बहुत दिन हो गए हैं अनपढ़ को कुछ गढ़े हुए। आज रविवार है। आफिस में एक तरह से सन्नाटा है। सुबह की मीटिंग के बाद सहयोगी अपने-अपने टास्क पर निकल गए हैं। मुझे लग रहा है कि एक बार अपने ब्लाग को अपडेट कर दूं। जुलाई में लिखी थी अपन ने अपने मन की आखिरी बात। अब दिसंबर चल रहा है। आज तो छह दिसंबर है। वर्ष 1992 में इस तारीख को अपन जबलपुर में थे। तब देशबंधु में काम करते थे। अयोध्या में बाबरी ध्वंस की सूचना फ्लैश हुई थी टेलीप्रिंटर पर। झटका लगा था मन को। कभी जो नहीं सोचा था, वह हो गया था उस दिन। नौदराब्रिज पर जहां हमारा दफ्तर था, उसके ठीक पीछे नया मोहल्ला आबाद है। मुस्लिम बहुत बस्ती है यह जबलपुर की। ओमती थाना क्षेत्र में पड़ती है। अयोध्या से आती सूचनाएं तेजी से फैल रही थीं और उसके अनुपात में ही तनाव। देखते -देखते कर्फ्यू लग था, शहर के लगभग सभी थाना क्षेत्रों में। रात में कान में इस शोर ने मस्तिष्क को झन्ना दिया कि... तकबीर अल्लाह हो अकबर भी और साथ ही जय श्री राम। आफिस की छत पर गए तो दूर-दूर आग जलती दिख रही थी शहर में। दफ्तर की गाड़ी से घर छुड़वाने का इंतजाम किया गया था हमें। रास्ते में सड़क पर कांच की अनगिनत बोतलें टूटी थीं, और टूटे पड़े थे ईंट तथा नजर आ रहे थे पत्थर। गनीमत इतनी ही थी कि हमारे दफ्तर में कोई अप्रिय प्रसंग नहीं हुआ। बस अफवाहों का बाजार गर्म रहा। करीब चार पांच दिन तनाव भरे माहौल में गुजरे थे। देखते ही देखते 23 साल बीत गए हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश में शिफ्ट होने के बाद तीन मौकों पर अयोध्या जाने का मौका मिला है। एक बार दर्शन पूजन के बहाने, दो बार अंत्येष्टि में। पहले फुफेरे भाई राकेश उर्फ भल्लू की पार्थिव देह के सरयू तट के किनारे पंचतत्व में विलीन हुई, फिर इस साल प्यारी बुआ जी की देह। अयोध्या वाकई में रोती और मुंह चिढ़ाती नजर आई। हनुमान गढ़ी भी जाना हुआ था दर्शन के क्रम में। वहां के बंदर अब भी स्मृतियों में हैं। खैर, इस प्रसंग पर बस इतना ही। बुआ जी के महाप्रयाण से पहले सितंबर में एक और अप्रिय प्रसंग से दो चार होना पड़ा। 14 सितंबर को हमारी सरहज संध्या उर्फ ऊषा चल बसीं। जुलाई में जब हम गांव से आए थे तभी ऊषा की बीमारी की सूचना मिली। पवन (हमारे छोटे साले) उन्हें लेकर आए। बेली अस्पताल में भर्ती कराया। यहां डाक्टर ओपी त्रिपाठी ने उनका इलाज किया। बीमारी शायद समझ ली थी उन्होंने, एसजीपीआई के लिए रेफर किया था, लेकिन मौत तो कानपुर में लिखी थी। अगस्त में भर्ती हुईं। रक्षाबंधन के दिन आपरेशन हुआ। ओपेन हार्ट सर्जरी थी। दोनों बाल्व बदले गए। 19 दिन वेंटिलेटर पर रहीं, लेकिन बचाई नहीं जा सकीं। पवन के साथ धन जाए, धर्म जाए वाली बात हुई। अब वह तथाकथित देवी-देवताओं में विश्वास नहीं रखते। रखें भी कैसे? आखिर कोई सहायक तो नहीं हुआ उनका। मैंने भी जो बन पड़ा किया। अंधविश्वासी हूं। लगा कि भगवान नाम की चीज कुछ चमत्कार करेंगे, एक ज्योतिषी की शरण ली। उन्होंने कहा था कि कुछ अनुष्ठान करना होगा, हो सकता है बिगड़ी बात बन जाए। उन्होंने किया भी, लेकिन कहते हैं न कि काल की गति टारै नहीं टरती। अब संध्या स्मृति हैं हमारे लिए। उनकी हंसी इस समय भी नहीं