होली गुजर चुकी है। उसकी शुभकामनाएं ब्लाग पर नहीं दे सका। खैर बहुत दिनों बाद ब्लाग पर हूं। दरअसल कुछ लिखने का मन नहीं होता इन दिनों। फिर भी दिल है कि मानता नहीं...। समाज, राजनीति पर फेसबुक पर कुछ टिप्पणियां की, लेकिन अलग अलग विचारधाराओं का चश्मा पहनने वालों की टिप्पणी ऐसी रहीं कि उस मंच पर भी खुद को संकुचित करना ही बेहतर मानता हूं फिलहाल। लोकसभा चुनाव के नतीजों तक यही खामोशी धारण किए रखूंगा। अभी यही कह सकता हूं। मौजूदा दौर में एक तरह से वीतराग है जीवन में। उम्मीदों का जिंदा होकर मरना और मर कर जिंदा होना।
हर दिन कुछ नया सोचता हूं। पर खटराग वही पुराना। 10 बजे के करीब सोकर उठने के बाद अखबार। समीक्षा। साथियों की, अपने काम की। फिर दोपहर में दफ्तर, रात में दफ्तर। आधी रात वापसी। कुछ निवाला पेट में जाता है। इसके बाद टिवटर, वाट्सएप होते हैं साथ में। ब्रह्म बेला में नींद लगती है। उससे पहले नहीं। इधर बीच अवकाशों का पता नहीं है। पहला कुंभ था, अब चुनाव आ गया। बीच में दो दिन का अवकाश मिला। इसमें एक साप्ताहिक अवकाश जोड़ दूं तो तीन दिन। एक छोटी सी संक्षिप्त यात्रा। एक वैवाहिक आयोजन में शिरकत। उसके बाद फिर दफ्तर। 26 जनवरी, होली अवकाश जोड़ दें तो मार्च एंड तक पांच दिन छुट्टी। ऐसे में यदि सोचता हूं कि नीरस जिंदगी कब ढोऊं ? तो क्या गलत सोचता हूं, मार्गदर्शन करेंगे। वैसे जब भी ऐसा सोचता हूं, मन के किसी कोने में आशा की किरण फूटती है कि जब घूरे के भी दिन बहुरते हैं तो मेरे क्यों नहीं बदलेंगे। जरूर बदलेंगे। यहां यह भी साफ कर दूं कि निराशावादी कतई नहीं हूं। आप भले चाहे जो मानें मुझे। असल में आज की जिंदगी में आप क्या हैं, इससे अधिक महत्व इस बात का होता है कि लोगों की धारणा क्या है आपके प्रति। मुझे लेकर भी ऐसी धारणा बन गई है कि निगेटिव एटीट्यूड है। इसका इलाज मेरे पास नहीं। दिन जरूर बदलेंगे। आखिर जिंदगी का दूसरा नाम ही है उम्मीद। बस सितारों को चमत्कार दिखाने दीजिए। दिल का एक कोना कहीं ना कहीं इसका संकेत दे रहा है।
हर दिन कुछ नया सोचता हूं। पर खटराग वही पुराना। 10 बजे के करीब सोकर उठने के बाद अखबार। समीक्षा। साथियों की, अपने काम की। फिर दोपहर में दफ्तर, रात में दफ्तर। आधी रात वापसी। कुछ निवाला पेट में जाता है। इसके बाद टिवटर, वाट्सएप होते हैं साथ में। ब्रह्म बेला में नींद लगती है। उससे पहले नहीं। इधर बीच अवकाशों का पता नहीं है। पहला कुंभ था, अब चुनाव आ गया। बीच में दो दिन का अवकाश मिला। इसमें एक साप्ताहिक अवकाश जोड़ दूं तो तीन दिन। एक छोटी सी संक्षिप्त यात्रा। एक वैवाहिक आयोजन में शिरकत। उसके बाद फिर दफ्तर। 26 जनवरी, होली अवकाश जोड़ दें तो मार्च एंड तक पांच दिन छुट्टी। ऐसे में यदि सोचता हूं कि नीरस जिंदगी कब ढोऊं ? तो क्या गलत सोचता हूं, मार्गदर्शन करेंगे। वैसे जब भी ऐसा सोचता हूं, मन के किसी कोने में आशा की किरण फूटती है कि जब घूरे के भी दिन बहुरते हैं तो मेरे क्यों नहीं बदलेंगे। जरूर बदलेंगे। यहां यह भी साफ कर दूं कि निराशावादी कतई नहीं हूं। आप भले चाहे जो मानें मुझे। असल में आज की जिंदगी में आप क्या हैं, इससे अधिक महत्व इस बात का होता है कि लोगों की धारणा क्या है आपके प्रति। मुझे लेकर भी ऐसी धारणा बन गई है कि निगेटिव एटीट्यूड है। इसका इलाज मेरे पास नहीं। दिन जरूर बदलेंगे। आखिर जिंदगी का दूसरा नाम ही है उम्मीद। बस सितारों को चमत्कार दिखाने दीजिए। दिल का एक कोना कहीं ना कहीं इसका संकेत दे रहा है।
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