यूपी के कौशांबी जिले में सिराथू तहसील का एक गांव है उदिहिन खुर्द। क्षेत्र को करीब से जानने वाले ओम प्रकाश सिंह ने बारिश और इस बारे में चीटियों से होने वाले एक टोटके का रोचक ब्योरा भेजा है। सो इसे ब्लॉग में सहेज रहा हूं, ताकि सनद रहे। उदिहिन खुर्द निवासी वयोवृद्ध संतशरण सिंह उर्फ मुखिया बाबा क्षेत्र में आधुनिक घाघ कहलाते हैं। यानी मौसम के जानकार। वह 'सगुनौती विधि' अपनाते हैं। दावा यह है कि उनकी अब तक मौसम को लेकर सारी भविष्यवाणियां लगभग सौ फीसद सच रही हैं और इस बार उनका कहना है कि रबी में मौसम ने चाहे जैसे मारा हो, खरीफ में इतनी बारिश जरूर होगी कि किसानों के कोठर अन्न से लबालब होंगे। संतशरण,चीटियों से मिले फलित के आधार पर कहते हैं कि आषाढ़ में तो पानी कम रहेगा लेकिन सावन और भादों में झड़ी लगेगी। खेत लबालब रहेंगे। अगले रबी सीजन में वह गेहूं की बुआई के लिए भी पर्याप्त बारिश की भविष्यवाणी कर रहे हैं। उनकी मानें तो कार्तिक पानी से भरा रहेगा।
भारतीय मौसम विभाग ने इस बार 35 फीसद बारिश कम होने की संभावना जताई है। बुधवार को दिल्ली में केंद्रीय विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान मंत्री हर्षवर्धन ने तकनीक आधारित ज्ञान जिसे हम विज्ञान भी कह सकते हैं, के आधार पर आने वाले दिनों में बादलों की जानकारी दी थी। मैं अंधविश्वासी नहीं हूं, इसलिए चीटियों के टोटके को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहता, लेकिन हैरत तो मुझे भी है, ऐसी किसी जानकारी पर। खैर 22 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर 'सगुनौती विधि आजमाई गई। इसमें 11 जिंसों को लेकर भविष्य फल निकाला गया। जिन जिंसों के लिए फलित निकाला गया, उनमें चना, सांवा, ज्वार, जौ, धान, बाजरा, उर्द, कपास, गेहूं, काकुन व मकर शामिल है।
यह है सगुनौती विधि
अक्षय तृतीया पर रात में करीब 11 बजे 11 ङ्क्षजस कपड़े में एक-एक तोला बांधकर मटके पर बांध दिए जाते हैं। उस पर रोटी व मोटे अनाज से बने कई प्रकार के व्यंजन होते हैं। करीब ही पानी भरा मटका आषाढ़, सावन, भादों, कुंवार और काॢतक नाम से पांच मिट्टी के ढेले के ऊपर रखा जाता है। पौ फटने से पहले ही मटके हटाकर यह देखा जाता है कि क्या हुआ? रोटी में चीटियां लिपटीं मिलीं तो अनुमान लगाया जाता है कि गेहूं की पैदावार भरपूर होगी। दूसरे मटके के नीचे रखे गए माह नाम वाले ढेले जितना भीगे होते हैं उसके आधार पर कहा जाता है कि फलां महीने में पानी गिरेगा अथवा नहीं। मटकी के साथ एक-एक तोला के 11 ङ्क्षजस अलग-अलग बांधे जाते हैं। इन्हें चांदी के सिक्के से तौला जाता है। इसके बाद जब वापस मटकी हटाई जाती है तो जिस तराजू से ङ्क्षजस की तौल होती है, उसी तराजू से दूसरे दिन उनकी दोबारा तौल होती है। इसकी बाकायदा लिखा-पढ़ी होती है। दूसरे दिन दाना तौल में कम या ज्यादा अथवा बराबर उतरता है तो उससे आने वाली फसल की उपज का अनुमान लगाया जाता है। पिछली अक्षय तृतीया पर किए गए टोटके में रोटी गायब हो गई थी। तभी उन्होंने कह दिया था गेहूं की पैदावार बहुत कम होगी। ठीक वैसा ही हुआ और किसान बेमौत मर रहे हैं। यदि राजस्थान के दौसा के गजेंद्र सिंह को 'सगुनौती की जानकारी हो गई होती तो हो सकता है वह आज जिंदा होते और देश की सबसे बड़ी पंचायत में शोर-शराबे की जगह आम लोगों के लिए कुछ अच्छी बात भी होती।

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