बुधवार, 24 जनवरी 2018

वाह मिश्र जी वाह

कुछ बातें सनद कर रख लेनी चाहिए... ताकि वक्त जरूरत पर काम आए.
विधिवेत्ता व बार काउंसिल आफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता वीसी मिश्र सोमवार को हमारे साथ थे। अकादमिक बैठक में। आगामी आठ फरवरी को वह 89 साल के हो जाएंगे। संपादकीय साथियों के बीच उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा संकट पर चर्चा की। माना कि इससे न्यायपालिका की गरिमा गिरी है। बताया कि यह दौर तो 1975 से ही शुरू हो गया था जब, सुप्रीम कोर्ट के आह्वान पर वकीलों ने पहली बार हड़ताल की थी। इससे पहले कभी भी वकीलों की हड़ताल नहीं होती थी। मेरे लिए यह अचरज वाली बात थी। होश संभालने के बाद से मैंने आए दिन वकीलों के हड़ताल की जानकारी अखबार में छापी है और पढ़ी है। किसी वकील से बदसलूकी तो हड़ताल, किसी की हत्या तो हड़ताल। बहाना कोई भी हो हड़ताल। सच है न्यायपालिका पर भरोसा नहीं रह गया है अब। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात साकार हो रही है सच में। तुलसीदास बाबा बहुत पहले ही लिख गए थे ---समरथ को नहिं दोष गुंसाईं।
सुप्रीम कोर्ट-हाई कोर्ट के जज भगवान सदृश माने जाते हैं इस देश में। जनता के धन से इनकी भगवान घांई (भांति) भक्ति भी होती है। कहीं भी टेबिल कुर्सी लगाकर अदालत लगाकर सजा सुना सकते हैं यह। इन्हें संविधान का रक्षक कहा जाता है। हमारा संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन हम फैसले पर टिप्पणी करें तो उसे अवमानना मान लिया जाता है। वीसी मिश्र को अदालत की अवमानना में सजा हुई है। तीन साल तक उन्हें प्रैक्टिस के  लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। उनका दर्द उनके शब्दों में...मैं सामान्य घर से था, इसलिए ऐसा हुआ। मुझे उनकी बात में दम लगा। इसी चर्चा में उन्होंने हाईकोर्ट के एक न्यायमूर्ति के बेटों के बारे में जानकारी दी। बताया कि एक ने हाईकोर्ट में प्रैक्टिस की, दूसरे ने सुप्रीम कोर्ट में। एक ही साल में आठ करोड़ रुपये का टर्नओवर अपनी इनकम टैक्स रिटर्न में दिखा दिया कानून के इस जानकार ने। सुना बहुत था, पर न्याय जगत की किसी हस्ती के मुंह से तो सच ही लगा। बेंगुलरू के रिजार्ट में आराम फरमाते न्याय के देवताओं की स्टोरी की हत्या पढ़ी और सुनी थी कभी। इसी इलाहाबाद में एक अपार्टमेंट को ध्वस्त कराने का प्रसंग भी नहीं भूला हूं मैं। कह सकता हूं कि न्याय के देवताओं में बहुत ताकत है, कुछ भी कर सकते हैं। इनके इर्द गिर्द ऐसा बाह्य आवरण है कि किसी में जुर्रत नहीं है उसे भेद पाने की। बहरहाल न्याय के देवता जर्नादन (जनता)  से न्याय मांगने सामने आए हैं और नई लकीर खींच दी है। यह कालांतर में अच्छा ही होगा। एक दूसरे की पैंट उतारने पर ही सच सामने आएगा, ऐसा मेरा मानना है।
लगाइए ठहाका ---नीचे की पंक्तियां वीसी की मिश्र की जुबानी
सिंह कौन हैं... कोई बता सकता है क्या। साथी ज्ञानेंद्र सिंह का जवाब ....नहीं पता। बताऊं सिंह कौन हैं ...मुगल राजाओं को बीवियां बहन भेंट करते थे तो राजा कहते थे सिंह है भाई सिंह....। बताओ रामचंद्र, लक्ष्मण, भरत व शत्रुध्न के नाम में सिंह है क्या.... (ठहाका)
अच्छा राजपूत कौन है.... राजाओं का मन किले में आई, ग्वालिन, पंडताइन, मालिन, धोबिन पर आ गया और सामने आ गए राज के पूत यानि राज पूत।  (ठहाका)
मुसलमान कौन हैं... कोई नहीं। सभी हिंदू ही हैं इस देश के। डीएनए की जांच करा लो। किसी ने तलवार के जोर पर धर्म बदल लिया, किसी ने प्रलोभन में आकर।
क्षत्रिय। ... एक से पूछा कितने साल के हो। जवाब मिला 40 साल के। तीन साल बाद पूछा तो जवाब मिला 40 के हैं। मैंने कहा यार गजब हो...तीन साल पहले भी 40 के थे, अब भी। उसने कहा (उत्तरकर्ता पढ़ें इसे) क्षत्रिय की एक जुबान होती है।
-मुलायम सिंह समझदार हैं, लेकिन अखिलेश में क्लर्क बनने तक का गुण नहीं है। मैंने मना किया था अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने से, लेकिन मुलायम सिंह ने कहा था कि यदि इसे अभी नहीं बनाया तो कभी नहीं बन सकेगा यह।
-साथी बृजेश श्रीवास्तव ने चलते चलते एक सवाल पूछा--- यदि आपको एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बना दिया जाए तो क्या करेंगे।
उत्तर था--मैं बनूंगा ही नहीं। एक दिन में क्या उखाड़ लूंगा।
(मान गए मिश्र जी। अद्भभुत ) 

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