अपन का आकार बिगड़ रहा है पत्र को आकार देते-देते। सच...। शब्दों की दुनिया में 23 बसंत बीतने के बाद कुछ ऐसा ही महसूस होता है। दो दिन पहले मेरे एक शुभचिंतक को नई नौकरी मिली। उन्होंने आशीर्वाद चाहा था। मैंने दिया। देता भी कैसे नहीं। यही तो दे सकता हूं। यही है मेरे पास। ढेरों अपयश के बीच। यश अपन से दूर रहा है नामुराद। जिनके लिए कुछ किया भी हो (वैसे तो मैंने किसी के लिए कुछ किया नहीं है, फिर भी ईश्वर के दरबार में कहीं कुछ हिसाब किताब में निकल आया तो गुस्ताखी माफ.) उन्होंने भी नुक्ताचीनी ही निकाली है। खैर, यह उनका काम है। मुझे तो इतना पता है कि जब जिस जगह रहो, ईमानदारी से अपना काम करो। यह परवाह नहीं करो कि लोग क्या कहते हैं। लोगों का काम ही दरअसल कुछ कहना है। लेकिन तकलीफ वहीं होती है जहां लगता है कि ईश्वरीय विधान में मेहनत के लिए जगह कम है, प्रारब्ध के लिए ज्यादा। फिर यह सोचकर संतोष करता हूं कि अपन का प्रारब्ध यही है। लिखो-पढ़ो और गरियाओ किस्मत को। दो दिन पहले वाराणसी में था। अपने अभिन्न शुभचितंक रजनीश त्रिपाठी के पुत्र के विवाहोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित रात्रिभोज में। तमाम पुराने शुभचिंतकों से मुलाकात हुई। बद्री विशाल जी भी मिले। वेद प्रकाश सिंह भी। किन -किन का नाम लिखूं। किनका छोड़ू, पंडित अजय चतुर्वेदी भी मिले, राजनाथ तिवारी भी। अमर उजाला में सब साथ थे। अब कोई यहां है कोई वहां। निंदा रस का आनंद भी लिया। एक पुराने संपादक की बात उठ खड़ी हुई, राजनाथ जी का जैसे स्वाद कसैला हो गया।
सच है हिंदी पत्रकारिता ऐसे ही लोगों से भरी है। वरिष्ठ सहयोगी हरिशंकर मिश्र जी ने एक प्रसंग सुनाया। आज की तारीख में बड़े नामचीन पत्रकार की किसी जगह की स्वीकारोक्ति। बड़े पत्रकार महाशय किसी समारोह में थे। वहां उनसे एक छात्र ने पूछा -आप सफल हैं, लेकिन क्या यह बताएंगे कि सफलता कैसे मिलती है? जवाब मिला-अपनों के कंधे पर चढ़ना सीखो। निर्मम बनो उनके प्रति। कहावत है कि छोटे लोग बड़ों का अनुगमन करते हैं, ऐसे में यदि सवाल कर्ता भावी पत्रकार अपनों के प्रति निर्मम नहीं बना तो...? संभवतः वह दूसरा सुरेश पांडेय होगा।
बहरहाल, मैं अपनी असफलता के लिए खुद को ही जिम्मेदार मानता हूं। अंर्तमुखी हूं। लेकिन लोग मुंहफट कहते हैं। अमर उजाला के कार्यकाल में एक संपादक ने मेरी पहचान शार्ट टेंपर्ड के रूप में की। सिर्फ की ही नहीं, मेरी प्रगति के लिए इसे अवरोध माना और मुझे प्रमोशन के लायक ही मानने से इंकार कर दिया। मेरे जिस समकक्ष सहयोगी को उन्होंने प्रमोशन दिया वह आज पद प्रतिष्ठा में मुझसे कहीं आगे हैं, लेकिन प्रमोशन देने वाले संपादक जी अब निजी बातचीत में उसे अपनी भूल मानते हैं। जब उनसे कुर्सी छिन गई तो प्रमोशन पाने वाले मेरे साथी ने उनके फोन तक को रिसीव करना उचित नहीं समझा था। और तो और सार्वजनिक तौर पर उनसे जो बन पड़ा, उन्होंने उलूलजुलूल कहा। कामयाबी का यह शार्टकट मैं नहीं सीख पाया। इसीलिए शायद विफल हूं जिंदगी का गणित समझने में। बिहार के मित्रों के शब्दों में कहूं तो बुरबक हूं।
इस रविवार इतना भर।
सच है हिंदी पत्रकारिता ऐसे ही लोगों से भरी है। वरिष्ठ सहयोगी हरिशंकर मिश्र जी ने एक प्रसंग सुनाया। आज की तारीख में बड़े नामचीन पत्रकार की किसी जगह की स्वीकारोक्ति। बड़े पत्रकार महाशय किसी समारोह में थे। वहां उनसे एक छात्र ने पूछा -आप सफल हैं, लेकिन क्या यह बताएंगे कि सफलता कैसे मिलती है? जवाब मिला-अपनों के कंधे पर चढ़ना सीखो। निर्मम बनो उनके प्रति। कहावत है कि छोटे लोग बड़ों का अनुगमन करते हैं, ऐसे में यदि सवाल कर्ता भावी पत्रकार अपनों के प्रति निर्मम नहीं बना तो...? संभवतः वह दूसरा सुरेश पांडेय होगा।
बहरहाल, मैं अपनी असफलता के लिए खुद को ही जिम्मेदार मानता हूं। अंर्तमुखी हूं। लेकिन लोग मुंहफट कहते हैं। अमर उजाला के कार्यकाल में एक संपादक ने मेरी पहचान शार्ट टेंपर्ड के रूप में की। सिर्फ की ही नहीं, मेरी प्रगति के लिए इसे अवरोध माना और मुझे प्रमोशन के लायक ही मानने से इंकार कर दिया। मेरे जिस समकक्ष सहयोगी को उन्होंने प्रमोशन दिया वह आज पद प्रतिष्ठा में मुझसे कहीं आगे हैं, लेकिन प्रमोशन देने वाले संपादक जी अब निजी बातचीत में उसे अपनी भूल मानते हैं। जब उनसे कुर्सी छिन गई तो प्रमोशन पाने वाले मेरे साथी ने उनके फोन तक को रिसीव करना उचित नहीं समझा था। और तो और सार्वजनिक तौर पर उनसे जो बन पड़ा, उन्होंने उलूलजुलूल कहा। कामयाबी का यह शार्टकट मैं नहीं सीख पाया। इसीलिए शायद विफल हूं जिंदगी का गणित समझने में। बिहार के मित्रों के शब्दों में कहूं तो बुरबक हूं।
इस रविवार इतना भर।
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