मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शनिवार को कुछ घंटों के लिए शहर में थे। देखने आए थे तैयारी कुंभ 2019 की। एक मुख्यमंत्री के रूप में चिलचिलाती धूप में उनको खड़ा होकर कार्यों का मुआयना करते देखना अच्छा लगा। हो सकता है कुछ को यह रस्मी नजर आया हो, फिर भी यह मानने में गुरेज नहीं है कि उनकी चिंता दिव्य आयोजन को लेकर ज्यादा ही है। कम से कम स्थानीय अफसरों से थोड़ा ज्यादा। वैसे यहां यह कहने में भी संकोच नहीं कि अफसर उनकी आंखों में धूल झोंकने में अभी कामयाब रहे हैं। बता दिया कि 39 फीसद काम हो चुका है। यह तब है जबकि हाल के दिनों में ही हुई प्रयागराज मेला प्राधिकरण की बैठक में अफसरों की समीक्षा के दौरान ही किसी काम की प्रगति आठ फीसद मिली थी तो किसी की 20 से 25 फीसद। पता नहीं अफसरों का पैमाना क्या है... सीएम को बताने के लिए कुछ और, आपस में मशविरे के दौरान कुछ और। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, राज्य सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह, नागरिक उड्डयन मंत्री नंद गोपाल नंदी शहर से ही हैं, तब भी अफसर किस तरह सीएम की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब हो जा रहे हैं, यह दिलचस्प है। कुंभ के लिए लगभग छह हजार करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर काम होना है। फिलहाल डेढ़ हजार करोड़ रुपये आवंटित भी हो गए हैं, लेकिन जहां देखिए गड्ढे ही दिखते हैं। यही कुंभ की तैयारियों का सच है, पर साधौ हमें चुप ही रहना चाहिए। कुंभ खत्म हो जाए तो कोई नया अरूण शौरी यह स्कूप देगा कि कुंभ में भी कामनवेल्थ 2010 दोहराया गया। मेरी चिंता तो आने वाली बरसात के दौरान होने वाली दिक्कत को लेकर है। अभी अफसरों से कहेंगे तो यह भी सुनने को मिलेगा कि बहुत आए -गए, कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया हमारा, जैसे हम अंग्रेजी हुकूमत में थे, वैसे ही काले अंग्रेजों की देसी हुकूमत में। व्यवस्था वैसी ही रहेगी चाहे भाजपा वाले सरकार में हों अथवा कांग्रेस, सपा व बसपा वाले। खालिस कामरेडों की सरकार हो तब भी भ्रष्टाचार और काहिली वाला रोग नहीं दूर होगा। अन्ना गन्ना चूसते रहें। केजरीवाल खांसते रहें तब भी। करेंगे क्या, यही हमारे खून में है। हर कोई एक दूसरे को दीया दिखाता है उजाले का। आखिर वह संत जो ठहरा। संत माने ईमानदार, त्यागी संतोषी। आप किसी से भी पूछ लीजिए वह यही कहेगा कि हुजूर मैं तो सही हूं, बस सामने वाला गलत है। हम भारतीयों की दिक्कत यही है। आत्मविश्लेषण करते नहीं। आलोचना पर आपा खो देते हैं, चूंकि संतई का अहं होता है मन के किसी कोने में, इसलिए हमेशा रगरा झगरा चलता है। अब भगवाधारी संतों को ही ले लीजिए। इलाहाबाद में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के दो शीर्ष पदाधिकारी
रहते हैं। स्वामी नरेंद्र गिरि व महंत हरि गिरि। परिषद की एक बैठक में फैसला होता है कि अफसर मनमानी कर रहे हैं, इसलिए कुंभ में शाही स्नान का बहिष्कार किया जाएगा। अफसरों के हाथ पांव फूलते हैं। संत मुख्यमंत्री भी विचलित होते हैं। खैर उनके (सीएम के) प्रयाग पर चरण रखने से पहले मामला सुलट जाता है। शाही स्नान के बहिष्कार का फैसला वापस हो जाता है। संत सीएम भी खुश हो जाते हैं इसलिए प्रयाग आने पर वह मठ बाघंबरी गद्दी में भी पहुंचते हैं। मलमास चल रहा है, सो भोलेनाथ की पूजा करते हैं और यहां बना प्रसाद ग्रहण करते हैं। अब संत भी खुश तथा उनके भक्त भी। अखबारों में बैठे लोग अपने -अपने हिसाब से खबर छापते हैं। मुझे बताया गया कि पहली बार कोई संत मठ बाघंबरी में पहुंचा है। महंत नरेंद्र गिरि इससे पहले वाले सीएम अखिलेश यादव के भी खास थे। हां, यह बात अलग है कि अखिलेश कभी मठ में नहीं आए। इसी मठ में सचिन दत्ता नामक एक व्यक्ति को भी महामंडलेश्वर की उपाधि दे दी गई थी, जो माल में डिस्कोथेक और पब चलाते थे एक दौर में। हंगामा मचा तो उपाधि वापस ले ली गई। एक और तथ्य। कुछ और संतों को अखाड़ा परिषद ने फर्जी संत घोषित कर रखा है। मुझे लगता है कि असली संत कौन हैं, उनकी परिभाषा क्या हो, इस तय कर पाना वाकई मुश्किल भरा है। कालनेमि पहले भी थे अब भी हैं आगे भी होंगे। सनातन धर्म की चिंता करने वाले चिंता से चिता पर जाए, उनकी बला से। राम-राम बोल कर पराया माल हड़पने वालों की कमी नहीं रहेगी।
खैर फिर लौटें आने वाले कुंभ की तरफ। दुनिया भर के सबसे बड़े धार्मिक समागम के निमित्त संतों की निगरानी कमेटी बनाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री ने मान लिया है। एक प्रस्ताव और था वह था राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने का, पर वह पूरा नहीं हो सका है। देखें यूपी के संत सीएम इसे मानते हैं अथवा नहीं। मप्र में शिवराज सिंह चौहान ने तो यह पहल कर दी है। राहुल गांधी समेत विपक्ष के सारे नेताओं को मेरा यह सुझाव है कि उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह घोषणा करनी चाहिए कि यदि उनकी सरकार बनी तो संतों को वीवीआइपी मान कर मंत्री पद का दर्जा दिया जाएगा। पूज्यनीय व सम्मानीय संतों का राजरोग गजब का है, इसका इलाज नेताओं के पास है, यह जानना सुखद लगा। समाज में संतों की भूमिका क्या होनी चाहिए, इस पर कौन विचार करेगा। जाहिर है मुझ जैसा अज्ञानी तो कदापि नहीं, लेकिन इंटीलेक्चुअल को तो आगे आना ही होगा। हिंदुत्व के लिए, सनातन मतावलंबियों के लिए यह विडंबना ही कही जाएगी कि संतों में संतोष भर नहीं दिखता। इसका उत्तर मुझे यही समझ में आता है कि साधो संतों में रगरा भारी। बड़े बड़े राजा महाराजा , महराज को संतुष्ट नहीं कर सके हैं तो संत सीएम की क्या बिसात। वाराणसी से लेकर इलाहाबाद, हरिद्वार जितनी भी धार्मिक जगहें हैं, वहां भगवाधारियों की सरकार होने के बाद भी संतों का असंतोष शायद इसीलिए है, क्योंकि हर किसी को कुछ चाहिए, सिवाय धर्म-अध्यात्मक के मार्ग के जरिए लोगों को सदमार्ग दिखाने के। तो चेलों जोर से बोलो -संतन की जय।
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