मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

दोनों देवियां हैं रूठीं...



आज अक्षय तृतीया है। सुबह टेलीविजन पर बताया जा रहा है कि मुद्दत बाद यह संयोग बना है। हर साल ऐसा ही संयोग बताया जाता है। ज्ञानी पंडित यही बताते हैं, इस बार भी कुछ ऐसा ही था। खैर बात सुबह की कर रहा हूं। खबरिया चैनल न्यूज 24 खुला था टेलीविजन स्क्रीन पर। मेरे उस ठिकाने पर जो किराए का मकान कहलाता है। पंडित जी बतलाते जा रहे थे कि फलां -फलां राशि वाले क्या- क्या चीजें खरीदें तो धन-संपदा बढ़ेगी। मुझे हंसी आ गई। दरअसल मेरी राशि वालों के लिए चांदी खरीदने की सलाह थी, (पता नहीं किस पंचांगकार ने मेरी राशि मेष तय कर दी है)। श्रीमती जी खुश हो गईं, बोली मैं कब से पायल के लिए कह रही थी, अब आज खरीद दो। मुझे अपना बैंक बैलेंस याद आ गया। कोई 2100 रुपये ही इसमें हैं, मैंने कहा, दो चार सौ की बात हो तो सोचूं भी। खैर स्क्रीन पर एक और सलाह आई पंडित सुरेश पांडेय की। बोले तुला राशि वालों के लिए नया वस्त्र खरीदना शुभ रहेगा। बेटा शुभम खुशी से उछल पड़ा। उसकी राशि तुला ही है, पंडित जी लोगों ने ऐसा ही विचारा है। मैंने शुभम से कहा जाओ खरीद लो...। जबाव मिला, तीन हजार रुपये दे दो। इससे कम में कुर्ते नहीं आ रहे हैं। मैं फिर बैकफुट पर था। क्या कहता? दोबारा याद आ गया बैंक बैलेंस। सोचने लगा न लक्ष्मी देवी की किरपा है न सरस्वती देवी की। जब दोनों देवियां रूठीं हैं तो लाख अक्षय तृतीया आए, मेरे लिए बेमतलब। हां, कल रात में अपना ब्लॉग ढूंढ लिया था, संस्थान से मिले टैब की बदौलत। इस पर जरूर दर्ज कर दूं अपनी सुबह की दास्तां। ताकि कभी रहूं, न रहूं, यह तो सनद रहे। दरअसल अपन का क्षय तो होना ही है एक दिन। अपन अक्षय नहीं हैं ना...। 

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