शनिवार, 21 अप्रैल 2018

पुस्तक दिवस पर पुरानी यादें

नमस्कार।
विश्व पुस्तक दिवस (23 अप्रैल) से एक दिन पहले  ब्लाग का यह पेज काला कर रहा हूं। बचपन की स्मृतियों के साथ। जबलपुर में राजकीय पुस्तकालय की पता नहीं कितनी सुबह शाम याद आ रही हैं बता नहीं सकता। छुटपन में अमर चित्र कथा सीरीज की कामिक्स। किशोरावस्था हुई तो कांदिबनी, दिनमान, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान। रविवार, दिनमान इत्यादि- इत्यादि। कंप्यूटर व इंटरनेट के दौर में आने के बाद दो चार पुस्तकें ही ऐसी रहीं जिन्हें कायदे से पढ़ा। इंडिया टुडे समय समय पर पढ़ता हूं, लेकिन करीब दो साल से निरंतरता टूट गईहै। खैर जिन कालजयी रचनाओं को पढ़ा है हाल के वर्षों में, इसमें एक है रागदरबारी। वाराणसी में हुए हादसे के बाद रामचरित मानस से नाता जोड़ लिया है। भरसक कोशिश रहती है कि कुछ चौपाइयां जरूर पढ़ लूं, हनुमान चालीसा पाठ के साथ।
पढ़ने लिखने से नाता पता नहीं कैसे आया... लेकिन अब भी खूब पढ़ना चाहता हूं। किसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए नहीं। स्वान्तः सुखाय मूल में रहता है।  मस्तिष्क की ममोरी कार्ड तथ्यों, बातों को पहले जैसा ग्रहण नहीं करती। इसकी वजह संभवतः उम्र का फेर भी है। अखबारों को सरसरी तौर पर पढ़ता हूं। गहराई से पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। मेरा मानना है कि एक अखबार के सारे पेजों पर दी गई पूरी सामग्री शायद ही कोई पढ़ पाता हो। यदि कोई यह दावा करता है तो कम से कम मैं उसकी इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता। निश्चित तौर पर नई पीढ़ी का किताबी पठन पाठन से नाता टूटा है। इंटर व कालेज स्तर पर बच्चे  पढ़ते हैं लेकिन कोर्स तक ही सीमित रहते हैं। ऐसे छात्रों को मैं सलाह देता हूं कि हिंदी में भी गद्य पद्य पढ़ें, लेकिन वह कहते हैं कि कोर्स का दवाब इतना है कि कला से जुड़े विषयों के लिए उनके पास समय नहीं।
किताबों से बेरुखी की एक वजह मुझे यह समझ में आती हैं कि यह महंगी हो चली हैं। साथ ही अंतर्विरोध भी पैदा करती हैं। यदि गांधी जी अहिंसा की बात कहते हैं तो हनुमान जी जैसे को तैसा जवाब देने की। फिर भी एक समझ तो पैदा होती ही है। आज 200 पेज की किताब के लिए दो सौ रुपये खर्च करना सबके बस की बात नहीं। फिर इन्हें सहेज कर रखना भी किसी चुनौती से कम नहीं। सेल्फ इत्यादि सबके घर में नहीं होते। अपन जैसे खानाबदोश के पास तो आज तक यह नसीब नहीं है। जबलपुर में पिता जी ने लकड़ी की आलमारी बनवाई थी, किताबें रखने के लिए, लेकिन चूहों का खौफ था। न जाने कितनी किताबें कुतर गए वह। 

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