रविवार, 6 अगस्त 2017

कलाई आपकी, प्यार हमारा...

फौज में जाना मेरा सपना था। फौजी मेरे आदर्श हैं । जबलपुर में मैट्रिककुलेशन के बाद इंडियन नेवी की आर्टिफिशयल अप्रेंट्रिस की परीक्षा दी थी। इसमें सफल नहीं हो सका। देखते ही देखते वह उम्र गुजर गई, जब फौज में जा सकता था। मन भटक गया कहीं और। लिखने पढ़ने की दुनिया में आना था, इसलिए फौज की जिंदगी ख्वाब ही रह गई। लगभग उन्हीं दिनों में टेलीविजन पर शाहरुख खान का सीरियल आने लगा फौजी। इसलिए भी फौज को लेकर उत्सुकता बढ़ गई। ऐसे शहर में बचपन बीता है, जो भारतीय सशस्त्र सेनाओं के लिए खास है। एरिया कमांड है जबलपुर। थल सेना के लगभग लगभग सभी सिपाहियों, अफसरों का वास्ता जीवन में एकाध बार यहां से जरूर पड़ता है, ऐसा पता चला था। खैर, देखते ही देखते ढाई दशक से ज्यादा का समय गुजर गया। फौज में जाने का ख्वाब अब इस जिंदगी में पूरा नहीं हो सकेगा। अगले जन्म में ईश्वर ने साथ दिया तो जरूर जाऊंगा फौज में।
आज फौज की बात क्यों? यह सवाल आप कर सकते हैं। चलिए उत्तर भी दे देता हूं। असल में कल कुछ देर फौजियों के बीच रहने का मौका मिला। दैनिक जागरण दशक भर से ज्यादा समय से भारत रक्षा पर्व मानता आ रहा है। इस पर्व के तहत विभिन्न संस्करण (प्रकाशन केंद्र) में कार्यरत सहयोगी अपने -अपने शहर की बहन बेटियों के हाथ की बनी राखियां जुटाते हैं। इन राखियों को ट्रक के जरिए सीमा पर तैनात जवानों को भेजा जाता है। सरहद प्रहरियों पर प्यार जताने का पर्व होता है एक तरह से यह। हम सिविलयन तो हर तीज त्योहार का आनंद ले लेते हैं अपनों के बीच, लेकिन यह ऐसा दिन होता है जब एक फौजी भाई को उसकी बहन की कमी खलती है। आखिर वह भी परिवार छोड़कर मोर्चे पर हैं। कभी पत्थर खाते, कभी गोलियां झेलते। इस अभियान से जहनी जुड़ाव पहली बार महसूस हुआ, शनिवार को इलाहाबाद स्थित पूर्व यूपी -एमपी एरिया सब कमांड मुख्यालय पहुंचकर। अनुशासित फौज और उसके सिपाही वाकई में अदभुत नजर आए। यह दुनिया कुछ अलग ही दिखी। हम (आदरणीय संपादकीय प्रभारी जगदीश जोशी, उपमहाप्रबंधक मनीष चतुर्वेदी, सहयोगी अवधेश पांडेय, रमेश यादव, दिव्यानंद पांडेय, शानू सिंह) मुख्यालय की हरियाली, सुरक्षा देख ओतप्रोत थे। कुछ ही देर में हमारे बीच में थे मेजर जनरल एसके सिंह। संपादकीय प्रभारी जगदीश जोशी ने कार्यक्रम का संक्षिप्त परिचय दिया। हमने राखियां भेंट की। फिर बारी थी मेजर जनरल एसके सिंह की। हिंदी पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। कहा कि सिविलयन की तरफ से ऐसे उपक्रम हमें (फौज को) यह बताते हैं कि हम उनके लिए खास हैं।)  उन्होंने चंद पंक्तियां पढ़ फौजी की जिंदगी और देश में उसके योगदान को रेखांकित कर दिया। उनकी पंक्तियां थीं....
कभी ठंड में ठिठुर कर देखो, कभी गर्मी में तप कर देखो
देश की हिफाजत कैसे होती है कभी सरहद पर आकर देखो...
उपरोक्त पंक्तियां दिल में उतर गईं। गहरे से। राखियां सौंपे जाने के बाद हमारे साथ ही परिसर में पहुंची एमपीवीएम गंगा गुरुकुलम स्कूल की छात्राओं ने तिलक किया फौजी भाईयों का और राखियां बांधने लगीं। तमाम फौजी भाईयों ने हाथ पर राखियां बंधवाई और पर्स निकाल कर नेग दिया। मुझे याद आ गई अपनी बहन की। मैं भी ऐसे ही करता हूं। एकबारगी आंख छलछला आईं। यह दृश्य भुलाए नहीं भूलेगा। रक्षाबंधन तो और भी आएंगे। हमारा समाज, हमारी नई पीढ़ी कितनी संवेदनशील है फौजी भाईयों को लेकर, यह शब्दों में बता पाना संभव नहीं। कल रक्षा बंधन है। इस बार कुछ ही घंटों का वक्त रहेगा राखियां बांधने के लिए। सीमा पर मौजूद सारे जवानों के हाथ में देश के नेह का बंधन होगा, ऐसा विश्वास करता हूं। बहनें निश्चित तौर पर नहीं चूकेंगी। आखिर इन्हीं भाईयों के हाथ ही है उनकी लाज। तो कह सकते हैं कि कलाई आपकी, प्यारा हमारा... रक्षा बंधन का पर्व है प्यारा।
    

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