रविवार, 31 जनवरी 2016

सांध्यबंधु में जिंदगी -एक

नमस्कार। आज इतवार है। सोचा था मन की बात लिखूंगा, लेकिन समय ज्यादा हो चला है। दफ्तर की बाबूगिरी ने ऊर्जा छीन ली है, कुछ लिखने की। लेकिन पिछले रविवार को भी नहीं लिख सका था ठलुआगिरी के आगे की दास्तान । इसलिए आज जरूर कुछ न कुछ तो ब्लाग काला करूंगा ही । जब तक उंगलियां थक नहीं जातीं।
...17 जनवरी की पोस्ट में बात अरविंद चौबे तक पहुंची थी। उन्होंने मिलौनीगंज स्थित अपने प्रेस से  जवान शैतान  निकाला था। मैं उनके संपर्क में आ गया था। पता नहीं एक दिन उन्हें क्या सूझा उन्होंने मेरा नाम प्रिंट लाइन में बतौर संपादक डाल दिया। शायद 18 अथवा 19 साल की उम्र रही होगी। संपादक बन गया। क ख ग घ ड़ कुछ भी पता नहीं था पत्रकारिता के बारे में। बस मोपेड की हेडलाइट के ऊपर रिपोर्टर लिखवाए घूमता था। जनभारती प्रहरी से होता हुआ सांध्यबंधु में पहुंच गया। नरेश वाजपेयी -कदीर सोनी इस अखबार के सर्वेसर्वा थे। दोनों ही कांग्रेस से जुड़े थे। लगा बड़े लोगों की सोहबत मिल गई। नरेश वाजपेयी जाने माने चेहरे थे शहर के। जमींदार परिवार के। उनके बेटे अतुल दोस्त बन गए थे मेरे। सांध्यबंधु में टेलीप्रिंटर लगा था। इस पर बैठते थे  शैलेंद्र दुबे। वह यहां पार्टटाइमर के रूप में काम करते थे।  चूंकि वह नवभारत के पहले पेज पर बैठते थे और नवभारत तब जबलपुर का लीडर था, इसलिए उनमें कुछ गर्व का अतिरिक्त बोध था। यदि विज्ञिप्त नवभारत में नहीं छपी तो कहीं नहीं छपी, ऐसी धारणा थी मेरी। भास्कर भी इसी दौर में जम रहा था। इसमें सतीश वाजपेयी जी काम करते थे । टेलीप्रिंटर में उन्हें भी मास्टर माना जाता था। वह भी सांध्यबंधु में आने लगे। तब संस्कारधानी में देशबंधु, नवीनदुनिया जैसे स्थापित अखबार तो थे ही। सब जगह टेलीप्रिटंर की खटर-पटर होती थी। एक बार मन में टेलीप्रिटंर को लेकर उत्सुकता जगी। देखने लगा। शैलेंद्र दुबे जी ने व्यंग के लहजे में कह दिया, इतना आसान नहीं है बच्चा। बात लग गई। शैलेंद्र के साथ भरत ओकास भी होते थे। एक दिन संयोग से दोनों नहीं आए। मैंने ही खबरें निकालीं, संपादित की और पहला पन्ना बनवा दिया। आत्मविश्वास हिलोर मारने लगा। वह तारीख तो अब ठीक से याद नहीं लेकिन स्मृति में इतना जरूर है कि जिस दिन दिल्ली को विधानसभा बनाए जाने का प्रस्ताव संसद में पास हुआ, मैंने चार पन्नों के इस अखबार के पहले पेज पर लीड बनाई थी यह खबर। तीन कालम दो लाइन में हैडिंग देते हुए। तीन दिन बाद घर के पीछे राजकीय पुस्तकालय की लाइब्रेरी में बैठ कर नवभारत टाइम्स देख रहा था। भौचक रह गया। मैंने जो शीर्षक दिया था, हु-ब-हू वही शीर्षक नवभारत टाइम्स की लीड का था। मन बाग-बाग हो उठा। मेरे तमाम मित्रों को आज विश्वास नहीं होगा। वह फाइल देख सकते हैं। पहली बार कांफिडेंस  हजार गुना बढ़ गया। इसके बाद तो रात में अकेले ही सांध्यबंधु के भीतर के पेज बनवा देता था। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों को लेते हुए। कन्हैयालाल राज यहां संपादकीय प्रभारी थे। दलित समुदाय से आते थे वह। पुराने पत्रकार थे गांधीवादी। उनके चरण स्पर्श से भी गुरेज नहीं किया था मैंने। खूब सीखा। कभी कभी वह झिड़कते थे मुझे, लेकिन रात में जब टुन्न होते थे तो आशीषते थे। सांध्यबंधु के बाद उनसे रिश्ता नहीं रहा। पर वह स्मृति में बने हैं। सांध्यबंधु में पहली तनख्वाह (सैलरी) शायद 280 रुपये मिली थी। इसके बाद यह एक साल के ही भीतर छह सौ रुपये हो गई। श्याम बिहारी सोनी कक्का, नरेश वाजपेयी भरपूर दुलार देते। रात में यहां दूसरा ही दौर हो जाता। तख्त पर नरेश भैया और उनकी मित्रमंडली जम जाती। दौर चलते। खाना आता तो मुझे भी पूछा जाता। घर में खाना बनता था, इसलिए अक्सर न कर देता था मैं। फिर भी कई बार नरेश वाजपेयी खाना खिलवा ही देते। उनका हक था मुझ पर। भगवान उनके परिवार को सलामत रखें। यहीं शरद मोदी मिले। मस्तमौला। यहीं हैंडकंपोजिंग होती थी। खटर पटर के बीच मैटर देना होता था। प्रूफ भी पढ़ता। दो पेज तैयार करवाकर जाता। घर पहुंचते-पहुंचते बाजे दफा रात में 11 भी बज जाते, या इससे अधिक। करीब डे़ढ़ साल पंख लगकर गुजर गए। अयोध्या में जब कारसेवकों पर गोली चली तब यहीं था। सांप्रदायिक तनाव क्या होता है, पत्रकारीय धर्म क्या होता है ऐसे मौकों पर, यहीं जाना। सच कहूं तो सांध्यबंधु में की गई अप्रेंटिसगिरी आगे बहुत काम आई। यही मोहब्बत के भी एक पाठ से दो चार हुआ। लेकिन यह सफर संक्षिप्त ही रहा। बात आई गई हो गई। इस पर अब क्या लिखना। 

