा था। लब्बोलुआब यह था कि दूसरा बच्चा पेट में आने की बात पता चलते ही उसे गर्भ में मार दिया जाता था, और यदि खुदा न खास्ता वह नवजात के रूप में बाहर आ गया तो उसके सिर में इंजेक्शन लगा दिया जाता था मौत का...। पता नहीं इस तरीके से कितनी जानें ली गईं वहां। कामरेडों की सब बात तब तक मुझे अच्छी लगती थीं युवा हो रहा था मैं, लेकिन इस कहानी (उपन्यास) को पढ़ने के बाद मन कसैला हुआ। हर किसी को एक जैसा मानने की बात कामरेड करते हैं तब तिब्बत से दलाई लामा को क्यों भागना पड़ा। तिब्बत में दमन है, कौन कामरेड लिखता है? बलूचिस्तान में दमन है, वहां मारे जाने वालों के अंगों का व्यापार तक हो रहा है, कहां लिखा जा रहा है यह सब। एमनेस्टी इंटरनेशनल वाले कहां हैं?
कश्मीर में भारतीय सेना दमन कर रही है ऐसा कामरेड चीख-चीखकर कह रहे हैं। गेहूं के साथ घुन पिसता है, इसमें नई बात क्या है। चौथी दुनिया वाले संतोष भारतीय कहते हैं कि कश्मीर में कोई भी भारत के साथ खुद को नहीं जोड़ता। बकरीद नहीं मनी वहां इस बार। क्या बकरीद तब मनेगी जब वहां पाकिस्तान का आधिपत्य होगा। आज ही तो वहां ऐसा हुआ नहीं है भारतीय जी। पहले भी था तब आपने प्रधानमंत्री को खुली पाती लिखी थी क्या?  पंजाब में कुछ ऐसा ही था।  सुपर काप केपीएस गिल और रिबेरो साहब ने कहा था तब कि गेहूं के साथ घुन पिसता है। बेअंत सिंह ने जान गंवाई लेकिन सख्ती से कुचल दिया आतंकवाद को। खैर अब विषय पर। राष्ट्रवाद में इंसानियत नहीं है, ऐसा कहते हैं सेक्युलर सोच वाले कारकून। चलिए मान लिया आपकी बात लेकिन बताइए  यदि पूंजीवाद में इंसानियत नहीं होती तो मलाला युसूफजई को ब्रिटेन पनाह नहीं देता, जिंदगी नहीं बचाता उनकी और उनके परिवार की। भारतीय सेना के जांबाज साल भर पहले आई कश्मीर की भयानक बाढ़ में उन लोगों की जिंदगी नहीं बचाते जो हमेशा से पत्थर बरसाते आ रहे हैं उन पर। दरअसल तथाकथित सेक्युलर कारकूनों को कभी भी कुछ अच्छा नहीं लगता भारत में। कांग्रेस की सरकार रही तब भी अब भाजपा की सरकार है तब भी। कामरेडों ने ही तो अमेरिका से एटमी संधि के नाम पर मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, भाजपा ने तब जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका अदा की थी विधेयक पर समर्थन देकर। आज कांग्रेसी मित्र शायद उस बात को भूल गए हैं। यही वजह है कि वह लगातार अप्रांसगिक होते जा रहे हैं। दक्षिणपंथियों में सब अच्छा ही अच्छा है, यह दावा भी नहीं करता, न करने की धृष्टता करूंगा। यह तो स्वर्ग में भी आपस में लड़ सकते हैं, इसमें इनका कोई सानी नहीं। शोषण भी करते हैं शब्दों की चासनी पिलाकर  लेकिन उनका क्या जो सर्वहारा की बात करते हैं और अपने फुलटाइमर स्टाफ को पार्टटाइमर बताते हैं। है न हाराकिरी।
सच वाकई में कड़वा होता है। अब तक अनुभव यही रहा है। इसलिए इंसानियत की बात करें तो तर्कों के साथ। यदि केंद्र में कांग्रेस की सरकार होती और वह भी सिंधु समझौते को रद करती तो मैं उसका समर्थन करता। पर वह ऐसा करती तो। इंसानियत के नाम पर दुश्मन को पानी पिलाओ तो वह जिंदा रहेगा, लेकिन हम आप नहीं रहेंगे, क्योंकि हम शत्रु हैं उसके। यह इंसानियत होगी क्या? जिनके पाठ्यक्रम में हमें शत्रु ही पढ़ाया जाता है, बताया जाता है। वह क्यों हमारे साथ आएंगे। यह सवाल कामरेड शायद नहीं उठाएंगे। भारत के किसी भी स्कूल के पाठ्यक्रम में ऐसा लिखा है क्या? यदि लिखा हो तो बताएंगे।
यह प्रसंग लंबा हो गया है,ज्यादा लंतरानी पचेगी नहीं, इसलिए यहीं विराम।

