नमस्कार। आज इतवार है। सोचा था मन की बात लिखूंगा, लेकिन समय ज्यादा हो चला है। दफ्तर की बाबूगिरी ने ऊर्जा छीन ली है, कुछ लिखने की। लेकिन पिछले रविवार को भी नहीं लिख सका था ठलुआगिरी के आगे की दास्तान । इसलिए आज जरूर कुछ न कुछ तो ब्लाग काला करूंगा ही । जब तक उंगलियां थक नहीं जातीं।
...17 जनवरी की पोस्ट में बात अरविंद चौबे तक पहुंची थी। उन्होंने मिलौनीगंज स्थित अपने प्रेस से जवान शैतान निकाला था। मैं उनके संपर्क में आ गया था। पता नहीं एक दिन उन्हें क्या सूझा उन्होंने मेरा नाम प्रिंट लाइन में बतौर संपादक डाल दिया। शायद 18 अथवा 19 साल की उम्र रही होगी। संपादक बन गया। क ख ग घ ड़ कुछ भी पता नहीं था पत्रकारिता के बारे में। बस मोपेड की हेडलाइट के ऊपर रिपोर्टर लिखवाए घूमता था। जनभारती प्रहरी से होता हुआ सांध्यबंधु में पहुंच गया। नरेश वाजपेयी -कदीर सोनी इस अखबार के सर्वेसर्वा थे। दोनों ही कांग्रेस से जुड़े थे। लगा बड़े लोगों की सोहबत मिल गई। नरेश वाजपेयी जाने माने चेहरे थे शहर के। जमींदार परिवार के। उनके बेटे अतुल दोस्त बन गए थे मेरे। सांध्यबंधु में टेलीप्रिंटर लगा था। इस पर बैठते थे शैलेंद्र दुबे। वह यहां पार्टटाइमर के रूप में काम करते थे। चूंकि वह नवभारत के पहले पेज पर बैठते थे और नवभारत तब जबलपुर का लीडर था, इसलिए उनमें कुछ गर्व का अतिरिक्त बोध था। यदि विज्ञिप्त नवभारत में नहीं छपी तो कहीं नहीं छपी, ऐसी धारणा थी मेरी। भास्कर भी इसी दौर में जम रहा था। इसमें सतीश वाजपेयी जी काम करते थे । टेलीप्रिंटर में उन्हें भी मास्टर माना जाता था। वह भी सांध्यबंधु में आने लगे। तब संस्कारधानी में देशबंधु, नवीनदुनिया जैसे स्थापित अखबार तो थे ही। सब जगह टेलीप्रिटंर की खटर-पटर होती थी। एक बार मन में टेलीप्रिटंर को लेकर उत्सुकता जगी। देखने लगा। शैलेंद्र दुबे जी ने व्यंग के लहजे में कह दिया, इतना आसान नहीं है बच्चा। बात लग गई। शैलेंद्र के साथ भरत ओकास भी होते थे। एक दिन संयोग से दोनों नहीं आए। मैंने ही खबरें निकालीं, संपादित की और पहला पन्ना बनवा दिया। आत्मविश्वास हिलोर मारने लगा। वह तारीख तो अब ठीक से याद नहीं लेकिन स्मृति में इतना जरूर है कि जिस दिन दिल्ली को विधानसभा बनाए जाने का प्रस्ताव संसद में पास हुआ, मैंने चार पन्नों के इस अखबार के पहले पेज पर लीड बनाई थी यह खबर। तीन कालम दो लाइन में हैडिंग देते हुए। तीन दिन बाद घर के पीछे राजकीय पुस्तकालय की लाइब्रेरी में बैठ कर नवभारत टाइम्स देख रहा था। भौचक रह गया। मैंने जो शीर्षक दिया था, हु-ब-हू वही शीर्षक नवभारत टाइम्स की लीड का था। मन बाग-बाग हो उठा। मेरे तमाम मित्रों को आज विश्वास नहीं होगा। वह फाइल देख सकते हैं। पहली बार कांफिडेंस हजार गुना बढ़ गया। इसके बाद तो रात में अकेले ही सांध्यबंधु के भीतर के पेज बनवा देता था। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों को लेते हुए। कन्हैयालाल राज यहां संपादकीय प्रभारी थे। दलित समुदाय से आते थे वह। पुराने पत्रकार थे गांधीवादी। उनके चरण स्पर्श से भी गुरेज नहीं किया था मैंने। खूब सीखा। कभी कभी वह झिड़कते थे मुझे, लेकिन रात में जब टुन्न होते थे तो आशीषते थे। सांध्यबंधु के बाद उनसे रिश्ता नहीं रहा। पर वह स्मृति में बने हैं। सांध्यबंधु में पहली तनख्वाह (सैलरी) शायद 280 रुपये मिली थी। इसके बाद यह एक साल के ही भीतर छह सौ रुपये हो गई। श्याम बिहारी सोनी कक्का, नरेश वाजपेयी भरपूर दुलार देते। रात में यहां दूसरा ही दौर हो जाता। तख्त पर नरेश भैया और उनकी मित्रमंडली जम जाती। दौर चलते। खाना आता तो मुझे भी पूछा जाता। घर में खाना बनता था, इसलिए अक्सर न कर देता था मैं। फिर भी कई बार नरेश वाजपेयी खाना खिलवा ही देते। उनका हक था मुझ पर। भगवान उनके परिवार को सलामत रखें। यहीं शरद मोदी मिले। मस्तमौला। यहीं हैंडकंपोजिंग होती थी। खटर पटर के बीच मैटर देना होता था। प्रूफ भी पढ़ता। दो पेज तैयार करवाकर जाता। घर पहुंचते-पहुंचते बाजे दफा रात में 11 भी बज जाते, या इससे अधिक। करीब डे़ढ़ साल पंख लगकर गुजर गए। अयोध्या में जब कारसेवकों पर गोली चली तब यहीं था। सांप्रदायिक तनाव क्या होता है, पत्रकारीय धर्म क्या होता है ऐसे मौकों पर, यहीं जाना। सच कहूं तो सांध्यबंधु में की गई अप्रेंटिसगिरी आगे बहुत काम आई। यही मोहब्बत के भी एक पाठ से दो चार हुआ। लेकिन यह सफर संक्षिप्त ही रहा। बात आई गई हो गई। इस पर अब क्या लिखना।
...17 जनवरी की पोस्ट में बात अरविंद चौबे तक पहुंची थी। उन्होंने मिलौनीगंज स्थित अपने प्रेस से जवान शैतान निकाला था। मैं उनके संपर्क में आ गया था। पता नहीं एक दिन उन्हें क्या सूझा उन्होंने मेरा नाम प्रिंट लाइन में बतौर संपादक डाल दिया। शायद 18 अथवा 19 साल की उम्र रही होगी। संपादक बन गया। क ख ग घ ड़ कुछ भी पता नहीं था पत्रकारिता के बारे में। बस मोपेड की हेडलाइट के ऊपर रिपोर्टर लिखवाए घूमता था। जनभारती प्रहरी से होता हुआ सांध्यबंधु में पहुंच गया। नरेश वाजपेयी -कदीर सोनी इस अखबार के सर्वेसर्वा थे। दोनों ही कांग्रेस से जुड़े थे। लगा बड़े लोगों की सोहबत मिल गई। नरेश वाजपेयी जाने माने चेहरे थे शहर के। जमींदार परिवार के। उनके बेटे अतुल दोस्त बन गए थे मेरे। सांध्यबंधु में टेलीप्रिंटर लगा था। इस पर बैठते थे शैलेंद्र दुबे। वह यहां पार्टटाइमर के रूप में काम करते थे। चूंकि वह नवभारत के पहले पेज पर बैठते थे और नवभारत तब जबलपुर का लीडर था, इसलिए उनमें कुछ गर्व का अतिरिक्त बोध था। यदि विज्ञिप्त नवभारत में नहीं छपी तो कहीं नहीं छपी, ऐसी धारणा थी मेरी। भास्कर भी इसी दौर में जम रहा था। इसमें सतीश वाजपेयी जी काम करते थे । टेलीप्रिंटर में उन्हें भी मास्टर माना जाता था। वह भी सांध्यबंधु में