रविवार, 24 जनवरी 2016

गंगा की गोद में सुखद पल

गंगा माई की गोद में थी इस बार रविवार की सुबह। माघ मेला क्षेत्र में लोअर संगम मार्ग पर लगे स्वामी ओइमानंद जी के शिविर में शनिवार देर रात तक जगता रहा, करीब तीन बजे नींद लगी। चार बजे खुल गई, इस अनाउंस को सुनकर कि स्नान घाट पर भीड़ न लगाएं। रात 11 बजे अचानक तय हुआ था माघ मेले क्षेत्र में जाने का प्लान। सहयोगी अवधेश पांडेय थे साथ में। दरअसल झूंसी में ही रहते हैं वह। उनके साथ पहुंच गया बाइक पर, चंद मिनटों के भीतर। ठंड थी, लेकिन अंदर ही अंदर अध्यात्मिक ऊर्जा से भरा था। सूर्योदय से पहले ही कोहरे के बीच पौष पूर्णिमा का स्नान किया। तमाम कामनाएं कीं मां गंगा से।  शायद पहली बार पौष पूर्णिमा पर मां गंगा की गोद में था। इसलिए सुखद अनुभूति हुई। अकेले ही घुसा सुरसरि के शीतल जल में। सुबह जागरण कनेक्शन में भी आना था, इसलिए स्नान के बाद ज्यादा बैठकी नहीं हुई। अवधेश जी के साथ निकल पड़ा। संस्थान के कार्यक्रम के बाद थकान ऐसी लगी कि दिन में नहीं आया दफ्तर। घर में ही रजाई में दुबका रह गया। शुभम लखनऊ चले गए, अमन भी आए राबर्टसगंज से। जाते-जाते दोनों को रजाई से ही विदा किया। इस तरह अबकी रविवार अपनी राम कहानी नहीं लिख सका। अब अगले रविवार को, अगर सब कुछ सलामत रहा तो...।   

