राष्ट्रवाद बनाम इंसानवाद
प्रसंग है उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद पर उड़ती बहसें, अफवाहें। राष्टभक्ति और इंसानियत की बातें। चुनांचे हर शब्दवीर अमोघ अस्त्र छोड़ता नजर आ रहा है, यह मानकर कि दूसरा मर जाएगा या घायल हो जाएगा। घायल नहीं होगा तो कम से कम मार जरूर जाएगा शब्दों से ही। मर भी रहे हैं हम,जिंदा होते हुए। सोच से। विचारों से।
मेरे एक फेसबुकिया मित्र ने अपने पाकिस्तानी मित्र से हुई टि्वटरबाजी पोस्ट की है, पढ़ा फिर लगा कि कामरेड को कुछ बतलाने की कोशिश करूं। जेहन में सवाल उठा कि आखिर किस वामपंथी देश में राष्ट्रवाद की सोच नहीं है? रूस में, चाइना में ? वियतनाम में। चाइना में थ्योनमान चौक हुआ, किस मानवाधिकारवादी ने झंडा बुलंद किया न्याय का। दूर नहीं जाएं। अभी-अभी चीन के ग्वांगझू में G-20 सम्मेलन हुआ था। चीन ने पाकिस्तानियों को होटल का कमरा देने से मना कर दिया था, क्यों? मित्र देश के लोगों के लिए ऐसा बर्ताब? चीन में मार्क्सवादी सोच वाले विचारकों की सरकार है, जनसंख्या नियोजन के लिए क्या किया गया वहां, यह भी जान लें। मैंने बहुत पहले नवनीत डाइजेस्ट में एक अमेरिकी लेखक का उपन्यास पढ़ा था। लब्बोलुआब यह था कि दूसरा बच्चा पेट में आने की बात पता चलते ही उसे गर्भ में मार दिया जाता था, और यदि खुदा न खास्ता वह नवजात के रूप में बाहर आ गया तो उसके सिर में इंजेक्शन लगा दिया जाता था मौत का...। पता नहीं इस तरीके से कितनी जानें ली गईं वहां। कामरेडों की सब बात तब तक मुझे अच्छी लगती थीं युवा हो रहा था मैं, लेकिन इस कहानी (उपन्यास) को पढ़ने के बाद मन कसैला हुआ। हर किसी को एक जैसा मानने की बात कामरेड करते हैं तब तिब्बत से दलाई लामा को क्यों भागना पड़ा। तिब्बत में दमन है, कौन कामरेड लिखता है? बलूचिस्तान में दमन है, वहां मारे जाने वालों के अंगों का व्यापार तक हो रहा है, कहां लिखा जा रहा है यह सब। एमनेस्टी इंटरनेशनल वाले कहां हैं?
कश्मीर में भारतीय सेना दमन कर रही है ऐसा कामरेड चीख-चीखकर कह रहे हैं। गेहूं के साथ घुन पिसता है, इसमें नई बात क्या है। चौथी दुनिया वाले संतोष भारतीय कहते हैं कि कश्मीर में कोई भी भारत के साथ खुद को नहीं जोड़ता। बकरीद नहीं मनी वहां इस बार। क्या बकरीद तब मनेगी जब वहां पाकिस्तान का आधिपत्य होगा। आज ही तो वहां ऐसा हुआ नहीं है भारतीय जी। पहले भी था तब आपने प्रधानमंत्री को खुली पाती लिखी थी क्या? पंजाब में कुछ ऐसा ही था। सुपर काप केपीएस गिल और रिबेरो साहब ने कहा था तब कि गेहूं के साथ घुन पिसता है। बेअंत सिंह ने जान गंवाई लेकिन सख्ती से कुचल दिया आतंकवाद को। खैर अब विषय पर। राष्ट्रवाद में इंसानियत नहीं है, ऐसा कहते हैं सेक्युलर सोच वाले कारकून। चलिए मान लिया आपकी बात लेकिन बताइए यदि पूंजीवाद में इंसानियत नहीं होती तो मलाला युसूफजई को ब्रिटेन पनाह नहीं देता, जिंदगी नहीं बचाता उनकी और उनके परिवार की। भारतीय सेना के जांबाज साल भर पहले आई कश्मीर की भयानक बाढ़ में उन लोगों की जिंदगी नहीं बचाते जो हमेशा से पत्थर बरसाते आ रहे हैं उन पर। दरअसल तथाकथित सेक्युलर कारकूनों को कभी भी कुछ अच्छा नहीं लगता भारत में। कांग्रेस की सरकार रही तब भी अब भाजपा की सरकार है तब भी। कामरेडों ने ही तो अमेरिका से एटमी संधि के नाम पर मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, भाजपा ने तब जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका अदा की थी विधेयक पर समर्थन देकर। आज कांग्रेसी मित्र शायद उस बात को भूल गए हैं। यही वजह है कि वह लगातार अप्रांसगिक होते जा रहे हैं। दक्षिणपंथियों में सब अच्छा ही अच्छा है, यह दावा भी नहीं करता, न करने की धृष्टता करूंगा। यह तो स्वर्ग में भी आपस में लड़ सकते हैं, इसमें इनका कोई सानी नहीं। शोषण भी करते हैं शब्दों की चासनी पिलाकर लेकिन उनका क्या जो सर्वहारा की बात करते हैं और अपने फुलटाइमर स्टाफ को पार्टटाइमर बताते हैं। है न हाराकिरी।
सच वाकई में कड़वा होता है। अब तक अनुभव यही रहा है। इसलिए इंसानियत की बात करें तो तर्कों के साथ। यदि केंद्र में कांग्रेस की सरकार होती और वह भी सिंधु समझौते को रद करती तो मैं उसका समर्थन करता। पर वह ऐसा करती तो। इंसानियत के नाम पर दुश्मन को पानी पिलाओ तो वह जिंदा रहेगा, लेकिन हम आप नहीं रहेंगे, क्योंकि हम शत्रु हैं उसके। यह इंसानियत होगी क्या? जिनके पाठ्यक्रम में हमें शत्रु ही पढ़ाया जाता है, बताया जाता है। वह क्यों हमारे साथ आएंगे। यह सवाल कामरेड शायद नहीं उठाएंगे। भारत के किसी भी स्कूल के पाठ्यक्रम में ऐसा लिखा है क्या? यदि लिखा हो तो बताएंगे।
यह प्रसंग लंबा हो गया है,ज्यादा लंतरानी पचेगी नहीं, इसलिए यहीं विराम।
प्रसंग है उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद पर उड़ती बहसें, अफवाहें। राष्टभक्ति और इंसानियत की बातें। चुनांचे हर शब्दवीर अमोघ अस्त्र छोड़ता नजर आ रहा है, यह मानकर कि दूसरा मर जाएगा या घायल हो जाएगा। घायल नहीं होगा तो कम से कम मार जरूर जाएगा शब्दों से ही। मर भी रहे हैं हम,जिंदा होते हुए। सोच से। विचारों से।
मेरे एक फेसबुकिया मित्र ने अपने पाकिस्तानी मित्र से हुई टि्वटरबाजी पोस्ट की है, पढ़ा फिर लगा कि कामरेड को कुछ बतलाने की कोशिश करूं। जेहन में सवाल उठा कि आखिर किस वामपंथी देश में राष्ट्रवाद की सोच नहीं है? रूस में, चाइना में ? वियतनाम में। चाइना में थ्योनमान चौक हुआ, किस मानवाधिकारवादी ने झंडा बुलंद किया न्याय का। दूर नहीं जाएं। अभी-अभी चीन के ग्वांगझू में G-20 सम्मेलन हुआ था। चीन ने पाकिस्तानियों को होटल का कमरा देने से मना कर दिया था, क्यों? मित्र देश के लोगों के लिए ऐसा बर्ताब? चीन में मार्क्सवादी सोच वाले विचारकों की सरकार है, जनसंख्या नियोजन के लिए क्या किया गया वहां, यह भी जान लें। मैंने बहुत पहले नवनीत डाइजेस्ट में एक अमेरिकी लेखक का उपन्यास पढ़ा था। लब्बोलुआब यह था कि दूसरा बच्चा पेट में आने की बात पता चलते ही उसे गर्भ में मार दिया जाता था, और यदि खुदा न खास्ता वह नवजात के रूप में बाहर आ गया तो उसके सिर में इंजेक्शन लगा दिया जाता था मौत का...। पता नहीं इस तरीके से कितनी जानें ली गईं वहां। कामरेडों की सब बात तब तक मुझे अच्छी लगती थीं युवा हो रहा था मैं, लेकिन इस कहानी (उपन्यास) को पढ़ने के बाद मन कसैला हुआ। हर किसी को एक जैसा मानने की बात कामरेड करते हैं तब तिब्बत से दलाई लामा को क्यों भागना पड़ा। तिब्बत में दमन है, कौन कामरेड लिखता है? बलूचिस्तान में दमन है, वहां मारे जाने वालों के अंगों का व्यापार तक हो रहा है, कहां लिखा जा रहा है यह सब। एमनेस्टी इंटरनेशनल वाले कहां हैं?
