बस बहुत हुआ। आज जब यह पोस्ट लिख रहा हूं तो मन व्यथित है। ऊरी में सेना के शिविर पर हमला हुआ है, नार्दर्न कमांड पर। अब तक 17 जवानों के मरने की सूचना आ चुकी है। टि्वटर पर गुस्सा जताने का दौर शुरू हो चुका है, कब तक चलेगा यह क्रम? पता नहीं। हमारा राजनीतिक नेतृत्व कब जागेगा, पता नहीं? निंदा, कड़ी निंदा व भर्त्सना का दौर ही चलेगा, अथवा उससे आगे भी बढ़ेगी बात। यही मेरा सवाल है। मेरा ही नहीं, शायद सरसठ फीसद उन भारतीयों की जो पहले खुद को हिंदू,मुसलमान, सिख अथवा जैन या बौद्ध या क्रिश्चयन नहीं मानते। हिंदुस्तानी या भारतीय मानते हैं।
56 इंच का सीना वाले हमारे पीएम क्या करते हैं, इसे मैं समय पर छोड़ देता हूं, लेकिन उम्मीद बरकरार है। एक बार हो जाए। बांग्लादेश की जंग हुए बहुत समय बीत चुका है। आर-पार जरूरी है। हो सकता है उसमें मैं भी नहीं रहूं। कोई बम गिरे दुश्मन का साफ हो जाऊं। पर राहत तो होगी। कम से कम रोज रोज जेहनी मौत से अच्छी होगी यह मौत। यदि हम जीतते हैं तो हमारी पीढ़ियां सलामत होंगी। हारते हैं तो कोई नहीं बचेगा। जो फिदायीन हमें मारने आते हैं, मरने का संकल्प लेकर वह कितना नुकसान करते हैं, इसका अंदाजा शायद हमारे नीति नियंताओं को नहीं है। यदि होता तो अब तक हमारी फौज कुछ हो न हो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कुछ तो जौहर दिखा ही चुकी होती।
दुश्मन मुल्क को सबक जरूरी है। उसे यह बताया जाना चाहिए कि हम कमजोर नहीं हैं। पर यह कैसे होगा? देश बंटा है। किसी वर्ग के नेता यह बयान दे देते हैं कि यदि भारत पाकिस्तान पर हमला करता है तो मुसलमान पहले पाकिस्तान का साथ देंगे? कितनी खतरनाक सोच है। मानता हूं कि अधिकांश मुसलमान ऐसे नेता को पागल ही कहेंगे, पर यह दुस्साहस भरा बयान जिस जीभ से निकला है, उसे बख्शा क्यों जाना चाहिए। हम लड़ेंगे, भिड़ेगे पर देश हित में एक क्यों नहीं होते।
मुझे दुख है कि मैं फौज में क्यों नहीं हुआ। अब उम्र 45 पार कर चुकी है, शायद होऊं भी नहीं। लेकिन भारतीय सेना दुनिया में ताकत है, ऐसा ऐतबार है। एक बार कुछ होना चाहिए आर या पार।
मन व्यथित है, आज मैंने सोचा था कि कुछ और लिखूंगा, अपनी आपबीती पर हिंदुस्तानी मन ठहरा। थोड़े में रोने की थोड़े में हंसने की। हंसने का मौका मोदी जी दे दीजिएगा। देश आपका ऋणी रहेगा।
56 इंच का सीना वाले हमारे पीएम क्या करते हैं, इसे मैं समय पर छोड़ देता हूं, लेकिन उम्मीद बरकरार है। एक बार हो जाए। बांग्लादेश की जंग हुए बहुत समय बीत चुका है। आर-पार जरूरी है। हो सकता है उसमें मैं भी नहीं रहूं। कोई बम गिरे दुश्मन का साफ हो जाऊं। पर राहत तो होगी। कम से कम रोज रोज जेहनी मौत से अच्छी होगी यह मौत। यदि हम जीतते हैं तो हमारी पीढ़ियां सलामत होंगी। हारते हैं तो कोई नहीं बचेगा। जो फिदायीन हमें मारने आते हैं, मरने का संकल्प लेकर वह कितना नुकसान करते हैं, इसका अंदाजा शायद हमारे नीति नियंताओं को नहीं है। यदि होता तो अब तक हमारी फौज कुछ हो न हो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कुछ तो जौहर दिखा ही चुकी होती।
दुश्मन मुल्क को सबक जरूरी है। उसे यह बताया जाना चाहिए कि हम कमजोर नहीं हैं। पर यह कैसे होगा? देश बंटा है। किसी वर्ग के नेता यह बयान दे देते हैं कि यदि भारत पाकिस्तान पर हमला करता है तो मुसलमान पहले पाकिस्तान का साथ देंगे? कितनी खतरनाक सोच है। मानता हूं कि अधिकांश मुसलमान ऐसे नेता को पागल ही कहेंगे, पर यह दुस्साहस भरा बयान जिस जीभ से निकला है, उसे बख्शा क्यों जाना चाहिए। हम लड़ेंगे, भिड़ेगे पर देश हित में एक क्यों नहीं होते।
मुझे दुख है कि मैं फौज में क्यों नहीं हुआ। अब उम्र 45 पार कर चुकी है, शायद होऊं भी नहीं। लेकिन भारतीय सेना दुनिया में ताकत है, ऐसा ऐतबार है। एक बार कुछ होना चाहिए आर या पार।
मन व्यथित है, आज मैंने सोचा था कि कुछ और लिखूंगा, अपनी आपबीती पर हिंदुस्तानी मन ठहरा। थोड़े में रोने की थोड़े में हंसने की। हंसने का मौका मोदी जी दे दीजिएगा। देश आपका ऋणी रहेगा।
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