रविवार, 17 जनवरी 2016

ठलुआगिरी के दिन और अस्सी रुपये का चेक

नमस्कार इतवार। आज सत्रह जनवरी है। ढाई बज रहे हैं, लिखने का मूड नहीं है। लेकिन अभी 20 मिनट बचे हैं तो क्रम न टूटे, इसलिए कुछ जरूर लिखूंगा। ब्लाग पर सारी बातें रख सकता हूं, लेकिन टाइम मैनेजमेंट में कहीं न कहीं आलस की वजह से चूक जाता हूं। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह क्रम भी व्यवस्थित हो जाएगा।
पिछले रविवार को मैंने लिखा था कि कैसे गर्मी के दिनों में ग्वालियर से आई एक पाती ने जिंदगी की दशा मोड़ी। इससे पहले भी कुछ बातें हुईं थीं। क्रिश्चयन स्कूल में हिंदी की कक्षा मैं नेगी सर की तारीफ मिली थी। इसके बाद से खुद को विद्वान मानने का भ्रम पाल लिया था। यह भ्रम आज भी है शायद। जब बीकाम फर्स्ट इयर में था तब एक बार पप्पू (सुरेश सोनकर) के साथ माधवराव सिंधिया जी से मिलने का मौका मिला। वह राजीव गांधी की सरकार में रेल राज्य मंत्री थे स्वतंत्र प्रभार। उनके रेलमंत्री बनने के बाद तमाम काम हुए थे, जबलपुर भी अछूता नहीं था। स्टेशन की सुंदरता बढ़ी थी। उन दिनों पप्पू भाई भी बेरोजगार थे और मैं भी कैसे न कैसे एक अदद नौकरी से जुड़ना चाहता था। यह नौकरी रेलवे की हो जाए, यही बात सिर चढ़ कर घूम रही थी। दरअसल जबलपुर से प्रतापगढ़ आने -जाने के दौरान रेलवे वालों के जलवे देखता था। सोचता था यदि गार्ड टीसी अथवा ड्राइवर बन जाऊं तो कितना मजा आ जाए जिंदगी में। तो इसी सोच से प्रभावित होकर पप्पू भाई के साथ मुजफ्फरनगर भर्ती बोर्ड द्वारा निकाली गई गार्ड -सहायक स्टेशन मास्टर की परीक्षा दी थी। इलाहाबाद में परीक्षा केंद्र बना था। नतीजा नहीं आ रहा था, इसी बीच एक खबर छपी की परीक्षा में धांधली हुई है। श्रीमंत जी (माधव राव सिंधिया) जबलपुर आए थे विवेक तन्खा के घर। दोपहर में तमाम कांग्रेसजन एकत्रित थे वहां। मैं भी कुर्ता पैजामा पहने घुस गया उस भीड़ में पप्पू भाई के साथ। एक एप्लीकेशन लिख रखी थी, धांधली की और इसकी वजह से योग्य लोगों का चयन नहीं होने की आशंका भी जताई थी। लंच था तनखा जी के यहां, मैंने भी लगे हाथ सिंधिया जी के हाथों में वह पाती थमा दी। हंसकर उन्होंने इतना ही कहा...