टिवटर पर इन दिनों अक्सर देर रात हो जाती है। शनिवार-रविवार रात भी ऐसा ही था। मनीष राठी और विपुल के संवाद में जाने कैसे उलझ गया। मनीष चहकने लगे। नोटबंदी पर। तमाम बातें उन्होंने लिखीं। एक कमेंट था. मोदी जी को विश्वास में वोट दिया था-लेकिन वह देश को बर्बाद करने में लगे हैं। मनमोहन सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री 15 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला था, लेकिन मोदी की नीति से पांच करोड़ लोग फिर गरीब हो गए हैं। मुझे लगा कि कुछ बोलना चाहिए। मैंने कहा-यदि मनमोहन सिंह की नीतियों से इतने लोग गरीब से अमीर हो गए तो उनकी सत्ता आखिरकार क्यों चली गई... मनीष ने तुरंत रिप्लाई किया-अन्ना जी के आंदोलन की वजह से। मेरे लिए अचरज वाली बात थी। माना कि अन्ना के आंदोलन से चीजें बदलीं थीं। व्यवस्था के प्रति गुस्सा उपजा था लेकिन और ताकतें इसका लाभ क्यों नहीं उठा सकीं। भाजपा को ही क्यों मिल गया चुनाव में इसका फायदा। वैसे भाजपा नहीं, यदि मोदी लिखूं तो ज्यादा उपयुक्त रहेगा। अब भी चीजें वैसी ही हैं। मोदी के नाम पर ही भाजपा है। भाजपा में क्या है, शायद कुछ नहीं। अब देखिए लालकृष्ण आडवाणी को। वह लोकसभा में नहीं रहना चाहते। शोर शराबे से उनका मन उचट गया है। वह अब संसद न चलने से दुखी हैं, हालांकि 2011 में जब संसद नहीं चली थी तब उन्होंने ही कहा था कि लोकतंत्र के लिए कभी कभी ऐसा जरूरी हो जाता है।
नेता हैं गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं, आंदोलन हैं मर जाते हैं करेंगे क्या?
हम भारतीयों की नियति ही लगता है ऐसी है। भरोसा बंधते और टूटते देर नहीं लगती। लोग आते हैं चले जाते हैं। लाइनें पहले भी लगती हैं, अब भी लगती हैं। मुझे याद है जबलपुर। तब आठवीं का छात्र था। राशन दुकान के आगे गेहूं चावल लेने भागता था। कभी मिलता था कभी नहीं। पिता जी बताते हैं इससे पहले बासठ में और बुरा हाल था। अमेरिकन गेहूं के लिए कतार लगती थी। कतार खत्म नहीं होगी हिंदुस्तान में। चाहे शासक कोई भी हों। वजह- हमारी सोच। हम तात्कालिक जरूरतों के मद्देनजर दीर्घकालिक सोच रखते ही नहीं। राजीव गांधी ने यदि 1985-86 में हमें कंप्यूटर नहीं दिया होता तो क्या यह संभव था कि अन्ना आंदोलन करते, सरकार हिला देते। मोदी डिजिटल इकोनामी की बात कर रहे हैं, तो क्या आज के भारत के लिए है। नहीं, मेरी धारणा यह है कि अगले दो दशक बाद जब लोगों को इसका फायदा होगा तब वह राजीव गांधी की तरह मोदी को भी याद करेंगे। हां आज चुनाव हों तो लाइन में उपजा असंतोष किसी भी करवट बदल सकता है। सुखद यह है कि मीडिया के एक खास वर्ग के दुष्प्रचार के बाद भी तमाम लोग मोदी के साथ हैं। हां अब कोई अन्ना फिर आएं भ्रष्टाचार के पुख्ता सुबूतों के साथ तो माहौल बदलने में देर नहीं लगेगी। मनीष ने कहा है कि राहुल जी के पास सुबूत है और वह वकील से सलाह मशविरा कर रहे हैं भूकंप लाने के लिए। मैं चाहता हूं जल्दी भूकंप आए। दरअसल विनाश ही विकास का रास्ता तय करता है। जब तक पुरानी धारणाओं, मिथक, कुरीतियों का विनाश नहीं होगा, जलजलों से तब तक समृद्ध और विकसित भारत दूर होगा दुनिया से। इसलिए हे अन्ना, फिर उतरिए मैदान में।
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