भुला पा रहा हूं। शायद अंतिम क्षण तक नहीं भुला सकूंगा। संध्या और बुआ जी की मौत का सदमा कुछ ऐसा लगा है परिवार पर कि शुभम -आयुष की मम्मी किसी भी सूरत में कम से कम इस साल तो अस्पताल में भर्ती होना ही नहीं चाहतीं। पिछले रविवार को उनके पेट में जर्बदस्त दर्द हुआ। इमरजेंसी में ले गए बेली अस्पताल के। तीन-तीन इंजेक्शन लगे, कुछ राहत हुई। अल्टा साउंड, डिजिटल एक्सरे में कुछ नहीं निकला। अब कुछ ठीक हैं। कहती है जो भी भर्ती हो रहा है, उसे भगवान भर्ती कर ले रहे हैं अपने लोक में। माटी के तन का इतना मोह होता है यह अब जान पा रहा हूं। यदि ईश्वर हैं तो उनसे यही गुजारिश करूंगा कि अब कम से कम इस साल तो वह मेरे किसी भी शुभचिंतक के लिए ऐसी नौबत नहीं लाएं कि उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़े।
इधर पिता जी का फोन कुछ दिनों से नहीं आया। वह वाराणसी में हैं इन दिनों। तीन दिसंबर को जरूर उन्होंने बधाई दी थी। कहते हैं इस दिन मैं पैदा हुआ था। यदि हुआ था तो यह विषम संख्या वाला दिन है। तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा।...बचपन में हम ऐसा कहते हुए हंसते थे। संयोग देखिए। खैर, बेबी, दीपू, रीतू ने इस दिन बधाई दी। राबर्ट्सगंज से सुमन सिंह जी ने भी बधाई दी। वह वर्ष 2003 से जन्मदिन की शुभकामनाएं देती आ रही हैं। मैंने उनसे कहा...चलिए आपको तो याद है कम से कम। बोलीं यह दिन नहीं भुला पाती हूं। इससे एक दिन पहले उनके पति संदीप सिंह का जन्मदिन पड़ता है. मैंने उन्हें बधाई दी थी। उनके फेसबुक बाल पर लिखा था। जन्मदिन की शुभकामनाएं, इस साल प्रधान पति कहलाएं। उन्होंने हंस कर कहा था नहीं ड्राइवर कहिए सर...कार चुनाव चिह्न है। तो 2015 गुजर रहा है अहिस्ता-अहिस्ता। ईश्वर की कृपा रही तो कुछ दिनों बाद मैं परिवार के साथ वर्ष 2016 में होऊंगा। ईश्वर से अब यही कामना है कि व दुख ले जाएं, सुख छोड़ जाएं। इसलिए आज यही कहकर अपनी बात खत्म करूंगा कि जाओ दुख आओ सुख।
इधर पिता जी का फोन कुछ दिनों से नहीं आया। वह वाराणसी में हैं इन दिनों। तीन दिसंबर को जरूर उन्होंने बधाई दी थी। कहते हैं इस दिन मैं पैदा हुआ था। यदि हुआ था तो यह विषम संख्या वाला दिन है। तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा।...बचपन में हम ऐसा कहते हुए हंसते थे। संयोग देखिए। खैर, बेबी, दीपू, रीतू ने इस दिन बधाई दी। राबर्ट्सगंज से सुमन सिंह जी ने भी बधाई दी। वह वर्ष 2003 से जन्मदिन की शुभकामनाएं देती आ रही हैं। मैंने उनसे कहा...चलिए आपको तो याद है कम से कम। बोलीं यह दिन नहीं भुला पाती हूं। इससे एक दिन पहले उनके पति संदीप सिंह का जन्मदिन पड़ता है. मैंने उन्हें बधाई दी थी। उनके फेसबुक बाल पर लिखा था। जन्मदिन की शुभकामनाएं, इस साल प्रधान पति कहलाएं। उन्होंने हंस कर कहा था नहीं ड्राइवर कहिए सर...कार चुनाव चिह्न है। तो 2015 गुजर रहा है अहिस्ता-अहिस्ता। ईश्वर की कृपा रही तो कुछ दिनों बाद मैं परिवार के साथ वर्ष 2016 में होऊंगा। ईश्वर से अब यही कामना है कि व दुख ले जाएं, सुख छोड़ जाएं। इसलिए आज यही कहकर अपनी बात खत्म करूंगा कि जाओ दुख आओ सुख।
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