अरे यह क्या है, मैंने कहा सर देख लेंगे तो कृपा होगी। उन्होंने एप्लीकेशन अपने सचिव को पकड़ा दी। कुछ दिनों बाद करीब तीन महीने बाद परीक्षा रद होने की खबर छपी। मैंने अपने आपको इसका श्रेय दिया और अपने शब्दों को महान मानने लगा। पता नहीं यह परीक्षा मेरे ज्ञापन की वजह से रद हुई अथवा किसी और वजह से लेकिन शब्दों को मैंने महान और महानतम मानना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद मैंने घर में बैठे बैठे तीन चार पन्ने में एक निबंध लिख मारा। शीर्षक दिया -भारतीय रेल एकता की संगम। इस लेख को रेल मंत्री जी को संबोधित करते हुए रेल भवन भेज दिया। दरअसल एक खबर थी कि सिंधिया जी के प्रयासों से रेल मंत्रालय एसी फर्स्ट व वातानुकूलित डिब्बों में रेल पत्रिका रखेगा, जो हिंदी व अंग्रेजी में होगी। पत्रिका में मेरा लेख छपा अथवा नहीं, मैं नहीं जानता, अलबत्ता रेल भवन से एक लिफाफा जरूर मिला जिसमें चेक था अस्सी रुपये का। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। फूला नहीं समाया। चार पेज के लिए अस्सी रुपये, तब बड़ी बात थी यह। जबलपुर जंक्शन पहुंच गया और उसके कोषागार में अस्सी रुपये नगद की मांग कर दी। वहां तैनात बाबू हंसे। बोले, जाकर बैंक में एकाउंट खोलो, उसमें जमा कराओ। वहां से भुगतान होगा। तब स्टेडियम के सामने एसबीआई मेन ब्रांच में एकाउंट खोला। चेक जमा हुआ। चालीस रुपये घर से लिए थे। एकाउंट में धीमे-धीमे डेढ़ सौ रुपये जमा हो गए।
ग्वालियर के साप्ताहिक (संभवतः मासिक) से जुड़ने के बाद पांव जमीन पर नहीं पड़ते थे मेरे। लेकिन पैसा नहीं होता था। नब्बे का दशक ढलान पर था। इसी दौरान ज्ञान भारती प्रहरी निकलना शुरू हुआ जबलपुर से। वहां एक दिन विज्ञिप्त देने गया। खुद को पत्रकार बताया। छात्रनेतागिरी का चस्का था, विज्ञिप्त छात्रनेता की हैसियत से दी थी, नाम छप भी गया। अगले दिन फिर पहुंचा और काम करने की ख्वाहिश जताई। अखिलेश तिवारी, राजेश पांडेय, अज्जू दुबे इत्यादि से परिचय हुआ। एकाध विज्ञिप्त बनाई। मुझे याद आता है राजेश पांडेय (जूनियर) ने कहा लगता है इसे भी कीड़ा काट खाया है...। कुछ समय बाद रामकुमार विश्वकर्मा से परिचय हुआ और फिर अरविंद चौबे से। जवान शैतान नामक अखबार निकालते थे अरविंद चौबे। तब तक बीसवी सदी की शुरूआत हो चुकी थी। जवान शैतान में अरविंद चौबे ने संपादक के रूप में मेरा नाम प्रिंट करवा दिया था। मसें भी कायदे से नहीं भीगीं थी और मेरा नाम संपादक के रूप में दर्ज हो गया। संपादकीय, अग्रलेख क्या होते हैं, इसकी गंभीरता से तब उतना परिचय नहीं हुआ था। सीनियर के रूप में दद्दा जो बताते वही हां होता था। कुछ इश्यू निकले, कुछ नहीं। दद्दा को मोपेड पर लेकर घूमता। वह विज्ञापन लाते थे। इसी सब में पता नहीं कैसे सांध्यबंधु के संपर्क में आ गया। इस अखबार में कैसे बीता समय, यहां के अनुभव...इसे अगले रविवार को लिखूंगा, बशर्ते सब कुछ ठीक रहा तो...। आज बस इतना ही । 

