अप्रैल का महीना कुछ खास होता है। मेरे जैसे उन कर्मचारियों के लिए, जो निजी क्षेत्र के एम्पलाई होते हैं। दरअसल इसी महीने ज्यादातर संस्थानों में इंक्रीमेंट-प्रमोशन का दौर चलता है। आपकी साल भर की परफारमेंस बास के मूड पर होती है, यदि फैसले के वक्त किसी भी कारण से आपके बास का मूड खराब हो आपसे, तो बैठ जाता है भट्ठा। बाबा जी का टुल्लू मिलने वाली बात ही रह जाती है कर्मचारियों के लिए। साल भर संस्थान अथवा बास को कोसें, या अपनी किस्मत पर रोएं , इसका कोई मतलब नहीं रह जाता। ऐसे लोग विरले ही रहते हैं जो इस कवायद से अप्रभावित होते होंगे। मैं भी इनमें नहीं हूं। मुझे पीड़ा होती है मई में, जब अपना इंक्रीमेंट देखता हूं। मेरे काम के मूल्यांकन कैसा हुआ, मुझमें क्या कमी रह गई? ऐसे सवालों से जूझता हूं, पर कहते हैं न कि समय सबसे बड़ा मरहम होता है, धीरे-धीरे भूल जाता हूं। जुट रहता हूं उत्साह से। अपनी सामर्थ्य भर। दूसरों को सलाह देता हूं कि कम से कम जनवरी से लेकर मार्च तक किसी भी सूरत में पंगा न लें बास से, लेकिन खुद भी यही भूल कर बैठता हूं। करूं क्या, अनाड़ी जो ठहरा।
आदरणीय ज्ञानरंजन सर ने मुझे एक सलाह दी थी। जबलपुर में मई 2010 में। अवसाद के दिन थे वे। पीपुल्स समाचार की नौकरी छोड़ दी थी, तथाकथित अहं को ठोस लगने पर। किसी और ठौर की तलाश में मदद के लिए गया था, उनके पास। उन्होंने मदद भी की। सिफारिशी पत्र लिखा था मेरे लिए। यह बात दीगर रही कि उस पत्र की गति मेरी किस्मत से तेज नहीं निकली। जिन विभूति से उन्होंने मेरे लिए कोई गुंजाइश निकालने की गुजारिश की, उन्होंने भी सिर्फ आश्वासन दिया। संभवतः समय का फेर था। खैर, ज्ञानरंजन सर की सलाह बता दूं। उन्होंने कहा था, -सुरेश तुम्हें थोड़ा डिप्लोमेटिक होना चाहिए। सर स्वीकार करता हूं कि कोशिश की, लेकिन बन नहीं सका हूं। इस जीवन में शायद यह संभव भी नहीं हो पाएगा। क्षमा करेंगे। तकदीर से ज्यादा और वक्त से पहले कुछ नहीं मिल सकता, अब इस पर और यकीन बढ़ गयाहै। इस बार मई के बाद शायद कुछ और भी बढ़ जाएगा। यदि गलत साबित होता हूं, तो इसी ब्लाग पर फिर से कुछ शब्दों से अपनी भावना व्यक्त करूंगा।
आदरणीय ज्ञानरंजन सर ने मुझे एक सलाह दी थी। जबलपुर में मई 2010 में। अवसाद के दिन थे वे। पीपुल्स समाचार की नौकरी छोड़ दी थी, तथाकथित अहं को ठोस लगने पर। किसी और ठौर की तलाश में मदद के लिए गया था, उनके पास। उन्होंने मदद भी की। सिफारिशी पत्र लिखा था मेरे लिए। यह बात दीगर रही कि उस पत्र की गति मेरी किस्मत से तेज नहीं निकली। जिन विभूति से उन्होंने मेरे लिए कोई गुंजाइश निकालने की गुजारिश की, उन्होंने भी सिर्फ आश्वासन दिया। संभवतः समय का फेर था। खैर, ज्ञानरंजन सर की सलाह बता दूं। उन्होंने कहा था, -सुरेश तुम्हें थोड़ा डिप्लोमेटिक होना चाहिए। सर स्वीकार करता हूं कि कोशिश की, लेकिन बन नहीं सका हूं। इस जीवन में शायद यह संभव भी नहीं हो पाएगा। क्षमा करेंगे। तकदीर से ज्यादा और वक्त से पहले कुछ नहीं मिल सकता, अब इस पर और यकीन बढ़ गयाहै। इस बार मई के बाद शायद कुछ और भी बढ़ जाएगा। यदि गलत साबित होता हूं, तो इसी ब्लाग पर फिर से कुछ शब्दों से अपनी भावना व्यक्त करूंगा।
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