कश्मीर में भारतीय सेना दमन कर रही है ऐसा कामरेड चीख-चीखकर कह रहे हैं। गेहूं के साथ घुन पिसता है, इसमें नई बात क्या है। चौथी दुनिया वाले संतोष भारतीय कहते हैं कि कश्मीर में कोई भी भारत के साथ खुद को नहीं जोड़ता। बकरीद नहीं मनी वहां इस बार। क्या बकरीद तब मनेगी जब वहां पाकिस्तान का आधिपत्य होगा। आज ही तो वहां ऐसा हुआ नहीं है भारतीय जी। पहले भी था तब आपने प्रधानमंत्री को खुली पाती लिखी थी क्या? पंजाब में कुछ ऐसा ही था। सुपर काप केपीएस गिल और रिबेरो साहब ने कहा था तब कि गेहूं के साथ घुन पिसता है। बेअंत सिंह ने जान गंवाई लेकिन सख्ती से कुचल दिया आतंकवाद को। खैर अब विषय पर। राष्ट्रवाद में इंसानियत नहीं है, ऐसा कहते हैं सेक्युलर सोच वाले कारकून। चलिए मान लिया आपकी बात लेकिन बताइए यदि पूंजीवाद में इंसानियत नहीं होती तो मलाला युसूफजई को ब्रिटेन पनाह नहीं देता, जिंदगी नहीं बचाता उनकी और उनके परिवार की। भारतीय सेना के जांबाज साल भर पहले आई कश्मीर की भयानक बाढ़ में उन लोगों की जिंदगी नहीं बचाते जो हमेशा से पत्थर बरसाते आ रहे हैं उन पर। दरअसल तथाकथित सेक्युलर कारकूनों को कभी भी कुछ अच्छा नहीं लगता भारत में। कांग्रेस की सरकार रही तब भी अब भाजपा की सरकार है तब भी। कामरेडों ने ही तो अमेरिका से एटमी संधि के नाम पर मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, भाजपा ने तब जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका अदा की थी विधेयक पर समर्थन देकर। आज कांग्रेसी मित्र शायद उस बात को भूल गए हैं। यही वजह है कि वह लगातार अप्रांसगिक होते जा रहे हैं। दक्षिणपंथियों में सब अच्छा ही अच्छा है, यह दावा भी नहीं करता, न करने की धृष्टता करूंगा। यह तो स्वर्ग में भी आपस में लड़ सकते हैं, इसमें इनका कोई सानी नहीं। शोषण भी करते हैं शब्दों की चासनी पिलाकर लेकिन उनका क्या जो सर्वहारा की बात करते हैं और अपने फुलटाइमर स्टाफ को पार्टटाइमर बताते हैं। है न हाराकिरी।
सच वाकई में कड़वा होता है। अब तक अनुभव यही रहा है। इसलिए इंसानियत की बात करें तो तर्कों के साथ। यदि केंद्र में कांग्रेस की सरकार होती और वह भी सिंधु समझौते को रद करती तो मैं उसका समर्थन करता। पर वह ऐसा करती तो। इंसानियत के नाम पर दुश्मन को पानी पिलाओ तो वह जिंदा रहेगा, लेकिन हम आप नहीं रहेंगे, क्योंकि हम शत्रु हैं उसके। यह इंसानियत होगी क्या? जिनके पाठ्यक्रम में हमें शत्रु ही पढ़ाया जाता है, बताया जाता है। वह क्यों हमारे साथ आएंगे। यह सवाल कामरेड शायद नहीं उठाएंगे। भारत के किसी भी स्कूल के पाठ्यक्रम में ऐसा लिखा है क्या? यदि लिखा हो तो बताएंगे।
यह प्रसंग लंबा हो गया है,ज्यादा लंतरानी पचेगी नहीं, इसलिए यहीं विराम।
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