रविवार, 10 जनवरी 2016

ठलुआ के हाथ पाती

नमस्कार। पिछले रविवार को वादा किया था कि आने वाले इतवार से पत्रकारीय जीवन के सफरनामे को लिखना शुरू करूंगा। आज अनमयस्क हूं। लिखने का मन नहीं है, फिर भी वादा था तो दो कदम जरूर चलना चाहूंगा, इस दिशा में। डायरी मेंटेन नहीं करता मैं। पिता जी करते हैं, लेकिन उनकी भी डायरी अनियमित रही है। उनसे तमाम चीजें लीं, पर डायरी लिखने की प्रेरणा नहीं ली। मुझे पता नहीं क्यों डायरी से कोफ्त रही है शुरू से। डायरियां मिलती रही हैं, लेकिन ऐसी ही पढ़ी रहती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि लगता था कि यह बकवास है। अभी भी सोच यही है। आप लिखें दूसरे पढ़ें और हंसे...। क्या यह बचकाना नहीं है? फैसला आप करें।
खैर, जबलपुर में गर्मी के दिन थे। नब्बे के दशक के आखिरी साल में। तब जीएस कामर्स कालेज का छात्र था बीकाम तृतीय वर्ष की परीक्षा हो चुकी थी। पढ़ाई लिखाई में ज्यादा मन नहीं लगता था उन दिनों। इसकी एक वजह शायद मैट्रिक का रिजल्ट था। उसमें कृपांक से पास हुआ था। दिलीप यादव इस कालेज के छात्रसंघ अध्यक्ष थे, उन्होंने पता नहीं कैसे प्रवेश दिला दिया था, कक्षा में एकाध बार ही बैठा होऊंगा। फर्स्ट इयर में था तभी कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव लड़ गया, शिकस्त मिली। सियासत की पहली ही पाठशाला में फेल हो गया। मेरे पड़ोसी रामगोपाल नामदेव जी के पुत्र पवन मुझसे सीनियर थे, वह चुनाव जीत गए थे। उनकी देखादेखी मुझे भी चस्का लगा था। खैर। राजनीति ज्यादा रास नहीं आई। अपन के पास न पैसे थे, न लोग। इसलिए राम-राम कह दिया। नौकरी खोजने लगा। छोटी मोटी कैसी भी। इसी दौरान समाजसेवा भी चलती रही, अंड बंड।  मोहल्ले में कार्यक्रम होते थे, गणेशोत्सव, दुर्गापूजा, नया साल, पंद्रह अगस्त। पता नहीं क्या -क्या? लड़ाई झगड़े भी होते थे। शादी हो गई थी, लेकिन यह बात छिपाना ही उचित लगता था। शायद इसलिए कि सीटियाबाजी नहीं कर पाऊंगा, इस बात के जाहिर होने पर। वैसे ब्यौहारबाग कालोनी में लोगों को यह बात मालूम थी। अम्मा सरल हृदय थीं, छिपा नहीं पाती थीं। हां तो गर्मी के दिन थे। एक दिन शाम को घर के बाहर बैठा था। पप्पू सोनकर भी साथ थे। वह बेरोजगार थे उन दिनों। गोधूलि बेला में ठाकुर साहब की साइकिल घर के बाहर रुकी। ठाकुर साहब पोस्टमैन थे। उनके हाथ में एक लिफाफा था। उस पर मेरा नाम लिखा था। ग्वालियर से किसी रामकुमार श्रीवास्तव ने भेजा था। खोला तो उसमें साप्ताहिक पत्र निकला। पत्रकार बनने के लिए मुझसे कहा गया था। सौ रुपये मांगे गए थे। सौ रुपये की रकम तब बड़ी होती थी। पिता जी से मांग नहीं सकता था। उनकी तनख्वाह ही तब शायद छह सौ से सात रुपये के बीच रहती थी। याद आए शंकरशाह नगर में रहने वाले श्वसुर जी। उनके घर पहुंच गया। विदाई में सौ रुपये मिल  गए। मैंने मनीआर्डर कर दिया। कुछ ही दिनों में ग्वालियर से आइडेंडी कार्ड आ गया। मैंने ससुराल से मिली हीरो मैजिस्टक मोपेड की हेडलाइट के ऊपर लिखवा लिया रिपोर्टर। उड़ने लगा। घर के पीछे माडल हाईस्कूल था। वहां लोकअदालत लगी थी। रंगनाथ मिश्र उसमें आए थे। उसमें पहुंच गया बाहैसियत रिपोर्टर। पत्रकारों की जमात में जा बैठा, सीनियरों ने हिकारत की नजर से देखा, पर मैं बेशर्म सा बैठा रहा। घर आया। तीन पन्ने में जो कुछ समझ सका लिखा और भेज दिया। पता नहीं वह छपा अथवा नहीं।
ग्वालियर से अखबार भेजने वाले श्रीवास्तव जी से मुलाकात कभी नहीं हुई। (शेष अगले इतवार को--यदि सलामत रहा तो...)