आने लगे। तब संस्कारधानी में देशबंधु, नवीनदुनिया जैसे स्थापित अखबार तो थे ही। सब जगह टेलीप्रिटंर की खटर-पटर होती थी। एक बार मन में टेलीप्रिटंर को लेकर उत्सुकता जगी। देखने लगा। शैलेंद्र दुबे जी ने व्यंग के लहजे में कह दिया, इतना आसान नहीं है बच्चा। बात लग गई। शैलेंद्र के साथ भरत ओकास भी होते थे। एक दिन संयोग से दोनों नहीं आए। मैंने ही खबरें निकालीं, संपादित की और पहला पन्ना बनवा दिया। आत्मविश्वास हिलोर मारने लगा। वह तारीख तो अब ठीक से याद नहीं लेकिन स्मृति में इतना जरूर है कि जिस दिन दिल्ली को विधानसभा बनाए जाने का प्रस्ताव संसद में पास हुआ, मैंने चार पन्नों के इस अखबार के पहले पेज पर लीड बनाई थी यह खबर। तीन कालम दो लाइन में हैडिंग देते हुए। तीन दिन बाद घर के पीछे राजकीय पुस्तकालय की लाइब्रेरी में बैठ कर नवभारत टाइम्स देख रहा था। भौचक रह गया। मैंने जो शीर्षक दिया था, हु-ब-हू वही शीर्षक नवभारत टाइम्स की लीड का था। मन बाग-बाग हो उठा। मेरे तमाम मित्रों को आज विश्वास नहीं होगा। वह फाइल देख सकते हैं। पहली बार कांफिडेंस हजार गुना बढ़ गया। इसके बाद तो रात में अकेले ही सांध्यबंधु के भीतर के पेज बनवा देता था। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों को लेते हुए। कन्हैयालाल राज यहां संपादकीय प्रभारी थे। दलित समुदाय से आते थे वह। पुराने पत्रकार थे गांधीवादी। उनके चरण स्पर्श से भी गुरेज नहीं किया था मैंने। खूब सीखा। कभी कभी वह झिड़कते थे मुझे, लेकिन रात में जब टुन्न होते थे तो आशीषते थे। सांध्यबंधु के बाद उनसे रिश्ता नहीं रहा। पर वह स्मृति में बने हैं। सांध्यबंधु में पहली तनख्वाह (सैलरी) शायद 280 रुपये मिली थी। इसके बाद यह एक साल के ही भीतर छह सौ रुपये हो गई। श्याम बिहारी सोनी कक्का, नरेश वाजपेयी भरपूर दुलार देते। रात में यहां दूसरा ही दौर हो जाता। तख्त पर नरेश भैया और उनकी मित्रमंडली जम जाती। दौर चलते। खाना आता तो मुझे भी पूछा जाता। घर में खाना बनता था, इसलिए अक्सर न कर देता था मैं। फिर भी कई बार नरेश वाजपेयी खाना खिलवा ही देते। उनका हक था मुझ पर। भगवान उनके परिवार को सलामत रखें। यहीं शरद मोदी मिले। मस्तमौला। यहीं हैंडकंपोजिंग होती थी। खटर पटर के बीच मैटर देना होता था। प्रूफ भी पढ़ता। दो पेज तैयार करवाकर जाता। घर पहुंचते-पहुंचते बाजे दफा रात में 11 भी बज जाते, या इससे अधिक। करीब डे़ढ़ साल पंख लगकर गुजर गए। अयोध्या में जब कारसेवकों पर गोली चली तब यहीं था। सांप्रदायिक तनाव क्या होता है, पत्रकारीय धर्म क्या होता है ऐसे मौकों पर, यहीं जाना। सच कहूं तो सांध्यबंधु में की गई अप्रेंटिसगिरी आगे बहुत काम आई। यही मोहब्बत के भी एक पाठ से दो चार हुआ। लेकिन यह सफर संक्षिप्त ही रहा। बात आई गई हो गई। इस पर अब क्या लिखना।
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