रविवार, 27 दिसंबर 2015

आओ 2016, खुशियां लाओ

साल 2015 की विदाई का वक्त नजदीक है। खट्टी मिट्ठी यादों संग यह विदा हो जाएगा। कुछ घंटे ही शेष हैं। गुजरते साल में बदलाव के नाम पर मेरे पास अपने दो अजीजों को खोने का गम है और इलाहाबाद में ही किराए के दूसरे मकान में रहने का। इसे अच्छा कहूं अथवा बुरा, समझ नहीं पा रहा हूं। आर्थिक दुश्वरियां इस साल भी कदम दर कदम रहीं। खैर, उम्मीद करता हूं कि साल 2016 बेहतर रहेगा। सामाजिक और आर्थिक, दोनों ही मोर्चें पर। पिता जी, पत्नी, दोनों पुत्र शुभम, आयुष, छोटे भाई दीपक और उनकी पत्नी रीतू तथा प्रिय श्री और छोटे देव स्वस्थ रहेंगे। उन्हें ईश कृपा से न तो कोई शारीरिक दिक्कत होगी, न आर्थिक। श्रीहरि से इतनी ही विनती है। बुआ जी नहीं रहीं, छोटी सरहज संध्या भी चली गईं। सितंबर से नवंबर तक के बीच। जुलाई में मकान छोड़ना पड़ा था। वैसे तो हानि, लाभ जीवन,मरण जस अपजस विधि (विधाता ) के हाथ होता है, फिर भी प्रार्थना तो की ही जा सकती है। आप कहेंगे, अपनों के लिए ही प्रार्थना। ऐसा भी नहीं है। मैं हर उस मानव तथा उसकी पालक प्रकृति की कुशलक्षेभ की कामना करता हूं, जिनमें दूसरों के प्रति संवेदना है। मेरे शब्दों से, कर्मों से किसी का दिल नहीं दुखेगा, ऐसी शक्ति ईश्वर मुझे दें। यह मैं अपने लिए चाहता हूं। धन -संपत्ति दें अथवा नहीं।
साल के आखिरी हफ्ते से पहले वाले सप्ताह में दो दिन सोनभद्र के राबटर्सगंज में गुजरे। बाबू संदीप सिंह के साथ। सुमन जी ने फिर नेह उड़ेला दिया, हमेशा की तरह। अब वह प्रधान हो गई हैं पनिकप कला ग्राम पंचायत की। उनकी खुशी में खुश था, इसलिए सोनभद्र गया था। पनिकप नहीं जा सका। देखिए ईश्वर नए साल में कब इसके लिए योग बनाते हैं। आखिर हर दाने पर खाने वाले का नाम जो लिखा है। जो दाना मेरा निवाला बनेगा, वह कब बुलाता है, उसे समय पर ही छोड़ देना मुनसिब समझता हूं। कल यानि शनिवार को पिता जी से बात हो रही थी। वह अपने पुराने दिनों में पहुंच गए। मैंने उन्हें टोका। मना किया बीते हुए दिन की याद दिलाने के लिए। मन मसोस कर वह मान भी गए, लेकिन मैं अब सोच रहा हूं कि क्या मेरे मना करने से ही वह मान जाएंगे। माना कि जिंदगी चलने का नाम है। चलती का नाम ही गाड़ी है, लेकिन क्या यादें बिसारी जा सकती हैं आसानी से। वह भी यदि कड़वी हो तो। शायद नहीं।
यहां संगम नगरी में एक बार फिर माघ मेला लगने जा रहा है। जनवरी के दूसरे पखवारे में धूम शुरू हो जाएगी। इस बार मन में एक संकल्पना है। संकल्प नहीं। यह संकल्पना यह है कि मानस नवाह्न यज्ञ हो जाए, स्वामी ओमानंद जी महराज के शिविर में। उसके लिए शिविर के वास्ते जमीन चाहिए तथा अन्य सुविधाएं भीं। प्रयासरत हूं। जिलाधिकारी ने आश्वस्त किया है। एडीेएम ने लिख भी दिया है आवेदन पर। यदि सब कुछ मनोकूल रहा तो श्रीराम जी की किरपा से उनके नाम की गंगा में मैं भी डुबकी लगा लूंगा। भले ही एक -दो दिन ही सही। रही बात धन की तो मित्र मंडली है ही। उसके सामने हाथ फैलाऊंगा। दरअसल जीवन के 46 वें वसंत में आ पहुंचा हूं। अब लगता है कि नये रास्ते की तलाश करनी होगी, जिंदगी का दुर्गम पथ सुगम बनाने के लिए। शब्दों के संसार में बहुत डूब-उतरा चुका हूं। जितना मिला, उसको ही मुकददर मान लूं तो अच्छा रहेगा। आने वाले दिन और क्षण मेरे, मेरे परिवार तथा शुभचिंतकों के लिए शीतल हों, मन को भाएं, इन्हीं शब्दों के साथ रविवार 27 दिसंबर 2015 की इस पोस्ट को विराम दे रहा हूं।   

कोई टिप्पणी नहीं:

दुनिया, राजनीति और फैसले

 सप्ताहनामा  ------------- सबसे पहले सबको गेगेरियन कैलेंडर के वर्ष 2023 की शुभकामनाएं। हर साल की तरह इस साल भी संकल्प ले रहा हूं गुडी गुडी (...