रविवार, 18 सितंबर 2016

अब तो आर या पार कर लें हुजूर

बस बहुत हुआ। आज जब यह पोस्ट लिख रहा हूं तो मन व्यथित है। ऊरी में सेना के शिविर पर हमला हुआ है, नार्दर्न कमांड पर। अब तक 17 जवानों के मरने की सूचना आ चुकी है। टि्वटर पर गुस्सा जताने का दौर शुरू हो चुका है, कब तक चलेगा यह क्रम? पता नहीं। हमारा राजनीतिक नेतृत्व कब जागेगा, पता नहीं? निंदा, कड़ी निंदा व भर्त्सना का दौर ही चलेगा, अथवा उससे आगे भी बढ़ेगी बात। यही मेरा सवाल है। मेरा ही नहीं, शायद सरसठ फीसद उन भारतीयों की जो पहले खुद को हिंदू,मुसलमान, सिख अथवा जैन या बौद्ध या क्रिश्चयन नहीं मानते। हिंदुस्तानी या भारतीय मानते हैं।
56 इंच का सीना वाले हमारे पीएम क्या करते हैं, इसे मैं समय पर छोड़ देता हूं, लेकिन उम्मीद बरकरार है। एक बार हो जाए। बांग्लादेश की जंग हुए बहुत समय बीत चुका है। आर-पार जरूरी है। हो सकता है उसमें मैं भी नहीं रहूं। कोई बम गिरे दुश्मन का साफ हो जाऊं। पर राहत तो होगी। कम से कम रोज रोज जेहनी मौत से अच्छी होगी यह मौत। यदि हम जीतते हैं तो हमारी पीढ़ियां सलामत होंगी। हारते हैं तो कोई नहीं बचेगा। जो फिदायीन हमें मारने आते हैं, मरने का संकल्प लेकर वह कितना नुकसान करते हैं, इसका अंदाजा शायद हमारे नीति नियंताओं को नहीं है। यदि होता तो अब तक हमारी फौज कुछ हो न हो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कुछ तो जौहर दिखा ही चुकी होती।
दुश्मन मुल्क को सबक जरूरी है। उसे यह बताया जाना चाहिए कि हम कमजोर नहीं हैं। पर यह कैसे होगा? देश बंटा है। किसी वर्ग के नेता यह बयान दे देते हैं कि यदि भारत पाकिस्तान पर हमला करता है तो मुसलमान पहले पाकिस्तान का साथ देंगे? कितनी खतरनाक सोच है। मानता हूं कि अधिकांश मुसलमान ऐसे नेता को पागल ही कहेंगे, पर यह दुस्साहस भरा बयान जिस जीभ से निकला है, उसे बख्शा क्यों जाना चाहिए। हम लड़ेंगे, भिड़ेगे पर देश हित में एक क्यों नहीं होते।
मुझे दुख है कि मैं फौज में क्यों नहीं हुआ। अब उम्र 45 पार कर चुकी है, शायद होऊं भी नहीं। लेकिन भारतीय सेना दुनिया में ताकत है, ऐसा ऐतबार है। एक बार कुछ होना चाहिए आर या पार।
मन व्यथित है, आज मैंने सोचा था कि कुछ और लिखूंगा, अपनी आपबीती पर हिंदुस्तानी मन ठहरा। थोड़े में रोने की थोड़े में हंसने की। हंसने का मौका मोदी जी दे दीजिएगा। देश आपका ऋणी रहेगा। 