रविवार, 3 जनवरी 2016

अब दिन यादों को संजोने के

वर्ष 2016  शुभ हो। हम सभी के लिए।खास तौर पर आर्थिक, सामाजिक व सेहत के मोर्चे पर । आज रविवार है और जब अपने ब्लाग पर यह पंक्तियां लिख रहा हूं तब पठानकोठ एयरबेस में हुए आतंकी हमले की खबर टेलीविजन पर चल रही है। हमारे शहीदों की संख्या 11 हो गई है अब तक। छप्पन इंच का सीना वालों की सरकार इसका क्या जवाब देती है, मुझे भी इसका इंतजार रहेगा देश के अन्य लोगों की तरह। खैर। कुछ ही देर पहले संजीव सर (अमर उजाला वाराणसी में संपादक थे हमारे) से बात हुई थी मोबाइल पर। उन्होंने आशीर्वाद दिया, नए साल की मंगलकामनाओं के साथ। मैंने उस मंगल कामना को सिर पर धर लिया। बड़े-छोटे मित्रों, शुभचिंतकों की शुभकामनाएं ही हैं कि कुछ मानसिक तनाव के बाद भी यहां ब्लाग काला कर रहा हूं। पिता जी गुजरते साल में एक बार फिर चिंता का सबब बन गए हैं हम सबके लिए। उसके बाद भी। गांव में तीस दिसंबर को बाबू जी गिर गए थे पानी भरते समय हैंडपंप के पास। बाएं हाथ की कलाई में फ्रैक्चर हो गया और कमर में क्रेक। मैं उन्हें नहीं ला सका इलाहाबाद। दीपू के पास हैं वह वाराणसी में। हड्डी की चोटों के लिए विख्यात चिकित्सक संजय मारवाह कर रहे हैं उनका इलाज। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह जल्द ही फिर सामान्य हों जाएं। उनको खोने की कल्पना मात्र से सिहर जाता हूं। घर में किससे कहूं यह सब? शुभम-आयुष शायद ही मेरी पीड़ा को समझ सकते हैं। मैं उनका नालायक बेटा हूं ना। मना किया था बाबू जी को वाराणसी से जाने के लिए। छोटे भाई ने यह कह कर मुझे सांत्वना दी कि क्या वाराणसी में हादसे नहीं होते। लेकिन मन तो मन है घोड़ों की तरह दौड़ता है। 
संजीव सर से बातचीत के दौरान मैंने कहा कि सर, अब पता नहीं क्यों मन कमजोर पड़ जाता है, विपत्ति में। सितंबर में सरहज गुजरीं नवंबर में बुआ जी। दस साल पहले यदि कहीं अपना घर बनवा लिया होता तो पिता जी को साथ ही रखता। आप थे लोन भी पास हो गया होता अासानी से। वह (संजीव सर) बोले, हां- तब अतुल जी थे, वाकई में अतुलनीय। उन्होंने मेरी किसी भी बात को अनुसुना किया हो, याद नहीं आता। काम करने वालों की कद्र वह जानते थे। मैंने कहा, सर-संयोग देखिए आज अतुल जी की पुण्यतिथि है पांचवी। हम उनका जिक्र कर रहे हैं। मेरा अतुल जी से सीधा बावस्ता कभी नहीं रहा। एक बार मिर्जापुर के उनके प्रवास से जुड़ा प्रसंग ही सुना हूं, अभिभूत करने वाला। उन्होंने वाराणसी दफ्तर में किसी को नहीं बताया था। चुपचाप आए, आम दर्शनार्थियों की भांति दर्शन कर चले गए। आज ऐसे कितने मालिकान हैं? इस सवाल का जवाब मेरे लिए कठिन है। अमर उजाला अब भी है, पर अतुल जी नहीं हैं। संजीव सर ने बताया कि एक बार तुम्हारा (मेरा) जिक्र मैंने अतुल जी से बोर्ड की बैठक के दौरान किया था। अच्छे सहकर्मी के रूप में। कुछ बेहतर करने की तैयारी थी, लेकिन मुई किस्मत आड़े आ गई। 
अमर उजाला में अच्छे दिन ज्यादा थे। जागरण में भी बहुत प्यार मिला है। अमर उजाला के साथी रजनीश त्रिपाठी ने यह नियुक्ति दिलाने में मदद की। संपादकीय प्रभारी राघवेंद्र चड्ढा जी से भी स्नेह ही मिला। आशुतोष सर (आशुतोष शुक्ला) सर का तो कृपा पात्र मैं खुद को मानता ही हूं। उन्होंने एक्सीडेंट के बाद जिस तरह से मुझे नई जिंदगी दिलाने में मदद दी, वह कभी नहीं भुलाऊंगा। पत्रकारिता में आज शीर्षस्थ नाम है शशिशेखर जी का। उन्होंने भी मुझे अवसाद के एक दौर से निकाला था। कुछ गलतियां नासमझी मैंने की और उसका खमियाजा आज भुगत रहा हूं। बहरहाल, यह सब बातें आज क्यों? इसे नहीं करना चाहिए। इसलिए विराम देता हूं इसको। विस्तार से इसका जिक्र फिर कभी करूंगा। इस साल मेरा संकल्प पत्रकारिता की अब तक की अपनी यात्रा को क्रमबृद्ध करना रहेगा। तो अगले इतवार से इस क्रम की शुरूआत करूंगा। ऐसा इसलिए क्योंकि अनुभव कहीं न कहीं किसी भी रूप में दूसरों के काम भी आ सकें। यदि लक्ष्मी की किरपा हुई तो मन की यह सरस्वती किसी पुस्तक के रूप में सजेंगी। अमरत्व की प्राप्ति के लिए यह तन और मन कितना साथ देता है, यही बात देखने लायक होगी। दरअसल वक्त रेत के घरौदें की तरह है यह कितनी तेजी से खत्म होता है पता ही नहीं चलता। इसलिए जितना भी समय मिले, उसका सार्थक उपयोग कर लेना चाहिए। अब उम्र के उस दौर में पहुंच भी गया हूं, जहां चीजें करीने से सजाई जानी चाहिए। 

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...