रविवार, 11 सितंबर 2016

अपन के पास बाबा जी का ठुल्लू

नमस्कार। आप स्वस्थ एवं सानंद रहें।
आज इतवार है।  कुछ समय है तो लगा कि अपनी पूंजी और संपन्न कर लूं। इसलिए कुछ शब्दों के साथ फिर बैठ गया हूं नई पोस्ट के लिए।
पहले का दौर होता तो डायरी लिखता। पिता जी भी डायरी लिखते रहे हैं। वैसे क्रम से तो उन्होंने भी कभी नहीं लिखी। लेकिन है यह बड़े काम की चीज। कभी कभार पढ़ने पर हंसी आती है। गुस्सा भी आता है जब तब। आप जब दुनिया में नहीं रहते तो कभी कभार इसे पढ़ लिया जाता है। वीवीआइपी नहीं होते तो यह जला दी जाती हैं अथवा कबाड़ी के काम आती है। प्रारब्ध के बली हुए और ईश कृपा ने कभी वीवीआइपी बना दिया तो यह शब्द रायल्टी दिलाते हैं आपके परिवार वालों को। मेरे साथ ऐसा होगा कि नहीं, बता नहीं सकता। बहरहाल उम्मीद तो करना ही चाहिए। बुढ़ापे में मेरे इस ब्लाग की तमाम पोस्ट यदि ईश कृपा से पुस्तकाकार हुईं तो रायल्टी भले नहीं दिलाएं परिवार वालों को? हां, एकाध शुभचिंतकों के घर में कुछ दिनों के लिए जरूर जगह पाएगी। मेरा जीवन सार्थक कहलाएगा तब।
पत्रकारिता के इस मुकाम पर कभी कभी रिक्तता का बोध होता है। होना लाजिमी है। तमाम साथी आज संपादक हैं अथवा इससे आगे। पर अपन। जहां थे, वहीं हैं। गाड फादर नहीं बना सका ना, इसलिए। ऐसा नहीं है कि पूजा नहीं करता, लेकिन भगवान से लड़ाई में पीछे नहीं रहा। सच को सच कहने की सजा बहुत मिली है, इसलिए अब सच कहने की हिम्मत नहीं रखता। अब तो तीन ही चीज याद है नून, तेल, लकड़ी। बड़की अम्मा (मेरी दादी) गाती थीं- भूल गए राज रंग, भूल गए खिचड़ी जिंदगी रह गई नून तेल लकड़ी। पढ़ने लिखने का जब दौर था, तब लापरवाह बने रहे, खमियाजा अब भुगत रहे हैं। शब्दों से दुनियां संवारने की सोची, अपनी जिंदगी बिखर गई। क्या है अपन के पास। बाबा जी का ठुल्लू। मित्र, रिश्तेदार, सगे संबंधी सबको देख लिया। शिकायत किसी से नहीं है। जिनके पास है, उन्होंने दिया, जिनके पास नहीं है, वह क्या देते? उन्होंने नहीं दिया।
आज सुबह अमर उजाला देखा। अच्छा लगा, नए कलेवर में। वैसे मुझे निनायनबे का दौर याद आ गया तब भी कुछ ऐसा ही था यह। अच्छा यह भी लगा कि बहुत दिन बाद शब्दों के कुबेर यशवंत व्यास यारी दुश्मनी नामक नए स्तंभ के साथ थे, नई जमीन बनाते हुए। (रविवारीय बौद्धिक पेज का नया नाम दिया है उजाला ने नई जमीन मास्टहेड के साथ)। यशवंत जी के साथ काम करने की साध अधूरी रही है मेरी, लेकिन उनसा बनने की ख्वाहिश हिलोर जरूर मारती है दिल में। एक जानकारी और। जबलपुर में आदरणीय ज्ञानरंजन सर ने यशवंत जी के लिए बताया था कि उनकी ओपन हार्ट सर्जरी हुई है। नोएडा में नौकरी के सिलसिले में जब मुलाकात हुई थी तो कहीं से ऐसा लगा ही नहीं। बहुत सहज हैं यशवंत व्यास। उनकी लेखनी सलामत रहे। यही कामना है।
अच्छा अब विदा लूं, इससे पहले हिंदी दिवस की बधाई। रोइएगा नहीं कि इस भाषा में लिखते हैं। अंग्रेजी आती होती तो इसमें क्यों लिखते। देखिए मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वालों को भी हिंदी सिखाई जा रही है ताकि गोरे भी बोल सकें- सस्ता है अच्छा है। नमस्कार।

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