रविवार, 11 सितंबर 2016

अपन के पास बाबा जी का ठुल्लू

नमस्कार। आप स्वस्थ एवं सानंद रहें।
आज इतवार है।  कुछ समय है तो लगा कि अपनी पूंजी और संपन्न कर लूं। इसलिए कुछ शब्दों के साथ फिर बैठ गया हूं नई पोस्ट के लिए।
पहले का दौर होता तो डायरी लिखता। पिता जी भी डायरी लिखते रहे हैं। वैसे क्रम से तो उन्होंने भी कभी नहीं लिखी। लेकिन है यह बड़े काम की चीज। कभी कभार पढ़ने पर हंसी आती है। गुस्सा भी आता है जब तब। आप जब दुनिया में नहीं रहते तो कभी कभार इसे पढ़ लिया जाता है। वीवीआइपी नहीं होते तो यह जला दी जाती हैं अथवा कबाड़ी के काम आती है। प्रारब्ध के बली हुए और ईश कृपा ने कभी वीवीआइपी बना दिया तो यह शब्द रायल्टी दिलाते हैं आपके परिवार वालों को। मेरे साथ ऐसा होगा कि नहीं, बता नहीं सकता। बहरहाल उम्मीद तो करना ही चाहिए। बुढ़ापे में मेरे इस ब्लाग की तमाम पोस्ट यदि ईश कृपा से पुस्तकाकार हुईं तो रायल्टी भले नहीं दिलाएं परिवार वालों को? हां, एकाध शुभचिंतकों के घर में कुछ दिनों के लिए जरूर जगह पाएगी। मेरा जीवन सार्थक कहलाएगा तब।
पत्रकारिता के इस मुकाम पर कभी कभी रिक्तता का बोध होता है। होना लाजिमी है। तमाम साथी आज संपादक हैं अथवा इससे आगे। पर अपन। जहां थे, वहीं हैं। गाड फादर नहीं बना सका ना, इसलिए। ऐसा नहीं है कि पूजा नहीं करता, लेकिन भगवान से लड़ाई में पीछे नहीं रहा। सच को सच कहने की सजा बहुत मिली है, इसलिए अब सच कहने की हिम्मत नहीं रखता। अब तो तीन ही चीज याद है नून, तेल, लकड़ी। बड़की अम्मा (मेरी दादी) गाती थीं- भूल गए राज रंग, भूल गए खिचड़ी जिंदगी रह गई नून तेल लकड़ी। पढ़ने लिखने का जब दौर था, तब लापरवाह बने रहे, खमियाजा अब भुगत रहे हैं। शब्दों से दुनियां संवारने की सोची, अपनी जिंदगी बिखर गई। क्या है अपन के पास। बाबा जी का ठुल्लू। मित्र, रिश्तेदार, सगे संबंधी सबको देख लिया। शिकायत किसी से नहीं है। जिनके पास है, उन्होंने दिया, जिनके पास नहीं है, वह क्या देते? उन्होंने नहीं दिया।
आज सुबह अमर उजाला देखा। अच्छा लगा, नए कलेवर में। वैसे मुझे निनायनबे का दौर याद आ गया तब भी कुछ ऐसा ही था यह। अच्छा यह भी लगा कि बहुत दिन बाद शब्दों के कुबेर यशवंत व्यास यारी दुश्मनी नामक नए स्तंभ के साथ थे, नई जमीन बनाते हुए। (रविवारीय बौद्धिक पेज का नया नाम दिया है उजाला ने नई जमीन मास्टहेड के साथ)। यशवंत जी के साथ काम करने की साध अधूरी रही है मेरी, लेकिन उनसा बनने की ख्वाहिश हिलोर जरूर मारती है दिल में। एक जानकारी और। जबलपुर में आदरणीय ज्ञानरंजन सर ने यशवंत जी के लिए बताया था कि उनकी ओपन हार्ट सर्जरी हुई है। नोएडा में नौकरी के सिलसिले में जब मुलाकात हुई थी तो कहीं से ऐसा लगा ही नहीं। बहुत सहज हैं यशवंत व्यास। उनकी लेखनी सलामत रहे। यही कामना है।
अच्छा अब विदा लूं, इससे पहले हिंदी दिवस की बधाई। रोइएगा नहीं कि इस भाषा में लिखते हैं। अंग्रेजी आती होती तो इसमें क्यों लिखते। देखिए मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वालों को भी हिंदी सिखाई जा रही है ताकि गोरे भी बोल सकें- सस्ता है अच्छा है। नमस्कार।

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...